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मुस्लिम देश ही अपने यहां शरण देने से कतरा रहे गाजा के मुस्लिमों को

मजहब के नाम पर सभी मुस्लिम देश इस्राएल के विरुद्ध, फिलिस्तीन और हमास के पक्ष में आवाज उठा रहे हैं। लेकिन ये देश गाजा वालों को अपने यहां पनाह देने को तैयार नहीं हैं। आखिर ऐसा क्यों

Written byPanchjanyaPanchjanya
Oct 21, 2023, 06:00 pm IST
in विश्व
Representational Image

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इस्राएल की हमास पर जबरदस्त जवाबी कार्रवाई के बीच गाजा के मुस्लिम ​पसोपेश में हैं कि यहां से निकलकर कहां शरण लें। इसकी वजह है कि आसपास का कोई भी मुस्लिम देश उन्हें अपने यहां शरण नहीं देना चाहता। इस्राएल में वे जा नहीं सकते। मिस्र और अरब देशों ने गाजा के मुस्लिम शरणार्थियों के मामले में हाथ खड़े कर रखे हैं। आखिर क्या वजह है कि यहां उनका मुस्लिम ब्रदरहुड कोई मोल नहीं रख रहा है? गाजा में भी वे फिलिस्तीनी हमास से सुरक्षित नहीं हैं। गाजा के अस्पताल पर हमास ने बम गिराकर दिखा दिया है कि अपने स्वार्थ और आतंक के सामने वह गाजा वालों पर भी जुल्म कर सकता है। ऐसे में फिलिस्तीनी गाजा पट्टी में ही घिर कर रह जाने को मजबूर हैं।

इस्राएल के लगातार हमलों के बीच फंसे गाजा के मुस्लिम, जो हमास के लिए हर तरह से समर्थन दिखाते रहे हैं, अब सांसत में हैं। हमास को जड़ से उखाड़ फैंकने की कसमें खाए इस्राएल की बमबारी से बचने के लिए गाजा के ​लोग भागकर कहीं जा नहीं पा रहे हैं। कारण, वे गाजा से निकलें कैसे, एक तरफ तो सागर का किनारा है तो बाकी दो सरहदों से जमीनी रास्ते हैं जो आगे जाकर बंद हैं।

गाजा के एक तरफ इस्लामवादी देश मिस्र है, जो किसी शरणार्थी को अपने यहां बसाने को तैयार नहीं हैं। फिर एक तरफ इस्राएल है जहां वे जा नहीं सकते, तो एक तरफ सागर। इस्राएल का हमला शुरू होने पर दुनिया को लगा था कि गाजा के लोग शायद बचकर मिस्र में शरण ले लें। लेकिन मिस्र ही नहीं अरब देशों ने भी फिलिस्तीनियों को अपने यहां आने से मना कर दिया है। जैसा लग रहा था कि मुस्लिम होने की वजह से मिस्र और अरब के देश उन्हें अपने यहां बसा लेंगे, पर उसकी दूर दूर तक कोई संभावना नहीं दिख रही है। इस्राएल के आगे जॉर्डन भी है। लेकिन वहां के दरवाजे भी फिलिस्तीन के शरणार्थियों के लिए बंद हैं।

वैसे, मजहब के नाम पर सभी मुस्लिम देश इस्राएल के विरुद्ध, फिलिस्तीन और हमास के पक्ष में आवाज उठा रहे हैं। लेकिन ये देश गाजा वालों को अपने यहां पनाह देने को तैयार नहीं हैं। आखिर ऐसा क्यों है? मुस्लिम देश फिलिस्तीनियों को पनाह देना क्यों नहीं चाहते?

दरअसल फिलस्तीन के लोगों का विस्थापन 1947—48 के समय से ही देखने में आता रहा है। 1948 में इस्राएल की नींव पड़ी थी, उसके से ही लाखों फिलिस्तीनियों को वहां से हटना पड़ा था। इसके बाद, 1967 में युद्ध हुआ। इसमें इस्राएल का गाजा तथा वेस्ट बैंक पर कब्जा हो गया, उस वक्त भी लगभग तीन लाख फिलिस्तीनी लोग विस्थापित हो गए। इनमें से अधिकांश जॉर्डन गए थे। आज फिलिस्तीन के लोगों की तादाद मोटे तौर पर 60 लाख हो चली है। ज्यादातर वेस्ट बैंक, गाजा, सीरिया, लेबनान तथा जॉर्डन में शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं। अनेक पश्चिमी देशों में जा बसे हैं।

फिलिस्तीन से निकले शरणार्थियों की इस्राएल के कारण वापसी होनी मु​श्किल है। इसके लिए कुछ शांति वार्ताएं हुई हैं, समझौते हुए है कि फिलिस्तीनी वापस आकर बस जाएं लेकिन इस्राएल इस बात के लिए तैयार नहीं होता। वह कहता रहा है कि फिलिस्तीनी लौटेंगे तो यहूदी बहुल देश के लिए खतरे बढ़ जाएंगे। यही वजह है कि विभिन्न इस्लामी देशों, जैसे मिस्र, जॉर्डन, जैसे अरब देश, इनको डर है कि अगर अपने यहां गाजा के शरणार्थियों को बसा लेंगे तो फिर वे कभी लौटकर गाजा नहीं जा सकेंगे, उनके देश में ही हमेशा के लिए बस जाएंगे।

मिस्र के गाजा के शरणार्थियों से कतराने की एक और वजह यह है कि अगर वह फिलिस्तीनियों को अपने यहां शरण देता है तो साथ में हमास के तत्वों का भी उनके देश में घुसपैठ का खतरा बढ़ जाएगा जो उसे बर्दाश्त नहीं होगा।  उसके यहां आतंकवादियों की कम समस्या नहीं है। उसने तो तब हमास पर आरोप भी लगाया था कि मिस्र की आतंकवादियों से लड़ाई में हमास आतंकवादियों का साथ दे रहा था।

7 अक्तूबर को वर्तमान युद्ध शुरू होने पर इस्राएल ने कहा था कि गाजा से जितने लोग भागे हैं और गाजा के उत्तरी भाग से दक्षिणी भाग में चले गए हैं, वे युद्ध की समाप्ति पर लौट कर आ पाएंगे। लेकिन इतिहास को देखते हुए अरब के देश इस्राएल के कहे पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं। इसके अलावा, मिस्र और इस्राएल के आसपास के दूसरे कई देश पहले ही अपने यहां शरणार्थियों की समस्याओं से त्रस्त हैं। अब वे और शरणार्थियों को झेलना नहीं चाहते। उनके पास पैसा भी इतना नहीं है कि शरणार्थियों को बैठा कर खिलाते रहें।

मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी की ए​क टिप्पणी इस संकट की एक वजह बनी है। उनका कहना है कि अगर फिलिस्तीनी गाजा को छोड़कर जाते हैं तो उनकी फिलिस्तीन की मांग खतरे में पड़ जाएगी। क्योंकि अगर वेस्ट बैंक और गाजा में फिलिस्तीनी रहेंगे ही नहीं तो उनके अलग देश की मांग की हवा निकल जाएगी।

हमास जैसे आतंकवादी संगठन का मजहब के नाम पर फिलहाल ये मुस्लिम देश पक्ष भले ही ले रहे हैं लेकिन वे नहीं चाहते कि उसकी छाया भी उनके देश पर पड़े। इसलिए मिस्र के गाजा के शरणार्थियों से कतराने की एक और वजह यह है कि अगर वह फिलिस्तीनियों को अपने यहां शरण देता है तो साथ में हमास के तत्वों का भी उनके देश में घुसपैठ का खतरा बढ़ जाएगा जो उसे बर्दाश्त नहीं होगा। मिस्र जानता है कि इससे उनके यहां बहुत अशांति मच जाएगी। उसके यहां आतंकवादियों की कम समस्या नहीं है। उसने तो तब हमास पर आरोप भी लगाया था कि मिस्र की आतंकवादियों से लड़ाई में हमास आतंकवादियों का साथ दे रहा था।

यही वजह है कि मिस्र हो, जॉर्डन या कोई भी अन्य अरबी इस्लामी देश, फिलिस्तीन के शरणार्थियों को कोई अपने यहां लेने को तैयार नहीं है। मजहब एक तरफ, अपनी सुरक्षा और ​स्थिरता एक तरफ। कोई भी मुस्लिम देश सिर्फ गाजा वालों के मुस्लिम होने से उन्हें सिर पर बैठानो रह नहीं चाहता। जबकि दूसरी ओर कुछ ​पश्चिमी देश ‘मानवता’ के नाम पर इस्लामी शरणार्थियों को अपने यहां बसा चुके हैं और आज उसका दुष्परिणाम भी देख रहे हैं। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, डेनमार्क के हालात इसके जीते—जागते उदाहरण हैं, जहां की सरकारों की अब आंखें खुल रही हैं और सुधारात्मक कदम उठाए जा रहे हैं।

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