सनातन दर्शन की प्रेरणास्रोत है पुण्य नगरी अयोध्या
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होम भारत

सनातन दर्शन की प्रेरणास्रोत है पुण्य नगरी अयोध्या

Written byडॉ. कृष्ण गोपाल सह सरकार्यवाहडॉ. कृष्ण गोपाल सह सरकार्यवाह
Jan 11, 2025, 09:50 am IST
inभारत, धर्म-संस्कृति

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहसरकार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल ने 28 फरवरी-1 मार्च 2020 को वडोदरा (केवड़िया) में सम्पन्न इंडिया फाउंडेशन के छठे इंडिया आइडियाज कॉन्क्लेव में ‘श्रीराम जन्मभूमि: भविष्य की परिकल्पना’ विषय पर सारगर्भित उद्बोधन दिया था। इसमें अयोध्या के ऐतिहासिक-आध्यात्मिक महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि प्रश्न सिर्फ एक मंदिर के निर्माण का नहीं है, अपितु प्रश्न है भारत को एक रखने वाली सनातन संस्कृति के चिन्ह को परिपुष्ट करने का। प्रस्तुत हैं डॉ. कृष्णगोपालके उसी उद्बोधन के संपादित अंश

डॉ. कृष्णगोपाल
सह सरकार्यवाह, रा.स्व.संघ

राम जन्मभूमि मंदिर आंदोलन भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसके संबंध में हमें एक बात समझनी होगी कि यह आंदोलन सिर्फ एक मंदिर के निर्माण के लिए नहीं था। हम इतिहास जानते हैं कि भारत करीब 1,300 वर्ष से हमलावरों, आक्रमणकारियों से लड़ता आ रहा था। आजादी के बाद देशवासियों को लगता था कि आक्रमणकारियों ने देश में जहां-जहां विध्वंस किये वहां-वहां पुनर्निर्माण किया जाएगा। लेकिन हैरानी की बात है, ऐसा नहीं हुआ। बेशक, दुनिया का कोई भी समाज स्वाभिमान एवं सम्मान के बिना नहीं रह सकता। उन 1,200-1,300 वर्ष के दौरान भारत ने हमलावरों के दुष्कृत्यों के असाधारण दृश्य देखे थे। बाहर से आए आक्रमणकारी घोर असहिष्णु थे। वे भारतीय संस्कृति-अध्यात्म के हर चिन्ह को मिटाने का पक्का इरादा करके आये थे। दुनिया में और भी स्थानों पर वे वैसा ही विध्वंस मचा चुके थे। भारत में भी उन्होंने बार-बार यहां के महत्वपूर्ण मंदिरों को तोड़ने का संकल्प लिया और उन्हें तोड़ा।

लेकिन जैसी देशवासियों को उम्मीद थी, उसके उलट आजादी के बाद उन ध्वस्त मंदिरों के पुनर्निर्माण का कोई कदम नहीं उठाया गया। स्थितियां कुछ और होतीं अगर भारत का मुस्लिम समाज स्वयं आगे आकर कहता कि उनके पूर्वजों ने जो कुछ गलत किया उसका प्रायश्चित करते हुए वे हिन्दुओं को उनके आस्था-केन्द्र सौंपते हैं।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ अपनी पुस्तक ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में लिखते हैं, ‘‘हिन्दू-मुस्लिम एकता का कोई भी प्रयास इस देश में सफल नहीं हो सका। दिल ऐसे फटे कि घाव गहरे होते गये। खाइयां बढ़ती गईं।’’ भारत में हमलावर बार-बार मंदिर तो तोड़ते गए, लेकिन वे यहां के जनमानस में खंडहर के ऊपर नये मंदिर के निर्माण का संकल्प लेने का प्रण नहीं तोड़ सके। ऐसा संकल्प ग्रीकलोग नहीं ले सके, मेसोपोटामिया के लोग नहीं ले सके, मिस्र और पर्शिया के लोग भी नहीं ले सके। लेकिन भारत के लोगों के मन में यह दृढ़ संकल्प था कि उचित समय आने पर हम अपने ध्वस्त मंदिरों को फिर से बनाएंगे। स्पष्ट है कि आक्रमणकारी यहां के समाज की भावना को चोट नहीं पहुंचा सके। हिन्दू समाज की उदारता के बारे में ब्रिटिश इतिहासकार आर्नोल्ड टॉयन्बी ने कहा है-‘‘1817 में जब रूस ने वारसा को जीता तो वहां के मुख्य चर्च को ध्वस्त करके आर्थोडॉक्स चर्च बना दिया। लेकिन 1918 में प्रथम विश्वयुद्ध में रूस की हार होने और पोलैंड के आजाद होने पर, पोलैंडवासियों ने आर्थोडॉक्स चर्च को ध्वस्त करके रोमन कैथोलिक चर्च बना दिया। ऐसा उन्होंने अपने राष्टÑ के स्वाभिमान को अक्षुण्ण रखने के लिए किया।’ आर्नोल्ड ने कहा, भारतीय नेतृत्व में (आजादी के बाद) ऐसी भावना नहीं थी। यह बात उन्होंने 1960 में नई दिल्ली में एक सेमिनार में कही थी कि भारत के लोग वारसा के लोगों की तरह नहीं हैं, यहां के लोग अधिक उदार हैं जो सब सहन कर रहे हैं’।

भारत कभी बिखरा नहीं

हमें यह समझना होगा कि अयोध्या में लड़ाई केवल एक मंदिर के निर्माण के लिए नहीं थी। इसके लिए समाज एक हजार वर्ष से लड़ रहा था। यहां दो बातें उल्लेखनीय हैं-एक, भारत लड़ता है और कायम रहता है। यह ग्रीस, मेसोपोटामिया, पर्शिया या रोम की तरह समाप्त नहीं हो जाता। उसका कारण यह है कि हम आध्यात्मिक हैं। विविधताओं के बावजूद भारत मिलकर रहता है। मान लीजिए, 1947 के बाद भारत का नेतृत्व यह फैसला लेता कि वह (विवादित) ढांचा हटा दिया जाए तो तब उस फैसले का कोई विरोध नहीं होता। कोई मना भी नहीं करता। लेकिन वैसा नहीं किया गया। भारत की प्रकृति है हर काम प्रेम से हो। लेकिन चूंकि नेतृत्व की लापरवाही के कारण तब मंदिर नहीं बन सका इसलिए उस हेतु एक बड़ा आंदोलन हुआ। अत: अयोध्या नगरी तो एक प्रतीक है। प्रश्न है,किसकी? यह वक्त है कि दुनिया के साथ ही हम सब भी इस बात को को गहराई से समझें कि अयोध्या किस चीज की प्रतीक है।

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के शिलान्यास व भूमिपूजन अनुष्ठान में भाग लेते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी एवं सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत (फाइल चित्र)

क्या है अयोध्या

अयोध्या हजारों-हजार साल से विविधताओं से परिपूर्ण देश के साथ मिलकर चलने का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। अयोध्या केवल श्रीराम का जन्मस्थान ही नहीं है। हम जानते हैं कि अयोध्या भगवान राम के पूर्वजों का केन्द्र है। इसकी एक लंबी परंपरा है। लेकिन हममें से ज्यादातर नहीं जानते कि अयोध्या जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ ऋषभदेव आदि का भी जन्मस्थान है। वे खुद को भगवान राम के वंश में मानते हैं अत: सूर्यवंशी हैं, इक्ष्वाकु वंश से ही उनकी परंपरा रही है। अयोध्या वस्तुत: जैन धर्म के पांच तीर्थंकरों की जन्मभूमि है: आदिनाथ, अजितनाथ, अभिनंदननाथ, सुमतिनाथ, अनंतनाथ-सभी उसी वंश के माने जाते हैं। भगवान महावीर ने स्वयं अयोध्या में वहां के राजा को जैन धर्म की दीक्षा दी थी। भगवान महावीर स्वयं को उसी वंश का मानते थे। भगवान बुद्ध भी खुद को उसी वंश का मानते हैं। उन्होंने अयोध्या में 16 वर्ष चातुर्मास किया। अयोध्या में ‘पहला राजा’ बौद्ध मत में आया। चीनी यात्री फाह्यान और ह्वेनसान, दोनों ने अपने संस्मरणों में बौद्ध मत का विशद् वर्णन किया है।

अयोध्या हजारों-हजार साल से विविधताओं से परिपूर्ण देश के साथ मिलकर चलने का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। अयोध्या केवल श्रीराम का जन्मस्थान ही नहीं है। हम जानते हैं कि अयोध्या भगवान राम के पूर्वजों का केन्द्र है। इसकी एक लंबी परंपरा है। लेकिन हममें से ज्यादातर नहीं जानते कि अयोध्या जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ ऋषभदेव आदि का भी जन्मस्थान है। वे खुद को भगवान राम के वंश में मानते हैं अत: सूर्यवंशी हैं, इक्ष्वाकु वंश से ही उनकी परंपरा रही है।

कहते हैं, भगवान राम जिस कुंड के पास बैठकर दातुन करते थे वहीं पर बुद्ध ने भी दातुन करते-करते अपना दातुन गाड़ दिया था। वहां एक बहुत बड़ा वृक्ष उत्पन्न हुआ। उक्त दोनों चीनी यात्रियों ने इस वृक्ष का वर्णन किया है। अशोक के द्वारा स्थापित स्तूप का भी वर्णन किया है। अर्थात् बौद्ध मत का एक बड़ा स्थान रही है अयोध्या। सिख धर्म की बात करें तो श्री गुरुनानक देव अयोध्या गये थे। वे लंबे समय तक वहां ठहरे थे। श्री गुरु तेगबहादुर अयोध्या गये थे, वे वहां ठहरे थे। श्री गुरुगोविंद सिंह जब पटना साहेब से वापस आ रहे थे तब वे अयोध्या में कुछ वक्त रुके थे। वहां नजरबाग तथा ब्रह्मकुंड, दो गुरुद्वारे हैं, जिनमें उक्त तीनों गुरुओं की स्मृतियां सहेजी गई हैं। निहंग सेना श्री गुरुगोविंद सिंह जी के बाद श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति संघर्ष के लिए वहां गई थी। वे सभी निहंग सैनिक शहीद हुए। उन गुरुद्वारों में दो गुरुओं के शस्त्र और निहंगों के शस्त्र रखे हैं। अयोेध्या नाथ योगियों का भी महत्वपूर्ण केन्द्र है। वहां के राजा समुद्रपाल योगी के बाद उनकी 17 पीढ़ियों ने राज किया। जिस स्थान पर राजा दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ किया, वह अयोध्या में है। भगवान राम जिस शिव मंदिर में शिव की उपासना करते थे वह मंदिर अयोध्या में है। वे जिस देवी की उपासना करते थे, शक्ति का वह मंदिर अयोध्या में है। भगवान राम ने जहां पर अपना शरीर पूर्ण किया वह पवित्र स्थान अयोध्या में है।

रामायण और खगोल विज्ञान

गुरुग्राम में रहने वालीं पूूर्व आईआरएस अधिकारी सरोजबाला जी ने पुराने साहित्य में से ऐसे श्लोकों का संग्रह कर उन पर शोध किया है जिनमें दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ, भगवान राम के जन्म, उनके वन गमन, विवाह आदि की तिथियों का उल्लेख है। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में लिखा है कि उस कालखंड में ग्रहों की स्थिति क्या थी, अर्थात बृहस्पति, मंगल, बुध कहां पर थे। यह सब उन श्लोकों में है कि फलां दिन ग्रहों की स्थिति ऐसी थी। शोध में उन तिथियों को एक कम्प्यूटर प्रोग्राम डाला गया। सरोजबाला जी ने उसकी प्रस्तुति बड़े बड़े विद्वानों के बीच की। उसके अनुसार ग्रहों-नक्षत्रों की स्थिति वही आई, जो रामायण में उस कालखंड की बताई गई थी। उस समय का जो नक्षत्र विज्ञान था उसमें तिथियां ऐसे नहीं लिखी जाती थीं, उस समय नक्षत्र बताते थे कि फलां दिन का पंचांग क्या है। उसी हिसाब से ये श्लोक हैं। इस शोध में राम जन्म का समय, यज्ञ का समय, राम विवाह का समय, वन गमन का समय और अयोध्या वापसी का समय ठीक वही पाया गया जैसा रामायण में बताया गया है।

अयोध्या तीर्थ विवेचनी सभा

गत हजारों वर्षों के दौरान जितने भी मत-पंथ, संप्रदाय हुए हैं, उन सबका कोई न कोई महत्वपूर्ण स्थान अयोध्या में है। 1901 के आस-पास अयोध्या में एडवर्ड नाम के जिलाधिकारी थे। उन्होंने एक सभा बनाई, उसे नाम दिया अयोध्या तीर्थ विवेचनी सभा। इसके अंतर्गत पूरे अयोध्या क्षेत्र का अध्ययन करके 148 स्थान निश्चित किये गए जिनका अयोध्या से किसी न किसी तरह आध्यात्मिक या धार्मिक संबंध रहा था। उन सभी स्थानों पर उन्होंने पत्थर की एक बड़ी शिला लगवाई। पहली शिला राम कोट में लगी जहां राम जन्मे थे। उस शिला को नाम दिया-तीर्थ क्रमांक-1, इसी तरह सभी स्थानों पर अलग-अलग नाम से शिलाएं लगवाई गईं। उस समय के बारे में अध्ययन से स्पष्ट है कि अयोध्या नगरी उस काल में पूरी दुनिया का एक सुंदर केन्द्र बन गयी थी। संभव है उस दौर के लोगों में वैचारिक मतभिन्नता रही हो। कुछ लोग मूर्ति पूजा करते हों, कुछ न करते हों। कुछ शिव की आराधना करते हों तो कुछ विष्णु की। कुछ शाक्त मत को मानते हों, कुछ आर्यसमाजी हों। फिर भी अयोध्या इन सबके मिलन का सुंदर केन्द्र बनी। लेकिन इसके साथ ही, अयोध्या को नष्ट किए जाने का इतिहास भी सब जानते हैं।

सरयू तट पर दीपोत्सव का अनूठा दृश्य (फाइल चित्र)

भारत और अध्यात्म

14वीं शताब्दी में जब अलाउद्दीन खिलजी अयोध्या का विध्वंस करता हुआ आगे बढ़ गया तब अयोध्या क्षेत्र के राजपूत श्याम देश चले गये थे। वहां उन्होंने एक नयी अयोध्या का निर्माण किया। वहां आज भी उस क्षेत्र को ‘अयुथया’ बोलते हैं। 1350 से 1757 तक उस पर उनका राज रहा था। अमीर खुसरो को पहला हिन्दी पद्य लेखक माना जाता है। उसने हिन्दी और फारसी को मिलाकर ‘खालिकबारी’ नाम से एक शब्दकोष बनाया था, जो उसने अयोध्या में बैठकर ही लिखा था। सुप्रसिद्ध अमेरिकी लेखक विल ड्यूरॉण्ट ने एक जगह (अयोध्या के बारे में) आश्चर्यचकित होकर लिखा है-ऐसी महान संस्कृति को कैसे नष्ट कर दिया गया! यह दुखद है। विल ड्यूरॉण्ट ने अपने लेखों में भारत में (आक्रमणकारियों द्वारा) किए गए विनाश का विस्तार से वर्णन किया है।

भारत की एक विशेषता है कि यह एक आध्यात्मिक देश है। कुछ लोग यह कह सकते हैं कि इसमें विशेष क्या है, आध्यात्मिक तो कोई भी देश हो सकता है? बेशक, हो सकता है। लेकिन भारत के अध्यात्म की यह मान्यता है कि परमात्मा सर्वव्यापी है। वह सबके अंदर है। मेरे अंदर, मेरे सामने बैठे व्यक्ति केअंदर, वृक्षों, पक्षियों, जल, थल….सबमें वह है। उसकी अनुभूति करना ही वस्तुत: आध्यात्मिक साधना है। ज्यों-ज्यों व्यक्ति आध्यात्मिक साधना की ओर बढ़ता है, उसके अंदर विनम्रता, सहिष्णुता, शालीनता बढ़ती है। अर्थात् कह सकते हैं कि आध्यात्मिक भाव समस्त गुणों की वृद्धि करता है। इसे यह भाव भी आता है कि सामने बैठा व्यक्ति भले शैव है और मैं वैष्णव, तो कोई फर्क नहीं पड़ता, वह अपनी पद्धति से आराधना करता है, मैं मूर्ति पूजा करता हूं, तो कोई हर्ज नहीं है। उसने वह रास्ता अपनाया है, उसके अंदर के परमेश्वर ने उसे वैसा करने को कहा है। यह आध्यात्मिक भाव सारी विविधताओं में भी समानता के सूत्र ढूंढता है। यही करुणा, प्रेम, दया, श्रद्धा, त्याग, समर्पण इत्यादि सद्गुणों को प्रकट करता है। अयोध्या ऐसे आध्यात्मिक भाव का केन्द्र है।

राम की अयोध्या में सबको सुख प्राप्त था, किसी का किसी से वैर नहीं था। राम का प्रताप आध्यात्मिक है। क्या हम फिर से ऐसी अयोध्या की कल्पना कर सकते हैं जो देश ही नहीं, अपितु दुनिया के सारे मतों, संप्रदायों, विचारों को एक स्थान पर लाकर कहे कि संपूर्ण सृष्टि एक है! जीव-जगत एक है। सब एक होकर सबके दुखों के निवारण के लिए आगे बढ़ें। भारत की अयोध्या उसी सनातन दर्शन की प्रेरणास्रोत है। वही अयोध्या हमारे लिए अभीष्ट है। यह एक मंदिर मात्र नहीं है। नि:संदेह अयोध्या और विकसित होते हुए सारे विश्व को एक नयी दिशा देगी।

राम धर्मज्ञ हैं, धर्म-प्राण, धर्म-रक्षक, धर्म-ज्ञाता, धर्म के व्याख्याता हैं। वे आदर्श राजा हैं, आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श पति भी हैं। और इसलिए महर्षि वाल्मीकि ने जब ऋषि नारद से पूछा कि किसका चरित्र लिखूं, तो नारद जी ने कहा, ‘तुम चरित्र लिखो राम का, जो युगों-युगों तक लोगों को प्रेरणा देता रहे’। आज देश में ऐसी कोई भाषा नहीं है जिसमें रामायण न लिखी गई हो। मलयालम, कन्नड़, तेलुगू, उड़िया, असमिया, मिजो, खासी, बांग्ला, कारबी, बोडो भाषा में रामायण है। हर भाषा में राम के चरित्र को आदर्श मानकर लिखा गया है। हैरानी की बात है कि भारत में जिन्होेंने राम का घोर विरोध किया, उनका नाम था रामास्वामी पेरियार। जयललिता जी का नाम था जय राम जयललिता। उनकी पार्टी के एक बड़े नेता का नाम था एम.जी. रामचंद्रन। आंध्र में मुख्यमंत्री थे एन.टी. रामाराव। लोग कहते थे कि दक्षिण में राम नहीं हैं। लोहिया जी कहते थे, राम उत्तर से दक्षिण को जोड़ते हैं। राम सबके हैं। राम कहने का मतलब है दशरथ के पुत्र नहीं, अयोध्या के राम। कबीर के राम अलग हैं, तुलसी के अलग।
एक राम दशरथ घर डोलै, एक राम घट घट में बोलै।
एक राम का सकल पसारा, एक राम है सबसे न्यारा।

कबीर राम मंदिर नहीं गए, लेकिन मुख से सदा राम ही बोलते रहे। दूसरे, राममनोहर लोहिया जी भगवान में ज्यादा भरोसा नहीं रखते थे। वे कहते भी थे, मेरा भगवान वगैरह पर भरोसा नहीं। लेकिन, कौन है जो इस देश को एक रखता है? अध्यात्म तो अदृश्य है, वह दिखता नहीं है पर कहीं न कहीं भावनाओं में प्रकट होता है। अदृश्य की साधना कठिन होती है। जो दिखता है उसकी साधना थोड़ी सरल होती है। राममनोहर लोहिया जी कहते हैं-भारत के किसी बड़े मंदिर में एक कोने में खड़े हो जाएं तो एक घंटे के अंदर सारा हिन्दुस्थान आपकी आंखों के सामने आ जाएगा। यह भारत की एकता का प्रतीक है। भारत के एक कोने में स्थित रामेश्वरम में खड़े हो जाइए और फिर दूसरे कोने में स्थित बद्रीनाथ में खड़े हो जाइए, दोनों के बीच 3,500 किलोमीटर का फासला है, लेकिन एक घंटे में आप उन स्थानों पर पूरे भारत का दर्शन कर लेंगे। लोहिया जी जैसे व्यक्ति कहते हैं कि, कोई तो बात है इन मंदिरों में, जो सारे देश को जोड़कर रखती है। वे आगे बताते हैं, ‘‘मैं रामेश्वरम के मंदिर में दर्शन करने ऐसे दौड़ता हुआ गया जैसे गाय अपने बछड़े के लिए दौड़ती है या बछड़ा अपनी गाय के लिए दौड़ता है।’’ इन भावनाओं ने ही इस देश को जोड़कर रखा है।

एकात्मता का सूत्र

लेकिन इस सत्य को स्वीकारने में कुछ लोगों को बहुत दुविधा होती है। वे कहते हैं कि संविधान लोगों को एक रख सकता है। अगर संविधान किसी देश को एक रख सकता होता तो सोवियत रूस क्यों टूटता? सेना देश को एक रख सकती होती तो यूगोस्लाविया क्यों टूटता? चेकोस्लोवाकिया क्यों टूटता? 25 साल के अंदर पाकिस्तान क्यों टूट गया? लेकिन भारत न टूटा, न ही टूट सकता है। राममनोहर लोहिया जी ने कहा है, इस देश के अंदर जोड़ने वाली ताकत है अध्यात्म। वह ताकत है शिव, राम और कृष्ण। अयोध्या एकात्मबोध कराने वाली ताकत का नाम है। भारत ने ऐसे स्थान का विकास किया था। भारत में भाषा की विविधता थी। बोलियां भिन्न थीं। खान-पान अलग था। सोचने के तरीके अलग थे। साहित्य अलग थे। पहनावे अलग थे। राज्य अलग थे। राजा अलग थे। सेनाएं अलग थीं, लेकिन भारत नाम का राष्टÑ, राष्टÑ का तत्व एक था। इसको एक बनाये रखने के लिए एक प्रक्रिया अपनाई गई थी जिसके अंतर्गत तीर्थों का विकास हुआ और विभिन्न प्रकार के तीर्थ बने।

लौकिक और अलौकिक

एक बार कुंभ जाकर देखिए। गरीब हो या अमीर, तमिलभाषी हो या तेलुगू या हिन्दीभाषी, मंत्री हो या छोटा कर्मचारी, सभी एक साथ गंगा में डुबकी लगाते हैं। गंगा देश को एक बनाकर रखती है। उसी तरह रामेश्वरम, केदारनाथ, बद्रीनाथ इस राष्ट्र को एक सूत्र में जोड़ते हैं। उसी तरह अयोध्या राष्ट्र में एकात्मता लाती है। नि:संदेह हमारे यहां के सनातन मान्यता वाले अध्यात्म का विकास करेंगे, वे आध्यात्मिक भावनाओं को जाग्रत करके देश को एक रखेंगे। आज दुनिया एक नये स्वरूप की ओर बढ़ती दिखती है जिसमें अधिक से अधिक संपत्ति अर्जित करने का भाव है।

एक से एक सुख-सुविधाओं का एकत्रीकरण है। इसमें अध्यात्म नहीं है। एक भारत ही है जहां इन दोनों स्वरूपों का सटीक समन्वय है। हमारे यहां लौकिक संसार की उपेक्षा नहीं है। राम की अयोध्या में सबको सुख प्राप्त था, किसी का किसी से वैर नहीं था। राम का प्रताप आध्यात्मिक है। क्या हम फिर से ऐसी अयोध्या की कल्पना कर सकते हैं जो देश ही नहीं, अपितु दुनिया के सारे मतों, संप्रदायों, विचारों को एक स्थान पर लाकर कहे कि संपूर्ण सृष्टि एक है! जीव-जगत एक है। सब एक होकर सबके दुखों के निवारण के लिए आगे बढ़ें। भारत की अयोध्या उसी सनातन दर्शन की प्रेरणास्रोत है। वही अयोध्या हमारे लिए अभीष्ट है। यह एक मंदिर मात्र नहीं है। नि:संदेह अयोध्या और विकसित होते हुए सारे विश्व को एक नयी दिशा देगी।

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अयोध्या: उडुपी से आई 44 मातृशक्तियों ने श्री रामजन्मभूमि में गाये श्री राम के भजन

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अयोध्या दीपोत्सव-2026 में 26,50,101 दीयों का लक्ष्य, 56 घाटों पर 35 हजार वालंटियर्स करेंगे दीप प्रज्ज्वलन

स्वरा भास्कर

राम मंदिर पर आए निर्णय पर स्वरा भास्कर शर्मिंदा क्यों?

रायबरेली में विकास कार्यों का लोकार्पण करते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। साथ में अन्य नेता।

‘वे हनुमानगढ़ी जाते हैं और फिर कार्यालय में जाकर मछली की दावत उड़ाते हैं’, कांग्रेस पर बरसे योगी आदित्यनाथ

अजय राय, कांग्रेस नेता

सावन के महीने में अयोध्या में अजय राय का मछली भोज, भाजपा बोली- सनातन धर्म का अपमान ही कांग्रेस की पहचान

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कल का मौसम: 3 अक्टूबर को देश के किन राज्यों में होगी बारिश, मौसम विभाग ने जारी किया अलर्ट

PM मोदी से बोले कैप्टन मच्छार- हनुमानजी ने बचा लिया, जब भी दर्द में होता हूं ‘हनुमान चालीसा’ पढ़ता हूं

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उजड़ता पंजाब: 6 महीने में मां ने खोया दूसरा बेटा! नशे की ओवरडोज से सुनाम में युवक की मौत, परिजनों में हाहाकार

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Rampur Tiraha Kand CM Pushkar Singh Dhami Tributes Uttarakhand State Activists Statue Panchjanya

रामपुर तिराहा सभा में CM धामी का बड़ा ऐलान: गांवों में लगेंगी आंदोलनकारियों की मूर्तियां, ई-लाइब्रेरी का होगा निर्माण!

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काशी में गरजा व्यास संघ: कन्वर्जन के खिलाफ राष्ट्रव्यापी अभियान का ऐलान, Gen Z को राम भक्ति से जोड़ने का प्रस्ताव!

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देवभूमि में टूटा रिकॉर्ड: उत्तराखंड में 1.16 करोड़ से अधिक पहुंचे श्रद्धालु, CM धामी बोले- अर्थव्यवस्था को मिली ताकत!

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धर्म और राष्ट्र अलग नहीं…  दुनिया को भारत से है समाधान की उम्मीद: सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी

सड़क पर ब्रेकर बनाने के विवाद में RSS कार्यकर्ता की हत्या, दबंगों ने लाठी- डंडों से किया था हमला

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