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भोजशाला : प्रमाण ही प्रमाण

भोजशाला की दीवारें ही बता रही हैं कि उनका संबंध एक मंदिर से है, सनातन समाज से है

Written byदुर्गेश कुमार साधदुर्गेश कुमार साध
Jul 15, 2024, 03:10 pm IST
inभारत, विश्लेषण, मध्य प्रदेश

भारतीय इतिहास में परमारवंशीय राजा भोजदेव (संक्षिप्त नाम राजा भोज) का नाम बड़े ही सम्मान के साथ लिया जाता है। राजा भोज का शासनकाल 1000 से 1055 ई. तक रहा। वे मालवा स्थित उज्जयिनी (अब उज्जैन) के महान राजा विक्रमादित्य की वंश परंपरा के 11वें राजा थे। राजा भोज के शासनकाल के पूर्व यहां की राजधानी उज्जयिनी हुआ करती थी, जिसे राजा भोज ने अपने शासन काल के दौरान धार में स्थानांतरित कर दिया था।

राजा भोज चूंकि कला एवं शिक्षा के रक्षक थे, इसलिए उन्होंने अपने शासनकाल में कई जगहों पर ‘भोजशालाओं’ की स्थापना की। उनमें धार स्थित भोजशाला विश्वविख्यात है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि भोजशाला दो शब्दों से मिलकर बना है- भोज एवं शाला। अर्थात् राजा भोज द्वारा स्थापित शाला। मगर यह केवल बच्चों की शाला नहीं थी, बल्कि एक असाधारण विश्वविद्यालय था, जहां अध्ययन के लिए देश-विदेश से भी छात्र आया करते थे।

ए.एस.आई. के भोपाल परिक्षेत्र के सर्वे के अनुसार इस समय भोजशाला में जो कथित मस्जिद है, उसमें सरस्वती मंदिर के प्रमाण मिलते हैं। ब्रिटिश लेखक कर्नल जॉन मैल्क्म अपनी किताब ‘हिस्ट्री आफ मालवा’ के पेज नंबर 27 पर लिखते हैं, ‘‘मुगलों का बार-बार आक्रमण परेशानियों की एक लंबी शृंखला के अलावा कुछ नहीं था। मुगलों द्वारा बार-बार जमीन हड़पने से इस प्रांत (मालवा) की सीमाएं बदलती रही हैं। हालांकि यह तथ्य भी एकदम स्पष्ट है कि भारत केवल आंशिक रूप से ही अधीन (परतंत्र) रहा है, क्योंकि हमें भारत के लगभग हर जिले या प्रांत में हिंदू राजा मिलते हैं, जिन्होंने आक्रामकों का हर प्रकार से भरपूर विरोध किया।’’ इसके अलावा विभिन्न ब्रिटिश विद्वानों ने अपने शोधों में इस जगह पर स्थित शिलालेखों पर संस्कृत और प्राकृत भाषा में वाग्देवी, व्याकरणिक नियम इत्यादि पर लिखित जानकारी होने का वर्णन किया है।

1. मंदिर एवं आसपास के क्षेत्रों से प्राप्त शिलालेखों पर संस्कृत एवं प्राकृत भाषा में रचनाएं मंदिर या हिंदू स्थल होने के लिखित प्रमाण हैं।
2. शिलालेखों पर मां वाग्देवी एवं राजा भोज से संबंधित विवरण।
3. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार ये शिलालेख 11वीं एवं 12वीं शताब्दी के हैं, जब यहां हिंदू राजाओं का शासन हुआ करता था।
4. मंदिर की खुदाई के दौरान वाग्देवी की प्रतिमा का मिलना भी एक अकाट्य प्रमाण है कि यह हिंदुओं का प्राचीन मंदिर या भोजशाला है।
5. मंदिर की दीवारों एवं खंभों पर पुष्प एवं देवताओं की आकृतियों का मिलना।
6. इसी के साथ ही दीवारों एवं खंभों पर सिंह, कछुआ एवं वराह या सूअर (जिसे इस्लाम में हराम माना जाता है) आदि आकृतियों का प्राप्त होना। अगर यह मस्जिद होती, तो इस तरह की आकृतियां नहीं बनी होतीं।
7. मंदिर की छत पर श्रीयंत्र के समान आकृति का डिजाइन इसके हिंदू शिल्प होने का प्रमाण है।

हिंदुओं को मिला पूजा का अधिकार

तक्षशिला व नालंदा विश्वविद्यालय के बाद धारानगरी अथवा भोजशाला का उल्लेख होता है। भोजशाला के बारे में अनेक विद्वानों का कहना है कि देवी सरस्वती इसी स्थान पर वसंत पंचमी के दिन प्रकट हुई थीं। मां सरस्वती की विशेष कृपा से राजा भोज चौंसठ कलाओं में निपुण थे। उन्होंने 84 ग्रंथों की रचना की। राजा भोज की साधना से प्रसन्न होकर देवी सरस्वती ने उन्हें साक्षात् दर्शन दिए थे।
सरस्वती के प्रकाट्य स्थल पर राजा भोज ने देवी के उसी स्वरूप को स्थापित किया, जिस रूप में देवी ने दर्शन दिए थे। राजा भोज ने अपने शासनकाल 1010-1055 ई. के दौरान इस मंदिर का निर्माण कराया। 1464 में मोहम्मद खिलजी ने धारानगरी पर आक्रमण कर भोजशाला को नष्ट कर मां वाग्देवी की प्रतिमा को खंडित कर परिसर से बाहर कर दिया। 1875 में खुदाई के दौरान मां वाग्देवी की मूर्ति मिली, जो अभी लंदन में है। इसकी पुष्टि इतिहासकार डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने 1961 में अपनी लंदन यात्रा के दौरान की थी।
18-19 फरवरी, 2003 को भोजशाला आंदोलन में तीन कार्यकर्ताओं का बलिदान हुआ था। फलस्वरूप 8 अप्रैल, 2003 को हिंदुओं को पूजन-दर्शन का अधिकार प्राप्त हुआ। इसके तहत हर मंगलवार और वसंत पंचमी पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक हिंदुओं को पूजा की अनुमति और शुक्रवार को मुसलमानों को नमाज की अनुमति प्राप्त है। शेष पांच दिन भोजशाला पर्यटकों के लिए खुली रहती है। 1960 से साहित्य के क्षेत्र में दिया जाने वाला ज्ञानपीठ पुरस्कार के चिन्ह को भोजशाला की मां वाग्देवी से लिया गया है। -अमित राव परमार

Topics: हिंदू शिल्पBhojdevHistory of Malwaहिंदू राजाHindu Kingपाञ्चजन्य विशेषTemple or Hindu PlaceभोजशालाMaa Vagdevi on inscriptionsभोजदेवRaja Bhojहिस्ट्री आफ मालवाHindu Craftsमंदिर या हिंदू स्थलतक्षशिला व नालंदा विश्वविद्यालयशिलालेखों पर मां वाग्देवीउज्जयिनीराजा भोज
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