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‘राष्ट्र जागरण में रत पाञ्चजन्य’

पाञ्चजन्य के 78वें स्थापना वर्ष पर भारत की प्रगति के ‘अष्टायाम’ के समापन सत्र को रा. स्व. संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने संबोधित किया

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jan 22, 2025, 08:16 am IST
in विश्लेषण, संघ @100, धर्म-संस्कृति, पाञ्चजन्य इवेंट
समापन सत्र को संबोधित करते हुए सुनील आंबेकर

समापन सत्र को संबोधित करते हुए सुनील आंबेकर

पाञ्चजन्य के 78वें स्थापना वर्ष पर भारत की प्रगति के आठ केंद्रों पर आधारित कार्यक्रम ‘अष्टायाम’ के समापन सत्र को रा. स्व. संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने संबोधित किया। प्रस्तुत हैं उस संबोधन के मुख्यांश-

पाञ्चजन्य की यात्रा काफी लंबी है। यह राष्ट्रीय विचार की एक सतत यात्रा है। पाञ्चजन्य का जन्म इस उद्देश्य के साथ हुआ कि लोग भारत के बारे में समझें, भारत के बारे में जानें और भारत के लिए काम करने की प्रेरणा पाएं। पाञ्चजन्य प्रारंभ से आज तक इसी कार्य को कर रहा है। स्वाधीनता के बाद से ही पाञ्चजन्य राष्ट्र जागरण का काम कर रहा है, क्योंकि इतने वर्षों के बाद जब कोई भी देश विदेशी दासता से मुक्त होता है तो उसमें बहुत वैचारिक उथल-पुथल होती है।

विदेशी दासता के काल में बहुत सारे ऐसे विषय भी आए, जिनके जरिए भारत के बारे में भ्रम उत्पन्न करने के प्रयास हुए। जैसे-अपना राष्ट्र क्या है, भारत क्या है? हमारी एकता के अस्तित्व पर भी बहुत सारे प्रश्न उठाए गए। इस बात पर भी सवाल उठाए गए कि हमारी एकता का आधार क्या होगा। अगर हम भारत के इतिहास पर नजर डालें तो पता चलेगा कि यह देश हजारों साल पुराना है। इसके बावजूद प्रश्न उठा कि भारत का जन्म कब हुआ? पर भारत तो एक ऐसा राष्टÑ है, जिसके जन्म की कोई तारीख ही नहीं है।

यह तो मानव संस्कृति की ऐसी यात्रा है, जिसका प्रारंभ कब हुआ, इसका ठीक-ठीक से अंदाजा किसी को नहीं है। परंतु यह निश्चित है कि भारत की इस यात्रा का उद्देश्य है समस्त मानव जाति का कल्याण करना, विश्व का कल्याण करना। लेकिन कालांतर में इस बात को एक अलग तरीके से प्रस्तुत करने का प्रयास हुआ। इस कारण उन चीजों और बातों पर आघात किया गया, जिनसे भारत के प्रति स्वाभिमान उत्पन्न होता है, लेकिन लोग अब इस बात को समझने लगे हैं। इसके बावजूद इस यात्रा को आगे ले जाने की जरूरत है। इस पर चर्चा भी जरूरी है।

एक समय था जब अपने देश में कई तरह की बातें की जाती थीं। जैसे, पूर्वोत्तर भारत के लोगों के लिए कहा जाता था कि आप कुछ अलग दिखते हो, आप अलग हो। ये बातें केवल किसी विश्वविद्यालय की कक्षा या मीडिया तक सीमित नहीं थीं। ये बातें लोगों के मन में, उनके जीवन में घर कर गई थीं। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि अलगाववादी, हिंसक और भारत की प्रगति के खिलाफ कई आंदोलन हुए और ये सिर्फ पूर्वोत्तर तक ही नहीं रहे, बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी गए। इसलिए इस तरह की बातें नहीं होनी चाहिए। इसकी जगह एकता के उन सूत्रों को ढूंढना चाहिए, जिनके बल पर हम पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक एक हैं। इस कार्य में पाञ्चजन्य की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

आज पूर्वोत्तर सहित पूरे देशभर में एक सामान्य धारणा यह बन गई है कि पहले जो बातें की जा रही थीं, वे गलत थीं। उनका कोई आधार नहीं था और उसका उद्देश्य भी सही नहीं था। इस समझ के बाद ही पूर्वोत्तर भारत का वातावरण बदला है। हालांकि कुछ अपवाद हो सकते हैं, लेकिन आम तौर पर यह महसूस किया जा रहा है कि वहां का माहौल बदल गया है। आज से करीब 5 साल पहले के समाचारपत्रों को देखेंगे तो पाएंगे कि पाञ्चजन्य छोड़कर बाकी पत्रों में इस तरह के समाचार प्रमुखता से होते थे कि दिल्ली के किसी क्षेत्र में किसी ने पूर्वोत्तर भारत के छात्रों के बारे में कुछ ‘गलत’ कह दिया। इस कारण संघर्ष हुआ। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह प्रयास, यह जागरूकता इस स्तर पर पहुंची है कि अब पहले जैसी खबरें पढ़ने को नहीं मिलती हैं, न ही बेतुकी बातें हो रही हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि देशभर के लोगों में एक जागरूकता आई है।

महाकुंभ और हमारे सांस्कृतिक प्रतीक

कुंभ का आयोजन 12 वर्ष में एक बार एक स्थान पर होता है। इससे हमारे समाज की मानसिक स्थिति अगले 12 वर्ष के लिए सशक्त होती है और इससे समाज की एकता और मजबूत होती है। इसलिए ऐसे कुंभ को और मजबूत किया जाना चाहिए। जो लोग ऐसा नहीं चाहते, वे इस पर नकारात्मक टिप्पणियां करते रहते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे त्योहार हमें जोड़ते भी हैं। इसलिए ऐसे त्योहारों को और अधिक धूमधाम से मनाने की आवश्यकता है। हालांकि देश में कुछ ऐसे तत्व भी हैं, जो होली या दीपावली के समय कुछ उल्टी-सीधी बातें करते हैं। इन बातों को हल्के में नहीं लेना चाहिए। पूरे समाज को मिलकर इन चीजों का सामना करना चाहिए।

धार्मिक ग्रंथों का महत्व

हमारे धर्मिक ग्रंथ रामायण और महाभारत हैं, जो हमें अच्छे जीवन मूल्य सिखाते हैं, हमें मिल-जुलकर रहने के लिए कहते हैं, हमें राक्षसों से लड़ने, एक-दूसरे के प्रति प्रेम और स्नेह से रहने की प्रेरणा देते हैं। वे हमें अपनेपन का एहसास कराते हैं। इसलिए इन ग्रंथों के साथ-साथ अपने प्रतीक चिन्हों को संभाल कर रखने की आवश्यकता है।

आज के समय में संविधान एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रतीक है और इसीलिए आज जब देश में बहुत सारी चर्चाएं चल रही हैं, तो इन बातों को फिर से याद करना, इन बातों पर चर्चा करना और उसी आधार पर आगे बढ़ते रहना आवश्यक है। अब समय बदल रहा है। पूरे देश में उत्साह का माहौल है और पूरी दुनिया भारत की ओर देख रही है। बहुत देशों को भारत से योग मिला। अब ‘मेडिटेशन डे’ भी लिया है और अभी बहुत सारी बातें हैं जिसके लिए वे भारत की तरफ भी देख रहे हैं।

ए.आई. और नैतिक सवाल

अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (ए.आई.) आ गया है। आने वाले समय में यह हमारे जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित करेगा। सच तो यह है कि ऐसा वातावरण बन भी चुका है। आज यह एक महत्वपूर्ण विषय है। भारत को यह कहना होगा कि ए.आई. के क्षेत्र में, साथ ही जैविक क्षेत्र में, हमारे द्वारा विकसित विज्ञान का नैतिक उपयोग कहां और कैसे किया जाए। इसलिए यह मुद्दा उठाना आवश्यक है कि ए.आई. में क्या नैतिक है और क्या अनैतिक है।

कौन-सी बात मानव हित में है और कौन-सी नहीं। इन चीजों पर बात करना जरूरी है और इसलिए आने वाले समय में हमारे देश के लोगों को ए.आई. जैसी नई चीजों का स्वागत करना चाहिए और यह तकनीकी कैसे देश के हित में काम करे, इस पर विचार करना चाहिए। क्योंकि जब भी कोई नई चीज आती है तो उसका उपयोग दोनों तरह से हो सकता है। इसीलिए जो लोग अच्छा चाहते हैं, उन्हें जल्दी से यह बात समझनी होगी और सोचना होगा कि नए समय में यह पूरी दुनिया के हित में लोगों के लिए कैसे लाभदायक और नैतिक होगी।

यह हमारे देश की प्रगति में भी उपयोगी होगी। वहीं दूसरी ओर यदि समय रहते इसे संभाला नहीं गया तो इसका हमारे देश की एकता, अखंडता, प्रगति और जनजीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इसलिए यह कोई विकल्प नहीं है कि हम इसे चाहते हैं या नहीं। लेकिन हम इसे कैसे चाहते हैं, इस बारे में निश्चित रूप से विकल्प हैं। इसलिए मुझे लगता है कि आज जब हम भारत के संदर्भ में आधुनिक विषयों पर बात करें तो ऐसे विषयों पर भी चर्चा होनी चाहिए।

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