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एग्जिट पोल: चुनावी भविष्यवाणी का मजेदार खेल

एग्जिट पोल के पीछे क्या वाकई है कोई वैज्ञानिक आधार

Written byयोगेश कुमार गोयलयोगेश कुमार गोयल
Jun 7, 2024, 05:04 pm IST
in विश्लेषण

18वीं लोकसभा के लिए हुए चुनावों के नतीजों ने एक बार फिर एग्जिट पोल्स की विश्वसनीयता पर बड़ा प्रश्न चिन्ह लगा डाला। चुनाव परिणामों ने पूरी तरह स्पष्ट कर दिया कि 2 जून को प्रसारित हुए लगभग सभी एग्जिट पोल के पूर्वानुमान वास्तविक चुनाव नतीजों से कोसों दूर रहे। ऐसे में एग्जिट पोल कराने वाली सर्वे एजेंसियों द्वारा एग्जिट पोल कराने में जिस विज्ञान की भूमिका की बातें की जाती रही हैं, उस पर एक बार फिर गंभीर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर ऐसे कौनसे विज्ञान की मदद से ये पोल कराए जाते हैं, जो अधिकांश अवसरों पर ये जमीनी धरातल से कोसों दूर प्रतीत होते रहे हैं। एग्जिट पोल्स की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगने का एक बड़ा कारण यह भी माना जाना चाहिए कि जिस दिन एग्जिट पोल जारी किए जा रहे थे, उस दिन कई एग्जिट कराने वाली एजेंसियों के कर्ता-धर्ता विभिन्न टीवी चैनलों पर बड़ा-बड़ा ज्ञान बघारते नजर आए थे लेकिन चुनावी नतीजों वाले दिन अधिकांश सर्वेकर्ता उन्हीं एग्जिट पोल का विज्ञान समझाने के लिए किसी भी टीवी चैनल पर नहीं दिखे। हालांकि एग्जिट पोल के अनुमान दिल्ली, बिहार, हिमाचल, गुजरात, मध्य प्रदेश सहित कुछ राज्यों में काफी हद तक सही साबित हुए लेकिन कई राज्यों में ये अनुमान धरे के धरे रह गए। यही कारण है कि एग्जिट पोल्स को ‘चुनावों के अनंत उत्साह के बीच एक गेम शो’ जैसा माना जाने लगा है, जो वास्तव में मतदान प्रक्रिया के समापन के बाद चुनावी नतीजों की घोषणा तक के पीड़ादायक इंतजार के अंतिम कुछ दिनों या घंटों में अधीर मतदाताओं को लुभाने के लिए आयोजित होते प्रतीत होने लगे हैं।

यही नहीं, टीवी चैनलों के लिए एग्जिट पोल अंतिम चुनावी चरण के समापन के बाद दर्शकों को अपने साथ बांधे रखने के साथ-साथ तुरंत बड़ा राजस्व पैदा करने वाला विकल्प भी बन गए हैं। न केवल भारत बल्कि दुनियाभर की सर्वे एजेंसियों ने चुनावी भविष्यवाणी को एक मजेदार खेल बना दिया है। एग्जिट पोल्स पर सवाल इसलिए भी खड़े होते रहे हैं क्योंकि दर्जनभर से भी ज्यादा एग्जिट पोल्स में कोई एग्जिट पोल किसी एक पार्टी की जीत की भविष्यवाणी करता है तो दूसरा दूसरी पार्टी की और कोई अन्य एग्जिट पोल दूसरी पार्टियों के बीच कांटे का मुकाबला होने का दावा करता है। ऐसे में कोई भरोसा करे भी तो आखिर किस एग्जिट पोल पर? यही कारण है कि एग्जिट पोल को लेकर अब यह भी कहा जाने लगा है कि इनके पीछे कोई विशेष विज्ञान नहीं है बल्कि ये मनोरंजन का साधन बनकर रह गए हैं। एग्जिट पोल कराने वाली अधिकांश एजेंसियां अनिश्चितता के विभिन्न मार्जिन में सैंपल साइज, सैंपलिंग फ्रेम, सैंपलिंग, अनुमान तकनीक और सारांश डेटा का खुलासा नहीं करती। एग्जिट पोल्स की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगने का यह भी एक बड़ा कारण है। यह भी कोई पहली बार नहीं हुआ है, जब तमाम एग्जिट पोल औंधे मुंह गिरे हों बल्कि पिछले कुछ चुनावों को देखें तो ऐसा लगातार हो रहा है।

नवम्बर 2023 में हुए राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना विधानसभा चुनावों के नतीजों ने भी अधिकांश एग्जिट पोल की साख पर बट्टा लगाया था। दरअसल उस समय लगभग सभी एग्जिट पोल में छत्तीसगढ़ में पूर्ण बहुमत के साथ कांग्रेस की वापसी का अनुमान लगाया गया था जबकि राजस्थान में भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर का अनुमान था। मध्य प्रदेश में किसी एग्जिट पोल में भाजपा की तो किसी में कांग्रेस की एकतरफा जीत का अनुमान था जबकि तीनों ही राज्यों में भाजपा रिकॉर्ड जीत के साथ सत्तारूढ़ हुई थी। विभिन्न पार्टियों को मिली सीटों का अंतर सभी पोल्स में लगाए गए अनुमानों से बहुत ज्यादा रहा था। ऐसे में एग्जिट पोल की विश्वसनीयता पर चुनाव दर चुनाव सवाल खड़े हो रहे हैं। राजस्थान में न्यूज 24-टुडेज चाणक्य ने भाजपा को 77-101, कांग्रेस को 89-113 और अन्य को 2-16 सीटें मिलने का अनुमान व्यक्त किया था। इसी प्रकार भाजपा, कांग्रेस तथा अन्य को इंडिया टुडे-एक्सिस माई इंडिया ने क्रमशः 80-100, 86-106 तथा 9-18, टीवी9-पोलस्टार ने 100-110, 90-100 तथा 5-15, दैनिक भास्कर ने 95-115, 105-120 तथा 0-15 सीटें मिलने की संभावना व्यक्त की थी। वहीं एबीपी-सी वोटर ने भाजपा, कांग्रेस तथा अन्य को क्रमशः 94-114, 71-91 सीटें मिलने का अनुमान जताया था। चुनावी नतीजे देखें तो राजस्थान में भाजपा को 115, कांग्रेस को 69 तथा अन्य को 15 सीटें मिली हैं। 2018 के चुनावों में कांग्रेस को 99, भाजपा को 77, बसपा को 6 और अन्य को 21 सीटों पर जीत मिली थी।

मध्य प्रदेश में टाइम्स नाउ-ईटीजी के एग्जिट पोल में भाजपा को 105-117, कांग्रेस को 109-125 जबकि अन्य दलों को 1-5 सीटें मिलने का अनुमान था। एग्जिट पोल में रिपब्लिक-मैट्रिज ने भाजपा, कांग्रेस तथा अन्य को क्रमशः 118-130, 97-107, 0-2, जन की बात ने 100-123, 102-125, 0-5, टीवी9-पोलस्ट्रैट ने 106, 111-121, 0-6, दैनिक भास्कर ने 95-115, 105-120, 15, एबीपी-सी वोटर ने 88-112, 113-137, 2-8 मिलने का अनुमान जताया था। इंडिया टीवी-सीएनएक्स के एग्जिट पोल में तो बहुजन समाज पार्टी के भी 15 सीटें जीतने का आकलन था। चुनाव परिणामों में भाजपा को 164, कांग्रेस को 65 और अन्य को 1 सीट मिली हैं। 2018 के चुनावों में कांग्रेस को 114, भाजपा को 109 तथा अन्य को 7 सीटें मिली थी। छत्तीसगढ़ में इंडिया टीवी-सीएनएक्स ने भाजपा को 30-40, कांग्रेस को 46-56 तथा अन्य को शून्य सीटें मिलने का अनुमान व्यक्त किया था। इसी प्रकार भाजपा, कांग्रेस तथा अन्य को न्यूज 24-टुडेज चाणक्य ने भाजपा को 25-41, कांग्रेस को 49-65 और अन्य को 0-3 सीटें मिलने का अनुमान व्यक्त किया था। भाजपा, कांग्रेस तथा अन्य को इंडिया टुडे-एक्सिस माई इंडिया ने क्रमशः 36-46, 40-50 तथा 1-5, एबीपी-सी वोटर ने 36-48, 41-53 तथा 0-4, रिपब्लिक-मैट्रिज ने क्रमशः 34-42, 44-52 तथा 0-2, टाइम्स नाउ ने 32-40, 48-56 तथा 2-4, रिपब्लिक टीवी- जन की बात ने 34-45, 42-53 तथा 3 सीटें मिलने की संभावना व्यक्त की थी जबकि वास्तविक चुनावी परिणामों में भाजपा तमाम एग्जिट पोल के अनुमानों से परे 54 सीटें हासिल कर रिकॉर्ड बहुमत हासिल करने में सफल रही और कांग्रेस महज 35 सीटों पर सिमट गई, अन्य को केवल एक ही सीट मिली। 2018 के चुनावों में कांग्रेस को 68, भाजपा को 15 तथा अन्य को 7 सीटें मिली थी। कर्नाटक विधानसभा चुनाव के परिणामों का सटीक अनुमान लगाने में भी अधिकांश एग्जिट पोल सफल नहीं हुए थे।

2021 में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद हुए तमाम एग्जिट पोल पर भी नजर डालें तो विभिन्न पार्टियों को मिली सीटों का अंतर सभी पोल्स के अनुमानों से काफी ज्यादा रहा था। बिहार में तो 2005 से 2020 के बीच चारों विधानसभा चुनावों में भी एग्जिट पोल जमीनी हकीकत से कोसों दूर साबित हुए थे। लोकसभा चुनावों में देखें तो 1998 से 2014 के बीच एग्जिट पोल और चुनावी नतीजों के बीच हर बार काफी अंतर रहा। 1998 के आम चुनाव में लगभग सभी एग्जिट पोल ने एनडीए को सर्वाधिक सीटें देते हुए कांग्रेस सहित अन्य सभी दलों को लगभग नकार दिया था। हालांकि एनडीए को 252 सीटों पर जीत तो मिली थी लेकिन यूपीए 166 और अन्य 199 सीटें जीतने में सफल रहे थे। 1999 के चुनाव में एग्जिट पोल्स ने एनडीए को 350 के आसपास सीटें मिलने का अनुमान लगाया था जबकि कुछ ने तो अन्य पार्टियों को मात्र 39 सीटें ही दी थी। उस चुनाव में एनडीए को 292 जबकि अन्य पार्टियों को 113 सीटें मिली थी। 2004 में तो कांग्रेस की जीत ने सभी एजेंसियों के एग्जिट पोल आंकड़ों को गलत साबित कर दिया था। 2009 में भी वास्तविक परिणामों और एग्जिट पोल के आंकड़ों में 50 सीटों से भी ज्यादा का अंतर था। 2014 के आम चुनाव में दो एजेंसियों को छोड़कर बाकी सभी ने अपने एग्जिट पोल में एनडीए को 270-290 के बीच और कांग्रेस को 150 के आसपास सीटें मिलने का अनुमान लगाया था लेकिन एनडीए के खाते में 336 सीटें आई थी जबकि यूपीए 60 सीटों पर ही सिमट गया था।

महत्वपूर्ण सवाल यही है कि एग्जिट पोल अपने दावों में अधिकांशतः गलत साबित क्यों होते रहे हैं? अपवादस्वरूप कुछ चुनाव परिणामों को छोड़ दें तो एग्जिट पोल का इतिहास कम से कम भारत में तो ज्यादा सटीक नहीं रहा है। अतीत में अनेक बार एग्जिट पोल्स द्वारा लगाए गए अनुमान गलत साबित हुए हैं। हालांकि कुछेक एग्जिट पोल चुनावी परिणामों के कुछ करीब अवश्य दिखे थे किन्तु उनमें भी प्लस-माइनस के अंतर का इतना बड़ा खेल शामिल रहता है कि इनकी सटीकता पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं और यही कारण है कि एग्जिट पोल्स के बारे में अब ‘लगे तो तीर, नहीं तो तुक्का’ वाली धारणा बनने लगी है। दरअसल एग्जिट पोल वास्तव में कुछ और नहीं बल्कि वोटर का केवल रूझान होता है, जिसके जरिये अनुमान लगाया जाता है कि नतीजों का झुकाव किस ओर हो सकता है। एग्जिट पोल के दावों का ज्यादा वैज्ञानिक आधार इसलिए भी नहीं माना जाता क्योंकि ये कुछ सौ या कुछ हजार लोगों से बातचीत करके उसी के आधार पर तैयार किए जाते हैं और प्रायः इसीलिए इन्हें कम विश्वसनीय माना जाता है। मतदाता जब अपना मत देकर मतदान केन्द्र से बाहर निकलता है तो एग्जिट पोल कराने वाली एजेंसियां उससे उसका रूझान पूछ लेती हैं। अधिकांश एग्जिट पोल परिणामों को प्रायः समझ लिया जाता है कि ये पूरी तरह सही ही होंगे। दरअसल सर्वे के दौरान मतदाता बहुत बार इस बात का सही जवाब नहीं देते कि उन्होंने अपना वोट किस पार्टी या प्रत्याशी को दिया है। देश में चुनाव प्रायः विकास अथवा जाति-धर्म के आधार पर लड़े जाते रहे हैं और विधानसभा चुनावों में तो स्थानीय मुद्दे भी हावी रहते हैं, ऐसे में यह पता लगा पाना इतना आसान नहीं होता कि मतदाता ने अपना वोट किसे दिया है।

विचारणीय बात यह भी है कि हर बार कई एग्जिट पोल के आंकड़ों में न केवल बड़ा अंतर होता है, साथ ही इनमें प्लस-माइनस का भी बड़ा खेल शामिल रहता है। यही कारण है कि एग्जिट पोल में किए जाने वाले दावों पर अब आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जाता क्योंकि ये केवल चुनाव परिणामों का पूर्वानुमान ही होते हैं। अभी तक कई बार ऐसा हो चुका है, जब विभिन्न एग्जिट पोल में किए गए पूर्वानुमान से चुनाव परिणाम बिल्कुल उलट रहे। एग्जिट पोल से पहले चुनावी सर्वे किए जाते हैं और सर्वे में बहुत से मतदान क्षेत्रों में मतदान करके निकले मतदाताओं से बातचीत कर विभिन्न राजनीतिक दलों तथा प्रत्याशियों की हार-जीत का आकलन किया जाता है। अधिकांश मीडिया संस्थान कुछ प्रोफैशनल एजेंसियों के साथ मिलकर एग्जिट पोल करते हैं। ये एजेंसियां मतदान के तुरंत बाद मतदाताओं से यह जानने का प्रयास करती हैं कि उन्होंने अपने मत का प्रयोग किसके लिए किया। उन्हीं आंकड़ों के गुणा-भाग के आधार पर हार-जीत का अनुमान लगाया जाता है। इस आधार पर किए गए सर्वेक्षण से जो व्यापक नतीजे निकाले जाते हैं, उसे ही ‘एग्जिट पोल’ कहा जाता है। चूंकि इस प्रकार के सर्वे मतदाताओं की एक निश्चित संख्या तक ही सीमित रहते हैं, इसलिए एग्जिट पोल के अनुमान बहुत बार सही साबित नहीं होते। वास्तव में ये सिर्फ अनुमानित आंकड़े होते हैं और कोई जरूरी नहीं कि मतदाता ने सर्वेकर्ताओं को अपने मन की सही बात ही बताई हो। यही कारण है कि एग्जिट पोल की विश्वसनीयता को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं और अब दुनियाभर में अधिकांश लोग एग्जिट पोल को ज्यादा विश्वसनीय नहीं मानते। यही कारण है कि कई देशों में इन पर रोक लगाने की मांग होती रही है।

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