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राम सबके, सब राम के

राम मंदिर निर्माण में सबकी भागीदारी है। हर जाति ने इसके लिए रक्त बहाया, हर जाति ने योगदान दिया। यह हिंदू गौरव है, हिंदू पराक्रम का शिखर है, हिंदू एकता का वास्तु है और यह लगातार जागते रहने का मूर्त संदेश भी है

Written byप्रशांत बाजपेईप्रशांत बाजपेई
May 6, 2024, 10:27 am IST
in भारत, विश्लेषण, उत्तर प्रदेश, धर्म-संस्कृति

श्रीराम जन्मभूमि हिंदू एकता, हिंदू जिजीविषा और हिंदू पुनरुत्थान का प्रतीक बन गई है। राम जन्मभूमि की रक्षा के लिए लड़े गए पहले युद्ध से लेकर जन्मभूमि मुक्ति के अंतिम संघर्ष और मंदिर निर्माण तक, 500 वर्षों का संघर्ष हिंदू समाज की एकता का प्रतीक बन गया। अयोध्या जाति-भेद रहित समरस हिंदू समाज का प्रतीक बन गई।

जब राम मंदिर के निर्माण का मंगल प्रसंग आया, तो भारत के करोड़ों हिंदू समाज, हर जाति-पंथ-संप्रदाय ने भरे हृदय और अश्रुपूरित आंखों से राम एक-एक शिला के लिए सहयोग दिया। हर हिंदू घर से कम से कम एक ईंट इस मंदिर में लगी है। सभी के पूर्वजों ने इस मंदिर के लिए अपना रक्त और स्वेद बहाया है। श्रीराम जन्मभूमि के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने वाले लाखों कारसेवकों में हिंदू समाज के हर वर्ग और जाति के लोग हैं। हर प्रदेश के और समस्त भाषा-भाषी लोग हैं। मंदिर विरोधियों को सबसे ज्यादा यही बात परेशान करती है।

समानता के मंत्र में गुंथा आंदोलन

रामराज्य का वर्णन करते हुए मानस में आया है, ‘सब नर करहिं परस्पर प्रीती’ अर्थात् सभी परस्पर प्रेम से रहते हैं। यह बेहद संतोष की बात है कि राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन केवल राम मंदिर के लिए संघर्ष नहीं था, बल्कि उसका उद्देश्य भगवान राम और हिंदू जीवन दर्शन पर आधारित समरस समाज रचना को पुन: स्थापित करने का भी था। 13-14 दिसंबर, 1969 को कर्नाटक के उडुपी में आयोजित धर्म संसद में रा.स्व.संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्रीगुरुजी के विशेष आग्रह पर सभी साधु-संतों एवं प्रतिनिधियों ने हिंदू समाज से छुआछूत को पूरी तरह मिटाने का संकल्प लिया था। इस संसद में पेजावर मठ के श्रीश्री विश्वेश तीर्थ स्वामी ने एक मंत्र दिया, ‘‘हिन्दव: सोदरा: सर्वे, न हिन्दू: पतितो भवेत्। मम दीक्षा हिन्दू रक्षा, मम मंत्र: समानता।’’ अर्थात् सभी हिंदू सहोदर (भाई) हैं। कोई हिंदू पतित नहीं है। हिंदू रक्षा मेरी दीक्षा है। मेरा मंत्र समानता है। इसी अवसर पर घोषणा की गई कि भारत की सभी जनजातियां सनातन हिंदू प्रवाह का अभिन्न अंग हैं।

समानता और हिंदू एकता का मंत्र धारण कर यह नेतृत्व आगे बढ़ा। 1989 में श्रीराम मंदिर के लिए शिलापूजन कार्यक्रम हुआ तो प्रथम शिला पूजन सुपौल (बिहार) के अनुसूचित जाति के एक कार्यकर्ता कामेश्वर चौपाल जी के द्वारा सम्पन्न करवाया गया। यह निर्णय समस्त साधु-संतों और विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व ने सर्वसम्मति से लिया था। यह इस बात का उद्घोष था कि जातिभेद के भ्रम को तोड़कर वेद-वेदांत-उपनिषद् और गीता के दर्शन के अनुसार समरस हिंदू समाज का निर्माण इस आंदोलन के मुख्य उद्देश्यों में से एक है। सृष्टि के प्रत्येक कण में, प्रत्येक जीव में एक ही चेतना का दर्शन करने वाली हिंदू जीवनधारा में भेदभाव और छुआछूत के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता। प्रथम शिला पूजन के इस कार्यक्रम ने मानो इस बात पर मुहर लगा दी कि श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन विराट हिंदू समाज की सामूहिक शक्ति का प्रकटीकरण है। इसके तीन दशक बाद जब सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार केंद्र सरकार ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास का गठन किया, तो उसके 15 सदस्यों में कामेश्वर चौपाल भी थे।

काशी के डोमराजा अनिल चौधरी को प्राण-प्रतिष्ठा का न्योता दिया गया था

हिंदू समाज का सामूहिक पूजन

न्यास की पहली बैठक में तय हुआ कि राम मंदिर परिसर में भगवान वाल्मीकि, माता शबरी, निषादराज, जटायु और भगवान गणेश का भी मंदिर बनेगा। मंदिर निर्माण शुरू हुआ और पुजारियों की नियुक्ति हुई तो उसमें अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग के पुजारी भी थे। सभी को योग्यता, वैदिक विधि के ज्ञान और आचरण के आधार पर चुना गया था, न कि जाति के आधार पर।

लिखित परीक्षा और 3 चरणों के साक्षात्कार के बाद 3,240 अभ्यर्थियों में से इन पुजारियों को चुना गया। यह इसलिए संभव हो सका, क्योंकि आज देश में ऐसे अनेक वैदिक संस्थान हैं, जो सभी जाति के हिंदुओं को पौरोहित्य कर्म का प्रशिक्षण देते हैं। इस दिशा में विश्व हिंदू परिषद ने भी काफी काम किया है। अनुसूचित जाति और जनजाति के 5,000 पुजारियों को प्रशिक्षित कर विभिन्न मंदिरों में नियुक्त किया गया है। अकेले तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में ऐसे 2,500 पुजारियों को प्रशिक्षित किया गया है। हिंदुओं के बड़े तीर्थस्थल गोरक्षपीठ (गोरखपुर) के प्रधान पुजारी कमलनाथ और भंडारगृह के अनेक कर्मचारी अनुसूचित जाति से आते हैं।

इसी तरह, प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में देश भर के विभिन्न जातियों और वर्गों के 14 जोड़े ‘यजमान’ बने, जिनमें अजा-अजजा, ओबीसी सहित सारे हिंदू समाज का प्रतिनिधित्व हुआ। इनमें वनवासी समाज के रामचन्द्र खराड़ी (उदयपुर), वाराणसी से काशी के डोम राजा अनिल चौधरी, असम के राम कुई जेमी, कर्नाटक के कलबुर्गी से लिंगराज वासवराज अप्पा, कृष्ण मोहन (हरदोई, रविदासी समाज), जयपुर से सरदार गुरु चरण सिंह गिल, मुंबई से विट्ठलराव कांबले, महादेव राव गायकवाड़ (लातूर, घुमंतु समाज ट्रस्टी), रमेश जैन (मुल्तानी), अदलारसन तमिलनाडु से और पलवल (हरियाणा) के अरुण चौधरी शामिल थे। लेकिन कांग्रेस नेता राहुल गांधी चुनावी सभाओं में हिंदू समाज को गुमराह करने के लिए सवाल पूछ रहे हैं, ‘‘राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा हुई, किसी ओबीसी को बुलाया? किसी दलित को बुलाया? किसी आदिवासी को बुलाया?’’ यजमानों की यह सूची झूठ की राजनीति करने वालों के मुंह पर तमाचा है। वास्तव में ये लोग राम मंदिर के कारण जो अभूतपूर्व हिंदू एकजुटता देखने में आ रही है, उसे अपनी वोट बैंक की राजनीति के लिए खतरा मानकर तोड़ने की कोशिशों में लगे हैं।
‘आज मनु जाने हैं, कि हमहु हिंदू हैं’

प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के लिए पहला न्योता काशी के हरिश्चंद्र घाट के डोमराजा के परिवार को मिला। अखिल भारतीय संत समिति के महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती डोमराजा परिवार के सदस्य अनिल चौधरी के घर निमंत्रण देने गए। उनकी माता भाव विभोर थीं। अनिल चौधरी बोले, ‘‘प्रभु श्रीराम सबके हैं। इस निमंत्रण पत्र ने इस बात को और मजबूत कर दिया है। संत स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने हमें घर आकर सपत्नीक आमंत्रण दिया है। यह हमारा सौभाग्य है।’’ इसी तरह, 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी ने अनिल चौधरी के बड़े भाई जगदीश चौधरी को अपना प्रस्तावक बनाया था। मरणोपरांत उन्हें पद्मश्री सम्मान दिया गया।

इस निमंत्रण के समाचार के बाद 1994 की काशी धर्मसंसद के बाद के एक प्रसंग की चर्चा हुई, जब धर्मसंसद में आए संत भोजन के लिए काशी के डोमराजा के घर पधारे थे। विहिप के तत्कालीन प्रमुख अशोक सिंहल भी साथ थे, जिन्होंने अपना जीवन राम जन्मभूमि के लिए खपाया था। संतों की अगुआई कर रहे थे पुरी के जगद्गुरु शंकराचार्य और महंत अवैद्यनाथ, जो राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन का एक प्रमुख चेहरा थे। वे गोरक्षपीठाधीश्वर, श्रीराम जन्मभूमि यज्ञ समिति के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गुरु थे।

जब मीनाक्षीपुरम मंदिर में दलितों का प्रवेश वर्जित कर दिया गया था, तब महंत अवैद्यनाथ ने मंदिर में तब तक धरना दिया था, जब तक मंदिर को पुन: हिंदू समाज की समस्त जातियों के लिए खोलने का आश्वासन नहीं मिल गया। सो, डोमराजा के घर संतों का भोजन के लिए आना एक अभूतपूर्व घटना थी। भोजन के बाद परिवार की महिलाओं के आंसू बह निकले। वे हाथ जोड़कर बोलीं, ‘‘मनु जाने हैं, कि हमहु हिंदू हैं’’ (आज हमने जाना कि हम भी हिंदू हैं)।

निरंतर पूजन, निरंतर युद्ध

राम मंदिर उदाहरण है सैकड़ों वर्षों तक हिंदू समाज द्वारा विदेशी आक्रांताओं के साथ लड़े गए घोर युद्धों का। क्या वजह है कि अरब आक्रमण के पश्चात प्राचीन पर्शिया, इराक, मिस्र, ट्यूनीशिया, तुर्की, उज्बेकिस्तान, अजरबैजान जैसे देशों की प्राचीन संस्कृति पूरी तरह समाप्त हो गई और ये देश पूरी तरह इस्लामी हो गए, जबकि 800 वर्ष तक संघर्ष के बावजूद भारत में आज भी सौ करोड़ हिंदू हैं? इसका एकमात्र कारण है अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए हिंदुओं का जी तोड़ संघर्ष। श्रीराम जन्मभूमि इसी पराक्रमी हिंदू प्रतिरोध की साक्षी है, जिस प्रतिरोध के कारण हम आज भी हिंदू हैं।

1528 में मंदिर विध्वंस के बाद से 1949 तक हिंदुओं ने राम जन्मभूमि के लिए 76 लड़ाइयां लड़ीं। इन 500 वर्षों में हिंदू निरंतर राम जन्मस्थान पर पूजन करते रहे और अपने अधिकारों की दिशा में एक-एक इंच बढ़ते रहे।
श्रीराम जन्मभूमि मंदिर हमेशा से हिंदू समाज के शत्रुओं के निशाने पर रहा। पहला आक्रमण 150 ईसा पूर्व यवन सम्राट मिलिंडर ने किया और मंदिर को ध्वस्त कर दिया। शुंग वंश के पराक्रमी राजा धूमतसेन ने जन्मभूमि को मुक्त कराया और यवनों को समाप्त कर उसकी राजधानी कौशांबी पर अधिकार कर लिया।

श्रीराम जन्मभूमि मुक्त हो गई, पर मंदिर का जीर्णोद्धार 50 वर्ष हुआ जब उज्जयनी के राजा विक्रमादित्य ने पुन: भव्य दिव्य मंदिर बनवाने का प्रण किया। शकों आक्रांताओं का नाश करने के बाद उन्होंने प्राचीन अयोध्या नगरी की सीमाओं का पता लगाने के लिए सर्वेक्षण करवाया। शास्त्रों में वर्णित स्थानों को खोजा गया। लक्ष्मण घाट के निकट एक टीले की खुदाई करवाई गई तो वहां से श्रीराम के पुत्र कुश द्वारा बनवाए गए श्रीराम मंदिर के कसौटी के 84 खंभे मिले। इन्हीं स्तंभों को आधार स्तंभ बनाकर विशाल राम मंदिर का निर्माण हुआ। अगले 1500 वर्षों तक हिंदुओं ने अपने इस पवित्र स्थान को सुरक्षित रखा।

200 वर्ष तक हमले का साहस नहीं

11वीं सदी में महमूद गजनवी के भांजे सालार मसूद ने अयोध्या पर आक्रमण किया, तब कौशल प्रदेश के राजा सुहेलदेव, जो महाराज लव के वंशज थे, ने आसपास के सभी राजाओं को संगठित किया। 15 लाख पैदल सैनिक और 10 लाख घुड़सवार अयोध्या के निकट बहराइच पहुंचे। घाघरा नदी के तट पर प्रयागपुर के निकट भयंकर मार-काट हुई। सालार मसूद का एक-एक सैनिक मारा गया, मसूद की भी गर्दन काट ली गई। इतिहासकार शेख अब्दुर्रहमान चिश्ती के शब्दों में ‘‘इस्लाम के नाम पर जो अंधड़ अयोध्या तक जा पहुंचा था, वह पूरी तरह खत्म हो गया। इस जंग में अरब और ईरान के हर घर का कोई न कोई चिराग बुझा है। यही वजह है कि अगले 200 साल तक मुसलमान भारत पर हमले का मन नहीं बना सके।’’

महाराणा सांगा से दो बार पराजित होने के बाद बाबर ने अयोध्या का रुख किया और मार्च 1527 में सरयू के तट पर पड़ाव डाला। उसका सेनापति मीर बाकी जब मंदिर तोड़ने को आगे बढ़ा तो उसे प्रचंड हिंदू प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। मंदिर के पुजारी, साधु-संत, आसपास के राजाओं के सैनिक और आम नागरिकों ने तोप और गोला-बारूद से लैस बाबर की विशाल सेना पर हमला बोल दिया। यह संघर्ष 15 दिनों तक चला। ब्रिटिश इतिहासकार कनिंघम ने लिखा है, ‘‘जन्मभूमि मंदिर पर हुए आक्रमण के समय हिंदुओं ने अपनी जान की बाजी लगा दी। 1 लाख 73 हजार हिंदुओं के शव गिर जाने के बाद ही मीर बाकी तोप के गोले से मंदिर को गिराने में सफल हो पाया।’’

मंदिर विध्वंस की सूचना अयोध्या के निकटवर्ती राज्य मीटी के महाराजा महताब सिंह को मिली, जो मंत्रियों के साथ बद्रीनाथ की यात्रा पर थे। वृद्ध राजा यात्रा स्थगित कर मैदान में कूद पड़े। अयोध्या में फिर भयंकर रण हुआ। बाबर के तीन लाख सैनिकों और मोर्चा जमाए आग उगलती तोपों की परवाह किए बिना एक लाख हिंदू लड़े, पर जीत बारूद और संख्याबल की हुई। लेकिन एक लाख बलिदानी हिंदू प्रतिरोध की अलख जलाए रखने में सफल रहे।

छापामार युद्धों से बाबर बेबस

बाबर की विशाल सेना को देखते हुए हिंदुओं ने रणनीति बदली और छापामार हमले शुरू किए। पहला छापामार हमला अयोध्या से 9 कोस दूर ग्राम सनेथु में हुआ। 3 जून, 1528 को जब बाबर की फौज शराब के नशे में धुत थे, तब देवीदीन पांडे की अगुवाई में 80 हजार सशस्त्र हिंदू युवकों ने धावा बोला और मीर बाकी व उसकी फौज को जान बचाकर भागना पड़ा। चार माह तक अयोध्या मुक्त रही। हालांकि इस लड़ाई में देवीदीन बलिदान हो गए।

4 माह बाद मीर बाकी फिर लौटा तो उसका सामना सूर्यवंशी राजा रणविजय सिंह की सेना से हुआ और उसे पिटकर पीछे हटना पड़ा। मीर बाकी की सहायता के लिए बाबर ने अतिरिक्त लश्कर भेजा। रणविजय सिंह ने 10 दिन तक उसका सामना किया और अंत में वीरगति प्राप्त की। इसके बाद उनकी पत्नी महारानी जय राजकुमारी ने छापामार हमले प्रारंभ कर दिए। स्वामी महेश्वरानंद के नेतृत्व में नागा साधुओं ने भी मीर बाकी की सेना पर हमला बोल दिया। बार-बार के हमलों से त्रस्त बाबर को झुकना पड़ा।

ब्रिटिश इतिहासकार लॉसन ने लिखा है, ‘‘आखिरकार बाबर वापस अयोध्या आया। अयोध्या से तीस कोस दूर, सिरवा और घाघरा नदियों के संगम पर उसने डेरा डाला, हिंदुओं से समझौता किया और हिंदू साधुओं की सारी बातें मान लीं।’’ बीच का रास्ता इस प्रकार निकला कि तथाकथित मस्जिद में अजान देने वाली मीनारें और वजू का स्थान नहीं बनने दिया गया। चारों ओर हिंदू मंदिरों की तरह परिक्रमा भी बनी और राम मंदिर के द्वार पर चंदन की लकड़ी भी लगाई गई।

दो वर्ष बाद बाबर की मृत्यु हो गई। क्षेत्र में उसके वंशज की पकड़ ढीली होते ही रानी जयराजकुमारी मुगल सेना पर टूट पड़ी और उसे खदेड़ दिया। मंदिर के पुनर्निर्माण की योजना बनी, लेकिन दो वर्ष बाद बाबर का बेटा हुमायूं विशाल फौज और तोपखाना लेकर आ धमका। आइन-ए-अकबरी के अनुसार, इस युद्ध में रानी और उसकी सेना के साथ स्वामी महेश्वरानंद के नेतृत्व में हजारों साधुओं ने भी अपने प्राणों की आहुति दी। अकबर के काल में भी संघर्ष जारी रहा। स्वामी बलरामाचार्य के नेतृत्व में आसपास के इलाकों के अखाड़ों के युवक संगठित हुए व मुगल सेना पर 20 छापामार हमले किए। आखिरकार अकबर ने बीरबल और राजा टोडरमल को मध्यस्थता के लिए भेजा। इन लोगों ने अयोध्या में साधुओं से बात करके राम जन्मभूमि के निकट चबूतरा बनवा दिया और वहां पूजा शुरू हो गई।

औरंगजेब से संघर्ष

यह समझौता जहांगीर और शाहजहां के समय तक चला। औरंगजेब ने गद्दी पर बैठते ही जांबाज खान के नेतृत्व में बड़ी सेना ने अयोध्या कूच किया। इस समय अयोध्या में बाबा वैष्णव दास का आश्रम हिंदू शक्ति का केंद्र था। गांव-गांव में हनुमान मंदिरों और अखाड़ों की स्थापना की गई थी, जहां हिंदू युवा शस्त्र और शास्त्र का प्रशिक्षण लेते थे। सरयू पार करते ही जांबाज खान की सेना पर तीरों की वर्षा हुई और जांबाज खान भाग खड़ा हुआ। तब औरंगजेब ने 60 हजार सेना के साथ सैयद हसन अली अयोध्या भेजा।

इस दौरान ब्रह्मकुंड नामक स्थान पर स्वामी वैष्णव दास की भेंट गुरु गोविंद सिंह से हुई और अयोध्या की रक्षा की रणनीति बनी। अयोध्या की ओर बढ़ती हुई मुगल सेना पर रुदौली कस्बे में राजपूत वीरों के एक दल ने दो तरफ से घेर कर हमला किया और गायब हो गए। अयोध्या से पहले सआदतगंज में खालसा वीरों ने खेतों में से निकाल कर मुगल सेना पर भीषण प्रहार किया। इस तरह गुरु गोविंद सिंह और बाबा वैष्णदास की संयुक्त शक्ति ने मुगल फौज को अयोध्या पहुंचने से पहले ही तहस-नहस कर डाला। 1664 में औरंगजेब ने फिर बड़ी फौज भेजी। 13 हजार हिंदू लड़ते हुए मारे गए। मुगल फौज ने पूजन वाला चबूतरा नष्ट कर दिया। जन्मभूमि क्षेत्र के हिंदू चिह्न भी मिटा दिए।

औरंगजेब की मृत्यु के बाद अयोध्या का क्षेत्र नवाबों के नियंत्रण में आ गया, परंतु हिंदू समाज ने एक दिन भी मंदिर पर अपना अधिकार नहीं छोड़ा। पिपरा के राजा राजकुमार सिंह और अमेठी के राजा गुरु दत्त सिंह ने पांच बार आक्रमण करके श्रीराम जन्मभूमि को जीतने का प्रयास किया। इन संघर्षों के कारण हिंदुओं ने गर्भ गृह में पूजा का अधिकार पा लिया, जबकि इस भवन में नमाज नहीं पढ़ी गई। इसके बाद गोंडा के राजा देवीबख्श सिंह के नेतृत्व में हिंदुओं ने नवाब की फौज के साथ भीषण युद्ध किया।

हिंदू पक्ष की जीत हुई। तत्कालीन अयोध्या के राजा मानसिंह ने नवाब वाजिद अली शाह से कहकर हिंदुओं को फिर से राम चबूतरा बनाने की अनुमति दिलाई। चबूतरे पर छोटा-सा मंदिर बना, जिसमें श्रीराम की मूर्ति की स्थापना की गई। ब्रिटिश काल में भी अदालत और मैदान, दोनों प्रकार से राम जन्मभूमि मुक्ति संघर्ष जारी रहा। इस दौरान हनुमानगढ़ पर हमले हुए, जिसका प्रतिकार हिंदू समाज ने किया। 1912 व 1934 में हिंदुओं ने शस्त्र उठाए। 1934 के संघर्ष में बाबरी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा, तब फैजाबाद के डिप्टी कमिश्नर जेपी निकालसन ने ढांचे का जीर्णोद्धार करवाया, हिंदू वहां पूजा-पाठ करते रहे, जबकि (कुछ समय से शुरू हुई) नमाज बंद हो गई।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को प्राण-प्रतिष्ठा का न्योता देते विहिप के अध्यक्ष आलोक कुमार, साथ में नृपेंद्र मिश्र

प्रकट हुए रामलला

22 दिसंबर, 1949 की मध्यरात्रि विवादित ढांचे के अंदर प्राचीन मंदिर के गर्भ गृह वाले स्थान पर रामलला प्रकट हुए। उस समय तक इस ढांचे का नाम मस्जिद-ए-जन्मस्थान था, जो कि मुस्लिम और ब्रिटिश दस्तावेजों में दर्ज है। बाद में जान-बूझकर इसे बाबरी मस्जिद कहा जाने लगा। तब जवाहर लाल नेहरू ने फैजाबाद के जिलाधिकारी केके नायर को वहां से रामलला के विग्रह को हटाने को कहा, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। पूजा जारी रही। बाद में सरकार के आदेश पर तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट ने ताला लगा दिया, लेकिन एक पुजारी को दिन में दो बार दैनिक पूजा और अनुष्ठान की अनुमति दी गई। हिंदू समाज तालाबंद दरवाजे तक जाकर दर्शन कर सकता था।

तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा राम मंदिर निर्माण के लिए दी गई राशि का चेक

1984 में विहिप द्वारा आयोजित पहले धर्म संसद के बाद ताला खुलवाने हेतु जन जागरण यात्राएं प्रारंभ हुर्इं। इन यात्राओं में हिंदू समाज उमड़ने लगा। 1 फरवरी, 1986 को फैजाबाद के जिला दंडाधिकारी ने ताला खोलने का आदेश दिया। इसके बाद राम जन्मभूमि से बाबरी ढांचे को हटाने और मंदिर निर्माण के उद्देश्य से श्रीराम जन्मभूमि न्यास का गठन हुआ और जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन और तेज हो गया। 1 फरवरी, 1989 को प्रयागराज के कुंभ मेले में पूज्य देवरहा बाबा की उपस्थिति में धर्म संसद का आयोजन हुआ और देश के हर मंदिर, हर गांव, हर बस्ती में रामशिला पूजन कार्यक्रम आयोजित करने का निर्णय हुआ। पहला शिला पूजन बद्रीधाम धाम में किया गया। रामशिला पूजन कार्यक्रमों में 6 करोड़ लोगों ने भाग लिया और 2,75,000 रामशिलाएं अक्तूबर 1989 में अयोध्या पहुंचीं।

30 अक्तूबर, 1990 को तत्कालीन मुलायम सिंह सरकार द्वारा की गई कड़ी घेराबंदी तोड़कर लाखों कारसेवक अयोध्या में प्रवेश कर गए और बाबरी ढांचे के ऊपर भगवा ध्वज फहरा दिया। 2 नवंबर, 1990 को पुन: कारसेवा का आयोजन हुआ। तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया, जिसमें बड़ी संख्या में कारसेवकों ने अपने जीवन की आहुति दी। तीन दिन बाद 5 नवंबर को अयोध्या में श्रीराम महायज्ञ प्रारंभ हुआ। अंतत: सरकार ने श्रीरामलला के दर्शनों की अनुमति दे दी। 4 अप्रैल, 1991 को दिल्ली के बोटक्लब पर ऐतिहासिक रैली हुई, जिसमें देश भर से 25 लाख हिंदुओं ने भाग लिया। इसी दिन मुलायम सिंह यादव ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

दशकों का आक्रोश फूटा

पंचम धर्म संसद में 6 दिसंबर, 1992 को पुन: कारसेवा का निर्णय लिया गया। उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह थे और केंद्र में कांग्रेस सरकार थी। 6 दिसंबर को प्रात: कारसेवा प्रारंभ हुई। दशकों से दबाया गया आक्रोश फट पड़ा। कारसेवकों के आक्रोश के आगे बाबरी ढांचा तिनका-तिनका बिखर गया। दिल्ली से बार-बार फोन आए, परंतु कल्याण सिंह ने कारसेवकों पर गोली चलवाने से साफ इनकार कर दिया। राम जन्म स्थान को साफ कर कारसेवकों ने वहां एक छोटा-सा मंदिर बनाया और भगवान राम का पूजन प्रारंभ कर दिया। केंद्र की कांग्रेस सरकार ने उत्तर प्रदेश समेत चार राज्यों की भाजपा सरकारों को तत्काल प्रभाव से बर्खास्त कर दिया। 8 दिसंबर को केंद्रीय सुरक्षाबलों ने श्री राम जन्म स्थान अपने कब्जे में ले लिया।

इसके बाद अगले तीन दशकों तक हिंदुओं ने कानूनी लड़ाई लड़ी। इस समय हिंदुओं का सामना छद्म सेकुलरवादी राजनीति और वामपंथी षड्यंत्रों से हुआ। अदालत में भ्रामक जानकारियां देकर, साक्ष्य और दस्तावेजों को झुठलाकर, सर्वेक्षणों का विरोध करके, तकनीकी खुराफातों के सहारे मामले को दशकों तक लटकाए रखा गया और अदालत के बाहर इस पूरे आंदोलन को बदनाम करने के प्रयास चलते रहे। जब भारतीय पुरातत्व विभाग ने बाबरी ढांचे के नीचे हिंदू मंदिर होने का प्रमाण रखा तो इन लोगों ने उस पर ही आरोप लगाए कि एएसआई के इतिहासकार योग्य नहीं हैं, क्योंकि उसमें ज्यादातर हिंदू हैं इसलिए उनकी रिपोर्ट का भरोसा नहीं किया जा सकता आदि।

बाबरी ढांचे के नीचे मंदिर नहीं था, अदालत में ऐसा दावा करने वालों में ऐसे भी थे, जो कभी अयोध्या गए ही नहीं थे। तथाकथित बड़े-बड़े इतिहासकार कहते रहे कि न तो उन्हें संस्कृत आती है, न अरबी और न ही फारसी। जब ढांचे के नीचे से मिले मंदिर के अवशेषों को भी उन्होंने मानने से इनकार कर दिया और कहा कि इन प्रमाणों को कहीं और से लाकर रखा गया है। दूसरी तरफ, राजनीतिक लोग थे, जो श्रीराम के अस्तित्व पर सवाल उठा रहे थे। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल तो राम जन्मभूमि मामले की सुनवाई रोकने के लिए अदालत तक जा पहुंचे। एक तरफ वामपंथी इतिहासकार और राजनीतिक लोग मंदिर निर्माण में रोड़े अटकाने में लगे थे, दूसरी तरफ आतंकवादी भी हिंदू आस्था पर प्रहार करने पर आमादा थे। 5 जुलाई, 2005 को अयोध्या में जहां रामलला विराजे थे, उस स्थान को निशाना बनाते हुए पांच जिहादी आतंकियों ने हमला किया। पांचों मारे गए, लेकिन इस संघर्ष में सीआरपीएफ के तीन जवान भी बलिदान हुए।

500 वर्ष की साधना हुई सिद्ध

अंतत: 30 सितंबर, 2010 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने निर्णय दिया, रामलला विराजमान जहां पर हैं, वही राम जन्मभूमि है। इसके बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा और 9 नवंबर, 2019 को पांच न्यायाधीशों की पीठ ने एकमत से हिंदुओं के पक्ष में निर्णय दिया। पूरे देश में खुशी की लहर दौड़ गई, पर वामपंथी विद्वानों और पत्रकारों के एक वर्ग ने कहा, ‘‘सर्वोच्च न्यायालय ने गलत निर्णय दिया है। राम मंदिर के प्रमाण नहीं मिले हैं। फैसला भावुक होकर लिया गया है।’’ ऐसे लोग आज भी इस प्रकार की बातें करते, लिखते दिखाई पड़ते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने 5 अगस्त, 2020 को मंदिर का भूमि पूजन किया।

22 जनवरी, 2024 को वह दिन आया, जिसकी प्रतीक्षा सैकड़ो वर्षों से हिंदू समाज कर रहा था। देश ही नहीं, धरती के हर कोने पर हिंदू समाज ने इस दिन महोत्सव मनाया। उस दिन इतिहास में पहली बार पहाड़ों, वन-पर्वतों, तटीय क्षेत्रों और द्वीपों के वासी एक स्थान पर उपस्थित हुए। हिंदू समाज की सभी आध्यात्मिक धाराओं के 150 से अधिक पंथों के संत-साधक उस पल के साक्षी बने। शैव, वैष्णव, शाक्त, गाणपत्य, पात्य, सिख, बौद्ध, जैन, दशनाम शंकर, रामानंद, रामानुज, निम्बार्क , माध्व, विष्णु नामी, रामसनेही, घिसापंथ, गरीबदासी, गौड़ीय, कबीरपंथी, वाल्मीकि, शंकरदेव (असम), माधव देव, इस्कॉन, रामकृष्ण मिशन, चिन्मय मिशन, भारत सेवाश्रम संघ, गायत्री परिवार, अनुकूल चंद्र ठाकुर परंपरा, ओडिशा के महिमा समाज, अकाली, निरंकारी, नामधारी, राधास्वामी और स्वामीनारायण, वारकरी, वीर शैव आदि परंपराएं समाहित हुईं। झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले 10 परिवारों के अलावा कृषक, मजदूर को भी न्यौता दिया गया।

प्राण-प्रतिष्ठा समारोह को संबोधित करते हुए मोदी बोले, ‘‘आज हमारे राम आ गए हैं। सदियों के धैर्य, कितने बलिदान, कितने तप के बाद हमारे राम आ गए हैं। अब हमारे रामलला टेंट में नहीं, दिव्य मंदिर में रहेंगे। आज का दिन तारीख नहीं, नए कालचक्र का उद्गम है। गुलामी की मानसिकता को तोड़कर उठा खड़ा हुआ राष्ट्र, अतीत के हर दंश से हौसला लेता हुआ राष्ट्र, ऐसे ही नव इतिहास का सृजन करता है। आज से हजार साल बाद भी लोग आज के इस दिन की चर्चा करेंगे। प्रभु राम की कितनी बड़ी कृपा है कि हम लोग इस पल को घटित होते देख रहे हैं।’’
रा.स्व.संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने कहा, ‘‘आज रामलला के साथ भारत का स्व लौटकर आया है। सारा भारत भाव विभोर है। राम राज्य आने वाला है।
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥

युद्ध जारी : निशाने पर हिंदू एकता

रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के बाद जो हिंदू शक्ति एकजुट हुई है, इसे हर कोई पचा नहीं पा रहा है। जो लोग कभी राम मंदिर के निर्णय और निर्माण को किसी भी तरह रोकने की जुगत लगा रहे थे, आज वे हिंदू समाज से उसकी जाति पूछते घूम रहे हैं। वे ऐसे लोगों की पीठ थपथपा रहे हैं, जो कहते घूमते हैं कि ‘हमारा समय आएगा तो देख लेंगे।’ चुनावी राजनीति के उन्माद में कुछ राजनीतिज्ञों ने हिंदू एकता को चुनौती के रूप में लिया है। हिंदुओं की श्रीराम में आस्था को जातियों में तोलने की कोशिश की जा रही है। ऐसे ही एक नेता का बयान वायरल हो रहा है कि ‘‘रात दिन बस जय श्रीराम, जय श्रीराम, जय श्रीराम… मंदिर जाना है और भूखे मरना है।’’ हिंदू समाज को खंड-खंड करने की नीयत से झूठ फैलाए जा रहे हैं कि जनजाति की होने के कारण राष्ट्रपति को नहीं बुलाया। सिर्फ अमीरों को बुलाया, सिर्फ ऊंची जातियों को बुलाया वगैरह-वगैरह। फर्जी वीडियो फैलाकर जातीय झगड़े खड़े करने के षड्यंत्र किए जा रहे हैं। सत्य यह है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को ससम्मान प्राण-प्रतिष्ठा के लिए आमंत्रित किया गया और राम मंदिर के निर्माण के लिए पहला दान तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से लिया गया।

नित नए रूप बदलने में माहिर जो वर्ग, जो लोग कभी राम मंदिर निर्माण का विरोध किया करते थे, आज राम के आदर्शों की बात कर रहे हैं। ‘भारत में तानाशाही आ गई है’ का हल्ला मचाने वाले एक बहुचर्चित यूट्यूबर ने हाल ही में ने कहा कि ‘‘हिंदू दर्शन तो बहुत उदार है, कण-कण में भगवान होने की बात करता है। राम सब जगह हैं, इसलिए राम मंदिर जाकर ही उनकी पूजा करने की क्या आवश्यकता है?’’ इसका उत्तर यह है कि हमारे सारे मंदिर, हमारा राम मंदिर इसी उदारता, इसी ज्ञान का प्रतीक है। यह ज्ञान, यह उदारता, यह परंपरा बनी रहे, इसलिए मंदिर आवश्यक हैं।

राम शिला पूजन में महंत नृत्यगोपाल दास एवं अन्य संतजन के साथ श्री अशोक सिंहल

राम उदार और करुणामूर्ति तो हैं ही, अन्याय के प्रतिकार का भी प्रतीक हैं। धर्म और सत्य की रक्षा के लिए उन्होंने जीवन भर युद्ध किए हैं। श्रीराम ने अपने आचरण से बताया है कि जीवनमूल्यों की रक्षा के लिए प्राणपण से संघर्ष करना पड़ता है। इसलिए यह राम मंदिर राष्ट्र मंदिर भी है और मानवता की धरोहर भी। भारत का इतिहास भी है, आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी। इसलिए हिंदू समाज इन कपट भरी बातों में आने वाला नहीं है कि हिंदू तो इतना उदार है, इसलिए उसे मिट जाने में भी संकोच नहीं करना चाहिए।

हिंदू होने के नाते हमारी यह जिम्मेदारी है कि हम सदा स्मरण रखें और सभी को स्मरण दिलाते रहें कि रामलला के इस पावन मंदिर में सबकी भागीदारी है। हर जाति ने इसके लिए रक्त बहाया। हर जाति ने इसके लिए योगदान दिया। यह हिंदू गौरव है। हिंदू पराक्रम का शिखर है। हिंदू एकता का वास्तु है। और यह लगातार जागते रहने का मूर्त संदेश भी है।

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