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आहत है ढुंढार

जहां जयपुर स्थित है, उसे पहले ढुंढार राज्य कहा जाता था। दुल्हेराय/ढोलाराय कछवाह (मूल निवास-नरवर, ग्वालियर) द्वारा 1137 ई में ढूंढ नदी के आस-पास स्थापित राज्य होने से इसे ढुंढार कहा जाता था।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Oct 11, 2023, 08:15 am IST
in भारत, विश्लेषण, राजस्थान
जयपुर का विश्वप्रसिद्ध हवामहल

जयपुर का विश्वप्रसिद्ध हवामहल

इसके प्रथम शासक दुल्हेराय ने जमवाय माता का मंदिर बनवाया। इस वंश में कोकिल देव,भारमल,भगवन्तदास, मानसिंह प्रथम, मिर्जा राजा जयसिंह,सवाई जयसिंह, सवाई प्रताप सिंह, सवाई माधोसिंह द्वितीय और मानसिंह द्वितीय जैसे अनेक महत्वपूर्ण और सुप्रसिद्ध विद्वान, योद्धा शासक हुए।

आज जहां जयपुर स्थित है, उसे पहले ढुंढार राज्य कहा जाता था। दुल्हेराय/ढोलाराय कछवाह (मूल निवास-नरवर, ग्वालियर) द्वारा 1137 ई में ढूंढ नदी के आस-पास स्थापित राज्य होने से इसे ढुंढार कहा जाता था। कछवाहा राजवंश आरंभ से धर्म-निष्ठ,धर्म-रक्षक और धर्म-सहिष्णु रहा है। इसके प्रथम शासक दुल्हेराय ने जमवाय माता का मंदिर बनवाया। इस वंश में कोकिल देव,भारमल,भगवन्तदास, मानसिंह प्रथम, मिर्जा राजा जयसिंह,सवाई जयसिंह, सवाई प्रताप सिंह, सवाई माधोसिंह द्वितीय और मानसिंह द्वितीय जैसे अनेक महत्वपूर्ण और सुप्रसिद्ध विद्वान, योद्धा शासक हुए।

तत्कालीन परिस्थितियों में राजा भारमल और अकबर के बीच 1562 में एक राजनीतिक समझौता हुआ। इसका लाभ यह हुआ कि कछवाहा राज्य का आम-जन मुगलों के अत्याचारों का शिकार होने से बचा रहा और इस क्षेत्र में धर्म-संस्कृति की ध्वजा निरंतर लहराती रही। मुगलों के राजनीतिक पतन के साथ यह समझौता समाप्त प्राय: हो गया।

कछवाहा शासक सवाई जय सिंह ने 18 नवंबर, 1727 को जयपुर नगर की स्थापना की। उसके बाद 1734 से रियासत काल तक जयपुर कछवाह वंश की राजधानी रहा। जब देश में मतांध और क्रूर औरंगजेब के आतंक का राज चल रहा था,तब मेवाड़ के महाराणा राजसिंह और जयपुर के सवाई जयसिंह द्वितीय(1700-1743) ने उसे कड़ी टक्कर दी और जजिया कर अदा करने से मना कर किया।

हिंदू धर्म-संस्कृति के प्रति अपने समर्पण भाव को प्रकट किया था। कछवाहा शासकों की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि वे कूटनीति और राजनीति में माहिर थे। कछवाहा राजवंश को भगवान श्रीराम के पुत्र कुश का वंशज होने का गौरव प्राप्त है। लेकिन जब आज के जयपुर को देखते हैं तो बहुत निराशा होती है। 

वृंदावन के भक्तजन औरंगजेब से देव प्रतिमाएं बचा कर जयपुर ले आए। सवाई जयसिंह ने मूर्ति स्थापित कर ‘राधा-गोविंददेवजी मंदिर’ का निर्माण करवाया और लोक आस्था का बड़ा केंद्र खड़ा कर दिया। इसके अलावा सवाई जयसिंह ने जयपुर में भारत का अंतिम अश्वमेघ यज्ञ किया और कल्कि भगवान का मंदिर बनवाया।

सवाई जयसिंह धर्म-अध्यात्म और विज्ञान के विद्वान और आश्रयदाता थे। उन्होंने जंतर-मंतर बनवाया। जयपुर स्थित जंतर-मंतर और जयपुर की चारदीवारी यूनेस्को की विश्व-विरासत की सूची में शामिल है। उनके शासनकाल में हर प्रजा को समान सुरक्षा,समान अवसर उपलब्ध थे। किसी प्रकार का सामाजिक या सामुदायिक वैमनस्य नहीं था। यहां के सभी शासक प्रजा वत्सल,जन हितैषी,देशप्रेमी और संस्कृति विस्तारक थे।

सवाई माधोसिंह द्वितीय ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के निर्माण में 5,00,000 रु. का योगदान देकर हिंदू धर्म-संस्कृति के प्रति अपने समर्पण भाव को प्रकट किया था। कछवाहा शासकों की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि वे कूटनीति और राजनीति में माहिर थे। कछवाहा राजवंश को भगवान श्रीराम के पुत्र कुश का वंशज होने का गौरव प्राप्त है। लेकिन जब आज के जयपुर को देखते हैं तो बहुत निराशा होती है। पिछले कुछ वर्षों में जयपुर की चारदीवारी के अंदर का वातावरण बिल्कुल बदल गया है। जिहादी तत्व कभी लक्ष्मी नारायण मंदिर पर अतिक्रमण करते हैं, तो कभी आपसी सौहार्द बिगाड़ने का प्रयास करते हैं।
(लेखक इतिहासकार हैं)

Topics: हिंदू धर्म-संस्कृतिराधा-गोविंददेवजी मंदिरसंस्कृति की ध्वजाFlag of CultureRadha-Govinddevji Temple
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