‘राष्ट्र सर्वोपरि की भावना का संचार बेहद अनिवार्य’
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होम विश्लेषण

‘राष्ट्र सर्वोपरि की भावना का संचार बेहद अनिवार्य’

लोकमंथन-2024 के उद्घाटन सत्र में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा दिए गए उद्बोधन के संपादित अंश

Written byPanchjanyaPanchjanya
Nov 30, 2024, 03:42 pm IST
in विश्लेषण, संघ @100, कर्नाटक, धर्म-संस्कृति
राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू

भारत की समृद्ध संस्कृति, परंपरा को एकता के सूत्र में बांधने का यह प्रयास अत्यंत सराहनीय है। प्रज्ञा प्रवाह के इस आयोजन में सहयोग करने वाले सभी संगठनों की मैं प्रशंसा करती हूं। भारत की सांस्कृतिक, बौद्धिक विरासत को गहराई से समझना और लोकपरम्पराओं को निरंतर मजबूत बनाना सभी देशवासियों का कर्तव्य है। मुझे बहुत खुशी है कि आप सभी इस आयोजन के माध्यम से सांस्कृतिक भावना को प्रबल करने का प्रयास कर रहे हैं। यह संगोष्ठी राष्ट्र को सर्वप्रथम मानती है और ऐसा मानने वाले निष्ठावान लोगों को एक प्रभावी मंच प्रदान करती है।

जब हम भारत की संस्कृति की विविधता में एकता की बात करते हैं तो एकता का भाव ही मुख्य भाव होता है। विविधता हमारी मूलभूत एकता को इन्द्रधनुषीय सौन्दर्य प्रदान करती है। हम चाहे वनवासी हों, ग्रामवासी हों या नगरवासी हों, सबसे पहले हम भारतवासी हैं। इस राष्ट्रीय एकता की भावना ने हम सभी को विविध चुनौतियों के बावजूद भी एकसूत्र में जोड़कर रखा है। सदियों से हमारे समाज को हर प्रकार से बांटने व कब्जा करने का प्रयास किया गया है। हमारी सहज एकता को खंडित करने के लिए कृत्रिम भेदभाव पैदा किया गया लेकिन भारतीयता की भावना से ओत-प्रोत देशवासियों ने राष्ट्रीय एकता की मशाल आज तक जलाए रखी है।

हमारे संतों-कवियों से लेकर ब्रिटिश हुकूमत के विरोध में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उत्तर से दक्षिण तथा पूर्व से पश्चिम तक भारत को राष्ट्रीयता की भावना से जोड़ने वाले महाकवियों ने प्राचीन काल से चली आ रही भारत की भावना व एकता को बचाए रखा और उसे आगे बढ़ाया। मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि लोकमंथन के इस कार्यक्रम में पुण्यश्लोक लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर और रानी रुद्रमा देवी जैसी महान वीरांगनाओं के जीवन चरित्र पर आधारित नाटकों का मंचन देश की शौर्य परंपरा व नारी शक्ति को सम्मान प्रदान करने की सोच से नागरिकों को विशेष रूप से प्रेरित करने का प्रयास है।

प्राचीनकाल से ही भारत की विचारधारा का प्रभाव दूर-दूर तक फैला हुआ है। यह प्रभाव आज भी उन देशों की सांस्कृतिक व धार्मिक परम्परा में देखा जा सकता है। भारत की संस्कृति के इस विशाल प्रभाव क्षेत्र को कुछ लोग इंडोस्फियर का नाम देते हैं। इंडोस्पेयर यानी विश्व का ऐसा क्षेत्र जहां भारत के जीवनमूल्यों तथा संस्कृति का प्रभुत्व था और आज भी दिखाई देता है। भारत की धार्मिक मान्यताओं, कला, संगीत, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा पद्धत्ति, भाषा व साहित्य को दुनिया भर में सराहा जाता है। सबसे पहले भारतीय दर्शन पद्धत्तियों ने ही आदर्श जीवन मूल्यों का उपहार विश्व समुदाय को दिया था।

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू को शॉल भेंट करते प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक जे.नंद कुमार

अपने पूर्वजों की इस गौरवशाली परंपरा को और मजबूत बनाना हमारा दायित्व है। यह भी प्रसन्नता का विषय है कि कई राज्यों के शिल्पकार इस आयोजन के दौरान अपनी कला का प्रदर्शन करेंगे। इसी वर्ष में मुझे भारतीय कला महोत्सव में भाग लेने का अवसर मिला था। भारतीय कलाकार राष्ट्रीय विरासत को सुंदर स्वरूप प्रदान करते हैं।

सदियों तक विदेशी ताकतों ने भारत पर शासन किया। उन साम्राज्यवादी एवं उपनिवेशवादी शक्तियों ने भारत का आर्थिक दोहन तो किया ही है, हमारे सामाजिक ताने-बाने को भी छिन्न-भिन्न करने का प्रयास किया है। हमारी समस्त बौद्धिक परंपरा के प्रति हेय दृष्टि रखने वाले शासकों ने हमारे देशवासियों में संस्कृति के प्रति हीनभावना का संचार किया। हम पर ऐसी परंपरा को थोपा गया जो हमारी एकता के लिए उचित नहीं थी। सदियों की पराधीनता के कारण हमारे देशवासी गुलामी की मानसिकता का शिकार हो गए हैं।

भारत को पुन: श्रेष्ठतम राष्ट्र बनाने के लिए देशवासियों की मानसिकता को एकता व श्रेष्ठता के सूत्र में पिरोने का कार्य करना हम लोगों का कर्तव्य है। मेरे विचार से एक विकसित राष्ट्र के निर्माण के लिए सभी देशवासियों में राष्ट्र को सर्वोपरि मानने की भावना का संचार करना अनिवार्य है। लोकमंथन द्वारा इस भावना का संचार किया जा रहा है, यह विकसित भारत के निर्माण की दिशा में अत्यंत सराहनीय कदम है।

19वीं सदी के कानूनों को हटा कर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, भारतीय न्याय संहिता तथा भारतीय साक्ष्य अधिनियम लागू किया गया है। दिल्ली में राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्यपथ और राष्ट्रपति भवन में दरबार हॉल का नाम बदल कर गणतंत्र मण्डपम् रखा गया है। ये सभी नामकरण हमारे देश में प्राचीन परंपरा के अनुरूप हैं। हाल ही में उच्चतम न्यायालय में न्याय की देवी की नई प्रतिमा का अनावरण किया गया, जिसकी आंखों पर पट्टी नहीं है। ऐसे सभी परिवर्तन औपनिवेशिक मानसिकता के उन्मूलन के सराहनीय उदाहरण हैं। समरसता हमेशा हमारी सभ्यता का आधार रही है। समरसता और एकता की शक्ति ही हमारी राष्ट्रीय प्रगति को ऊर्जा प्रदान करेगी।

Topics: Torch of national unityभारतीय न्याय संहिताOur national progressIndian Judicial Codeपाञ्चजन्य विशेषIndian Civil Defence Codeभारत की समृद्ध संस्कृतिसांस्कृतिक भावनाराष्ट्रीय एकता की मशालहमारी राष्ट्रीय प्रगतिculturalRich culture of Indiaभारत की सांस्कृतिकCultural spirit of Indiaभारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता विधेयक
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