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साझे हित मजबूत रिश्ता

अमेरिका का राष्ट्रपति कोई भी बने लेकिन भारत की तैयारी ऐसी है कि उसके हितों पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला

Written byप्रो. बृज किशोर कुठियालाप्रो. बृज किशोर कुठियाला
Aug 10, 2024, 07:54 am IST
in विश्व, विश्लेषण
अमेरिकी राष्ट्रपति पद के दो दावेदार पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और उपराष्ट्रपति कमला हैरिस

अमेरिकी राष्ट्रपति पद के दो दावेदार पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और उपराष्ट्रपति कमला हैरिस

अगले वर्ष, 2025 की 20 जनवरी को अमेरिका में नव-निर्वाचित राष्ट्रपति शपथ लेंगे। वहां कौन नया राष्ट्रपति बनता है, इसका बहुत बड़ा प्रभाव अमेरिकी जनता पर तो पड़ेगा ही, परन्तु काफी हद तक अगले कुछ वर्षों के लिए वैश्विक घटनाक्रम को नए राष्ट्रपति ही तय करेंगे। भारत-अमेरिकी संबंधों को लेकर भी दोनों मुख्य प्रतिस्पर्धी अलग-अलग रुख अपनाने वाले हैं। अमेरिका में वर्षों से दो दलीय राजनीतिक व्यवस्था चल रही है। इन्हें ‘डेमोक्रेट’ और ‘रिपब्लिकन’ के नाम से जाना जाता है। दोनों पार्टियों की मौलिक बौद्धिक विचारधारा में अधिक उदार व कम उदार होने का ही अन्तर है, परन्तु समय-समय पर तत्कालीन मुद्दों पर दोनों की परस्पर विरोधी नीतियां रही हैं। उदाहरण के लिए दोनों इस्राएल की समर्थक हैं परन्तु डेमोक्रेट फिलिस्तीन के लिए सहानुभूति रखते हैं तो वही रिपब्लिकन इस्राएल के प्रधानमंत्री द्वारा फिलिस्तीन को लेकर की जाने वाली कार्रवाई का पूरी तरह समर्थन करते हैं।

अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनाव के लिए मतदाताओं को चुनाव से पहले पंजीकरण करवाना आवश्यक है। इस काम के लिए राजनीतिक दल अपने समर्थकों का पंजीकरण करवाने में सक्रिय रहते हैं। अमेरिका में जन्मा और कम से कम 14 वर्ष वहीं रहा अमेरिकी चुनाव लड़ सकता है। जिसको अपनी पार्टी में सबसे अधिक समर्थन मिलता है वही उस पार्टी का राष्ट्रपति उम्मीदवार बनता है।

अमेरिका में मतदाता सीधे राष्ट्रपति के लिए वोट नहीं करते। वहां 50 राज्य और एक कोलम्बिया जिला है। हर राज्य के नियम और प्रकिया अपनी हैं। मतदाता अपने मतों से एक निर्वाचन मंडल का चुनाव करते हैं जिसमें 538 प्रतिनिधि होते हैं। राज्य में जितने सदस्य कांग्रेस (भारत की राजनीतिक पार्टी नहीं, लोकसभा जैसा अमेरिका का सदन) के और जितने सदस्य सीनेट के (राज्यसभा से मिलता-जुलता अमेरिकी सदन) होते हैं, उतने ही सदस्य उस राज्य के मतदाता निर्वाचन मंडल को चुनते हैं। कुल 538 सदस्यों में से जो भी उम्मीदवार कम से कम 270 का समर्थन पाता है, वह अगले चार वर्ष के लिए राष्ट्रपति घोषित होता है।

इस बार अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में तीन घटनाओं का बड़ा प्रभाव पड़ने वाला है। पहले डेमोक्रेटिक पार्टी के वर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडन ने घोषणा की कि वे एक बार फिर राष्ट्रपति का चुनाव लड़ेंगे। वे 81 वर्ष के हैं और भूलने वाली बुढ़ापे की बीमारी से ग्रस्त हैं। उन्हीं की पार्टी के कुछ प्रमुख लोग उन्हें चुनाव न लड़ने की सलाह दे रहे थे। वहां की प्रथा के अनुसार रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डॉनल्ड ट्रम्प के साथ एक टीवी चैनल पर उनकी बहस हुई जिसमें बाइडन काफी पिछड़ गए। रेटिंग में वे ट्रम्प से 6 अंकों से अधिक पीछे हो गए।

दूसरी घटना में डोनाल्ड ट्रम्प की पेन्सिलवेनिया राज्य के एक नगर बटलर में रैली चल रही थी। सुरक्षा के सभी इंतजामों को ठेंगा दिखाते हुए उन पर गोलियां चलाई गईं। पहली गोली ही घातक हो सकती थी यदि ट्रम्प भाषण मुद्रा में सिर को न घुमा लेते। गोली उनके दाएं कान के सिरे पर लगते हुए निकल गई। हत्या के इस सुनियोजित प्रयास के बाद घटनाक्रम और नाटकीय हो गया और सहानुभूति की लहर में अमेरिकी मतदाताओं ने सर्वेक्षणों में ट्रम्प को बढ़त दे दी।

तीसरा, धीरे-धीरे बाइडन पर दबाव बढ़ा और उन्होंने घोषणा कर दी कि वे अगले राष्ट्रपति की दौड़ से हट रहे हैं लेकिन उन्होंने अपनी सहयोगी उप राष्ट्रपति कमला हैरिस को डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार के रूप में प्रस्तुत कर दिया। कमला हैरिस की माता भारत की थीं और पिता जमैका के अफ्रीकी मूल के थे। ध्यान रहे, कमला हैरिस भारतीय मूल की पहचान का प्रचार नहीं करतीं और न ही भारतीय संस्कृति के किसी रीति-रिवाज को मानती दिखती हैं। शीघ्र ही ट्रम्प व कमला में टेलीविजन के मंच पर सीधी बहस होने वाली है।

अमेरिकी राष्ट्रपति के 2024 के चुनाव के मुद्दों की बात करें तो वर्तमान में सबसे बड़ा विषय है बाइडन की साढ़े तीन वर्ष की सफलताएं व असफलताएं। डेमोक्रेटिक पार्टी दावा करती है कि बहुत विपरीत स्थितियों के बावजूद बाइडन देश की अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर ले आए। वहीं ट्रम्प यह कहते नहीं अघाते कि अमेरिका के इतिहास में सबसे निकम्मे राष्ट्रपति जो बाइडन ही हैं। एक बड़ा और पुराना विषय गैरकानूनी तौर से आए अप्रवासियों का है। डेमोक्रेटिक पार्टी उनकी ओर सहानुभूति रखती है और उन्हें ग्रीन कार्ड व नागरिकता देने की पक्षधर है। शायद ऐसा करके वे स्पेनिश व अफ्रीकी मूल के मतदाताओं को रिझाना चाहते हैं। दूसरी ओर ट्रम्प गैरकानूनी तौर से आए लोगों को घुसपैठिए मानते हैं।पाठकों को इसमें भारत की स्थिति जैसा ही कुछ आभास हो रहा होगा। इस झगड़े में भारतीय मूल के वे लोग असमंजस में हैं, जो कानूनी प्रक्रिया से अमेरिका में आए हैं और ग्रीन कार्ड व नागरिकता की प्रतीक्षा कर रहे हैं। एक और बड़ा चुनावी मुद्दा ट्रम्प पर लगे आरोपों व चल रहे मुकदमों का है। ट्रम्प पर धन के गुप्त लेन-देन, सुरक्षित कागजों में हेर-फेर, अवैध सम्बन्धों व हारने पर राजधानी के मुख्य कार्यालय पर भीड़ के हमले का षड्यंत्र रचने आदि के आरोप हैं। ट्रम्प चुनावी अभियान को अपने विरोध में षड्यंत्र के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। वहीं विरोधी पक्ष ट्रम्प को भ्रष्ट, चरित्रहीन व बड़बोले नेता के रूप में मतदाताओं के सामने रख रहा है।

विश्व में चल रहे दो बड़े युद्धों, रूस-यूक्रेन व इस्राएल-फिलिस्तीन, के विषय में दोनों पार्टियां भिन्न मत रखती हैं। हाल ही में ट्रम्प ने फिलिस्तीन को चेतावनी दी है कि वह उनके राष्ट्रपति बनने से पहले युद्ध समाप्त कर दे, नहीं तो उसे पछताना पड़ेगा। बाइडन की पार्टी इस्राएल से नाराज लगती है कि इस्राएल युद्ध बंद करने के प्रयासों में अड़चन डाल रहा है। एक विषय गर्भपात का है जिसके पक्ष और विरोध में अमेरिकी जनमानस बंटा हुआ है। परिवार में बच्चों का न होना भी मुद्दा बनता जा रहा है।
अमेरिका में एक शब्दावली प्रचलित है ‘कैट लेडीज’, यह उन महिलाओं के लिए है जो सम्पन्न हैं और अपना समय और धन बिल्लियों के पालन में लगाती हैं। ट्रम्प की पार्टी के उप राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जेम्स डेविड वान्स कई बार कह चुके हैं कि अकेली रहने वाली संतानहीन ‘कैट लेडीज‘ के कारण अमेरिकी समाज के जीवन में दुख बढ़ रहा है। डेमोक्रेट इस विषय को लेकर ट्रम्प को घेर रहे हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी ने दो और मुद्दे बनाए हैं कि ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने से लोकतंत्र को खतरा है और ट्रम्प संविधान बदल देंगे। पाठकों को इसमें भी भारत के लोकसभा चुनावों से समानता दिख रही होगी। अनेक स्थानीय व क्षेत्रीय विषय अलग हो सकते हैं परन्तु वर्षों के अनुभव से अमेरिकी मतदाता विवेकशील बन चुका है और लगता है, वह राष्ट्रीय मुद्दों पर ही इस चुनाव में मतदान करेगा।

भारत के संदर्भ में अमेरिका की दोनों पार्टियों में भारत के पक्षधर व घोर विरोधी भी हैं। जब ट्रम्प राष्ट्रपति थे तो भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी औपचारिक व अनौपचारिक मित्रता सर्वविदित है। बाइडन के कार्यकाल में भी भारत-अमेरिका की मित्रता गहरी हुई है। यह तथ्य भी जगजाहिर है कि डेमोक्रेटिक पार्टी पाकिस्तान को अधिक आश्रय देती है और ट्रम्प ‘अमेरिका फर्स्ट’ के जनक व घोर समर्थक हैं। दोनों ही पार्टियां चीन के प्रभाव को सीमित करने के लिए समर्थ व शक्तिशाली भारत बनाने में सहयोग करने की इच्छुक हैं।

भारतीय मूल के अमेरिकी दोनों ही पार्टियों में हैं और भविष्य में उनका प्रभाव बढ़ना ही है। सारांश में कहा जा सकता है कि 5 नवम्बर, 2024 तक खूब प्रचार होगा और दोनों में से कोई भी 2025 से 2029 तक अमेरिका का राष्ट्रपति बन सकता है। भारत की तैयारी ऐसी है कि कोई भी अमेरिका का राष्ट्रपति बने, भारत के हितों की रक्षा होगी ही। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका व भारत में एक मत हो न हो, पर सहयोग व आपसी भाईचारा बढ़ेगा ही। भारत के प्रधानमंत्री व विदेश मंत्री की जोड़ी इसे बार-बार सिद्ध कर चुकी है।
(लेखक – वरिष्ठ शिक्षाविद् है)

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