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बहुमूल्य है ई-कचरा

ई-कचरा कोईकबाड़ नहीं है। इसे पुर्नचक्र करके महंगी धातुएं ही नहीं, बल्कि विभिन्न प्रकार के खनिज भी प्राप्त किए जा सकते हैं। संसाधित ई-कचरे से प्राप्त धातुओं का दोबारा प्रयोग कर प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को रोका जा सकता है और पर्यावरण को भी सुरक्षित रखा जा सकता है

Written byअरविंद मिश्रअरविंद मिश्र
Jul 15, 2023, 02:24 pm IST
in भारत

सिर्फ सोना, चांदी, एल्युमिनियम, तांबा ही महत्वपूर्ण धातुएं मानी जाती थीं। अब ये दुर्लभ पृथ्वी तत्व और बैटरी खनिज तरक्की के नए ईंधन हैं। हाइड्रोजन कार, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में लगे सेमीकंडक्टर, लीथियम आयन बैटरी, सोलर प्लेट, विंड टर्बाइन सहित लगभग हर उपकरण ऊर्जा खनिज पर टिका है।

हम लोग खराब कंप्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, लीथियम बैटरी आदि को कबाड़ समझ कर फेंक देते हैं, जो वास्तव में दुर्लभ खनिज भंडार हैं। ई-कचरे को संसाधित कर उससे लीथियम, कोबाल्ट, तांबा, एल्युमिनियम, सोना, चांदी और पैलेडियम जैसी महंगी धातुएं न केवल निकाली जा रही हैं, बल्कि इनसे प्राप्त होने वाले विभिन्न खनिजों का भी दोबारा प्रयोग हो रहा है।

एक समय सिर्फ सोना, चांदी, एल्युमिनियम, तांबा ही महत्वपूर्ण धातुएं मानी जाती थीं। अब ये दुर्लभ पृथ्वी तत्व और बैटरी खनिज तरक्की के नए ईंधन हैं। हाइड्रोजन कार, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में लगे सेमीकंडक्टर, लीथियम आयन बैटरी, सोलर प्लेट, विंड टर्बाइन सहित लगभग हर उपकरण ऊर्जा खनिज पर टिका है। नए जमाने के ऊर्जा खनिज दो तरह के हैं। पहले प्रकार में बैटरी खनिज, जिसमें लीथियम, कोबाल्ट, निकेल और ग्रेफाइट तथा दूसरे में 17 दुर्लभ पृथ्वी तत्व जिसमें नियोडिमियम, प्रजोडिमियम, डिस्प्रोसियम, टेरिबियम, येट्रियम, स्कैंडियम, सोरियम, यूरोपियम, एर्बियम, गैडोलिनियम, होल्मियम, लैंथेनम, ल्यूटेटियम, प्रोमेथियम, सैमेरियम, थ्यूलियम और येटेरबियम शामिल हैं।

स्वदेशी तकनीक

आज दुनियाभर के देशों पर कार्बन उत्सर्जन शून्य करने का दबाव है। भारत ने 2070 तक शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है। इस दिशा में उसने बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 2 जून को 9 री-साइक्लिंग उद्योगों व स्टार्टअप को स्वदेशी तकनीक सौंपी है। इससे मिश्रित प्रकार की लीथियम आयन बैटरियों को संसाधित कर 95 प्रतिशत से अधिक लीथियम, कोबाल्ट, मैंगनीज और निकेल लगभग 98 प्रतिशत शुद्धता के साथ दोबारा प्राप्त किया जा सकता है। कम लागत वाली इस तकनीक को ई-कचरा प्रबंधन पर उत्कृष्टता केंद्र (सीओई) सी-मेट हैदराबाद ने विकसित किया है।

ई-कचरा उत्पादक देशों में भारत अमेरिका, चीन, जापान और जर्मनी के बाद 5वें स्थान पर है। ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर की 2017 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत सालाना लगभग 20 लाख टन ई-कचरा पैदा करता है। लेकिन 2016-17 में वह कुल ई-कबाड़ का सिर्फ 0.036 मीट्रिक टन ही निपटान कर सका। 2018 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, अर्बन माइनिंग के जरिये ई-कचरे से 6,900 करोड़ रुपये का सोना निकाला जा सकता है। अमेरिकी पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी के अनुसार, एक मीट्रिक टन खराब मोबाइल से 300 ग्राम सोना निकल सकता है। परंपरागत खनन में सोने के अयस्क से प्रति टन 2 या 3 ग्राम सोना ही मिलता है।

कच्चे माल की पूर्ति

अर्बन माइनिंग से न केवल बेकार सामग्री दोबारा उपयोग में लाई जा सकती है, बल्कि उसे पुन: संसाधित भी किया जा सकता है। इससे कच्चे माल की कमी तो पूरी होगी ही, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन भी कम होगा। साथ ही, परंपरागत खनन पर आने वाली लागत को कम करने के साथ पर्यावरणीय नुकसान तथा कार्यबल के संकट को भी दूर किया जा सकता है। अर्बन माइनिंग का मतलब है इलेक्ट्रॉनिक कचरे से खनिज और धातुओं का निष्कर्षण। जलवायु परिवर्तन पर 2015 के पेरिस समझौते के अस्तित्व में आने पर अगले 20 वर्ष में धरती के गर्भ में छिपे खनिजों की मांग चार गुना बढ़ जाएगी।

ट्रांसमिशन लाइन बिछाने के लिए तांबा और ई-वाहनों में लीथियम, सोलर पैनल में सिलिकॉन और विंड टर्बाइन के लिए जिंक की आपूर्ति बड़ी चुनौती है। ली-आयन बैटरी स्मार्ट फोन से लेकर इलेक्ट्रिक कारों तक में प्रयुक्त होती है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का कहना है कि एक इलेक्ट्रिक कार में सीएनजी कार के मुकाबले 6 गुना अधिक खनिज प्रयुक्त होता है। इसी तरह आफशोर विंड टर्बाइन में गैस आधारित बिजली संयंत्र के मुकाबले नौ गुना खनिज लगते हैं। ऐसे में अर्बन माइनिंग के जरिए हम इन महंगी धातुओं को दोबारा उपयोग में ला सकते हैं।

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने बीते वर्ष ‘न्यू बैटरी वेस्ट मैनेजमेंट रुल्स-2022’ लागू किए थे, जिसमें उत्पादक, डीलर और उपभोक्ताओं की जिम्मेदारी तय की गई है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की निगरानी में ईपीआर (विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व) का तंत्र खड़ा किया जा रहा है। इसके तहत कंपनियां कितनी बैटरी तैयार कर रही हैं, उसका पुनर्चक्रण अनुपात क्या है, ऐसी अनेक जानकारियां देती हैं। बैटरी कचरा प्रबंधन के नए नियम अर्बन माइनिंग को बढ़ावा देंगे, लेकिन इसके लिए कुछ अहम कदम उठाने होंगे। पहला, ई-कचरा एकत्रीकरण की व्यवस्था मजबूत हो। खराब इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को कहां और किसे सौंपा जाए, आम जन को इसकी जानकारी नहीं होती।

दूसरा, ऐसी तकनीक का विकास किया जाए, जिससे ई-कचरे से महंगी धातुओं का निष्कर्षण आसानी से किया जा सके। नेशनल मेट्रोलॉजिकल लेबोरेट्री ने ऐसी तकनीक विकसित की है, जिससे लीथियम आयन बैटरी से 95 प्रतिशत तक शुद्ध कोबाल्ट प्राप्त किया जाता है। भुवनेश्वर स्थित सेंट्रल इंस्टीट्यूट आफ प्लास्टिक इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी ने ई-कचरे से सात तरह के प्लास्टिक निष्कर्षण की तकनीक विकसित की है। ऐसी तकनीक अन्य ऊर्जा खनिजों के पुनर्चक्रण के लिए भी विकसित करनी होगी। तीसरा, संसाधित खनिजों और धातुओं को दोबारा कैसे और कहां उपयोग हो, इसके विकल्प तैयार करने होंगे। चौथा, उत्पाद से लेकर परियोजनाएं तक इस तरह बनें कि उसमें प्रयुक्त खनिज और महंगे तत्व को फिर से निकालना आसान हो।

उदाहरण के लिए, लीथियम आयन बैटरी में प्रयुक्त होने वाले खनिज का दोबारा उपयोग कर उससे 80 प्रतिशत तक दक्षता हासिल की जा सकती है। पांचवां, विनिर्माण क्षेत्र से लेकर हर उस क्षेत्र को अर्बन माइनिंग के दायरे में लाया जाए, जहां कचरे से संसाधन सृजन (वेस्ट टु वेल्थ क्रिएशन) के मौके हैं। मतलब, इमारतों से इस्पात, वाहनों से मैंग्नीज, निकेल और क्रोमियम जैसे दुर्लभ खनिज दोबारा हासिल किए जा सकते हैं। छठवां, दुर्लभ व बैटरी खनिज के उत्खनन पर भारत 14 अरब रुपये खर्च करता है, जबकि अमेरिका, आस्ट्रेलिया तथा कनाडा लगभग 82 अरब रुपये खर्च करते हैं। ऊर्जा खनिजों के अर्बन माइनिंग पर केंद्रित वित्तीय संस्थान स्थापित किए जा सकते हैं।

इलेक्ट्रिक कार में प्रयुक्त होने वाली ली- आयन बैटरी का भी पुनर्चक्रन हो सकता है।

आज दुनियाभर के देशों पर कार्बन उत्सर्जन शून्य करने का दबाव है। भारत ने 2070 तक शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है। इस दिशा में उसने बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 2 जून को 9 री-साइक्लिंग उद्योगों व स्टार्टअप को स्वदेशी तकनीक सौंपी है। इससे मिश्रित प्रकार की लीथियम आयन बैटरियों को संसाधित कर 95 प्रतिशत से अधिक लीथियम, कोबाल्ट, मैंगनीज और निकेल लगभग 98 प्रतिशत शुद्धता के साथ दोबारा प्राप्त किया जा सकता है। कम लागत वाली इस तकनीक को ई-कचरा प्रबंधन पर उत्कृष्टता केंद्र (सीओई) सी-मेट हैदराबाद ने विकसित किया है।

लीथियम भंडार

ऊर्जा खनिज के मामले में पिछले कुछ वर्षों में चीन ने अपनी रणनीति बदली है। अब वह प्रोसेसिंग और एडवांस रिफाइनिंग टेक्नोलॉजी के दम पर अर्बन माइनिंग की बड़ी अवसंरचना खड़ी कर ई-कचरे से बैटरी खनिज प्राप्त कर रहा है। बैटरी खनिज की वैश्विक आपूर्ति शृंखला में चीन की 75 प्रतिशत हिस्सेदारी के पीछे अर्बन माइनिंग की बड़ी भूमिका है। मध्य अमेरिकी देश कोस्टरिका के पास लीथियम का भंडार नहीं है, पर अर्बन माइनिंग की बदौलत वह लीथियम का निर्यातक बन चुका है। इसी तरह, जापान मोटरवाहन घटकों से विभिन्न धातुएं हासिल करने में अव्वल है। अर्बन माइनिंग की क्षमता को देखते हुए जी-7 देशों ने खनिज सुरक्षा साझेदारी की है। कनाडा की पहल पर सस्टेनेबेल क्रिटिकल मिनरल अलायंस और यूरोपीय संघ ने क्रिटिकल लॉ मटेरियल क्लब की स्थापना की है।

फिक्की की रिपोर्ट के अनुसार, भारत उपलब्ध बैटरी और दुर्लभ पृथ्वी तत्व की क्षमता का 10 प्रतिशत ही उत्खनन कर पाया है और जरूरत के 96 प्रतिशत लीथियम का आयात करता है। जम्मू के रियासी जिले में 59 लाख टन का विशाल लीथियम भंडार मिला है। कर्नाटक के मंड्या जिले में 1600 टन लीथियम भंडार की पुष्टि हो चुकी है। यदि इनका पूरी तरह दोहन किया जाए तो भारत लीथियम निर्यातक देशों की श्रेणी में आ जाएगा। वर्तमान में सफेद सोना कहे जाने वाले लीथियम के वैश्विक भंडार का 36 प्रतिशत चिली, 24 प्रतिशत आस्ट्रेलिया और 10 प्रतिशत अर्जेंटीना के पास है।

दुर्लभ पृथ्वी तत्व के वैश्विक बाजार में भारत की भागीदारी भले ही एक प्रतिशत है, लेकिन इसका पांचवां सबसे बड़ा भंडार उसके पासहै। इस मामले में वैश्विक बाजार में चीन का 75 प्रतिशत कब्जा है। आस्ट्रेलिया, ब्राजील, तुर्की, इंडोनेशिया, कांगो, बोलीविया जैसे बड़े ऊर्जा खनिज उत्पादकों के साथ भारत निवेश और तकनीक हस्तांतरण परियोजनाओं को मूर्त रूप देने में जुटा है।

आयात पर निर्भरता

लीथियम आयन बैटरी के एक मुख्य घटक कोबाल्ट का भारत में उत्पादन लगभग नगण्य है। 2021 में भारत ने 2 अरब 50 करोड़ रु. से अधिक का कोबाल्ट आयात किया था। भारत अभी कांगो और आस्ट्रेलिया में कोबाल्ट के उत्खनन की नीति पर काम कर रहा है। कोबाल्ट उत्पादन में कांगो 48, आस्ट्रेलिया 18 और क्यूबा 7 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखते हैं।

गैस टर्बाइन और रॉकेट इंजन, लीथियम आयन बैटरी, स्टेनलेस स्टील, विभिन्न प्रकार के धातु और विद्युत चुंबकीय परत में प्रयुक्त होने वाले निकेल का भी भारत में उत्पादन नाम मात्र है। देश में पाए जाने वाले निकेल का 93 प्रतिशत भंडार ओडिशा में है जबकि झारखंड के जादुगोड़ा, क्योंझर, पूर्वी सिंहभूम व नागालैंड के किफेरे में 3 प्रतिशत निकेल पाया जाता है। लेकिन देश में निकेल निकालने की तकनीक नहीं है। भारत के पास उच्च गुणवत्ता वाला ग्रेफाइट भंडार लगभग 35 हजार किलोटन है, जबकि मांग छह गुना अधिक है। इसलिए हमें आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। ग्रेफाइट उत्पादन में तुर्की, ब्राजील और चीन की हिस्सेदारी क्रमश: 27, 22 और 16 प्रतिशत है।

दुर्लभ पृथ्वी तत्व के वैश्विक बाजार में भारत की भागीदारी भले ही एक प्रतिशत है, लेकिन इसका पांचवां सबसे बड़ा भंडार उसके पासहै। इस मामले में वैश्विक बाजार में चीन का 75 प्रतिशत कब्जा है। आस्ट्रेलिया, ब्राजील, तुर्की, इंडोनेशिया, कांगो, बोलीविया जैसे बड़े ऊर्जा खनिज उत्पादकों के साथ भारत निवेश और तकनीक हस्तांतरण परियोजनाओं को मूर्त रूप देने में जुटा है।

इलेक्ट्रॉनिक सामान के प्रिंटेड सर्किट बोर्ड में सीसा, कैडमियम जैसी धातुएं प्रयुक्त होती हैं। इसी तरह, कैथोड रे-ट्यूब और स्विच में पारे का प्रयोग होता है। लेकिन प्रयोग के बाद इसे ई-कचरे को खुले में फेंकने से मिट्टी के साथ मनुष्य की सेहत को गंभीर नुकसान पहुंचता है। ऐसे में ई-कचरे का पुर्नचक्रण पर्यावरण के साथ मानवीय स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होगा। चक्रीय अर्थव्यवस्था की अवधारणा भारत के लिए नई नहीं है। वस्तुओं का पुर्नरुपयोग भारतीय जीवनशैली का अहम हिस्सा है। अर्बन माइनिंग को बढ़ावा देने वाली स्वदेशी तकनीक इस दिशा में बड़ा कदम है।

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