100 वर्ष पहले जब विश्व में गूंजा भारतीय संस्कृति का घोष, दुनिया ने देखी एक 'नई सभ्यता'
September 29, 2026
  • Read Ecopy
  • Circulation
  • Advertise
  • Careers
  • About Us
  • Contact Us
Android appiPhone AppArattai
Panchjanya
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
Panchjanya
panchjanya android mobile app
  • होम
  • भारत
  • विश्व
  • संघ @100
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विश्लेषण
  • मत अभिमत
  • रक्षा
  • धर्म-संस्कृति
  • पत्रिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
  • Print Edition
  • Ecopy
होम धर्म-संस्कृति

100 वर्ष पहले जब विश्व में गूंजा भारतीय संस्कृति का घोष, दुनिया ने देखी एक ‘नई सभ्यता’

जो अंग्रेज भारतीयों को अशिक्षित-गँवारू घोषित करने पर आमादा थे, जो विदेशी शक्तियाँ सनातन भारतीय संस्कृति के गौरव को क्षीण करने पर आमादा थीं, उनकी आँखें फटी रह गईं थीं, जब 20 सितंबर 1924 को 'द इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज' में एक लेख छपा।

Written byसार्थक शुक्लासार्थक शुक्ला
Sep 20, 2024, 08:23 am IST
inधर्म-संस्कृति
पूरी तरह से विकसित थी सिंधु घाटी की सभ्यता

पूरी तरह से विकसित थी सिंधु घाटी की सभ्यता

20 सितंबर, 1924 का दिन संपूर्ण विश्व में भारत, भारतीय संस्कृति के ‘शंखनाद’ के रूप में मनाया जाना चाहिए। जो अंग्रेज भारतीयों को अशिक्षित-गँवारू घोषित करने पर आमादा थे, जो विदेशी शक्तियाँ सनातन भारतीय संस्कृति के गौरव को क्षीण करने पर आमादा थीं, उनकी आँखें फटी रह गईं थीं, जब 20 सितंबर 1924 को ‘द इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज’ में एक लेख छपा। लेख के साथ कई तस्वीरें भी छपीं, जिसने विश्व के भारत के प्रति दृष्टिकोण को, भारत को देखने और समझने के तरीके को बदल दिया। क्योंकि ये तस्वीरें और लेख सिंधु नदी के तट पर कई सहस्राब्दियों पूर्व, विशाल प्राचीन सभ्यता की ओर इशारा कर रहे थे। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तत्कालीन महानिदेशक जॉन मार्शल द्वारा भेजा गया यह लेख दर्जनों शोधकर्ताओं के काम का परिणाम था।

राखल दास बनर्जी, केएन दीक्षित और माधवस्वरूप वत्स जैसे कुछ विद्वान अविभाजित भारत के पंजाब जिले में मोहनजोदड़ो में खुदाई स्थलों पर मौजूद थे और उन्होंने ही सबसे पहले स्थलों की प्राचीनता का संकेत दिया, और लुइगी पियो टेसिटोरी जैसे अन्य लोगों ने भी इसकी सत्यता निर्धारित करने में मदद की और अन्वेषणों से यह भी सुनिश्चित किया कि यह सभ्यता दूर-दूर तक फैली हुई थी। आज यानि 20 सितंबर 2024 को भारतीय संस्कृति के इस जयघोष को 100 वर्ष पूरे हो रहे हैं।

सैंधव सभ्यता की उत्खनित विशेषताएँ संपूर्ण विश्व के लिए आश्चर्यजनक थीं। कुछ वर्ष पहले तक हम सिंधु घाटी सभ्यता को लगभग 5500 वर्ष पुराना मानते थे किन्तु कुछ वर्ष पूर्व भी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (खड्गपुर) व भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के शोध के अनुसार यह सभ्यता लगभग 8000 वर्ष पुरानी है। इसका विस्तार भारत के बड़े हिस्से में था, यह विस्तार अब लुप्त हो चुकी सरस्वती नदी के किनारे या घग्गर-हाकरा नदी तक भी रहा था।

सिंधु घाटी सभ्यता की खोज 1920 के दशक में हुई, और तब से इसके कई पुरातात्विक स्थल खोजे गए हैं, जिनमें हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, धौलावीरा, राखीगढ़ी, कालीबंगा और लोथल प्रमुख हैं। सिंधु घाटी सभ्यता का समाज एक उच्च विकसित और सुव्यवस्थित समाज था। इस सभ्यता के लोग कृषि, व्यापार और नगर नियोजन में निपुण थे। इनके नगरों में एक उन्नत जल निकासी प्रणाली, पक्की सड़कों और भव्य भवनों का निर्माण देखने को मिलता है। सिंधु घाटी सभ्यता के लोग लेखन प्रणाली का उपयोग करते थे, लेकिन अब तक इस लिपि को पूरी तरह समझा नहीं जा सका है। इस सभ्यता के धार्मिक और सांस्कृतिक पहलुओं के बारे में कई प्रत्यक्ष प्रमाण मिले हैं, पुरातात्विक अवशेषों से भी कई विचार प्राप्त होते हैं जो भारतीय संस्कृति के साथ इसके संबंध को समझने में हमारी मदद करते हैं। सिंधु घाटी सभ्यता के धार्मिक जीवन पर कई विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किए हैं। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे स्थलों से प्राप्त मूर्तियों और धार्मिक प्रतीकों से स्पष्ट संकेत मिलता है कि ये लोग प्रकृति पूजा, पशु पूजा, और मातृ देवी की उपासना करते थे। ये धार्मिक प्रतीक और तत्व भारतीय उपमहाद्वीप में विकसित धार्मिक विचारों से मेल खाते हैं, विशेष रूप से सनातन धर्म से।

मातृ प्रधान सभ्यता थी

भारतीय संस्कृति प्राचीनता, निरंतरता व चिरस्थायीत्वता स्वरूप में स्पष्ट परिलक्षित होती है। वर्तमान भारतीय समाज में भी सिंधु-सरस्वती सभ्यता के विद्यमान लक्षणों को विभिन्न रूपों में देख सकते हैं, उदाहरण के लिए यह सभ्यता मातृ प्रधान सभ्यता थी जहाँ मातृ देवी का पूजन किया जाता था। इसे वर्तमान भारतीय समाज में भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है जहाँ लोगों द्वारा शक्ति देवी, ग्राम देवी, इत्यादि के रूप में देवी की पूजा की जाती है। हम जानते हैं कि मातृ देवी की कई मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं, जिनमें प्रजनन और उर्वरता के प्रतीक जुड़े हुए हैं। सैंधव सभ्यता से लिंग पूजा के भी साक्ष्य प्राप्त हुए हैं जो वर्तमान भारतीय समाज में शिवलिंग के रूप में लिंग का पूजन किया जाता है। इसी तरह सिंधु घाटी के पुरातात्विक स्थलों पर मिले कुछ चित्रणों में ध्यान मुद्रा में बैठे व्यक्तियों की छवियाँ हैं, जिन्हें ‘योग मुद्रा’ माना जाता है। मोहनजोदड़ो से प्राप्त ‘पशुपति सील’ इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। इस सील में एक योग मुद्रा में बैठा व्यक्ति, जिसके चारों ओर पशु हैं, देवता के एक तरफ हाथी, एक तरफ बाघ, एक तरफ गैंडा तथा उनके सिंहासन के पीछे भैंसा का चित्र बनाया गया है। उनके पैरों के पास दो हिरनों के चित्र हैं। चित्रित भगवान की मूर्ति को पशुपतिनाथ महादेव की संज्ञा दी गई है। कई विद्वानों का मानना है कि यह ‘पशुपति’ शिव का आदि रूप हो सकता है, जो भारतीय संस्कृति में योग और तपस्या के साथ जुड़ा है। यह संकेत करता है कि सिंधु घाटी सभ्यता के लोग ध्यान और योग जैसी प्रथाओं से परिचित थे, जो आज भी भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं।

वृक्ष पूजन के भी प्रमाण

सैंधव सभ्यता में वृक्ष पूजन के प्रमाण मिले हैं। साथ ही, पशुओं की धार्मिक महत्ता के भी साक्ष्य मिले हैं, जो आज भी भारतीय हिन्दू समाज में दृष्टिगोचर होता है। सैंधव मुद्राओं से नाग पूजा के भी प्रमाण प्राप्त होते हैं जो आज भी भारतीय हिन्दू समाज में नाग पूजा की परंपरा के रूप में विद्यमान है। सैंधव सभ्यता के लोग जल को पवित्र मानते थे तथा धार्मिक समारोहों के अवसर पर सामूहिक स्नान आदि का काफी महत्त्व था जैसा कि बृहद स्नानागार से स्पष्ट होता है। यह भावना आज भी हिन्दू धर्म में विद्यमान (गंगा स्नान) है। चूड़ी व सिंदूर के साक्ष्य भी सिंधु-सरस्वती सभ्यता से प्राप्त हुए हैं जो आज भी भारतीय हिन्दू समाज में महिलाओं के प्रमुख प्रसाधन की वस्तु है। दुर्ग निर्माण व प्राचीरों के निर्माण की कला भी हमें सैंधव काल से प्राप्त होती है। सुनियोजित ढंग से नगरों बसाने का ज्ञान, सैंधव काल की ही देन है। इसी तरह सुरक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता इत्यादि के क्षेत्र में सैंधव निवासियों ने बाद की पीढ़ियों को निर्देशित किया। इन सभी के अलावा मूर्तिकला, चित्रकला इत्यादि के विकसित रूप भी कहीं-न-कहीं सैंधव कला से प्रभावित हैं।

सिंधु घाटी सभ्यता की सामाजिक संरचना पर भी विचार किया जाए तो यह देखने को मिलता है कि यह सभ्यता एक सुव्यवस्थित सामाजिक प्रणाली पर आधारित थी। नगरों की सुव्यवस्था और नियोजन से यह स्पष्ट होता है कि सामाजिक वर्गीकरण और नियमों का पालन किया जाता था। भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था का प्रारंभिक रूप भी सिंधु घाटी सभ्यता में पाया जाता है। हालाँकि, इस संबंध में प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिलते, लेकिन इस सामाजिक व्यवस्था के संकेत पुरातात्विक अवशेषों से अवश्य मिलते हैं।

धर्म और सामाजिक संरचना के बीच घनिष्ठ संबंध

हमारे भारतीय समाज में धर्म और सामाजिक संरचना के बीच घनिष्ठ संबंध है, और यह परंपरा सिंधु घाटी सभ्यता में भी विकसित हुई, उदाहरणस्वरूप, मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के पुरातात्विक स्थलों से यह अनुमान लगाया गया है कि वहाँ के समाज में कुछ धार्मिक और शासकीय वर्ग होते थे, जो सामाजिक नियमों का पालन करवाते थे। यह वर्ग संभवतः धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा-पद्धतियों के माध्यम से समाज को एकत्रित रखता था। इसके उत्खनन में एक पुरोहित की भी मूर्ति प्राप्त हुई है जो मस्टीटाइट से बनी है, इसकी लंबाई करीब 17.5 सेंटीमीटर है, यह मूर्ति एक दाढ़ी वाले व्यक्ति को दिखाती है जो एक ओर से वस्त्र डाले हुए है। इस मूर्ति के चेहरे की विशेषताएँ काफी विस्तृत हैं, जिसमें एक मुकुटनुमा हेडबैंड है, मूर्ति के वस्त्र पर एक डिजाइन है, इस मूर्ति की शांत अभिव्यक्ति और गरिमामय मुद्रा से पता चलता है कि यह कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति था और चूँकि इस मूर्ति की आँखें नाक की नोक पर स्थिर हैं, जिससे यह संकेत हो सकता है कि यह एक धार्मिक व्यक्ति है। स्पष्ट है कि सैंधवकालीन सांस्कृतिक जीवन के लक्षण इस समृद्ध सभ्यता के संभवतः प्रकृतिजन्य कारणों से पतन होने के पश्चात् भी वर्तमान भारतीय समाज में जीवंत रूप में विद्यमान हैं और भारतीय जन-जीवन को इतिहास के गौरव से अवगत करा रहे हैं।

Topics: Indus Valley Civilizationमोहनजोदड़ोपाञ्चजन्य विशेषसिंधु घाटी की सभ्यताराखल दास बनर्जीमातृपूजाभारतभारतीय संस्कृति
Share1
Tweet
SendShareSend
Subscribe Panchjanya YouTube Channel
Download Panchjanya mobile apps: Google Play Store  / App Store

संबंधित समाचार

UCC : समान नागरिक संहिता का समय

बाढ़ पीड़ितों को राहत सामग्री बांटते सेवा भारती के कार्यकर्ता

सेवा संकल्प से राष्ट्र निर्माण

मणिपुर के उखरुल जिले में स्थापित ओझा शंकर विद्यालय। यह उन छात्रों के सहयोग से बना है, जिन्हें संघ प्रचारक श्री शंकर (भैयाजी) काणे ने पढ़ने के लिए महाराष्ट्र भेजा था। इसलिए इसका नामकरण उनके नाम पर किया गया है।

शिव भाव से जीव सेवा

सेवा भाव जीवन का स्वभाव

आज का श्लोक : अकृत्वा धीरवीराणां महासंघटनं दृढम्।

बातचीत के दौरान (बाएं से) लक्ष्य राज सिंह, रिया छावड़ी और यश डबास

अभाविप : जीत बड़ी, जिम्मेदारी बढ़ी

Load More

ताज़ा समाचार

किर्गिज महाकाव्य 'मनास' के पहले हिंदी अनुवाद का विमोचन करते श्री सुनील आंबेकर

‘मनास’ हजारों वर्षों से किर्गिज समाज की सांस्कृतिक धरोहर : सुनील आंबेकर

कल का मौसम: 29 सितंबर को 23 राज्यों में ‘मूसलाधार बारिश’, 3 राज्यों में ओले गिरने का अलर्ट; IMD की चेतावनी

UCC : समान नागरिक संहिता का समय

पूज्य पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य और माता भगवती

हरिद्वार : शांतिकुंज में माता भगवती देवी शर्मा की 100वीं जयंती पर विशेष आयोजन

प्रतीकात्मक चित्र

SIR पर राजनीतिक दलों के साथ बैठक में साझा हुई जानकारी, 3 अक्टूबर को अंतिम मतदाता सूची का होगा प्रकाशन

उत्तरकाशी और पिंडारी ग्लेशियर में फंसे 179 ट्रैकर्स-माउंटेनियर्स के रेस्क्यू ऑपरेशन की मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने ली जानकारी

उत्तरकाशी में 40 ट्रैकर्स का सफल रेस्क्यू, पल-पल की जानकारी ले रहे सीएम धामी

क्या है चक्रवात अर्नब? 14 राज्य इसकी चपेट में; कई जिलों में मूसलाधार बारिश का अलर्ट

नई दिल्ली में सोमवार को पत्रकारों को संबोधित करते भारतीय किसान संघ के पदाधिकारी।

खेत की मेड़ से सम्मान के मंच तक, महिला किसानों की मेहनत लिख रही नई कहानी; भारत का सबसे बड़ा किसान संगठन करेगा सम्मान

Pandit Deendayal Upadhyaya Jayanti: एक विचार, एक दर्शन, एक अमर साधना

EPFO

अपने PF अकाउंट में नॉमिनी कैसे जोड़ें? जानिए आसान तरीका जानें

Load More
  • Privacy
  • Terms
  • Cookie Policy
  • Refund and Cancellation
  • Delivery and Shipping

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies

  • Search Panchjanya
  • होम
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • सामाजिक समरसता
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • पर्यावरण
      • नागरिक कर्तव्य
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विभाजन-विभीषिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
    • सुशासन संवाद
    • सागर मंथन
    • मुंबई संकल्प
    • अष्टायाम
    • गुरुकुलम
    • साबरमती संवाद
    • आधार इन्फ्रा
  • वेब स्टोरी
  • ऑपरेशन सिंदूर
  • विश्लेषण
  • लव जिहाद
  • खेल
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म-संस्कृति
  • पर्यावरण
  • बिजनेस
  • साक्षात्कार
  • शिक्षा
  • रक्षा
  • कला-साहित्य
    • पुस्तकें
    • पुस्तक समीक्षा
  • सोशल मीडिया
  • विज्ञान और तकनीक
  • मत अभिमत
  • श्रद्धांजलि
  • संविधान
  • आजादी का अमृत महोत्सव
  • पॉडकास्ट
  • पत्रिका
  • हमारे लेखक
  • Read Ecopy
  • प्रसार विभाग – Circulation
  • About Us
  • Contact Us
  • Careers @ BPDL
  • Advertise
  • Privacy Policy

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies