श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन : 500 वर्ष की आहुतियों की गाथा
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श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन : 500 वर्ष की आहुतियों की गाथा

राजाओं ने, संतों ने, निहंगों ने, संगठनों और विधि विशेषज्ञों ने मंदिर निर्माण के लिए सतत् संघर्ष किया

Written byPanchjanyaPanchjanya
Aug 12, 2023, 06:00 pm IST
inभारत, उत्तर प्रदेश
शासकीय बर्बरता से घायल हुए श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के प्रणेता श्री अशोक सिंहल

शासकीय बर्बरता से घायल हुए श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के प्रणेता श्री अशोक सिंहल

सन् 1528 से 1949 तक 76 युद्ध हुए। अंतिम खूनी संघर्ष 1934 में हुआ। तब हिंदुओं ने जबर्दस्ती बनाए गए दस्लामी ढांचे को क्षति पहुंचाई। इसके लिए ब्रिटिश सरकार ने आर्थिक दंड लगाया। उस संघर्ष का प्रभाव दोनों समुदायों पर पड़ा। एक ओर तो हिंदू शांत हो गए, दूसरी ओर मुसलमानों ने वहां नमाज पढ़ना बंद कर दिया।

अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर बनाने के लिए सन् 1528 से 1949 तक 76 युद्ध हुए। अंतिम खूनी संघर्ष 1934 में हुआ। तब हिंदुओं ने जबर्दस्ती बनाए गए दस्लामी ढांचे को क्षति पहुंचाई। इसके लिए ब्रिटिश सरकार ने आर्थिक दंड लगाया। उस संघर्ष का प्रभाव दोनों समुदायों पर पड़ा। एक ओर तो हिंदू शांत हो गए, दूसरी ओर मुसलमानों ने वहां नमाज पढ़ना बंद कर दिया।

22/23 दिसंबर, 1949 को जन्मभूमि पर रामलला प्रकट हुए। फैजाबाद के तत्कालीन जिलाधिकारी के.के. नायर ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए ढांचे पर ताला लगा दिया। लेकिन एक पुजारी को दिन में दो बार ढांचे के अंदर जाकर दैनिक पूजा और अन्य अनुष्ठान संपन्न करने की अनुमति दी। इस ताले को खुलवाने के लिए हिंदू समाज ने 1950 के बाद अदालत में याचिकाएं डालनी शुरू कर दीं। फिर मुसलमानों ने भी 1962 में याचिका डाली। 1984 में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) अयोध्या आंदोलन में शामिल हुई। जागरूकता फैलाने के लिए ‘राम जानकी यात्रा’ शुरू हुई। तत्कालीन जिला एवं सत्र न्यायाधीश के. एम. पांडे ने 1 फरवरी, 1986 को ताला खोलने का निर्णय सुनाया। 1989 में पालमपुर अधिवेशन में भाजपा ने एक प्रस्ताव पारित कर अयोध्या आंदोलन का समर्थन किया। यही नहीं, लालकृष्ण आडवाणी ने रथयात्रा भी निकाली।

अयोध्या आंदोलन का एक विहंगम दृश्य

श्री अशोक सिंहल, श्री मोरोपंत पिंगले, दाऊदयाल खन्ना जैसे तपस्वियों ने अयोध्या आंदोलन को धार दी, तो बी.आर. मणि, के.के. मोहम्मद जैसे पुरातत्व विशेषज्ञों ने साक्ष्य जुटाने में बड़ी भूमिका निभाई। इस मामले में के.परासरन जैसे कानूनविदों के योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता

1986 के आसपास ही रामानंदाचार्य स्वामी शिवरामाचार्य की अध्यक्षता में श्रीराम जन्मभूमि न्यास का गठन हुआ। 1 फरवरी, 1989 को प्रयागराज में तय किया गया कि देश के हर मंदिर, हर गांव में रामशिला पूजन कार्यक्रम आयोजित होंगे। देश और विदेश से ऐसी 2,75,000 रामशिलाएं अक्तूूबर, 1989 के अंत तक अयोध्या पहुंच गईं। संतों ने देवोत्थान एकादशी (30 अक्तूबर, 1990) से मंदिर निर्माण हेतु कारसेवा शुरू करने का आह्वान किया।

2 नवंबर, 1990 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया, जिसमें कोलकाता के राम कोठारी और शरद कोठारी सहित अनेक रामभक्तों ने अपने जीवन की आहुति दी। 30 अक्तूूबर, 1990 को हजारों रामभक्तों ने ढांचे पर भगवा ध्वज फहराया। 4 अप्रैल, 1991 को दिल्ली के बोट क्लब पर अभूतपूर्व रैली हुई। अक्तूबर, 1992 को दिल्ली में आयोजित धर्म संसद में दिसंबर से पुन: कार सेवा प्रारंभ करने की घोषणा हुई।

6 दिसंबर को कारसेवकों ने अपमान के प्रतीक ढांचे को ध्वस्त कर दिया। 7 दिसंबर, 1992 को जन्मस्थान पर एक लघु मंदिर बनाया गया। दैनिक सेवा-पूजा की अनुमति के लिए अधिवक्ता हरिशंकर जैन ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। 1 जनवरी, 1993 को अनुमति दे दी गई। 2003 में उच्च न्यायालय ने एएसआई को इस स्थान की खुदाई करने का आदेश दिया। 30 सितंबर, 2010 को उच्च न्यायालय ने और 9 नवंबर, 2019 को सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि विवादित स्थल ही राम मंदिर है।

श्री अशोक सिंहल, श्री मोरोपंत पिंगले, दाऊदयाल खन्ना जैसे तपस्वियों ने अयोध्या आंदोलन को धार दी, तो बी.आर. मणि, के.के. मोहम्मद जैसे पुरातत्व विशेषज्ञों ने साक्ष्य जुटाने में बड़ी भूमिका निभाई। इस मामले में के.परासरन जैसे कानूनविदों के योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता

ये खबर भी पढ़ें-
1947 : रियासतों का एकीकरण : पटेल न होते, तो यह नक्शा न होता

Topics: Vishwa Hindu Parishadदाऊदयाल खन्नाअयोध्याPalampur sessionरामललाMr. Ashok Singhalविश्व हिंदू परिषदMr. Moropant PingleShri Ram JanmabhoomiDawoodyal Khannaश्रीराम जन्मभूमिRamlalaश्रीराम जन्मभूमि न्यासपालमपुर अधिवेशनश्री अशोक सिंहलAyodhyaश्री मोरोपंत पिंगले
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