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मुंडारी भाषा में हनुमान चालीसा

आज भी इस समाज में ऐसे बहुत सारे लोग हैं, जिन्होंने अपने पूरे शरीर पर राम नाम गुदवा रखा है।

Written byरितेश कश्यपरितेश कश्यप
Sep 29, 2023, 10:51 am IST
in भारत, धर्म-संस्कृति
शीघ्र ही महात्मा नारायण दास ग्रोवर शोध संस्थान, खूंटी द्वारा मुंडारी भाषा में हनुमान चालीसा का प्रकाशन होने जा रहा है

शीघ्र ही महात्मा नारायण दास ग्रोवर शोध संस्थान, खूंटी द्वारा मुंडारी भाषा में हनुमान चालीसा का प्रकाशन होने जा रहा है

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में उप निदेशक रहे छत्रपाल सिंह मुंडा ने बताया कि अयोध्या में श्रीराम मंदिर के उद्घाटन से पहले ही मुंडारी भाषा में प्रकाशित हनुमान चालीसा की 50,000 प्रतियां जनजातीय समाज के बीच वितरित की जाएंगी।

जनजातीय समाज सनातन संस्कृति का अभिन्न अंग है। आज भी इस समाज में ऐसे बहुत सारे लोग हैं, जिन्होंने अपने पूरे शरीर पर राम नाम गुदवा रखा है। ये लोग खुलेआम कहते हैं कि वे राम और कृष्ण के वंशज हैं। इसके बावजूद ईसाई मिशनरियां यह दुष्प्रचार कर रहती हैं कि जनजाति हिंदू नहीं हैं। इस दुष्प्रचार में फंस कर जरूर कुछ लोग ईसाई बन रहे हैं, लेकिन आज भी जनजाति समाज के अधिकांश लोग सनातनी हैं।

इन सनातनियों के सहयोग और समर्पण से आज हनुमान चालीसा, रामायण, महाभारत, गीता आदि धर्मग्रंथों का अनुवाद मुंडारी, संथाली जैसी विभिन्न जनजातीय भाषाओं में हो रहा है। अभी हाल ही हनुमान चालीसा का अनुवाद मुंडारी में हुआ है। प्रत्येक पृष्ठ पर मूल चौपाई के साथ मुंडारी में उसका अनुवाद है। इसकी विशेषता यह है कि हर पन्ने पर प्रसंग के अनुसार चित्र भी हैं। इसके अनुवादक हैं खूंटी के रहने वाले मानस-मर्मज्ञ छत्रपाल सिंह मुंडा।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में उप निदेशक रहे छत्रपाल सिंह मुंडा ने बताया कि अयोध्या में श्रीराम मंदिर के उद्घाटन से पहले ही मुंडारी भाषा में प्रकाशित हनुमान चालीसा की 50,000 प्रतियां जनजातीय समाज के बीच वितरित की जाएंगी। छत्रपाल सिंह मुंडा ने रामचरित मानस का भी मुंडारी में अनुवाद किया है। उन्हें रामचरित मानस पढ़ने की प्रेरणा अपने बड़े चाचा स्व. मझिया मुंडा से मिली थी। छत्रपाल सिंह कहते हैं, ‘‘एक समय मेरे गांव में कुछ ही लोग थे, जो रामचरित मानस पढ़ पाते थे। उनमें से एक मेरे चाचा भी थे। वे नियमित रूप से लोगों को रामचरित मानस के प्रसंग सुनाया करते थे। वे मुझे भी भगवान राम, माता सीता, भरत जी, लक्ष्मण जी, राजा दशरथ आदि के जीवन के बारे में बताते थे। इस कारण रामचरित मानस के प्रति मेरा लगाव बढ़ता गया।’’

एकल अभियान के द्वारा जनजातीय समाज के बीच जनजागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। इसके तहत जनजातीय समाज के लोग रामचरित मानस, महाभारत और भगवद्गीता सहित कई ग्रंथों का अध्ययन करते हैं और ग्रामीणों के बीच उनकी भाषा में ही उन तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं।

मुंडारी और संथाली झारखंड के जनजातीय समाज की प्रमुख भाषाएं हैं। इनमें से छत्रपाल सिंह मुंडा ने मुंडारी भाषा में रामचरित मानस और हनुमान चालीसा का अनुवाद पूर्ण कर लिया है और अब उसके मुद्रण की तैयारी की जा रही है। वहीं दूसरी ओर संथाली में भी रामचरित मानस, हनुमान चालीसा और महाभारत का अनुवाद किया जा रहा है। इस पुनीत कार्य के लिए जामताड़ा के रहने वाले रबिलाल हांसदा पिछले कई महीने से लगे हैं।

लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में पढ़ने वाले रबिलाल हांसदा ने हनुमान चालीसा का अनुवाद काफी पहले ही पूर्ण कर लिया था और अब वे रामचरितमानस और महाभारत का अनुवाद कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि संथाली भाषा ओलचिकी लिपि में लिखी गई है। इस लिपि की खोज पंडित रघुनाथ मुर्मू ने 1925 में की थी। उन्होंने बताया कि इस लिपि का संबंध प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य पाणिनि की अष्टाध्यायी से है। इस कारण संथाली भाषा में संस्कृत के अनेक शब्द समाविष्ट हैं। रबिलाल के अनुसार जनजातीय समाज की जीवनशैली, उनकी पूजा-पद्धति और परंपरा में सनातन संस्कृति की छाप स्पष्ट दिखती है।

छत्रपाल सिंह कहते हैं-
‘‘एक समय मेरे गांव में कुछ ही लोग थे, जो रामचरित मानस पढ़ पाते थे। उनमें से एक मेरे चाचा भी थे। वे नियमित रूप से लोगों को रामचरित मानस के प्रसंग सुनाया करते थे। वे मुझे भी भगवान राम, माता सीता, भरत जी, लक्ष्मण जी, राजा दशरथ आदि के जीवन के बारे में बताते थे। इस कारण रामचरित मानस के प्रति मेरा लगाव बढ़ता गया।’’

झारखंड सहित पूरे देश के जनजातीय समाज के बीच मुंडारी और संथाली भाषा में प्रकाशित रामचरित मानस, महाभारत और हनुमान चालीसा की चर्चा शुरू हो चुकी है। लोगों का मानना है कि जनजातीय भाषा में लिखी गई रामचरित मानस और महाभारत पढ़ने के बाद जनजातीय समाज के लोग किसी के बहकावे में नहीं आएंगे। पिछले 37 वर्ष से एकल अभियान के द्वारा जनजातीय समाज के बीच जनजागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। इसके तहत जनजातीय समाज के लोग रामचरित मानस, महाभारत और भगवद्गीता सहित कई ग्रंथों का अध्ययन करते हैं और ग्रामीणों के बीच उनकी भाषा में ही उन तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं।

एकल अभियान, रांची भाग अध्यक्ष प्रमोद सिंह का मानना है कि मुंडारी और संथाली भाषा में रामचरित मानस, हनुमान चालीसा और महाभारत के आने से झारखंड सहित पूरे विश्व में हमारी संस्कृति परम वैभव को प्राप्त करेगी। मिशनरी संस्थाएं सैकड़ों वर्षों से जनजातीय समाज को बरगला रही हैं, उस पर भी लगाम लगेगी।

Topics: हनुमान चालीसाhanuman chalisaरामायणमहाभारतगीताGeetaMundari languageरामचरित मानसभगवद्गीता सहितमुंडारी और संथाली भाषाRamayana
रितेश कश्यप
रितेश कश्यप
डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। राजनीति, सामाजिक और सम-सामायिक मुद्दों पर पैनी नजर। कर्मभूमि झारखंड।   [Read more]
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