पोषण की समृद्ध परंपरा
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पोषण की समृद्ध परंपरा

भारतीय भोजन में पोषण है शरीर, मन, बुद्धि व आत्मा के लिए। इसमें स्वाद है, रस है, उल्लास है, रंग है, त्याग है, तप है, कला है, विज्ञान है, जैव-विविधता है, एकरसता है। यह देशज समाजशास्त्र के अनुरूप और भारतीय अर्थशास्त्र के अनुकूल है

Written byअतुल जैनअतुल जैन
Sep 17, 2024, 07:29 am IST
in भारत, विश्लेषण, संघ @100, धर्म-संस्कृति
अद्भुत है भारतीय पाककला

अद्भुत है भारतीय पाककला

भोजन शब्द के उच्चारण से ही हमारे मनोमस्तिष्क के सामने एक सुंदर-सी बयार बहने लगती है। इस शब्द के स्मरण मात्र से ही एक सुगंध आने लगती है। स्वाद जीभ पर उतर आता है। मुंह में पानी आने लगता है। पेट में चूहे कूदने लगते हैं। आंखों के सामने एक चित्र उभरता है स्वादिष्ट भोज्य पदार्थों का, पकवानों का। कभी-कभी याद आ जाते हैं वे गीत या कहानी-किस्से, जिन्हें हम हमारी मां, दादी-नानी से सुनते आए हैं, खानपान को लेकर। या फिर वे उत्सव जब तरह-तरह के पकवानों की थाली हमारे सामने सजने को होती है। भारतीय संस्कृति पूरी तरह भोजन, खानपान व पोषण के इर्द-गिर्द घूमती है। बात-बात में भोजन।

दिन-रात भोजन की बात। सुबह-शाम भोजन की चिंता। गर्मी-सर्दी में उसके अलग-अलग रूप। बरसात से लेकर पतझड़ में भोजन क्या हो। नवजात हो तो क्या खाएं। बचपन के नखरे। किशोरावस्था का चिड़चिड़ापन। एक किशोरी की जरूरतें। युवावस्था के शौक और चटखारे। गृहस्थी के समझौते। वृद्ध हों तो बचपन के नखरे फिर लौट आएं। शास्त्रों से लेकर आजकल के ‘न्यूट्रीशनिस्ट’ की राय, उनके नुस्खे। पूरा जीवन चक्र खाने-पीने की बात करते, उसका जुगाड़ करते बीत जाता है।

अतुल जैन
महासचिव, दीनदयाल शोध संस्थान

फिर भारतीय जीवनशैली में तो हर चीज का आनंद लेने की परंपरा है। बचपन की अठखेलियां, छात्रावस्था की शैतानियां, पढ़ाई भी आनंद के साथ, योगक्षेम में भी आनंद, सारा जीवन आनंद में ही बीतता है। और बात भोजन की हो तो यह आनंद, परम आनंद की अवस्था को प्राप्त हो जाता है। भोजन है तो उत्सव है, और उत्सव है, तो भोजन है। जन्म का उत्सव, तो उल्लास के साथ भोजन। और मृत्यु हो जाए तो दिवंगत आत्मा की विदाई भी खीर-पुए के साथ। भारतीय भोजन का अपना एक दर्शन है, यानी फिलॉसफी। इन्हीं सबके अनुसार बनती, बदलती रही हैं हमारी सांस्कृतिक परंपराएं-सहज, सरल, रोचक।

मोक्ष की प्राप्ति का माध्यम

अपने यहां भोजन सिर्फ पेट भरने की या भोग की वस्तु नहीं है। वह अध्यात्म, विज्ञान, पोषण, समाजशास्त्र, पर्यावरण, भावनाओं, सबसे जुड़ा है। वह हमारे लिए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति का माध्यम है। आज की पीढ़ी के लिए सिर्फ इतना बता दें कि अपने यहां धर्म का अर्थ अंग्रेजी के ‘एथिक्स’ से भी विस्तृत है। अर्थ अपने लिए इकोनॉमिक्स के नीतिगत सिद्धांतों का वृहद स्वरूप है। काम, सांसारिक सुख और आनंद की अभिव्यक्ति करने वाला शब्द है। और मोक्ष, निपुणता का द्योतक, यानी परफेक्शन। हमारी पाककला इन सबको समाहित करती है। हर गृहिणी इसमें निपुण है। मां की रसोई उसकी पाठशाला। काकी और बुआ उसकी टीचर। सखी की मां ट्यूटर। बचपन से ही पाकविद्या कब, कैसे सीख जाती है हमारे देश की महिलाएं, उन्हें भी नहीं पता है। अपनी बड़ी बहन की शादी में मंगौड़ी तोड़ते समय या पापड़ बनाते समय जब कोई लड़की, परिवार व पड़ोस की महिलाओं को गीत गुनगुनाते सुनती है तो उसे मालूम ही नहीं होता कि उसकी क्लास चल रही है। धीरे-धीरे वह भी गुनगुनाने लगती है। फिर तो वह यूं ही निपुण होती चली जाती है।

सब कुछ परंपराओं को निभाते हुए। अपनी आस्थाओं के अनुरूप। तमाम षोड्श संस्कारों, भोजन को आत्मसात करते हुए। हर व्यक्ति की प्रकृति के अनुसार भोजन। ऋतु यानी मौसम के अनुसार भोजन। क्षेत्रानुसार भोजन। अपने भारत देश में भोजन से संबंधित दो प्राचीन परंपराएं हैं, बल्कि उन्हें दर्शन कहना उचित होगा –‘अन्नं बहु कुर्वीत’ यानी अन्न का प्रचुर उत्पादन हो। और दूसरा, ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’ यानी त्याग के साथ उपभोग करो। संयमित उपभोग करो। इसलिए नहीं कि अन्न की कमी है, बल्कि इसलिए, ताकि किसी को अन्न की कमी न हो। सबको बराबर मिले। हमारे शास्त्रों में प्रचुर मात्रा में अन्न उगाने का आह्वान तैत्तिरीयोपनिषद् में ‘अन्नं बहु कुर्वीत’ श्लोक से मिलता है, तो त्याग की परंपरा का उल्लेख ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा:’ के मंत्र में निहित है। लोक संस्कृति में इन दोनों दर्शनों को हमारे मनीषियों व लोक ने कैसे उतारा, इसका एक खूबसूरत उदाहरण हमारे पारंपरिक गीतों में मिलता है- राजस्थान में जब किसान दंपती हल जोतता है, तो दोनों मिल कर स्यावड़ माता का स्मरण कर निम्न गीत गुनगुनाते हैं-

स्यावड़ माता रो सिमरण, स्यावड़ माता सतकरी
दाणा-फाका भोत करी, बैण-सुभासणी रै भाग रो देई
चीड़ी-कमेड़ी रै राग रो देई, राही-भाई रो देई
ध्यांणी अर जवांई रो देई, घर आयो साधु भूखो न जा
बामण दादो धाप र खा, सुन्ना डांगर खा धापै
चोर चकोर लेज्या आपै, कारुंआ रै भेले ने देई
राजाजी रै से लै ने देई, सुणीजै माता सरी
छत्तीस कौमां पूरी, फेर तेरी बखारी में ऊबरै
ते मेरे टाबरा नै ई देई,स्यावड़ माता, सत की दाता

अर्थात्, हे सत् करने वाली स्यावड़ माता! पर्याप्त खाद्यान्न उत्पन्न करना। ससुराल गई बहन-बुआ के भाग्य का देना, पक्षियों की आवश्यकता को पूरा करना। राहगीर भाई-बंधुओं के लिए देना। अपने जंवाइयों के लिए देना। आवारा पशु भी पूरा खा सकें। चोर-चकोर भी अपनी जरूरत पूरी कर सकें। कारू अर्थात् खेती न करने वाले कुम्हार, नाई, खाती आदि इनके लिए भी देना, शासन अच्छा चले, उनके लिए भी देना है। हे सब की माता! सुनो, छत्तीस कौमों की जरूरत पूरी करो। उसके बाद तुम्हारे भंडार में कुछ बचे तो मेरे बच्चों के लिए भी देना। हे स्यावड़ माता! तुम्हीं सब को सत् देने वाली हो। अन्य प्रदेशों व भाषाओं में भी ऐसे ही लोकगीत भरे पड़े हैं। यह है हमारे पूरे भारतीय दर्शन की उदात्त परंपरा।

लेकिन भोजन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है तो इसका मतलब यह नहीं कि उसे जूठा छोड़ा जा सके। इसके लिए हमारे समाज ने ऐसे गीत तक रचे जो शादी-ब्याह के समय गाए जाते हों और ‘गारी’ के माध्यम से जूठन छोड़ने पर ताना भी देते हों। सुखद तो यह तथाकथित अनपढ़ समाज ने इन अर्थपूर्ण ‘गालियों’ की रचना की। और उसी तथाकथित ‘गंवार’ समाज ने उन गालियों को अपने गले से स्वर भी दिए।

एक मंदिर में खिचड़ी का प्रसाद तैयार करते रसोइए

भगवान का प्रसाद

भारतीय दर्शन की एक और समृद्ध परंपरा है, सब कुछ भगवान का प्रसाद मान कर खाना, मिल-बांट कर खाना, आनंद व उत्सव के साथ खाना, स्वाद लेकर खाना, पौष्टिक खाना। देश के सभी मंदिर-गुरुद्वारों में दिव्य प्रसाद की व्यवस्था गई है। फिर उसी प्रसाद को प्रकृति का वरदान मानकर वहां के स्थानीय समाज ने अपने पोषण की रचना की। भारतीय भोजन का विशाल संसार ढेर सारी पांथिक व सांस्कृतिक रुचियों व परंपराओं से प्रभावित रहा है। त्योहारों की गिनती करने बैठें तो साल के 365 दिन भी कम पड़ जाएं। हर त्योहार के अपने व्यंजन। और हर व्यंजन का अपना त्योहार, लेकिन सब कुछ स्थानीय जैव विविधता व आबोहवा तथा मिट्टी-पानी की विशिष्टताओं के अधिष्ठान पर टिका हुआ। भारतीय समाज में खान-पान का भी अपना संस्कार है।

भारत के धर्म ग्रंथों, लोक परंपराओं और सामान्य साहित्य में खान-पान पर पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है। खान-पान की इस परंपरा में समाज के अमीर-गरीब सभी वर्गों का पूरा ध्यान रखा गया है। जैसे मानव की तीन वृत्तियां-सात्विक, राजसिक और तामसिक हैं। वैसे ही भोजन भी तीन तरह का होता है-सात्विक, राजसिक और तामसिक। खान-पान हमारी मानसिक एवं शारिरिक वृत्तियों को निर्धारित करता है। जैसा कि- जैसा खाओ अन्न वैसा होए मन। हमारी पोषण, पोषक और पोषण समर्थक भारत की समृद्ध खान-पान परंपरा इसी स्वरूप में रही है।

हमारे घरों में खान-पान को लेकर बड़ी समझदारी और ज्ञान की बातें नानी-दादी, अम्मा-ताई, बुआ-मौसी और दूसरे बड़े-बुजुर्ग बताते रहते हैं। खान-पान को लेकर उनका यह ज्ञान कपोल-कल्पित नहीं, बल्कि विरासत में मिले अनुभवों से भरपूर है। इसमें मानव का हित और उसके पोषण का ऐसा खजाना छिपा है जिसे चखने भर से खाने की पौष्टिकता से मालामाल होकर कोई भी अपने जीवन को निरोगी बना सकता है।

बांट कर खाओ

आज का विज्ञान भी कहता है कि मनुष्य की ज्यादातर बीमारियां गलत खान-पान और जीभ के स्वाद के कारण हैं। मनुष्य जीभ के स्वाद के कारण ही बहुत कुछ ऐसा खाता है जो उसका आहार ही नहीं है। लेकिन आज के उपभोक्तावादी दौर की पीढ़ी खान-पान को लेकर पारंपरिक ज्ञान और बड़े-बुजुर्गों के अनुभव का मजाक उड़ाती है। वह यह मानती है कि हमारे बुजुर्गों को खाने का शऊर ही नहीं है, जबकि ऐसा नहीं है। गांव में आज भी आपको बड़े-बुजुर्ग स्वस्थ और उम्र को मात देते मिल जाएंगे, लेकिन अपने आपको ‘एडवांस’ मानने वाली युवा पीढ़ी तमाम रोगों से पीड़ित मिलेगी। अब टेलीविजन के विज्ञापन उसके खानपान को तय करते हैं पर जीवन विज्ञान से उनका कोई सरोकार नहीं है।

मानव जीवन के एक मुख्य पहलू भोजन ने भारतीय मूल्यों और मान्यताओं को गहरे और रोचक रूप से प्रभावित किया है। इससे कई सामाजिक, आर्थिक, गतिविधियां और सांस्कृतिक परंपराएं भी जुड़ी हुई हैं। भोजन से जुड़े पारंपरिक ज्ञान को लोकगीतों, लोककथाओं, लोक-विज्ञान, रीति-रिवाजों, त्योहारों आदि में बखूबी देखा जा सकता है। लोककला के हरेक क्षेत्र में इस तरह का विशाल खजाना छिपा हुआ है।

एक गुरुद्वारे में लंगर की तैयारी

अब तक के अनुभवों व अध्ययन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारतीयों की सेहत अमूर्त रूप से हमारी पारंपरिक थाली में छिपी हुई है। यह थाली हर क्षेत्र विशेष की अपनी विशिष्टता को समेटे होती है। इस माध्यम से सिर्फ पोषण ही नहीं, वहां की आबो-हवा, समाज व्यवस्था, जैव-विविधता, अर्थ-व्यवस्था, कृषि-प्रणाली, पसंद-नापसंद आदि की सुरुचिपूर्ण अभिव्यक्ति होती है। लेकिन इससे पहले कि यह सब लुप्त हो जाए, इन संबंधित परंपराओं का दस्तावेजीकरण अत्यावश्यक है।

आधुनिक खानपान की वजह से न केवल आज स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं ने हमें घेरा है, बल्कि हम अपने भोजन की विशिष्टता और उसकी पौष्टिकता को ही भूलते जा रहे हैं। दुनिया भर में पोषण को लेकर विभिन्न शोध किए जा रहे हैं। आधुनिक जगत में इसके बहुत से कृत्रिम तरीके हमारे सामने रोजाना परोसे जाने लगे हैं। कुछ समय पहले तक विटामिन, मिनरल्स, आयरन आदि के कैप्सूल ही पोषण का पर्याय बनने लगे थे। मिल-बांट कर, बराबर बांट कर, दूसरे की चिंता कर, आग्रह के साथ परोसने वाली और त्याग, आनंद व उत्सव के साथ ग्रहण करने वाली सभ्यता का नाम है भारत। इस संस्कृति ने एक ऐसी सुविकसित, सुदृढ़ सामाजिक जीवन पद्धति तैयार की, जिसमें जिसका पालन हो तो देश का कोई भी प्राणी भूखा न सोए, न ही कुपोषित रहे। समाज के कमजोर वर्ग को भी जीवन के सभी रस हासिल हों। उसका पेट भर सके और सभी पोषक तत्व भी हासिल हों, ताकि उसका भी सर्वांगीण विकास हो सके। प्रत्येक देशवासी का सर्वांगीण विकास ही भारत को दुनिया का सिरमौर बना सकता है।

भावात्मक पोषण का वाहक

पिछली सहस्राब्दी में बाकी भारतीयत्व की तरह इस पर भी कुठाराघात हुआ, लेकिन देश के एक बड़े हिस्से में आज भी कम-ज्यादा स्तर पर यह जीवित है। खासतौर पर ग्रामीण अंचल में। और वहां का समाज उसे निभा रहा है-जाने, अनजाने।

हमारे मनीषियों ने अपने तप से समाज, उसके स्वभाव, उसकी लौकिक व अलौकिक आवश्यकताओं, क्षेत्रीय परिस्थितियों, वहां की आबोहवा, मिट्टी-पानी, ऋतुओं की विशिष्टताओं का अध्ययन किया और उनका विश्लेषण किया। सामाजिक, आर्थिक व वैज्ञानिक विश्लेषण ही नहीं, बल्कि उनका भावात्मक सूचकांक (emotional quotient) भी समझा। उन सबके आधार पर परंपराओं, रीति-रिवाजों, तीज-त्योहारों आदि का सृजन किया। देशभर में अलग-अलग स्थानों पर होने वाले कुंभ और उसके समवर्ती आयोजन इस सांस्कृतिक सृजन के गर्भाशय रहे। उन्हीं में से सृजन हुआ ढेरों परंपराओं का। भोजन की संस्कृति भी उन्हीं की देन है। हमारे मनीषियों ने, आयुर्वेदाचार्यों ने, समाज के सयाने लोगों ने, भारत में भोजन को सिर्फ पेट भर देने या खाद्य सुरक्षा का ही साधन नहीं माना, बल्कि उसे शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक व भावात्मक पोषण का वाहक भी माना। उसका वैज्ञानिक अध्ययन कर यह चिंता भी की कि भोजन की संस्कृति को ऐसी परंपराओं में ढाला जाए, ताकि समाज के वंचित वर्ग को भी भरपूर पोषण मिल सके। उसी मंथन में से निकली ढेरों सहज-सरल, लेकिन रस व रंग से भरपूर परंपराएं। जो विज्ञान का खजाना है और कला का विशाल कैनवास है। स्वाद तो उस परंपरा का महत्वपूर्ण अवयव है ही।

देश के अलग-अलग अंचलों की विशिष्टतों के अनुरूप हैं ये परंपराएं। वहां की आबोहवा का प्रतिबिंब हैं ये परंपराएं। हर अंचल की जैव विविधता की स्वादिष्ट व पौष्टिक अभिव्यक्ति हैं ये परंपराएं। हर क्षेत्र के लोगों के कद-काठी के सांचे में ढली हुई हैं परंपराएं। उस अंचल के लोगों के त्रिदोषों (पित्त, वायु, कफ) के अनुकूल हैं ये परंपराएं। मानव जीवन के हर पहलू को छूती हैं ये कालजयी लोक परंपराएं।

पुरानी पद्धति से बने भोजन का स्वाद निराला होता है

भोजन का अभिन्न अंग मिष्ठान

मिष्ठान हमारे भोजन का अभिन्न अंग है, लेकिन उसके वैज्ञानिक व पौष्टिक कारण हैं। पश्चिम के डिजर्ट की तरह हम भारतीय उसे भोजन के बाद नहीं, उससे पहले खाते हैं। इसलिए उसके बारे में कुछ मीठी-मीठी बातें मुख्य भोजन से पहले ही कर ली गई हैं। ऐसा अंग्रेजीदां लोग मानते हैं। जबकि भारतीय मानस कहता है कि पहले मीठा हो जाए। फिर भी भूख रह गई तो कुछ दाल-भात, सब्जी खा लेंगे। भारतीय जिव्हा इस मानस का आमराय से प्रतिनिधित्व करती है। डायबिटीज की आधुनिक चिकित्सा पद्धति को नकारते हुए आम भारतीय की जिह्वा अपने-अपने ढंग से मीठे की व्याख्या कर लेती है। और उसकी अनिवार्यता को स्थापित कर ही लेती है। मिष्ठान की इसी महत्ता ने इसे भारतीय खानपान और पाक कला का अभिन्न अंग बना दिया।

घर की रसोई से लेकर ठेले-खोमचे और गली-नुक्कड़ की दुकान और शॉपिंग मॉल में सजी आलीशान दुकानों तक मिष्ठान के पकवान का जायका लोगों की जुबान पर सिर चढ़कर बोलता है। भारतीय भोजन में मिष्ठान का स्थान इसी पहलू से लगाया जा सकता है कि अक्सर भोजन के आरंभ से लेकर भोजन का अंत भी मिष्ठान के बिना अपूर्ण माना जाता है। मिष्ठान ही वास्तव में भोजन को पूर्णता प्रदान करता है। यह तथ्य सर्वस्वीकार्य है कि जीवन के लिए यदि अन्न आवश्यक है तो उसे मधुर बनाए रखने के लिए मिष्ठान उतना ही जरूरी है।

मिष्ठान को स्वाद और सेहत के साथ ही जीवन को रुचिकर बनाए रखने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना गया है। स्वास्थ्य के लिहाज से देखें तो मधुर रस जीवन के आरंभ से ही मानव शरीर के लिए अनुकूल होता है। यह सप्तधातुओं (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र) को पोषित करता है। ओज बढ़ाता है। आयु की वृद्धि करता है। पांचों ज्ञानेंद्रियों के अतिरिक्त मन को प्रसन्नवदन रखता है। मधुर रस कफ-वर्धक और वात एवं पित्त नाशक है। मिष्ठान बलशाली बनाने के साथ ही वाणी को मधुरता प्रदान करता है। इसीलिए मृदुभाषी व्यक्ति के लिए यही उपमा दी जाती है कि मानो उसकी जुबान में मिठास घुली हुई हो।

भारत की ऊष्ण कटिबंधीय जलवायु से लेकर सांस्कृतिक एवं पौराणिक आख्यान भी मिष्ठान को जरूरी पकवानों में शामिल कराते हैं। शारीरिक श्रम को समर्पित रही भारतीय जीवनशैली में ऊर्जा की तत्काल आवश्यकता के लिए मीठा या मीठे से बने पकवान से बेहतर शायद ही कोई और विकल्प रहा हो। भारतीयों के आराध्य देवी-देवताओं ने भी उन्हें मिष्ठान प्रेम की चाशनी में डुबोने को काम किया है। प्रथमपूज्य श्रीगणेश यदि मोदक के स्वाद का मोह संवरण नहीं कर पाते तो उनके पिताश्री देवों के देव महादेव भले ही वैराग्य प्रेम में आकंठ डूबकर साधनारत रहते हों, लेकिन खीर का स्वाद उन्हें भी बहुत रास आता है।

जगतपालक भगवान विष्णु के अवतार की संकल्पना के पीछे एक उद्देश्य तो मानो यही लगता है कि वे पृथ्वी पर अवतरित होकर मिष्ठान के विभिन्न व्यंजनों का रसास्वादन कर सकें। पूरब में महाप्रभु जगन्नाथ के महाप्रसाद से लेकर सुदूर पश्चिम में द्वारिकाधीश धाम में भोग लगाए जाने वाले छप्पन भोगों में मिष्ठान से बने पकवान बहुतायत में होते हैं। वास्तव में हर क्षेत्र में विशिष्ट प्रकार की मिठाई वहां की भौगोलिक स्थिति और जलवायु के आधार पर स्थानीय  आराध्य देवता को उसी के प्रसाद के रूप में मान्यता प्राप्त करती गई। जैसे महाराष्ट्र में गणेश जी को नारियल से बने मोदक का भोग लगाया जाता है तो उत्तर में बूंदी के लड्डू, कहीं हनुमान जी को सिर्फ बूंदी का प्रसाद चढ़ाया जाता है, तो कहीं बेसन के लड्डुओं का, लीलाधर श्रीकृष्ण जी की लीलाओं में एक लीला तो मिष्ठान के साथ उनके अनुराग पर ही केंद्रित हो सकती है कि कहीं वह मक्खन-मलाई के प्रेम में पगे हैं, तो कहीं उन्हें कुछ और भाता है। यानी भारतीयों को मीठे की लत लगाने में उनके आराध्य देवी-देवताओं का भी कम योगदान नहीं रहा, जिन्हें भिन्न-भिन्न इलाकों और अलग-अलग पहर पर विभिन्नता लिए पकवान चाहिए।

आध्यात्मिक एवं पौराणिक आख्यानों से इतर भारतीय पकवानों और पोषण के साथ मिष्ठान का पारंपरिक रिश्ता रहा है तो उसके पीछे देसी जीवनशैली की भूमिका अहम रही है। चाहे खेती-किसानी हो या फिर बर्तन बनाने से लेकर लोहे के उपकरणों को बनाने या तराशने का काम, सभी में बड़ी शारीरिक ऊर्जा की खपत होती है, जिस ऊर्जा की तत्काल प्राप्ति के लिए मिष्ठान उत्तम विकल्प है। आज जिस ग्लूकोज को इंस्टेंट एनर्जी बूस्टर यानी तत्काल स्फूर्तिदायक की पदवी प्राप्त है वह मीठे का परिष्कृत रूप नहीं तो और क्या है? लेकिन वह ‘टेस्टलैस’ है। अब तो एक से बढ़कर एक नाना प्रकार की मिठाइयां बनने लगी हैं, लेकिन पारंपरिक रूप से भारतीय गुड़, शक्कर, खांड, बूरा, मिश्री और यहां तक कि शहद का ही मिष्ठान के रूप में सेवन करते आए हैं। ये उस दौर की मिठाइयां हैं, जब शहर के हर अगले चौराहे पर मिठाई की कोई दुकान नहीं हुआ करती थी। लोक परंपराओं में इसकी सहज ही अभिव्यक्ति मिलती है-
मीठी मिसरी रौ ठिकाणो, केसर भरीयौ मखाणो
बीके रै हठ सूं हुई थरपणा,वौ सैर है म्हारौ बीकाणो

राष्ट्रीय आहार खिचड़ी

खिचड़ी अपने देश का मानो राष्ट्रीय आहार है। पूरे देश में लोकप्रिय खिचड़ी हर क्षेत्र का विशिष्ट पोषण समेटे हुए है। इसी तरह उसके चार यारों- दही, पापड़, घी, अचार- की विविधता भी निराली है। अपनी रसोई की बरनी में रखी कोई सूखी मंगौड़ी या सब्जी अपने हर परिवार की उद्यमशीलता की कहानी है और प्रसंस्कृत आहार की सांस्कृतिक कृति।
खिचड़ी के अछि चारि यार, दही, पापड़, घी, अचार।।
जब भी किसी महापुरुष से उनके प्रिय भोजन के बारे में पूछा जाता है, एक आहार आमतौर पर समान रूप से सामने आता है वह है खिचड़ी। ऋषि-मुनि, राजा-महाराजा, राजनीतिक, कलाकार, खिलाड़ी, किसी बहुराष्ट्रीय टेक-कंपनी का सीईओ या फिर कोई भी सामान्य व्यक्ति, खिचड़ी देशभर में सर्वाधिक प्रचलित भोजन है। बहुत से मामलों में यह व्यंजन भी है, उत्सव का मुख्य भोजन, कहीं प्रसाद है। कभी कोई आपदा आ जाए, तो बनाने व परोसने में सबसे सरल। ‘होलसम मील’ यानी संपूर्ण आहार, लेकिन सुपाच्य। कई बार तो एंटासिड या पुदीन हरा का काम भी कर जाती है यह खिचड़ी। कन्याकुमारी से खीरभवानी तक, कोटेश्वर से कामाख्या तक, जगन्नाथ से केदारनाथ तक, सोमनाथ से काशी विश्वनाथ तक, सम्मेद शिखर से श्रवणबेलगोला तक, बोधगया से सारनाथ तक, अमृतसर से पटना साहिब तक, अंदमान से अजमेर तक, लक्षद्वीप से लेह तक, पूरा भारत, किसी न किसी तरह की खिचड़ी का प्रेमी है। हर क्षेत्र की अपनी खिचड़ी, हर ऋतु की अलग खिचड़ी, हर शरीर के लिए भिन्न खिचड़ी। अंग्रेजीदां लोगों को बताना हो तो कस्टोमाइज्ड खिचड़ी-आवश्यकतानुसार, स्वादानुसार। इतना लचीलापन है इस खिचड़ी में।

शैशवकाल का पहला भोजन खिचड़ी। जीवन के अंतिम क्षणों में खिचड़ी। बीमारी में खाना तो खिचड़ी। बीमारी के बाद खाना हो तो खिचड़ी। और तो और एक पूरे उत्सव का ही नाम खिचड़ी। मृत व्यक्ति की स्मृति में पहला गोग्रास छोड़ना हो तो भी खिचड़ी। अब लग्जरी रिजॉर्ट्स के एग्जॉटिक मेन्यू में भी प्रमुख स्थान पा चुकी है खिचड़ी।

खाला खाला दूल्हा मड़उवा में खिचड़ी
आज खाई लेबा तो काल जाई निसरी
काल जाई निसरी हो काल जाई निसरी
खाला खाला दूल्हा मड़उवा में खिचड़ी
समधी के दांत न….. समधी के दांत नाही कइसे कुचाई
उनहुं के चाहत बा बर्फी मलाई
समधी के बहिनी ता हई बड़ी छिनरी
खाला खाला दूल्हा मड़उवा में खिचड़ी।

हरप्पा और मोएंजोदरो सभ्यताओं के अवशेषों में जो खाना पकाने, परोसने व खाने के बरतन मिले, वे आज भी हर इलाके की विविधता को बयां करते हैं। कहीं-कहीं तो बांस में भोजन पकाने या पत्तों में बाटी और चीला बनाने से जो अतिरिक्त पोषण प्राप्त होता है वह भी अद्भुत है। मिट्टी के बरतन में राबड़ी या कढ़ी पकने के गुणों की सांस्कृतिक दास्तां भी मुंह का जायका बदल देती है। श्री जगन्नाथ पुरी के विशाल रसोई में इस्तेमाल होने वाले बरतनों व पकाने की विधि में पोषण के साथ-साथ जो आर्थिक व सामाजिक पक्ष निहित हैं, वे भी हमारी सांस्कृतिक विरासत का अनूठा उदाहरण हैं।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि हमारे देश में 2000 से अधिक वनस्पतियों की पत्तियों से तैयार की जाने वाले पत्तलों और उनसे होने वाले लाभों के विषय में पारंपरिक चिकित्सकीय ज्ञान उपलब्ध है पर मुश्किल से पांच प्रकार की वनस्पतियों का प्रयोग हम करते हैं। पुराने समय में पत्तल में खाना खाया जाता था। कई प्रकार के पत्तों से पत्तल बनाई जा सकती थी, और इन्हीं पत्तलों पर खाना खाया जाता था। घर में तो ठीक है किन्तु किसी भी मांगलिक कार्य या विवाह आदि में तो पत्तल में ही खाना खाने व खिलाने का रिवाज था।

आम तौर पर केले की पत्तियों पर खाना परोसा जाता है। प्राचीन ग्रंथों में केले की पत्तियों पर परोसे गए भोजन को स्वास्थ्य के लिए लाभदायक बताया गया है। आजकल महंगे होटलों और रिसोर्ट में भी केले की पत्तियों का प्रयोग होता है।

सुपारी के पत्तों से भी प्लेट व कटोरी बनायी जा सकती है, जिसे प्लास्टिक, थर्मोकॉल के विकल्प में उतारा गया है, क्योंकि प्लास्टिक व थर्मोकॉल दोनों स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक हैं।

और अपने भोजनोत्सव का समापन होता है पान से। पाचक पान से। वह तो पान में तंबाकू के छौंके ने उसकी साख को चूना लगा दिया, वरना तो कृष्ण जी भी पान का बीड़ा खाए बिना सोते नहीं थे। इसलिए पान हमारे भोजन का हिस्सा ही नहीं बन गया, बल्कि हमारी सांस्कृतिक परंपराओं में भी महत्वपूर्ण स्थान पा गया है, ताकि हम उसे भूलें नहीं।

सचमुच में पोषण के विविध पक्षों को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। हमें पूरी पोषण संस्कृति को समग्रता के साथ देखना होगा। यही भारतीय दर्शन की विशिष्टता है।

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