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एक हादसे ने सब कुछ बदल दिया

नक्सलियों के आतंक का ऐसा शिकार हुए कि अब जीने की इच्छा को ही मार बैठे हैं। किसान परिवार में जन्मे नंदा अपने परिवार के साथ खेती करते थे

Written byPanchjanyaPanchjanya
Oct 4, 2024, 10:53 am IST
in छत्तीसगढ़

22 वर्षीय माडवी नंदा बीजापुर जिले के चुटवाही गांव के रहने वाले हैं। नक्सलियों के आतंक का ऐसा शिकार हुए कि अब जीने की इच्छा को ही मार बैठे हैं। किसान परिवार में जन्मे नंदा अपने परिवार के साथ खेती करते थे और परिवार का बड़ा सहारा बने हुए थे। लेकिन 2 जून, 2024 के एक हादसे ने उनकी जिंदगी को हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया।

उस दिन माडवी नंदा अपने घर और खेत के रोजमर्रा के कामकाज निपटाकर बाजार जाने के लिए निकले थे। बाजार से उन्हें खेती के लिए कुछ आवश्यक सामान खरीदना था और इसके लिए वह ट्रैक्टर से तर्रेम (स्थानीय बाजार) जा रहे थे। इसी बीच वह रास्ते में शौच करने के लिए ट्रैक्टर को सड़क के किनारे खड़ा करके थोड़ी दूर गए आगे बढ़ पाए थे, तभी उनका पैर नक्सलियों द्वारा बिछाए गए आईईडी पर पड़ गया।

इससे पहले माडवी नंदा कुछ समझ पाते, अचानक जोरदार धमाका हुआ। इस धमाके में उनका दाहिना पैर घुटने के नीचे से कट कर अलग हो गया और दूसरा पैर गंभीर घायल हो गया। यह हादसा न केवल नंदा के लिए एक शारीरिक और मानसिक आघात है, बल्कि उनके परिवार के लिए भी आर्थिक संकट का कारण बन गया है। कुछ महीने पहले तक वह परिवार का सहारा थे, लेकिन अब वह खुद उनके सहारे हैं। नक्सलियों की बर्बरता ने उन्हें अवसाद में डाल दिया है और उनके परिवार की रोजी-रोटी का साधन छिन गया है।

नक्सलियों ने छीनी परिवार की रोजी-रोटी

नारायणपुर जिले के राजपुर निवासी 24 वर्षीय मुनेज पटेल एक खनन कंपनी में काम करते हैं। 29 अप्रैल, 2024 की रात एक दर्दनाक हादसे का शिकार हो गए। उस रात नक्सलियों द्वारा प्लांट में लगाए गए आईईडी विस्फोट में मुनेज गंभीर रूप से घायल हो गए। धमाके के दौरान उनकी आंखों और छाती में चोटें आईं। आंखों में लगी चोट के कारण उनकी दृष्टि पर गहरा असर पड़ा है।

मुनेज ने बताया की उनका परिवार पूरी तरह से उन पर ही निर्भर है। परिवार में पत्नी और दो बच्चे हैं। इस हादसे के बाद से उनकी नौकरी चली गई, जिससे परिवार के पालन-पोषण में गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है। मुनेज ने कहा, ‘‘शारीरिक क्षति से ज्यादा मुझे अपने परिवार की चिंता सता रही है। मेरे बिना घर का खर्च कैसे चलेगा, यह सोचकर मन परेशान हो जाता है।’’ मुनेज अभी भी पूरी तरह ठीक नहीं हुए हैं।

उनका इलाज चल रहा है, लेकिन डॉक्टर कहते हैं कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि उनकी आंखों में लगी चोट पूरी तरह ठीक हो जाएगी। हालांकि मुनेज को विश्वास है कि वह पूरी तरह ठीक हो जाएंगे और फिर से काम करने लगेंगे। लेकिन शायद उनके मन में इस बात की भी आशंका है कि अगर उनकी आंखें ठीक नहीं हुई, तो क्या होगा…? भविष्य की यही चिंता हर वक्त उन्हें सताती है। इस हादसे ने न केवल उनके जीवन को बदल दिया है, बल्कि उनके परिवार के लिए अनिश्चितता की स्थिति भी उत्पन्न कर दी है।

मन के घाव नहीं भरे

दुला हेमला 22 वर्ष की हैं। वह सुकमा जिले के अतकारीरास गांव की रहने वाली हैं। वह बस्तर की अन्य महिलाओं की तरह मजदूरी करके अपना घर चलाती हैं। 22 जून, 2022 की बात है। घर का काम निपटाने के बाद दुला रोज की भांति काम करने गई थी। वह पास ही स्थित हिरोली पुलिस कैम्प के आसपास काम करती थी। उस दिन अचानक नक्सलियों ने पुलिस कैम्प को घेर कर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। लेकिन इससे अनभिज्ञ दुला अपने काम में मग्न थी। उसे पता ही नहीं चला कि वहां नक्सलियों ने हमला किया है।

नक्सलियों ने भारी गोलीबारी के बीच बीजीएल नामक रॉकेट के आकार के दर्जनों बैरल दागे। एक बीजीएल दुला के पास फटा और वह इसकी चपेट में आ गई। विस्फोट में वह बुरी तरह घायल हो गई। उसका पेट फट गया था। इसके अलावा, उसके हाथ और पैर में भी चोटें आई थीं। दुला की किस्मत अच्छी रही कि उसे समय पर इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया। इलाज के बाद उसके जख्म तो भर गया, लेकिन उसके मन पर जो आघात लगा, उसका इलाज नहीं हो सका। मजदूरी करके घर चलाने वाली दुला का शरीर पहले जैसा नहीं रहा कि वह मजदूरी कर सके।

खेलते समय बम फटा

छत्तीसगढ़ के उत्तर बस्तर कांकेर जिले के गांव रामपुर में धन सिंह हुपेण्डी परिवार रहता है। कुछ वर्ष पहले परिवार में शादी के होने वाली थी, इसलिए रिश्तेदार भी जुटे थे। घर में रौनक थी। 12 जून, 2019 की बात है। घर के बड़े-बुजुर्ग विवाह की रस्म में व्यस्त थे, जबकि बच्चे खेलने-कूदने में। अचानक धन सिंह हुपेण्डी के घर से जोरदार धमाके की आवाज आई। कमरे में बच्चे लहू-लुहान पड़े हुए थे। दीवारों पर असंख्य छेद थे। लोग देखते ही समझ गए थे कि बीजीएल से हमला हुआ है। लेकिन बीजीएल घर के अंदर कैसे पहुंचा, यह बड़ा प्रश्न था।

दरअसल, धन सिंह के दो बच्चे हैं। बेटा बड़ा है, जिसका नाम हीरालाल है। वह उस समय 10 वर्ष का था और बेटी सुनीता हुपेण्डी 5 वर्ष की थी। दोनों बच्चे खेलते-खेलते एक दिन जंगल तक चले गए थे। वहां उन्हें माओवादियों द्वारा लगाया गया बीजीएल बम मिला। दोनों उसे घर ले आए और उससे खेलने लगे। इसी बीच बीजीएल फट गया। इस विस्फोट में सुनीता के बाएं हाथ की हथेली बुरी तरह घायल हो गया, जबकि हीरालाल के पैर में चोट आई। एक अच्ची सुकार बत्ती की इस हादसे में मोत हो गई। हालांकि इलाज के बाद सुनीता का जख्म तो भर गया, लेकिन बायां हाथ अब लगभग काम नहीं करता है।

 

Topics: नक्सली‘अर्बन नक्सली’नक्सवाद. माओवादीनक्सलवादी
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