Doctor's Day : डॉक्टर और समाज, जरूरत है एक-दूसरे को समझने की
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Doctor’s Day : डॉक्टर और समाज, जरूरत है एक-दूसरे को समझने की

भारतीय चिकित्सक, भारत रत्न डॉ बी.सी. रॉय के जन्म एवं निर्वाण दिवस (1 जुलाई) को डॉक्टर्स डे के रूप मे मनाते हैं

Written byडॉ. सूर्यकान्तडॉ. सूर्यकान्त
Jul 1, 2023, 10:12 am IST
inभारत, स्वास्थ्य
डॉक्टरों से मरीजों के रिश्ते पूरी तरह से व्यावसायिक हों तो भी उसमें आत्मीयता, मानवीयता और परस्पर सम्मान का होना नितान्त आवश्यक है

डॉक्टरों से मरीजों के रिश्ते पूरी तरह से व्यावसायिक हों तो भी उसमें आत्मीयता, मानवीयता और परस्पर सम्मान का होना नितान्त आवश्यक है

डॉ. सूर्यकान्त

भारतीय चिकित्सक, डॉ बी.सी. रॉय के जन्म एवं निर्वाण दिवस, (1 जुलाई) को चिकित्सक दिवस (डॉक्टर्स डे) के रूप मे मनाते हैं। भारत रत्न डॉ. बिधान चन्द्र रॉय का जन्म 1 जुलाई, सन् 1882 को तत्कालीन बंगाल प्रेसीडेन्सी के अंतर्गत बांकीपुर (अब पटना) में हुआ था एवं उनकी मृत्यु 1 जुलाई 1962 को हुई। वे एक प्रख्यात चिकित्सक, स्वतंत्रता सेनानी, सफल राजनीतिज्ञ तथा समाजसेवी के रूप में याद किये जाते हैं। उन्होंने पटना कॉलेजिएट से 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद कलकत्ता मेडिकल कालेज से मेडिकल ग्रेजुएट व इंग्लैंड से एम.डी., एम.आर.सी.पी., एफ.आर.सी.एस. उत्तीर्ण की। इसके बाद 1911 में भारत वापस आये।

 

भारत वापस आने के बाद डॉ बी सी रॉय ने चिकित्सा शिक्षक के रूप में कलकत्ता मेडिकल कालेज, एन.आर.एस. मेडिकल कालेज व आर.जी. कर मेडिकल कालेज में कार्य किया। वे मेडिकल कांउसिल ऑफ इंडिया (एम.सी.आई.) के अध्यक्ष भी रहे तथा राजनीतिज्ञ के रूप में कलकत्ता के मेयर, विधायक व पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री (1948 से 1962) भी रहे। वे मुख्यमंत्री रहते हुए भी प्रतिदिन निःशुल्क रोगी भी देखते थे। उन्हें 4 फरवरी 1961 को भारत रत्न से अलंकृत किया गया था।

एक समय था जब मरीज और उसके परिजन डाक्टरों को भगवान का दर्जा देते थे। वो श्रद्धा, सम्मान और उससे भी बड़ी बात वो अटूट भरोसा, कहां चला गया। चिकित्सा सेवा भी अब सेवाएं नहीं रही, सर्विसेज हो गई हैं, प्रोफेशनल सर्विसेज, जिसमें तकनीकी सुघढ़ता और कौशल तो बढ़ा है, लेकिन नैतिक दायित्वबोध और गरिमा निश्चित तौर पर अपने पुराने रूप से कमतर होती जा रही हैं। व्यावसायिकता हावी हो चुकी है। पहले चुनिन्दा डाक्टर दूर-दूर तक अपने नाम और कौशल की अच्छाइयों के लिये जाने जाते थे। अब डॉक्टर नहीं कारपोरेट, अस्पतालों, स्पेशलाइजेशन और सुपर स्पेशलाइजेशन का दौर है। समाज, डाक्टरों को ईश्वर के रूप में नहीं देखता बल्कि उसे लगता है कि ज्यादातर चिकित्सक येन केन प्रकारेण इलाज के दौरान धन के दोहन में लगे रहते हैं। दवा, सर्जरी और जाँचें सबमें उसे कमाई के अनैतिक श्रोत दिखते हैं। सन्देह का चश्मा हमेशा ही मरीज की आंखों पर रहता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि सब डॉक्टर ऐसा करते हैं, लेकिन सबको एक ही नजर से देखने की बदली सामाजिक प्रवृत्ति ने मरीज और चिकित्सकों के बीच सदियों से स्थापित श्रद्धा और विश्वास की नींव को जड़ से हिला कर रख दिया है।

पूंजी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी

निजीकरण और व्यवसायीकरण के इस युग में पूंजी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है। इसके फायदे कम हुए हैं, नुकसान ज्यादा। पूंजी बढ़ने से तकनीक और आधारभूत ढांचे में क्रांतिकारी सुधार हुए हैं। गांवों और कस्बों में पेड़ के नीचे खाट और बदहाल अस्पतालों में इलाज का दौर से अब सेवेन स्टार होटलनुमा अस्पतालों तक आ पहुंचा है। इससे जहां एक ओर इलाज की गुणवत्ता बढ़ी है तो वही दूसरी ओर खर्चे भी बढ़े हैं। वर्ष 1994 में जब चिकित्सकीय पेशे को भी उपभोक्ता अधिनियम (कन्ज्यूमर एक्ट) में शामिल कर लिया गया, तब से यह चिकित्सकीय पेशा सेवा का माध्यम न होकर एक व्यवसाय बन गया। इसे एक छोटे उदाहरण से समझिये कि जब आप ढाबे पर दाल खाते हैं तो लगभग 100 रुपये में मिल जाती है, पर इसी दाल की कीमत स्टार होटल में पांच गुनी से भी ज्यादा हो जाती है। भारत में ज्यादातर प्राइवेट अस्पताल/नर्सिंग होम अब एक व्यवसाय हैं और कई बार इसके मालिक डॉक्टर न हो कर व्यवसायी ही होते हैं। ऐसे अस्पतालों को बनाने और चलाने में बहुत खर्चा आता है अतः यहाँ इलाज भी महंगा ही होगा। लेकिन रोगी के परिजन बड़े आराम से कह देते हैं कि हमें तो लूट लिया। यह सोच ठीक नही है। इन बेतहाशा बढ़े खर्चों का अर्थशास्त्र भी डाक्टरों से मरीजों के सम्बन्धों का मनोविज्ञान और मानसिकता बदल रहा है।

लक्ष्मण रेखा होती है ध्वस्त

जब मरीज की हालत गंभीर हो और धैर्य और सहनशीलता की सबसे ज्यादा जरूरत हो, मरीजों और चिकित्सकों के बीच स्थापित मर्यादा और सद्व्यवहार की लक्ष्मण रेखा आसानी से और अक्सर ही ध्वस्त हो जाती है। कारणों की तह में जायें तो एक तथ्य यह भी सामने आता है कि दस-दस साल चिकित्सा शास्त्र के हर गूढ़ और गहन तथ्यों को समझने-बूझने में लगे डाक्टरों को मरीजों से उचित तरह से संवाद करने के लिये प्रशिक्षित नहीं किया जाता। पढ़ाई के दौरान इन चिकित्सकों को प्रशासनिक प्रशिक्षण व कानूनी प्रशिक्षण भी नहीं दिया जाता, जिसके कारण आगे चलकर उन्हें मेडिको-लीगल व प्रशासनिक दायित्व निर्वाह करने में भी परेशानी का सामना करना पड़ता है। इसीलिए इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, इंडियन इंजीनियरिंग सर्विसेज की तर्ज पर इंडियन मेडिकल सर्विसिज (आई.एम.एस.) की मांग कर रही है।

डॉक्टरों की है कमी

एक बड़ा कारण जो डाक्टर-रोगी के रिश्तों को प्रभावित करता है वो है डॉक्टरों की कमी। 2018 की नेशनल हेल्थ प्रोफाइल रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रति 11,082 जनसंख्या पर एक एलोपैथिक चिकित्सक है, जो कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक (1,000 जनसंख्या पर एक चिकित्सक) से 10 गुना कम है। काम के बोझ से जुड़े तनाव तो इस सेवा का हिस्सा बन ही चुके हैं। इन दोनों छोरों पर भी बड़े सुधार की तत्काल आवश्यकता है।

समाज में बढ़ती उग्रता

एक अन्य कारण जो चिकित्सक रोगी के संबंधों को बिगाड़ रहा है, वह है समाज में बढ़ती उग्रता। आज रोगी के परिजनों को लगता है कि सिफारिश कराकर या धौंस दिखाकर रोगी का अच्छा उपचार कराया जा सकता है। जैसा कि जीवन के अन्य क्षेत्रों में वे आए दिन करते रहते हैं। इस सोच के कारण चिकित्सक रोगी का उपचार करे या समाज के बढ़ते उग्र स्वरूप से स्वयं की रक्षा करे या अपनी क्लीनिक या अस्पताल के शीशे टूटने से बचाए, यह भी एक विकराल समस्या कुछ वर्षों से बड़ी तेजी से उभरी है। किसी रोगी की यदि उपचार के दौरान मृत्यु हो जाए तो तुरन्त आरोप लगता है कि डाक्टर की लापरवाही से मरीज की मृत्यु हो गई। जबकि सच्चाई यह है कि कोई भी चिकित्सक क्यों चाहेगा कि उसके मरीज की मृत्यु हो जाए या वह ठीक न हो। प्रत्येक चिकित्सक अपने ज्ञान व जानकारी से रोगी को ठीक करने की कोशिश करता है, जीवन या मृत्यु चिकित्सक के वश में नहीं अपितु ईश्वर के हाथ में है, इस बात का ध्यान समाज को सदैव रखना चाहिए। अतः मरीजों और उनके परिजनों को भी अपने रवैये मे सकारात्मक परिवर्तन लाना होगा। यही कारण है कि आई.एम.ए. राष्ट्रीय स्तर पर एक ’’नेशनल मेडिकल प्रोटेक्शन एक्ट’’ की भी मांग कर रही है।

परस्पर सम्मान का होना आवश्यक

डाक्टरों से उनके रिश्ते पूरी तरह से व्यावसायिक हो फिर भी उसमें आत्मीयता, मानवीयता और परस्पर सम्मान का होना नितान्त आवश्यक है। भारतीय चिकित्सा शास्त्र के महान मनीषी चरक ने क्या खूब कहा था कि मरीज चिकित्सक को चिकित्सा सेवा या परामर्श के बदले फीस (धन) दे सकता है या सम्मान दिया जा सकता है या फिर कोई उपहार दे सकता है। ये भी न हो सके तो वह उसके कौशल का प्रचार कर उसके उपकार से निवृत्त हो सकता है। अगर कोई मरीज ऐसा करने में भी अक्षम हो तो वह ईश्वर से उस चिकित्सक के कल्याण की प्रार्थना करे। इस भाव और मानसिकता का मूल चिकित्सक और रोगी दोनो को समझना होगा, क्योंकि उनका आपसी रिश्ता और सम्मान की भावना इस पुनीत और महान चिकित्सा व्यवस्था की नींव है और इस व्यवस्था पर करोड़ों मरीजों की सेहत और जिंदगी टिकी है।

(लेखक किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय, उ0प्र0, लखनऊ में रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष हैं)

Topics: Doctor's Daydoctors and societywhy celebrate Doctor's Dayडॉक्टर्स डेडॉक्टर और समाजक्यों मनाते हैं डॉक्टर्स डेडॉ. सूर्यकान्त
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