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नृत्य एक सहज साधना

कला और उसमें भी नृत्य साक्षात ईश्वरीय अनुभूति कराता है। नाट्य साधना के द्वारा चेतना की उच्चतम अवस्था तक पहुंचा जा सकता है। समस्त कलाएं ईश्वर से आती हैं और उसमें ही समाहित हो जाती हैं

Written byआदित्य भारद्वाजआदित्य भारद्वाज
Nov 19, 2024, 10:18 pm IST
inधर्म-संस्कृति
मंच पर विराजमान (बाएं से) डॉ. संध्या पुरेचा, डॉ. पद्मा सुब्रह्मण्यम, स्वामिनी विमलानंद सरस्वती, स्वामी वेदत्त्वानंद सरस्वती एवं प्रो. यज्ञेश्वर शास्त्री

मंच पर विराजमान (बाएं से) डॉ. संध्या पुरेचा, डॉ. पद्मा सुब्रह्मण्यम, स्वामिनी विमलानंद सरस्वती, स्वामी वेदत्त्वानंद सरस्वती एवं प्रो. यज्ञेश्वर शास्त्री

कला का सौन्दर्य आनंद में है। कला की विशेषता है कि उसमें सदैव नवीनता रहती है। कला एवं नृत्य के आध्यात्मिक संबंध को स्पष्ट करने से यह बात सामने आती है कि भगवान बैठें तो कला है और चलें तो नृत्य है। नृत्य भी एक प्रकार की साधना है, जिससे मन परिष्कृत होता है। यह कहना था स्वामिनी विमलानंद सरस्वती का। वे आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास, संस्कृति विभाग मध्यप्रदेश शासन द्वारा भारत भवन, भोपाल में ‘नृत्य में अद्वैत’ विषय पर आयोजित तीन दिवसीय कार्यशाला के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रही थीं।

उन्होंने आगे कहा, ‘‘हमारे यहां कला में नृत्य की अभिव्यक्ति सदैव दिव्य मानी गयी है। नर्तन करना ईश्वर का स्वभाव है। हमारी सभी कलात्मक क्रियाएं ईश्वर से ही आती हैं और उन्हें ही समर्पित होती हैं। सब कुछ अंतत: ईश्वर में ही समाहित हो जाता है।’’

तप से जन्मती है कला

पद्मविभूषण डॉ. पद्मा सुब्रह्मण्यम ने शास्त्रीय नृत्यों में अद्वैत के विभिन्न सिद्धांतों और स्वरूपों की विस्तार से चर्चा की। उन्होंने ‘प्रैक्टिकल सेशन आफ डांस आन रस एंड सात्विक अभिनय’ पर बोलते हुए कहा, ‘‘नृत्य के माध्यम से शरीर और मन का समागम होता हैं। हर सुंदर कला तप के फलस्वरूप जन्म लेती है, कलाकार कला को केवल प्रदर्शित करता है जबकि कला पूर्व से ही विद्यमान होती है। जहां दृष्टि होती है वहां मन होता है, जहां मन होता है वहां भाव होता है और जहां भाव होता है वहीं रस प्राप्त होगा। यही ‘रसो वै स:’ की परिकल्पना है।’’

भाव को समझना जरूरी

केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्ष डॉ. संध्या पुरेचा ने इस अवसर पर कहा, ‘‘जीव केवल अज्ञान के कारण ब्रह्म को नहीं जान पाता है, जबकि ब्रह्म उसके अंदर ही होता है। उन्होंने कहा कि यदि हम भाव को नहीं समझते तो रस तक पहुंचना संभव नहीं है। कला में संलग्न होने के लिए विकार रहित होना आवश्यक है। विकारों के साथ रसास्वादन होना संभव नहीं। परमानंद के लिये सत्त्व प्राप्त करना होता है। आज के युग में यदि सत्त्व को लेकर चलेंगे तभी कला की साधना सफल होगी।’’ पद्मश्री डॉ. शोवना नारायण ने मानवीय मस्तिष्क की कार्य क्षमता, सीमा आदि पर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने कहा, ‘‘जीवन है तो गति है। गति होती है तभी संचलन होता है और वहीं से स्वर की उत्पत्ति होती है जो गति का एक अहम हिस्सा है।’’

कार्यक्रम में उपस्थित गणमान्यजन

अभय अद्वैत का प्रतीक

कार्यक्रम के दूसरे दिन वरिष्ठ नृत्यांगना डॉ. पद्मजा सुरेश ने नृत्य में शरणागति सत्र में प्रतिभागियों को संबोधित किया। उन्होंने कहा, ‘‘नृत्य एक सहज साधना है। साधना हमें आंतरिक रूप से प्रकाशित करती है। नाट्य साधना के द्वारा ही चेतना की उच्चतम अवस्था तक पहुंचा जा सकता है।’’ उन्होंने कहा कि नृत्य के माध्यम से स्थूल से सूक्ष्म शरीर की ओर बढ़ते हैं।’’ उन्होंने नाट्य में अभय मुद्रा का उदाहरण देते हुए कहा, ‘‘अभय अद्वैत का प्रतीक है और कला महामाया का चिन्मय विलास है। नवधा भक्ति, नारद भक्ति सूत्रों सहित शास्त्रों में भी शरणागति की विशेष महिमा बताई गई है। यही नहीं, शैव सिद्धांत में भी शरणागति महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे ही हम उपासना के सबसे निकट होते हैं।’’

बिन भाव न नाट्य है, न नृत्य

स्वामिनी विमलानंद सरस्वती

सत्र में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए भरतनाट्यम नृत्यांगना डॉ. रेवती रामचंद्रन ने कहा, ‘‘इस तरह के आयोजन मन को विस्तारित करते हैं। यह हमारे आंतरिक एवं आध्यात्मिक विकास में उपयोगी है। कलाकार मंच पर सृष्टिकर्ता की भूमिका में होता है, जो अपनी रचनात्मकता से कला का निर्माण करता है।’’ कुलपति एवं प्रख्यात विद्वान डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी ने ‘नृत्य कला एवं अद्वैतानुभूति’ पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘आनंद ही वह गंगोत्री है, जिससे काव्य एवं रस की भागीरथी निकलती है। नृत्य मात्र मनोरंजन नहीं है, पुरुषार्थ में उसकी परिणति होनी चाहिए। कला की साधना में ही आनंद की सिद्धि होती है।’’

सत्र के अध्यक्ष वरिष्ठ नृत्यकार डॉ. प्रेमचंद्र होम्बल ने कहा कि बिना भाव के न तो नाट्य होता है और न ही नृत्य। भाव से हमें अनुभूति होती है जिससे हम रस तक पहुंचते हैं। इस रस तक पहुंचने का माध्यम नृत्य और नाट्य है। मानव त्रिगुणात्मक होता है। उसमें सत्व, रज और तम तीनों गुण पाए जाते हैं। जब हम सत्व के धरातल पर होंगे तभी रस की अनुभूति होगी। हमारा लक्ष्य है भाव का प्रदर्शन और उसके माध्यम से रस की अनुभूति प्राप्त करना और यह स्थिर भाव से धीरे-धीरे आगे बढ़ने पर ही संभव है। जो परमानंद की ओर ले जाये, वही कला है। कथक नृत्यांगना डॉ. कुमकुम धर ने ऐसे अनूठे आयोजन के लिए न्यास का आभार व्यक्त किया। प्रमुख सचिव एवं न्यासी शिवशेखर शुक्ला ने बताया कि आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास का मूल उद्देश्य अद्वैत वेदान्त का लोकव्यापीकरण है। नृत्य में अद्वैत विषय पर यह कार्यशाला अगले वर्ष भी आयोजित होगी।

Topics: Art and DanceCultural Unity TrustCulture DepartmentBhagirathi of Poetry and RasaDancing is the nature of Godसंस्कृति विभागपाञ्चजन्य विशेषकला एवं नृत्यसांस्कृतिक एकता न्यासकाव्य एवं रस की भागीरथीनर्तन करना ईश्वर का स्वभाव
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