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मातृभाषा संस्कृति और शिक्षा

मनुष्य के जन्म के साथ ही स्वर और ध्वनि के रूप में भाषा का आविर्भाव होता है और इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मातृभाषा मनुष्य के अस्तित्व और विकासक्रम से जुड़ी हुई है।

Written byरंजना बिष्टरंजना बिष्ट
Feb 21, 2024, 11:57 am IST
in भारत, मत अभिमत

मातृभाषा क्या है, इसका संरक्षण क्यों आवश्यक है, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसके क्या मायने हैं? व्यक्तिगत तौर पर हम मातृभाषा से किस प्रकार जुड़े हुए हैं, अक्सर यह विचार आपके और हमारे मन में आता होगा। मातृभाषा का अर्थ है हमारी प्रथम भाषा, एक बच्चे या प्राणी के मन का पहला उद्गार। बच्चा मां की कोख से जन्म लेते ही सबसे पहले रोता है। जिसे जन्म के बाद पहला कमुनिकेशन कहा जाता है। उसका यह रुदन और स्वर ही उसकी भाषा होती है जिसे मां सहज रूप से समझ जाती है। मनुष्य के जन्म के साथ ही स्वर और ध्वनि के रूप में भाषा का आविर्भाव होता है और इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मातृभाषा मनुष्य के अस्तित्व और विकासक्रम से जुड़ी हुई है।

जिस समाज की मातृभाषा जितनी समृद्ध होती है वह समाज सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से उतना ही सशक्त होता है। मातृभाषा से आपकी सांस्कृतिक चेतना का भी आभास होता है।मातृभाषा से तात्पर्य उस भाषा से हो सकता है जो किसी ने सबसे पहले सीखी हो, जो पहली बार बोली गई हो। इसे ‘प्राथमिक’ या ‘प्रथम भाषा’ भी कह सकते हैं।

हमारा देश भारत संपूर्ण विश्व में अपनी विविधता के लिए जाना जाता है। भाषाई विविधता भी भारतीय समाज की एक विशिष्टता है। देश की नई शिक्षा नीति-2020 भाषाई विविधता का सम्मान करती है, मातृभाषा में शिक्षा पर जोर देती है और बहुभाषावाद का समर्थन करती है। इस बार यूनेस्को द्वारा निर्धारित अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 2024 की थीम’बहुभाषी शिक्षा अंतर-पीढ़ीगत शिक्षा का एक स्तंभ है’ विषय पर केन्द्रित है। जो शिक्षा में समावेशिता को ढ़ावा देने और स्वदेशी भाषाओं के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला साबित होगा। स्वदेशी के साथ स्व की पहचान और मजबूती देने वाला होगा।

भाषा हमारी संस्कृति का प्रतीक है जिस प्रकार हमारी संस्कृति और हमारी परंपराएं एक संस्कार के रूप में एक पीढी से दूसरी पीढी तक हस्तांतरित होते है, निरंतर प्रवाहमान रहते हैं उसी भांति हमारी भाषा भी है जो पीढी दर पीढी आगे बढती जाती है। भाषाएं हमारी संस्कृति का प्रमाण ही नहीं वरन प्राण तत्व भी है। चूंकि भाषा के माध्यम से ही हम अपने प्राचीन संस्कृति, सभ्यता एवं ग्रंथो के विषय में जान सकते हैं। भाषाएँ और अंतर-पीढ़ीगत शिक्षा साथ-साथ चलती हैं। एक के बिना दूसरे के अस्तित्व की कल्पना करना ही बेमानी है।

भाषा के माध्यम से ही हमारे मूल्य, हमारी मान्यताएं और हमारी पहचान बनती है। एक निश्चित स्वरूप बनता है। भाषा की बदौलत हमारे अनुभव, हमारी परंपराएँ और हमारा ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्वत: ही प्रहावितहोता हैऔर युगों-युगों तक जीवंत रहता है। भारतीय ज्ञान परंपरा की बात करें तो उसका मूल भारतीय भाषाओं में ही है।

भाषाई विविधता हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है। लेकिन भाषाएं लुप्त होती जा रही हैं, भाषाई विविधता खतरे में पड़ती जा रही है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बहुभाषावाद का समर्थन करना, सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करना है, संवाद की परंपरा को आगे बढाने जैसा है।

समूचा विश्व प्राकृतिक, सांस्कृतिक, भाषाई और पारंपरिक आधार पर विविधता से भरपूर है। भूमंडलीकरण के चलते आज समूचा विश्व एक गांव बन गया है। आज वैश्विक स्तर पर सूचनाओं के आदान-प्रदान के साथ ही सांस्कृतिक रूप से भी एक दूसरे के करीब आ गये हैं। वैश्विक दृष्टिकोण से भी बहुभाषावाद का लक्ष्य महत्वपूर्ण है। चूंकि यह परस्पर संचार और संवाद प्रक्रिया को गति देने वाला है। दुनिया आज विविधता की सुंदरता को पहचान चुकी है। हमारा देश भारत वैश्विक स्तर पर भाषाई और सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक है। बहुभाषिकता के महत्व को आज समूचा विश्व जान गया है। यूनेस्को द्वारा अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 2024 की निर्धारित थीम इस बात का प्रमाण है।

मातृभाषा की सरलता और सहजता उसके व्यापक प्रभाव को दर्शाती है। वैज्ञानिक शोध के अनुसार मातृभाषा में व्यक्ति की ग्राहय क्षमता, सीखने की तीव्रता अधिक होती है। रचनात्मक क्षमता का विकास होता है। यही कारण है कि भारत सरकार ने नई शिक्षा नीति-2020 में मातृभाषा में अध्ययन को बढावा दिया है। त्रिभाषा फार्मूला लागू किया है। बहुभाषी शिक्षा हाशिए के समाज को मूल धारा के समाज से जोड़ने में भी मददगार साबित होगी। यह विभिन्न भाषाओं के लोगों के मध्य परस्पर समझ, सहयोग और सम्मान की भावना को जन्म देगी। सामाजिक एकीकरण और सद्भावना का भाव पैदा होगा। रोजगार एवं नवाचार की दिशा में नये अवसर पैदा होंगे।

बहुभाषी तथा बहुसांस्कृतिक समाज अपनी भाषाओं, पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के माध्यम से ही फलते-फूलते हैं। वैदिक संस्कृति, वैदिक ज्ञान, वैदिक परंपराएं जीवन के हर क्षेत्र में इतनी विविधता भारत में ही पाई जाती हैं और भाषाएं इस निहित ज्ञान को एक पीढीसे दूसरी पीढी तक ले जाती हैं। भाषाएं संरक्षित होंगी तो हमारी संस्कृति संरक्षित रहेगी। ज्ञान का विपुल भंडार भी संरक्षित रहेगा और भविष्य की पीढियों के लिए मार्गदर्शक साबित होगा। भाषाएं हमारे अस्तित्व का मूल आधार हैं इनका संरक्षण अपनी जडों कोसींचने जैसा है।

एक राष्ट्र एक वृक्ष की भांति होता है और जड़े मजबूत रहेंगी तो देश चहुमुखी दिशाओं में प्रगति करेगा। नरेन्द्र मोदी सरकार के नेतृत्व में देश की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना जागृत हुई है और भारत वैश्विक पटल पर अपनी पहचान कायम करने में सफल हुआ है। भारत पुनः विश्व पटल पर स्थापित हो रहा है उदाहरण के तौर पर जी 20 का नेतृत्व भारत ने किया यह कोई साधारण बात नहीं है। आज समूचा विश्व भारत की ओर देख रहा है। पूरी दुनिया में भारतीय संस्कृति और शिक्षा की चर्चा हो रही है।

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