राजा मदन सिंह की अलाउद्दीन खिलजी पर विजय और गढ़ा कटंगा में गोंडवाना साम्राज्य का उत्कर्ष
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राजा मदन सिंह की अलाउद्दीन खिलजी पर विजय और गढ़ा कटंगा में गोंडवाना साम्राज्य का उत्कर्ष

जनजातीय गौरव दिवस के आलोक में महान हिंदू जनजातीय गोंडवाना साम्राज्य के स्मृत- विस्मृत महान वीरों और वीरांगनाओं की अमर गाथा

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Oct 27, 2024, 04:01 pm IST
inजनजातीय नायक
मदन सिंह ने गढ़ा कटंगा के अंतर्गत मदन महल की पहाड़ियों की अनगढ़ चट्टानों पर एक सुदृढ़ किले का निर्माण कराया, जिसे मदन महल का किला कहा जाता है

मदन सिंह ने गढ़ा कटंगा के अंतर्गत मदन महल की पहाड़ियों की अनगढ़ चट्टानों पर एक सुदृढ़ किले का निर्माण कराया, जिसे मदन महल का किला कहा जाता है

भारत के हृदय स्थल में स्थित त्रिपुरी के महान कलचुरि वंश का 13वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में अवसान हो गया था। सीमावर्ती शक्तियां इस क्षेत्र को अपने अधीन करने के लिए लालायित थीं। अंततः इस संक्रांति काल में एक वीर योद्धा जादो राय (यदु राय) ने तिलवाराघाट निवासी एक ब्राह्मण सन्यासी सुरभि पाठक के भगीरथ प्रयास से त्रिपुरी क्षेत्र के अंतर्गत गढ़ा कटंगा क्षेत्र में गोंड वंश की नींव रखी। यही आगे चलकर गढ़ा मंडला के साम्राज्य के रूप में सुविख्यात हुआ। यह उपाख्यान चाणक्य और चन्द्रगुप्त मौर्य की याद दिलाता है कि वर्ण व्यवस्था कर्म से निर्धारित होती है। कालांतर में यह साम्राज्य महान् गोंडवाना साम्राज्य के नाम से जाना गया।

अधिकांश गोंड राजाओं के मंत्री ब्राम्हण ही हुए हैं जो इस बात का प्रमाण है कि धर्म, वर्ण और जाति को लेकर भारत में कभी किसी प्रकार का वैमनस्य नहीं रहा। जिसे प्रकारांतर से अंग्रेजों और वामपंथियों के साथ परजीवी इतिहासकारों ने फैलाया है। रामनगर प्रशस्ति के अनुसार गोंड राजाओं की वंशावली में 53 राजाओं के नाम मिलते हैं। इस प्रशस्ति के लेखक राजकवि और पंडित जय गोविंद हैं, इसके अनुसार 34 वीं पीढ़ी में मदन सिंह(मदन शाह) का नाम आता है और यहीं से स्व की भावना से अभिप्रेत होकर गोंडवाना साम्राज्य का वास्तविक उत्कर्ष शुरू होता है।

मदन सिंह ने गढ़ा कटंगा के अंतर्गत मदन महल की पहाड़ियों की अनगढ़ चट्टानों पर एक सुदृढ़ किले का निर्माण कराया, जिसे मदन महल का किला कहा जाता है। यह किला विश्व का सबसे छोटा परंतु सुरक्षित और सभी व्यवस्थाओं से परिपूर्ण अभेद्य किला माना जाता है। राजा मदन सिंह ने गोंडवाना साम्राज्य की सीमाओं को विस्तार देना शुरू किया। मालवा के महाराजा महालक्ष देव (महलक देव) से मैत्री स्थापित की।

राजा महलक देव ने मांगी मदद

सन् 1290 में जब कड़ा और मानिकपुर के सूबेदार अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा पर आक्रमण करने की योजना बनाई। राजा महलक देव ने राजा मदन सिंह से सहायता मांगी, तब मदन सिंह ने अपने मंत्री विभूति पाठक से परामर्श कर सहायता करने का वचन दिया। महालक्ष देव (महलक देव) चाहते थे कि अलाउद्दीन खिलजी को रास्ते में ही रोक लिया जाए ताकि उन्हें युद्ध की तैयारी का समय मिल जाए। मालवा के मंत्री हरनंद (कोका) को मदन सिंह ने संदेश भेजा और गोंडी सेना को लेकर धसान नदी के किनारे डेरा डाल दिया। वर्षा काल का समय था, अलाउद्दीन खिलजी की सेना जैसे ही नदी पार करने लगी और कुछ सेना नदी के बीच में थी तभी गोंडी सेना ने छापामार युद्ध शैली में जहरीले तीरों, अग्निबाण और लुकेत सांपों के बाणों से हमला बोल दिया। अचानक हमले से अलाउद्दीन खिलजी की सेना में खलबली मच गई। उसकी नावें डुबो दी गईं और उसके शस्त्रागार में आग लगा दी गई। कुछ ही घंटे में अलाउद्दीन खिलजी पराजित हुआ, और पुन: कड़ा और मानिकपुर लौट गया। इस प्रकार गोंडवाना सेना की विजय हुई और मालवा नरेश महालक्ष देव ने राजा मदन सिंह के प्रति आभार व्यक्त किया।

राजा मदन सिंह ने बनवाया था मजबूत किला

जब हारा अलाउद्दीन खिलजी

अलाउद्दीन खिलजी ने कुपित होकर अचानक गोंडवाना साम्राज्य पर हमला किया। राजा प्रारंभ में पराजित होकर भानतलैया स्थित बड़ी खेरमाई की शिला के पास बैठ गए, जहाँ उन्हें आध्यात्मिक अनुभूति हुई, पूजा के बाद उनमें अद्भुत शक्ति का संचार हुआ और मदन शाह ने पुनः तुर्क सेना पर आक्रमण कर अलाउद्दीन खिलजी को परास्त कर खदेड़ दिया। इसलिए जब अलाउद्दीन खिलजी सुल्तान बना तब भी उसने गोंडवाना पर आक्रमण करने का साहस न किया।

राजा अमान दास ने शाह की उपाधि धारण की

मदन सिंह के उपरांत क्रमशः उग्रसेन, ताराचंद्र(रामकृष्ण) , ताराचंद, उदय सिंह, मान सिंह, भवानीदास, शिवसिंह, हरनारायण, सबलसिंह, राजसिंह, दादीराय ,गोरखदास (जबलपुर अंतर्गत गोरखपुर बसाया) अर्जुन दास (अर्जुन सिंह) और उसके उपरांत 48 वीं पीढ़ी में अमान दास का जन्म हुआ। अमान दास बाल्यकाल से ही पराक्रमी थे और युवा अवस्था तक आते-आते उन्होंने बृहत् गोंड राज्य की नींव डाली। आगे चलकर अमान दास ने मालवा के सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी को पराजित कर शाह की उपाधि धारण की और संग्राम शाह के नाम से प्रसिद्ध हुए।

Topics: पाञ्चजन्य विशेषराजा मदन सिंहत्रिपुरीकलचुरि वंशगढ़ा कटंगागोंडवाना साम्राज्यअलाउद्दीन खिलजी
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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