समान नागरिक संहिता : अधिकारहीनता से अधिकार सम्पन्नता की ओर
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समान नागरिक संहिता : अधिकारहीनता से अधिकार सम्पन्नता की ओर

- उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (CCC) की मंजूरी सामाजिक कानूनों के सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण और प्रगतिशील कदम है।

Written byप्रो. रसाल सिंहप्रो. रसाल सिंह
Feb 16, 2024, 09:43 pm IST
in विश्लेषण

भारत की विधायी व्यवस्था में एक ऐसे सार्वभौम और सर्वप्रभावी सामाजिक विधान का अभाव है, जो सभी सामाजिक-धार्मिक समुदायों पर समान रूप से लागू हो। इस रिक्त को भरने के लिए समान नागरिक संहिता (CCC) की प्रस्तावना की गई है, जोकि एक समग्र सामाजिक कानूनी ढांचे का निर्माण करती है। इस ढांचे में, विविध पारिवारिक कानूनों को एक समान,  संगत और समग्र रूप में शामिल किया जाएगा।  इसका लक्ष्य एक संहिताबद्ध कानूनी ढाँचा तैयार करना है, जिससे भारतीय समाज के सभी वर्गों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों के हितों की सुरक्षा, विवाह, उत्तराधिकार और संरक्षकता/अभिभावकत्व आदि का एकसमान नियमन हो सके। यह प्रयास कानूनी समानता को बढ़ावा देने, भारतीय राजनीतिक ढांचे को मजबूती प्रदान करने, और लैंगिक समानता, महिला सशक्तिकरण, बाल सुरक्षा तथा सामाजिक समानता के मूल्यों को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे एक अधिक समरस और समावेशी समाज का निर्माण होगा।

21वीं सदी के नये भारत में समान नागरिक संहिता (UCC) की मांग और भी मुखर हुई है। उत्तराखंड द्वारा इसे स्वीकृति प्रदान किए जाने के बाद देशभर में इसकी आवश्यकता महसूस की जा रही है। उत्तराखंड, स्वतंत्रता के बाद समान नागरिक संहिता को अंगीकार करने वाला भारत का प्रथम राज्य बन गया है, यद्यपि गोवा में पुर्तगाली शासन के समय से ही इसी प्रकार का एक कानून प्रचलित है।

उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (CCC) की मंजूरी सामाजिक कानूनों के सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण और प्रगतिशील कदम है। यह विधेयक, बहुविवाह और बाल विवाह जैसी प्रथाओं के उन्मूलन के साथ विवाह की आयु को समानीकृत करता है। इससे लड़कियों का भी आवश्यक शारीरिक-मानसिक विकास हो सकेगा और उनको अपनी शिक्षा पूरी करने और अपने भविष्य को स्वयं निर्धारित करने का समुचित अवसर मिल सकेगा। इसके अलावा, विधेयक समान उत्तराधिकार की वकालत करता है, जिससे बेटों और बेटियों को बराबरी का दर्जा प्राप्त होगा। यह कानून तलाक की प्रक्रिया को भी समान बनाने की बात करता है। विधेयक विवाह और तलाक पंजीकरण को अनिवार्य बनाकर, राजकीय सेवाओं,योजनाओं और सुविधाओं की समान पहुंच और प्राप्ति सुनिश्चित करता है। यह प्रशासनिक सुगमता और पारदर्शिता के लिए आवश्यक है। यह नवीन पहल सभी समुदायों में, विशेषकर मुस्लिम महिलाओं में, गोद लेने के अधिकारों को विस्तारित करती है और हलाला तथा इद्दत जैसी विवादास्पद प्रथाओं को समाप्त करती है। इससे सामाजिक न्याय और लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलेगा। इसके अतिरिक्त, विधेयक में सह-जीवन संबंधों को कानूनी मान्यता प्रदान करने के प्रावधान भी शामिल हैं, जो जीवनसाथी के चयन की स्वतंत्रता को स्वीकृति/वैधता प्रदान करते हैं। इस विधेयक न केवल उत्तराखंड की महिलाओं और बच्चों को सशक्त बनाता है, बल्कि यह पूरे देश के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करता है। इससे भारतीय समाज में समानता, सुरक्षा और समावेशिता के नए युग का सूत्रपात होता है।

विधेयक, उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और विविधता को सम्मानित करते हुए जनजातीय समुदायों की संस्कृति और रीति-रिवाजों की रक्षा का विशेष प्रावधान करता है। इसमें अनुसूचित जनजातियों के लिए विशिष्ट छूट का प्रावधान है, जो उनकी विशिष्ट पहचान और सांस्कृतिक को सुनिश्चित करता है।

तलाक के मुद्दे पर एक मानवीय और संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाते हुए यह विधेयक न्यायिक प्रक्रिया को गहन बनाता है। वैवाहिक अलगाव में सुलह की संभावना तलाशने हेतु एक ‘कूलिंग-ऑफ’ अवधि का प्रस्ताव करता है। माता-पिता के बीच विवादों के संदर्भ में, यह बच्चों की कस्टडी के लिए क्रांतिकारी समाधान प्रस्तुत करता है। इसमें दादा-दादी को भी संभावित देखभालकर्ता के रूप में मान्यता दी गयी है। अनाथ बच्चों को गोद लेने की प्रक्रिया को सरलीकृत किया गया है। साथ ही, दिवंगत जीवनसाथी के माता-पिता की भलाई के लिए व्यापक प्रावधान किए गए हैं। ये सुधारात्मक प्रस्ताव कानूनी समरूपता और सांस्कृतिक परम्पराओं के बीच सुचिंतित समन्वयकारी संतुलन की देन हैं। इनका उद्देश्य एक ऐसे समाज की रचना करना है जो न केवल सामाजिक न्याय और समता के मूल्यों को प्रोत्साहित करता है, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मानव अधिकार और सांस्कृतिक बहुलता को भी स्वीकारता है। इसप्रकार यह एक समावेशी, सशक्त और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण की आधारभूमि तैयार करता है।

प्रधानमंत्री मोदी ने बार-बार जोर दिया है कि  विविधतापूर्ण कानूनी प्रणाली के साथ देश का संचालन कठिन है। साथ ही, यह भी बताया है कि समान नागरिक संहिता (CCC) भारतीय संविधान के मूलभूत सिद्धांतों के अनुरूप है। उत्तराखंड सरकार द्वारा इसे मंजूरी देने का निर्णय राज्य में एक समान कानूनी ढांचे की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रगति के रूप में देखा जा रहा है, जो लंबे समय से चले आ रहे व्यक्तिगत कानूनों के विवादों को हल करने का प्रयास करता है। इसे एक महत्वपूर्ण कदम मानते हुए, भारत सरकार से यह आशा की जा रही है कि वह उत्तराखंड के इस विधेयक को राष्ट्रीय स्तर पर एक मॉडल के रूप में अपनाते हुए शीघ्र लागू करेगी। हालांकि, राजनीतिक जगत में इसे लेकर स्पष्ट मतभेद हैं। मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करने वाले कांग्रेस, सीपीआई, और तृणमूल कांग्रेस जैसे दल इसके विरोध में हैं, जबकि भाजपा, आप, शिवसेना आदि अन्य दल इस पहल का समर्थन कर रहे हैं।

भारत में कॉमन सिविल कोड संबंधी बहस ने दशकों से राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य को प्रभावित किया है। इसकी शुरुआत 1833 के चार्टर एक्ट से हुई थी। इसमें ब्रिटिश शासन को हिंदू और मुस्लिम कानूनों को संहिताबद्ध करने की अनुमति दी गई थी। इस प्रक्रिया ने सती प्रथा के निषेध और हिंदू विधवा पुनर्विवाह के वैधीकरण जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक सुधारों को जन्म दिया। 1840 की लेक्स लोकी रिपोर्ट ने एक एकीकृत कानूनी ढांचे की जरूरत को और अधिक मजबूत किया, जिससे आपराधिक, संविदात्मक, और नागरिक कानूनों में महत्वपूर्ण प्रगति हुई। हालांकि, 1859 में महारानी विक्टोरिया की घोषणा में धार्मिक प्रथाओं में गैर-हस्तक्षेप की नीति अपनाने पर बल दिया गया था। इससे पारंपरिक धार्मिक कानूनों की सुरक्षा सुनिश्चित हुई। 20वीं शताब्दी के आरंभ में, समान नागरिक संहिता का विचार नई ऊर्जा के साथ सामने आया, जिससे इस विषय पर आगे चलकर व्यापक विमर्श हुआ।

कॉमन सिविल कोड (CCC) की संकल्पना संविधान के अनुच्छेद 44 में व्यक्त की गई है। यह संविधान निर्माताओं की सार्वभौमिक कानूनी समानता की गहन आकांक्षा को दर्शाती है। हालांकि, इस आदर्श की प्राप्ति अभी भी एक चुनौती बनी हुई है, जिसे धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विभेदों ने और अधिक जटिल बना दिया है। भारतीय संविधान के निर्माण के समय इसपर गहन विचार-विमर्श किया गया, जिसका मूल उद्देश्य विविध व्यक्तिगत कानूनों को एक समग्र कानूनी ढांचे में समाहित करना था। इससे सभी नागरिकों के लिए सभी सामाजिक मामलों में समानता और न्याय सुनिश्चित करने का लक्ष्य था।

कॉमन सिविल कोड (CCC) की जड़ें संविधान सभा की महत्वपूर्ण बहसों में देखी जा सकती हैं, जहां डॉ. भीमराव अंबेडकर, सरदार पटेल, हंसा मेहता, मीनू मसानी जैसे विख्यात नेताओं ने लैंगिक समानता और व्यक्तिगत अधिकारों को संरक्षित करते हुए, राष्ट्रीय एकता और पंथनिरपेक्षता को बढ़ावा देने वाली आधुनिक कानूनी प्रणाली के लिए मौलिक तर्क प्रस्तुत किए। इन नेताओं की सार्थक चर्चाओं के फलस्वरूप, इसे संविधान के निर्देशक सिद्धांतों में स्थान मिला। फिर भी, इस प्रस्ताव को खासतौर पर मुस्लिम समुदाय के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, जिसने भारत की विविधतापूर्ण सांस्कृतिक पहचान के संदर्भ में एक एकीकृत कानूनी ढांचे की व्यवहार्यता पर सवाल उठाए।

संविधान के लागू  होने के पश्चात, भारत सरकार ने हिंदू पर्सनल लॉ में कई महत्वपूर्ण सुधार किए। 1950 के दशक में, हिंदू कोड बिल नाम से प्रसिद्ध कई श्रृंखलाबद्ध कानून पारित किए गए, जिन्होंने हिंदू कानूनों में गहन सुधार किया और इन्हें और अधिक प्रगतिशील बनाया, विशेषकर महिलाओं के अधिकारों के संदर्भ में। इन सुधारों में हिंदू विवाह अधिनियम, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम, और हिंदू दत्तक ग्रहण और रखरखाव अधिनियम प्रमुख थे। साम्प्रदायिक संवेदनशीलता और विभिन्न पांथिक समूहों के प्रतिरोध के चलते, मुस्लिम समुदाय समेत अन्य समुदायों के लिए इसी प्रकार के सुधार लागू नहीं किए जा सके।

कॉमन सिविल कोड (CCC) की प्रासंगिकता और आवश्यकता को भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के विविध ऐतिहासिक निर्णयों ने बारंबार मुखरित किया गया है। इनमें एक सुसंगत कानूनी ढांचे के निर्माण की वकालत की गई है। ये न्यायिक निर्णय, संविधानिक जनादेश की महत्वपूर्ण व्याख्या करते हुए, समाज में लैंगिक समानता, न्याय, और व्यक्तिगत अधिकारों के संवर्धन के लिए समान नागरिक संहिता की आवश्यकता को  रेखांकित करते हैं। निम्नलिखित पांच निर्णय सीसीसी के विमर्श में विशेष योगदान देने वाले हैं:

शाह बानो मामला (1985) : इस मामले ने महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए एक समान नागरिक संहिता की आवश्यकता को महत्वपूर्ण बताया। अदालत ने मुस्लिम महिलाओं के गुजारा भत्ता में विद्यमान असमानताओं को निरस्त किया।

सरला मुद्गल मामला (1995) : इस फैसले ने पांथिक आधार पर लैंगिक भेदभाव को समाप्त करने और संविधानिक लोकाचार को साकार करने में समान नागरिक संहिता की महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर किया।

जॉन वल्लमट्टम मामला (2003) : यह निर्णय कमजोर वर्गों के प्रति भेदभाव को रोकने के लिए एक समान कानूनी ढांचे की अपरिहार्यता पर प्रकाश डालता है ताकि न्याय और समान अधिकार सुनिश्चित हो सकें।

डेनियल लतीफी मामला (2001) : इस निर्णय ने भरण-पोषण के मुद्दों पर लैंगिक न्याय और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए समान नागरिक संहिता की आवश्यकता को स्पष्ट किया।

जोसेफ शाइन मामला (2018) : इस निर्णय ने लिंग-निरपेक्ष और उदार कानूनों की आवश्यकता को मजबूती प्रदान की, जिससे व्यक्तिगत कानूनों के नाम पर भेदभावपूर्ण प्रथाओं को खत्म करने की दिशा में कदम उठाया जा सके।

ये फैसले समाज के कमजोर वर्गों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की रक्षा हेतु समान नागरिक संहिता की आवश्यकता को उजागर करते हैं।

भारत में व्यक्तिगत कानूनों की विविधता विभिन्न समुदायों की सामाजिक और धार्मिक परंपराओं को दर्शाती है। हिंदू, बौद्ध, सिख, और जैन समुदाय हिंदू कोड बिल के तहत आते हैं, जिसमें हिंदू विवाह अधिनियम और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम जैसे महत्वपूर्ण कानून शामिल हैं। दूसरी ओर, मुसलमानों पर शरीयत आधारित व्यक्तिगत कानून लागू होते हैं, जिसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम प्रमुख है। इसके अलावा, भारतीय तलाक अधिनियम और विशेष विवाह अधिनियम जैसे पंथनिरपेक्ष कानून भी हैं, जिनका चुनाव व्यक्ति अपनी धार्मिक पहचान के बावजूद कर सकता है। इन कानूनों के भीतर भी, पितृसत्तात्मक संरचनाएं प्रभावी हैं, जो अक्सर पुरुषों को वरीयता देती हैं। यह प्रवृत्ति महिलाओं के लिए समानता की संभावनाओं को सीमित करती है और लिंग आधारित भेदभाव को बढ़ावा देती है, खासकर विवाह, तलाक, और उत्तराधिकार संबंधी मामलों में। उदाहरण के लिए, विवाहित हिंदू महिलाओं के विपरीत, मुस्लिम महिलाओं को तलाक के बाद गुजारा भत्ता का अधिकार नहीं होता, जो स्पष्ट भेदभाव को दर्शाता है। इस प्रकार, भारतीय समाज में व्यक्तिगत कानूनों की विविधता और उनके कार्यान्वयन में लिंग आधारित असमानताएं एक जटिल चुनौती पेश करती हैं, जिन्हें समझने और हल करने की आवश्यकता है।

इस्लामी न्यायशास्त्र की आड़ में बहुविवाह को वैधता प्रदान की जाती है,जबकि तुर्की और ट्यूनीशिया जैसे देशों ने बहुविवाह को क्रमशः निषिद्ध किया है। ये कदम समाज के समकालीन सामाजिक-आर्थिक और नैतिक ढांचे के साथ अधिक सुसंगत होने की दिशा में कानूनों के आधुनिकीकरण के व्यापक प्रयास का हिस्सा हैं। ऐसा अल्जीरिया और मोरक्को में भी देखा गया है। सऊदी अरब जैसे देश भी लैंगिक समानता और सामाजिक कल्याण में सुधार के लिए अपने कानूनी ढांचे में परिवर्तन कर रहे हैं। इनके अलावा, रूस, अमेरिका, स्विट्जरलैंड, ब्राजील, और जर्मनी जैसे देशों में अपने-अपने सर्वव्यापी सिविल कोड्स हैं, जो उनकी विशिष्ट सामाजिक और न्यायिक प्रणालियों की विशेषताओं को प्रतिबिंबित करते हैं। ये उदाहरण लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय के प्रति बढ़ती जागरूकता और उन्हें  एकीकृत कानूनी ढांचे में समाहित करने की दिशा में वैश्विक सक्रियता को दर्शाते हैं।

भारत में, मुस्लिम महिलाओं की ओर से सुधारों की बढ़ती मांग के बावजूद, बहुविवाह को नियंत्रित करने वाले कानून अभी भी पारंपरिक प्रथाओं में पर आधारित हैं। इस संदर्भ में एक औपचारिक संहिता का अभाव है। यह स्थिति लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण की दिशा में कानूनी सुधारों के लिए एक अनिवार्य अवसर प्रस्तुत करती है। बाबासाहेब अम्बेडकर और संविधान सभा के अन्य प्रतिष्ठित सदस्यों ने इसी उद्देश्य के साथ पर्सनल लॉ में एकीकरण का प्रस्ताव दिया था। उनका मानना था कि विवाह, तलाक, और विरासत के मामलों में लैंगिक समानता सुनिश्चित करने के लिए समानता और न्यायसंगत नियम आवश्यक हैं। समान नागरिक संहिता ऐसी भेदभावपूर्ण प्रथाओं को समाप्त करेगी जोकि महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित करती हैं और उन्हें समान अवसर और सुरक्षा प्रदान करने में बाधक हैं।

देशव्यापी समान नागरिक संहिता (CCC) लागू होने से भारतीय समाज में ऐतिहासिक परिवर्तन आएगा। इससे पंथ या लिंग के आधार पर कोई भेदभाव की समाप्ति करते हुए सभी महिलाओं और बच्चों को समान और न्यायसंगत अधिकार मिल सकेंगे। यह एकीकृत कानूनी ढांचा न केवल विविध क्षेत्रों में कानूनी असंगतियों को दूर करेगा, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को भी अधिक सुगम बनाएगा, जिससे नागरिकों को अपनी पसंद के अनुसार जीवनयापन करने की अधिक स्वतंत्रता मिलेगी। समान नागरिक संहिता का लागू होना न केवल भारतीय समाज को अधिक समावेशी बनाएगा, बल्कि यह भारतीय संविधान के मूल्यों और आदर्शों को भी मजबूती प्रदान करेगा, जिससे एक अधिक एकीकृत और समरस भारतीय समाज का निर्माण होगा।

कॉमन सिविल कोड (CCC) के विषय में व्यापक आशंकाओं के बावजूद, यह स्पष्ट है कि यह कानून भारत में विभिन्न धर्मों और जनजातियों की प्रथाओं और रीति-रिवाजों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगा। वास्तव में, समान नागरिक संहिता का उद्देश्य पारंपरिक सांस्कृतिक प्रथाओं में हस्तक्षेप किए बिना, नागरिक अधिकारों और दायित्वों के संदर्भ में समानता और न्याय सुनिश्चित करना है। इसमें मुसलमानों का ‘निकाह’, सिखों का ‘आनंद कारज’, हिंदुओं के ‘फेरे’ और ईसाइयों का ‘पवित्र विवाह’ जैसे विवाह समारोह शामिल हैं, जो अपने-अपने धर्मों की मान्यताओं के अनुसार बने रहेंगे। इसी तरह, जनजातीय समुदायों के रीति-रिवाज और परंपराएं भी अप्रभावित रहेंगी, जिन्हें भारतीय संविधान के विभिन्न प्रावधानों द्वारा सुरक्षित किया गया है, जैसे कि नागाओं के लिए अनुच्छेद 371 (ए) और मिजो के लिए अनुच्छेद 371 (जी)। इसके अतिरिक्त, अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष नीतियां और वन अधिकारों से संबंधित कानून उनके अधिकारों और रीति-रिवाजों की रक्षा करते हैं। इस प्रकार, समान नागरिक संहिता व्यक्तिगत और सामुदायिक पहचानों का सम्मान करते हुए, समानता और न्याय के सिद्धांतों को आगे बढ़ाने का एक  विश्वसनीय और अपरिहार्य माध्यम है।

वर्तमान सरकार ने महिलाओं और बच्चों के कल्याण के लिए अपनी प्रतिबद्धता को ठोस और प्रभावी कदमों के माध्यम से बारम्बार साबित किया है, जोकि शब्दों से कहीं अधिक हैं। हाल में, नारी शक्ति वंदन विधेयक का पारित होना लैंगिक समानता की दिशा में एक निर्णायक कदम है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि सरकार नारी सशक्तिकरण को महत्व देती है। इसके अतिरिक्त, पीएम उज्ज्वला योजना, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को सुरक्षा और सहयोग, मातृ स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान, लखपति दीदी योजना, मिशन शक्ति और पीएम मातृ वंदना योजना जैसे कार्यक्रम महिला और बच्चों के प्रति सरकार की गहरी प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करते हैं। COVID-19 महामारी के दौरान, पीएम केयर्स फंड को अनाथ बच्चों की सहायता के लिए लगाया गया, जबकि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, कौशल विकास पहल और एआई-आधारित शिक्षा मंच आदि भी ऐसी ही पहलें और योजनाएं हैं। कॉमन सिविल कोड (CCC) का क्रियान्वयन इस प्रतिबद्धता का ही विस्तार है, जो महिलाओं और बच्चों के समान अधिकारों और संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए सरकार के अथक प्रयासों का प्रतिफलन है।

कॉमन सिविल कोड (CCC) एक अधिक मानवीय कानूनी दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है, जो विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों की पारंपरिक विविधता को आधुनिक समय की जरूरतों के अनुरूप एक समग्र कानूनी ढाँचे में संग्रहीत करता है। यह पहल अप्रचलित और अल्पप्रचलित मध्ययुगीन विचारों को पीछे छोड़ने का आह्वान करती है। ये प्रथाएं और विचार समकालीन समाज के अनुरूप नहीं हैं। यह दृष्टिकोण संविधान में उल्लेखित “हम भारत के लोग”  जैसे आदर्शों के साथ गहराई से मेल खाता है, जो भारत की विविध सांस्कृतिक धरोहर को संजोते हुए भी प्रत्येक नागरिक के लिए  समानता और न्याय सुनिश्चित करने की वकालत करता है।

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एफआईएच प्रो लीग : हॉकी में भारत की शानदार जीत, पाकिस्तान को 4-3 से हराया

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव

UCC : मप्र में 90 फीसद से अधिक नागरिक यूसीसी के पक्ष में, अल्पसंख्यक समुदाय का भी बड़ी संख्या में समर्थन

देवेंद्र फडणवीस

UCC : उत्तराखंड, गुजरात और असम के बाद महाराष्ट्र में भी लागू होगा यूनिफार्म सिविल कोड, सरकार ने शुरू की प्रक्रिया

ख्वाजा आसिफ, पाकिस्तानी रक्षा मंत्री

पाकिस्तानी रक्षा मंत्री की धमकी पर भारत का करारा जवाब, PoJK का जिक्र कर लगाई लताड़

आप विधायक चैतर बसावा

गुजरात: AAP विधायक को 7 साल की सजा, बने कैदी नंबर 90888, नहीं लड़ पाएंगे 6 साल तक चुनाव

भगवंत मान, मुख्यमंत्री, पंजाब

भगवंत मान के वीडियो को फर्जी साबित करने के लिए 10 लाख रुपए में बनी थी फोरेंसिक रिपोर्ट, 2 आरोपी गिरफ्तार

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