हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल की द्वितीया को भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा का आयोजन होता है। वैसे तो यह वार्षिक रथोत्सव देशभर में धूमधाम के साथ मनाया जाता है लेकिन विशेषकर ओडिशा के शहर पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर से भव्य रथयात्रा निकाली जाती है। यहां की रथ यात्रा विश्वभर में विख्यात है, जिसमें भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए लाखों की संख्या में भक्त देश-विदेश के कोने-कोने से आते हैं।
इस वर्ष इस भव्य रथोत्सव की शुरूआत 7 जुलाई को हुई है, जिसका समापन 16 जुलाई को होगा। मान्यता है कि रथ यात्रा के दौरान आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से दशमी तिथि तक भगवान जगन्नाथ जन सामान्य के बीच रहते हैं तथा अपने बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ रथ पर विराजकर अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। भगवान जगन्नाथ उड़िया संस्कृति में रचे-बसे हैं और यह रथ यात्रा भी उड़िया लोक-संस्कृति की ही देन मानी जाती है। जगन्नाथ रथ यात्रा का भव्य आयोजन हर साल लगातार 10 दिनों तक चलता है और ऐसा माना जाता है कि इसके दर्शन मात्र करने से ही व्यक्ति को हजारों यज्ञों के पुण्य के समान फल की प्राप्ति होती है। इस रथ यात्रा को भारतीय धर्म-संस्कृति का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, जो भगवान जगन्नाथ की भक्ति और भारतीय संस्कृति का अद्भुत संगम है। स्कंद पुराण के उत्कलखंड के 23 अध्यायों में भगवान विष्णु के शंखाकार श्रीक्षेत्र जगन्नाथ पुरी में आगमन और आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया से लेकर दशमी तक होने वाले रथ यात्रा महोत्सव का वर्णन मिलता है।
पुरी की विश्व प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए भगवान श्रीकृष्ण, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के लिए नीम की लकड़ियों से रथ तैयार किए जाते हैं। तीनों रथों के नाम और रंग अलग-अलग होते हैं, बलराम जी के रथ को ‘तालध्वज’ कहा जाता है, जिसका रंग लाल और हरा होता है जबकि देवी सुभद्रा के रथ को ‘दर्पदलन’ या ‘पद्मरथ’ कहा जाता है, जो काले या नीले रंग का होता है और भगवान जगन्नाथ का रथ ‘नंदिघोष’ या ‘गरुड़ध्वज’ कहलाता है, जो पीले या लाल रंग का होता है। नंदिघोष की ऊंचाई 45 फीट, तालध्वज की 45 फीट जबकि दर्पदलन पथ की करीब 44.7 फीट होती है। रथ यात्रा में सबसे आगे ताल ध्वज पर श्री बलराम जी चलते हैं, उनके पीछे पद्म ध्वज रथ पर माता सुभद्रा तथा सुदर्शन चक्र होते हैं और अंत में गरुड़ध्वज पर श्री जगन्नाथ जी सबसे पीछे चलते हैं। स्कंद पुराण में रथ यात्रा के महत्व का वर्णन करते हुए कहा गया है कि जो व्यक्ति रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ के नाम का जप करते हुए गुंडिचा नगर तक जाता है, वह पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाता है और जो व्यक्ति भगवान जगन्नाथ का नाम लेते हुए इस यात्रा में शामिल होता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। यह भी कहा जाता है कि रथ यात्रा के दर्शन करना और उसमें शामिल होना बहुत सौभाग्य की बात होती है, इससे संतान से जुड़ी समस्याएं दूर हो जाती है।
रथ यात्रा के पहले दिन भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा, तीनों देवी-देवताओं को एक-एक कर मंदिर से बाहर लाकर पुरी के शंकराचार्य द्वारा रथों की पूजा करने और जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध रस्म ‘छेरा पहरा’ पूरी करने के बाद रथ यात्रा की विधिवत शुरूआत होती है। तीन किलोमीटर की रथ यात्रा के बाद अब भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा के रथ 8 से 15 जुलाई तक गुंडिचा मंदिर में ही रहेंगे, जहां उनके लिए कई प्रकार के पकवान बनाए जाएंगे। भगवान जगन्नाथ को छह बार महाप्रसाद चढ़ाया जाता है और भोजन में सात विभिन्न प्रकार के चावल, चार प्रकार की दालें, नौ प्रकार की सब्जियां तथा अनेक प्रकार की मिठाईयां परोसी जाती हैं। मीठे व्यंजन तैयार करने के लिए यहां चीनी के बजाय उत्तम किस्म का गुड़ प्रयोग में लाया जाता है जबकि मंदिर में आलू, टमाटर और फूलगोभी का उपयोग नहीं होता। 16 जुलाई को रथ यात्रा का समापन होगा और तीनों देवी-देवता वापस जगन्नाथ मंदिर लौट आएंगे। रथ यात्रा का समापन ‘निलाद्री विजया’ नामक परम्परा के साथ होता है, जिसमें भगवान के रथों को खंडित कर दिया जाता है, जो इस बात का प्रतीक होता है कि रथ यात्रा के समापन के बाद भगवान जगन्नाथ इस वायदे के साथ जगन्नाथ मंदिर में वापस लौट आए हैं कि वे अगले साल फिर से अपने भक्तों को दर्शन देने आएंगे। सदियों से यही परम्परा चली आ रही है और आज भी श्रद्धापूर्वक और परम्परागत तरीके से इसका पूरी तरह पालन किया जाता है। भगवान जगन्नाथ के पवित्र मंदिर देश के चार विभिन्न कोनों में स्थित है, दक्षिण में रामेश्वरम, पश्चिम में द्वारका, हिमालय में बद्रीनाथ और पुरी में जगन्नाथ लेकिन पूरी दुनिया में इसी जगन्नाथ मंदिर को छोड़कर ऐसा शायद कोई मंदिर नहीं है, जहां भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा तीनों भाई-बहन की मूर्तियां एक साथ स्थापित हों।
पुरी जगन्नाथ रथ यात्रा का इतिहास बहुत प्राचीन है। माना जाता है कि जगन्नाथ रथ यात्रा उत्सव की शुरुआत 12वीं शताब्दी में हुई थी और इसकी शुरुआत के बारे में कई कहानियां और मान्यताएं प्रचलित हैं। पद्म पुराण के अनुसार भगवान जगन्नाथ की बहन सुभद्रा ने एक बार नगर घूमने की इच्छा जाहिर की थी, जिसके बाद बहन की इच्छा पूरी करने के लिए भगवान जगन्नाथ ने तीन रथ तैयार कराए और सुभद्रा को नगर घुमाने के लिए रथ यात्रा पर ले गए। उस रथ यात्रा में सबसे आगे वाला रथ भगवान बलराम का था जबकि बीच वाला रथ बहन सुभद्रा का और सबसे पीछे वाला रथ भगवान जगन्नाथ का था। इसी मान्यता के साथ एक और कहानी भी जुड़ी है, जिसके मुताबिक भगवान जगन्नाथ बहन सुभद्रा को नगर घुमाने के लिए रथ यात्रा पर निकले तो रास्ते में ही अपनी मौसी के घर गुंडिचा भी गए और वहां 7 दिनों तक ठहरे। इन्हीं मान्यताओं के आधार पर प्रतिवर्ष यह रथ यात्रा निकालने की परम्परा शुरू हुई। यह भी माना जाता है कि इस परम्परा की शुरुआत राजा इंद्रद्युम्न से हुई थी, जिन्होंने कथित तौर पर अनुष्ठान शुरू किए थे। एक अन्य मान्यता के अनुसार जब भगवान श्रीकृष्ण के मामा कंस ने उन्हें मारने की योजना बनाई, तब कंस ने अपने मंत्री अक्रूर को एक रथ के साथ गोकुल भेजा और श्रीकृष्ण और बलराम को मथुरा आने का न्यौता भिजवाया। अक्रूर के कहेनुसार श्रीकृष्ण अपने भाई बलराम के साथ रथ पर बैठे और मथुरा के लिए रवाना हो गए। गोकुल वासियों ने इसी दिन को रथ यात्रा का प्रस्थान माना।
जहां तक पुरी में जगन्नाथ मंदिर की स्थापना की बात है तो इसके बारे में मान्यता है कि द्वारका में जब भगवान श्रीकृष्ण का अंतिम संस्कार किया जा रहा था, तब बलराम बहुत दुखी हुए थे और गहरे शोक में डूबे बलराम कृष्ण का पार्थिव शरीर लेकर समुद्र में डूबकर मरने के लिए चल दिए। बलराम के पीछे-पीछे उनकी बहन सुभद्रा भी चल दी, ठीक उसी समय भारत के पूर्वी तट पर जगन्नाथ पुरी के राजा इंद्रद्युम्न को सपना आया कि भगवान का मृत शरीर पुरी के तट पर तैरता हुआ मिलेगा, जिसके बाद वे एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाएंगे, जिसमें कृष्ण, बलराम और सुभद्रा की मूर्तियां स्थापित की जाएंगी। सपने में राजा इंद्रद्युम्न ने यह भी देखा कि भगवान की अस्थियां उन्हीं की मूर्तियों के पीछे एक खोखली जगह बनाकर उसी में रखी जाएंगी। राजा इंद्रद्युम्न का यह सपना सच हुआ, उन्हें भगवान की अस्थियां मिली लेकिन उसके बाद प्रश्न यह था कि मूर्तियां बनाएगा कौन? इस बारे में मान्यता है कि भगवान की मूर्तियां बनाने के लिए बूढ़े बढ़ई के रूप में स्वयं भगवान विश्वकर्मा उनके दबार में आए और उन्होंने राजा को यह चेतावनी दी कि यदि उन्हें उनके काम के बीच में रोका-टोका गया तो वे अपना काम अधूरा छोड़कर चले जाएंगे। भगवान विश्वकर्मा को काम करते-करते कुछ महीने बीत गए तो एक दिन राजा के सब्र का बांध टूट गया और उन्होंने मंदिर का दरवाजा खुलवा दिया, जिसके बाद चेतावनी के अनुसार विश्वकर्मा काम अधूरा छोड़कर चले गए। आखिरकार राजा इंद्रद्युम्न ने अधूरी बनी मूर्तियों को ही मंदिर में स्थापित करा दिया और भगवान कृष्ण की अस्थियां उनकी मूर्ति के पीछे बनी खोखली जगह पर रख दी। इस तरह पुरी में भगवान जगन्नाथ मंदिर और मंदिर में मूर्तियों की स्थापना हुई। इस मंदिर में प्रत्येक 12 वर्षों के पश्चात भगवान की पुरानी मूर्तियों की जगह नई मूर्तियां स्थापित की जाती हैं और परम्परानुसार नई मूर्तियां की संरचना भी अधूरी ही होती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

















