हमास-इजरायल युद्ध: ‘खत्म’ नहीं होने वाले बड़े संकट से निपटने की बड़ी चुनौती!
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हमास-इजरायल युद्ध: ‘खत्म’ नहीं होने वाले बड़े संकट से निपटने की बड़ी चुनौती!

इजरायल और फिलिस्तीनी आतंकी संगठन हमास के बीज युद्ध दिन बीतने के साथ तेज होता जा रहा है। आतंक के खात्मे की कसम खा चुका आतंकी हमास पर हमले तेज करता जा रहा है। जबकि इस्लामिक देश इजरायल के खिलाफ एकजुट हो चुके हैं।

Written byललित मोहन बंसलललित मोहन बंसल
Oct 22, 2023, 11:29 am IST
in मत अभिमत
hamas Israel war

हमास इजरायल युद्ध

इजरायल और फिलिस्तीनी आतंकी संगठन हमास के बीज युद्ध दिन बीतने के साथ तेज होता जा रहा है। आतंक के खात्मे की कसम खा चुका आतंकी हमास पर हमले तेज करता जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन भी इजरायल की यात्रा कर स्वदेश लौट आए। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के निमंत्रण पर बाइडन की इस संक्षित यात्रा से अमेरिका-इज़रायल के मज़बूत रिश्ते की इबारत सुर्ख जरूर हुई। वहीं हमास के समर्थ में पहली बार पूरा अरब एकजुट नजर आ रहा है। अमेरिका के मित्र जॉर्डन और मिस्र भी फ़िलिस्तीन के समर्थन में खड़े हो गए हैं। इस बीच जन आक्रोश के दबाव के चलते अब्राहम संधि की डोर में बंधे यूनाइटेड अरब अमीरात और बहरीन के साथ साथ नाटो सदस्य टर्की ने भी पलटी मार ली है। ये सभी देश फिलिस्तीन के समर्थन में हैं, जबकि अमेरिका और यूरोपीय संघ ने हमास को एक आतंकी गुट माना है।

गत 7 अक्टूबर को हमास के लड़ाकों ने ग़ाज़ा पट्टी के उस पार इज़रायली बस्तियों को चारों ओर से घेर कर जिस तरह अकस्मात हमलों में तेरह सौ लोगों को मौत के घाट उतारा, महिलाओं से बलात्कार किए और अबोध बच्चों के सिर धड़ से अलग कर दो सौ से अधिक लोगों को बंधक बना लिया। इससे फ़िलिस्तीन के इस ‘आतंकी’ संगठन के प्रति दुनिया भर में वैमनस्य पैदा हो गया। आतंकी हमले के जबाव में इजरायल की ओर से ग़ाज़ा पट्टी में बिजली, पानी और खाद्य पदार्थों सहित जीवनोपयोगी वस्तुओं की नाकेबंदी और जोई बाइडेन की यात्रा से एक दिन पहले ग़ाज़ा के ‘अल अहिली अस्पताल’ पर राकेट के हमले में हुए विस्फोट से पाँच सौ लोगों की जाने जाने के बाद स्थिति पलट गई। इससे दुनिया में युद्धकाल के नियमों के विपरीत जोर-जबरदस्ती का प्रतिकूल असर पड़ा है।

इसे भी पढ़ें: लोकसभा वेबसाइट का एक्सेस बिजनेसमैन को, महुआ के समर्थन में कांग्रेस: ‘वजह राहुल गांधी तो नहीं!’

जो बाइडेन की इस यात्रा का ग़ाज़ा पट्टी के लोगों को इतनी राहत मिली है कि मिस्र और ग़ाज़ा के एकमात्र प्रवेश -निकास द्वार ‘राफ़ा’ से प्रतिदिन बीस ट्रकों में जीवनोपयोगी वस्तुओं के आने की हरी झंडी मिल गई है। अरब जगत में एक संदेश जा रहा है कि फ़िलिस्तीनी अपनी ही ज़मीन पर 75 वर्षों के इज़राइली आधिपत्य से ठगा हुआ क्यों महसूस कर रहे हैं? इस से फ़िलिस्तीन और ग़ाज़ा पट्टी में कभी ख़त्म नहीं होने वाले संकट की चुनौती बनी हुई है।

फ़िलिस्तीन के वयोवृद्ध राष्ट्रपति मुहम्मद अब्बास घर में ग़ुस्साए युवाओं और हमास के दबाव में हैं। उन्होंने बुद्धवार को अरब जगत के दबाव में फ़िलिस्तीन राष्ट्रीय अथारिटी के अधीनस्थ वेस्ट बैंक की समन्वित सुरक्षा प्रणाली को एकतरफ़ा रद्द कर अपने क्षेत्र की सुरक्षा का भार अपने पुलिस कर्मियों को सौंपने की घोषणा कर दी। इसका सीधा-साधा अर्थ यह हुआ कि संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव के मुताबिक़ अब फ़िलिस्तीन की जनता को अपने राज्य की सुरक्षा का वैधानिक अधिकार होगा। अरब मीडिया में यह कहा जा रहा है कि यह लड़ाई खाड़ी तक सीमित न रह कर आगे तक जाएगी।

ईरान के मित्र चीन और रूस ने प्रथम साक्ष्य में हमास के अमानवीय कृत्य के बावजूद उसकी निंदा करने से परहेज़ किया था। दूसरे, ईरान ने अपने दो महारथी मित्रों -चीन और रूस की मदद से अरब जगत को जोड़ने का उपक्रम किया है, उस से फ़िलिस्तीन के हौसले बढ़े हुए देखे जा सकते हैं। इसलिए कहा जा रहा है कि इज़रायल से घिरे होने और इज़रायल की बहुदलीय सरकार में दो चरमपंथी दलों की भागीदारी पर टिकी बेंजामिन नेतन्याहू सरकार ‘वेस्ट बैंक’ में जोड़-तोड़ से यहूदी समुदाय की वृद्धि तो कर सकेगी, पर ज़ोर ज़बरदस्ती करना सहज नहीं होगा।

इसे भी पढ़ें: ‘फिलिस्तीनियों की शिकायत…हमास का हमला उचित नहीं’: संयुक्त राष्ट्र, मुस्लिम देश गाजा के लोगों को नहीं देगें शरण

भू राजनैतिक विवशताएँ

अमेरिका से रणनीतिक रिश्तों के बावजूद खाड़ी में सऊदी अरब और ईरान से छत्तीस का आँकड़ा रहा है। पेट्रो डालर की बदौलत खाड़ी में वर्चस्व की लड़ाई और सऊदी के पड़ौसी देश यमन में ईरान समर्थित होथी लड़ाकों के आए दिन विस्फोट/धमाकों से क्षुब्ध सऊदी अरब ने पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ रणनीतिक संधि की थी। लेकिन वाशिंगटन पोस्ट के सऊदी पत्रकार की कथित हत्या में सऊदी प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान का नाम घसीटे जाने और मानवीय अधिकारों के नाम पर जो बाइडेन और सऊदी प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान के बीच संबंध कटु हो गए थे।

चीन ने इस मौक़े का लाभ उठाते हुए खाड़ी की दो बड़ी शक्तियों-सऊदी और ईरान, के बीच मेल मिलाप और राजनयिक रिश्तों की डोर बाँधने में महती भूमिका निभाई, उस से अमेरिका का विचलित होना स्वाभाविक था। इस घड़ी में जो बाइडेन की ओर से इज़रायल और सऊदी अरब के बीच शांति प्रस्ताव में अब्राहम संधि भी पीछे छूट गई। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस्लामिक एकजुटता के नाम पर खाड़ी ही नहीं, दुनिया भर के इस्लामिक देश इन दो बड़े देशों की अगवानी से प्रभावित हुए हैं। ऐसे में सऊदी प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान ने मौजूदा स्थिति में पहल करते हुए ईरान के राष्ट्रपति से फ़ोन पर 45 मिनट बातचीत की जो गत मार्च दोनों देशों के बीच दौत्य संबंध स्थापित होने के पश्चात पहली सीधी बात थी।

मंगलवार को रियाद में आर्गेनाइज़ेशन आफ इस्लामिक काउंसिल के बैठक में इज़राइल के विरुद्ध प्रतिबंध लगाए जाने की गरज से ईरान के विदेश मंत्री हुसैन अमीर अब्दुल्लाहियान ने एक बचकाना सुझाव रखा। उन्होंने कहा कि इज़रायल को कच्चे तेल की आपूर्ति करने से इंकार कर दिया जाना चाहिए। बता दें, इज़रायल खाड़ी देशों की बजाय सेंट्रल एशिया में कजाकिस्तान व अरबेजिस्तान से कच्चा तेल ख़रीदता है। ईरान ने यमन में हूती, लेबनान में हिजबुल्ला और ग़ाज़ा पट्टी में हमास लड़ाकों को सैन्य मदद दी है और देता आ रहा है।

युद्द विराम कब

इस समय असल सवाल यह है कि इस युद्ध में आम जनों के जान माल की तबाही देख कर युद्ध विराम की माँगें उठना वाजिब है। बुद्धवार को क़रीब तीन सौ अमेरिकी फ़िलिस्तीनी समुदाय ने वाशिंगटन में कैपिटल हिल पर रोटेंडा परिसर में प्रदर्शन कर अमेरिकी कांग्रेस (पार्लियामेंट) से युद्ध विराम की माँग की। प्रदर्शनकारी काले रंग की जर्सियाँ पहने थे। बाद में इन्हें क़ानून की अवहेलना और पुलिस से दुर्व्यवहार के आरोप में हिरासत में लिया गया।

खाड़ी में युद्ध के खिलाफ बाइडेन

जो बाइडेन फ़िलिस्तीन की स्वायत्तता के हामी ज़रूर हैं, लेकिन आतंकवाद के ख़िलाफ भी हैं। उन्होंने इजरायल रवाना होने से पूर्व कहा था कि हमास एक आतंकवादी गुट है, जिस के समूल नाश के लिए इजरायल कार्रवाई करती है, उन्हें कोई आश्चर्य नहीं होगा। जो बाइडेन ने ग़ाज़ा पट्टी के अल अहिली अस्पताल में हुए विस्फोट पर अपनी जाँच एजेंसियों की रिपोर्ट के आधार पर दावा किया कि उसमें इजरायली सेना का हाथ नहीं है। अमेरिकी साक्ष्य और वीडियो रिपोर्ट के आधार पर अमेरिकी दावे में कहा गया कि यह विस्फोट फिलिस्तीन इस्लामिक जेहादी ग्रुप की ओर से छोड़े गए राकेट के बीच में फुस्स होने और अस्पताल पर गिरने से हुआ है। इसे हमास और अरब जगत मानने को तैयार नहीं है।

बाइडन ने वाशिंगटन से रवाना होने से पूर्व इस संकट के समाधान के लिए मित्र देश जॉर्डन की राजधानी ओमान में किंग अब्दुल्ला-दो और फ़िलिस्तीन के राष्ट्रपति मुहम्मद अब्बास के साथ शिखर वार्ता में गुफ़्तगू करने का सीधा प्रस्ताव रखा था। लेकिन ग़ाज़ा पट्टी के अस्पताल अल-अहिली में राकेट विस्फोट से सैकड़ों लोगों की जान जाने और इस से मरीज़ों की अकस्मात मौत के कारण शिखर वार्ता को रद्द करना पड़ा था। मुहम्मद अब्बास को फ़िलिस्तीन में तीन दिन के राजकीय शोक के कारण रामाल्ला लौटना पड़ा। इस से शिखर वार्ता को धक्का लगा।

इसे भी पढ़ें: भारत के एक और दुश्मन का अंत, पाकिस्तान में आतंकी दाउद मलिक की गोली मारकर हत्या

हालाँकि, इस संकट से निपटने के लिए एक सप्ताह पूर्व इज़रायल और निकटवर्ती देशों की यात्रा पर गए अमेरिकी विदेश मंत्री एंथनी ब्लिंकेन ने इज़रायल, जॉर्डन, फ़िलिस्तीन, बहरीन आदि देशों के विदेश मंत्रियों और राजप्रमुखों से समस्या के समाधान पर चर्चा की थी। कहा यह जा रहा है कि इस संकट में ईरान की कोशिश यह है कि वेस्ट बैंक पर क़ाबिज़ राष्ट्रपति मुहम्मद अब्बास को अपदस्थ कर अरब जगत के मनचाहे नेता को पदासीन कर दिया जाए। ईरान के कट्टरपंथी नेता मुहम्मद अबास को अमेरिका का एक पिट्ठू और अरब जगत में एक कमज़ोर कड़ी के रूप में देखते हैं। मंगलवार देर सायं अल अहिली अस्पताल पर राकेट विस्फोट में सैकड़ों लोगों की मौत के बाद ग़ुस्साए फ़िलिस्तीनी युवाओं ने वेस्ट बैंक और यरुशलम में प्रदर्शन किया और अब्बास को पद से हटाए जाने की माँग की थी।

संकट की जड़ में है ईरान

ईरान के सुप्रीम लीडर आयातुल्ला खुमैनी ने मंगलवार को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा था कि इज़रायल ने ग़ाज़ा पट्टी में हमले जारी रखे तो मुस्लिम जगत को रोक पाना बहुत महँगा पड़ेगा। खुमैनी 1979 में इस्लामिक क्रांति के बाद से लगातार इज़रायल के फ़िलिस्तीन समुदाय पर दमन के विरोध में वक्तव्य देते आए हैं। ईरान ने इस संदर्भ में हमास को मिलिट्री और आर्थिक मदद दी है। अब यह धीरे-धीरे स्पष्ट होता जा रहा है कि इस संकट की जड़ में ईरान है। ईरान के बड़बोले विदेश मंत्री हुसैन अमीर अब्दुल्लाहियान ने आयातुल्ला खुमैनी की तर्ज़ पर एक क़दम आगे बढ़ कर चेतावनी दे डाली कि अरब जगत के देशों की ओर से एक ऐसे सैन्य दल के गठन की तैयारी की जा रही है जो इज़रायल से लोहा लेने को आमादा रहेगी। इस सैन्य दल में हिजबुल्ला के नाम का विशेष उल्लेख किया गया है। इस सैन्य दल में इराक़ और सीरिया के ख़ूँख़ार लड़ाकों को लिए जाने की बात की गई है। फ़िलिस्तीन के मुद्दे पर इस्लामिक काउंसिल आफ एशिया के विदेश मंत्रियों की एक बैठक बुलाए जाने का प्रस्ताव भी रख दिया है।

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