सावन माह : महादेव से सीखें प्रकृति संरक्षण के दिव्य सूत्र
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सावन माह : महादेव से सीखें प्रकृति संरक्षण के दिव्य सूत्र

शिव की आराधना हमें प्रकृति को पूजना और सहेजना सिखाती है। भौतिक सुखों से दूर आत्मिक सुख और जन कल्याण की सोच के साथ शिव जिस धैर्य और दृढ़ता के साथ प्रकृति की गोद में रमते हैं, वैसा कोई दूसरा उदाहरण नही मिलता। शिव और शक्ति के सम्भाव समन्वय से ही सृष्टि का संतुलन कायम रह सकता है।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Jul 23, 2024, 02:31 pm IST
inभारत, विश्लेषण, धर्म-संस्कृति

वन्दे देव उमापतिम् सुरगुरुं वन्दे जगत् कारणं,
वन्दे पन्नग भूषणं मृग्धरम् वन्दे पशूनाम्पतिम् !
वन्दे सूर्य शशांक वह्यिनयनम् वन्दे मुकुंदप्रियम्,
वन्दे भक्त जनाश्रयम् च वरदम् वन्दे शिवम् शंकरं !!

महादेव की इस स्तुति में प्रकृति संरक्षण का जो दिव्य संदेश निहित है, वह अपने आप में अनूठा है। शिव की आराधना हमें प्रकृति को पूजना और सहेजना सिखाती है। भौतिक सुखों से दूर आत्मिक सुख और जन कल्याण की सोच के साथ शिव जिस धैर्य और दृढ़ता के साथ प्रकृति की गोद में रमते हैं, वैसा कोई दूसरा उदाहरण नही मिलता। शिव और शक्ति के सम्भाव समन्वय से ही सृष्टि का संतुलन कायम रह सकता है।

इसी कारण हमारे सनातन हिन्दू धर्म दर्शन में महादेव शिव को ‘लोकमंगल के महानतम देवता’ और श्रावण माह को शिव तत्व के जागरण का सर्वाधिक फलदायी साधनाकाल माना जाता है। शास्त्रीय मान्यता है कि देवशयनी एकादशी के दिन से जगतपालक श्रीहरि विष्णु के चातुर्मास कालीन योगनिद्रा में चले जाने के फलस्वरूप सृष्टि संचालन का कार्यभार देवाधिदेव महादेव सँभालते हैं। शास्त्र कहते हैं कि शिव, प्रकृति और सावन का संबंध बहुत गहरा है। परम पुरुष (शिव) और माँ प्रकृति (भवानी) का मंगलमय पुनर्मिलन ही इस परम पवित्र साधनाकाल की आध्यात्मिक आर्द्रता है। मात्र एक लोटा जल व विल्व पत्र से सहज प्रसन्न हो जाने वाले औघड़दानी भोलेनाथ की अतीव कृपा इस ऋतु में धरतीवासियों पर बरसती है।

शिव महापुराण के अनुसार समुद्र मंथन की महान पौराणिक घटना इसी श्रावण मास में घटित हुई थी। देवों और असुरों के मध्य हुए इस सागर मंथन में सबसे पहले निकले “कालकूट” विष की प्रचंड विषाक्तता से सृष्टि की रक्षा के लिए महादेव ने उस हलाहल को अपने कंठ में धारण कर लिया था। जब उस विषपान से महादेव के शरीर का ताप बहुत बढ़ गया और जहर की तीव्रता के कारण वे अर्द्धमूर्छित हो गये तब देवराज इंद्र ने मूसलाधार वर्षा कर तथा अन्य सभी देव-दानवों ने जलाभिषेक कर शिव के शरीर को शीतलता प्रदान की। तभी से श्रावण मास में शिव को जलाभिषेक की परम्परा का शुभारम्भ माना जाता है।

ज्योर्तिलिंग का अद्भुत ज्ञान विज्ञान

यदि हम भारत का रेडियो एक्टिविटी मैप उठा कर देखें तो सचमुच हैरान रह जाएंगे। भारत सरकार के न्यूक्लियर रिएक्टर केन्द्र के अलावा सबसे ज्यादा रेडिएशन देश के द्वादश ज्योर्तिलिंग स्थलों पर ही पाया जाता है। गौरतलब हो कि भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिजाइन भी शिवलिंग की तरह है। दरअसल शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि न्यूक्लिअर रिएक्टर्स ही हैं। जरा विचार कीजिए प्राचीन भारत का ज्ञान विज्ञान कितनी उच्च कोटि का रहा होगा तभी तो हमारे ऋषि मुनियों ने शिवलिंगों पर जल चढ़ाने की परम्परा डाली थी ताकि उससे उत्सर्जित होने वाले उर्जा तरंगें शांत रहें। जल व दूध के साथ शिवलिंग पर अर्पित किये जाने वाले बिल्व पत्र, आक, आकमद, धतूरा, गुड़हल आदि पदार्थ भी न्यूक्लिअर एनर्जी सोखने वाले पदार्थ होते हैं। शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रेडियो एक्टिव हो जाता है, तभी जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता। शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ जल नदी के बहते हुए जल के साथ मिलकर औषधि का रूप ले लेता है। तभी तो हमारे बुजुर्ग कहा करते थे कि महादेव शिव शंकर अगर नाराज हो जाएंगे तो प्रलय आ जाएगी। जरा गहराई से विचार कीजिए कि हमारी इन पौराणिक परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है। यह इस देश का दुर्भाग्य है कि हमें हमारी परम्पराओं को समझने के लिए जिस विज्ञान की आवश्यकता थी, आजादी के बाद वो हमें पढ़ाया ही नहीं गया वरन विज्ञान के नाम पर जो हमें पढ़ाया गया उससे हम अपनी परम्पराओं से दूर होते गये। सनद रहे कि हमने जिस देव संस्कृति की कोख से जन्म लिया है, वो सनातन है। हमारे ऋषियों ने विज्ञान को परम्पराओं का जामा इसलिए पहनाया था ताकि वो प्रचलन बन जाए और हम भारतवासी सदा वैज्ञानिक जीवन जीते रहें। आज यह समय की मांग है कि हम भारतवासी अपनी इन वैज्ञानिक परम्पराओं की महत्ता से देश की भावी पीढ़ी को परिचित कराएं ताकि इस देवभूमि का गौरवशाली अतीव पुनः जीवंत जागृत हो सके।

श्रावण मास में प्रकृति अपने समूचे श्रृंगार के साथ महाकाल का महारुद्राभिषेक करती नजर आती है। वन-उपवन में हरियाली, फूल-फल से लदी पेड़-पौधों की डालियां, कोयल की कूक, नदी- तालाब और झरनों का कल-कल निनाद; प्रकृति का यह हरा-भरा मनमोहक सौंदर्य महादेव को खूब लुभाता है। श्रावण मास में शिव के जलाभिषेक को निकलने वाली कांवड़ यात्राओं का हर-हर महादेव और बम-बम भोले का जयघोष चहुंओर एक अनूठी आध्यात्मिक ऊर्जा का सृजन करता प्रतीत होता है।

पूरी श्रद्धा से अपने कंधों पर कांवड़ों को धारण करने वाले शिवभक्तों की टोली जब केसरिया वस्त्र धारण कर हर-हर, बम-बम की जयकार करती हुई महादेव को जलाभिषेक के लिए निर्धारित गंतव्यों पर निकलती है तो भक्ति का यह स्वत: स्फूर्त जनसमूह राष्ट्र की सामाजिक समरसता का ऐसा अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है जिसमें गरीब-अमीर, अगड़े-पिछड़े, छोटे-बड़े सब एकरस हो उठते हैं। ज्ञात हो कि शिव महापुराण में भगवान शिव को बिल्व पत्र चढ़ाने का भी विशेष महत्व बताया गया है। तीन पत्तों वाला अखंडित बिल्व पत्र शिव पूजन का एक महत्वपूर्ण अंग माना जाता है। इसका तत्वदर्शन यह है कि बिल्व पत्र के ये तीन पत्ते धर्म, अर्थ व काम इन तीन पुरुषार्थों के प्रतीक हैं। शिव भक्त जब इन तीनों पुरुषार्थों को निस्वार्थ भाव से साध लेता है तो भगवान शिव की कृपा से चौथा पुरुषार्थ ‘मोक्ष’ उसे स्वतः ही प्राप्त हो जाता है।

श्रावण मास के आध्यात्मिक महात्म्य की अत्यंत सारगर्भित व्याख्या करते हुए युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा लिखते हैं, “सावन का महीना प्रकृति के निकट जाने और शिव की शिक्षाओं को हृदयंगम कर प्रकृति के समस्त घटकों को संरक्षित करने है। यही सच्ची शिव आराधना है, सच्चा रुद्राभिषेक है। जीव व जगत के कल्याणकर्ता शिव प्रकृति व जीवों का संरक्षण कर मानव को संदेश देते हैं कि प्रकृति को उजाड़ो मत, जीवों को सुरक्षित व संरक्षित करने के लिए सर्वत्र मदद करो। इसलिए शिव पशुपतिनाथ बन कर पूजे जाते हैं। श्रावण में शिवोपासना का मर्म है अपने अन्दर के अज्ञान रूपी अन्धकार को दूर करने का सत्प्रयत्न। मानव का मन ही उसके मोक्ष और बंधन का मूल कारण है। इसे श्रावण में ज्ञानयोग की साधना से ही साधा जा सकता है। इसके लिए गुरुपूर्णिमा से श्रावणी पूर्णिमा तक शास्त्रों के सत्संग, प्रवचन व धर्मोपदेश सुनने व चिंतन-मनन का विधान हमारे मनीषियों ने बनाया है। इसे सिर्फ शिवकृपा से ही नियंत्रित किया जा सकता है। ‘’

शास्त्रज्ञ कहते हैं कि एकमात्र शिवतत्व ही स्वयंभू है। महादेव शिव अपने संपूर्ण स्वरूप से जिस तरह समूची प्रकृति को रूपायित करते हैं, वह अपने आप में विलक्षण है। देवाधिदेव शिव प्रकृति के महानतम देवता हैं। सृष्टि और समष्टि के कल्याण के लिए अपने अर्द्धनारीश्वर रूप में वे प्रत्येक जीव को ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का जो लोकमंगलकारी शिक्षण देते हैं, वह वर्तमान के पर्यावरणीय असंतुलन को साधने में अत्यन्त कारगर है। देवाधिदेव का प्रकृति से जुड़े रहना और साधारण जीवन आज के आमजन के लिए प्रेरणादायी है। शिव के सभी रूप भक्तों के लिए कल्याणकारी हैं। वे सभी रूपों में पूजनीय हैं और जीवन का संदेश देते हैं। इसी लिए तो इन शब्दों में देवाधिदेव की वंदना की गयी है-
कर्पूरगौरम करुणावतारम, संसारसारं भुजगेंद्रहारम ।
सदा वसंतम ह्मदयार विन्दे, भवम भवानी सहितं नमामि।।

ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार इस वर्ष की सावन ऋतु बेहद विशिष्ट है क्योंकि इसकी शुरुआत भगवान शिव के दिन यानी सोमवार से हो रही है। साथ ही इस सोमवार को प्रीति आयुष्मान योग के साथ सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहा है। इसको लेकर ऐसी शास्त्रीय मान्यता है कि जो भी इस योग में पूजा करता है उसको भगवान शिव से सामान्य स्थिति की तुलना में कई गुना अधिक आशीर्वाद की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही इस बार पूरे सावन में कुल पांच सोमवार पड़ेंगे। इस साल का श्रावण मास 21 जुलाई से शुरू होगा और एक महीने बाद 19 अगस्त को श्रावणी पूर्णिमा की पावन तिथि को इस माह का समापन होगा।

 

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