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आपातकाल ने जिन्हें बनाया नेता, आज वही आपातकाल को भूल गए

नीतीश कुमार और लालू यादव जैसे लोग आपतकाल के कारण नेता बने, पर आज ये दोनों उस कांग्रेस की गोद में जा बैठे हैं, जिसने सत्ता बचाने के लिए लोकतंत्र की हत्या की थी।

Written byसंजीव कुमारसंजीव कुमार
Jun 25, 2023, 12:16 pm IST
inबिहार
बिहार में विपक्षी दलों की बैठक में शामिल नेता

बिहार में विपक्षी दलों की बैठक में शामिल नेता

आज आपातकाल की 48वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। 25 जून , 1975 को देश में आपातकाल लगाने की घोषणा की गई थी। पटना आपातकालीन संघर्ष का केंद्र बिंदु था। लोकनायक जय प्रकाश नारायण आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे। आपातकालीन संघर्ष से ही नीतीश कुमार, लालू प्रसाद, मुलायम सिंह यादव जैसे नेता निकले थे। आज उसी पटना में आपातकाल को लेकर लालू-नीतीश खेमे में कोई हलचल नहीं है। वहीं इस शांत माहौल में आज आम आदमी पार्टी के बैनर ने पटना में एक हलचल पैदा कर दी है।  बता दें कि आज आम आदमी पार्टी द्वारा दो अलग अलग प्रकार के बैनर पूरे पटना में लगाए गए हैं। इस बैनर के माध्यम से विपक्षी एकजुटता के पैरोकारों से पूछा गया है कि अगर विपक्षी एकता सम्मान के नाम पर हो रही है तो सम्मान में भेदभाव क्यों है? अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, हेमंत सोरेन सरीखे नेताओं को उचित सम्मान क्यों नहीं दिया जा रहा है? दूसरे बैनर में केंद्र के अध्यादेश की बात कही गई है। अध्यादेश का विरोध करने पर ही आम आदमी पार्टी द्वारा  समर्थन की बात कही गई है। 2024 में देश के भावी प्रधानमंत्री के तौर पर केजरीवाल को घोषित करने की भी मांग पोस्टर में है।  दो दिनों में जो स्थिति उत्पन्न हुई है उससे नीतीश कुमार असहज हैं।

विपक्षी एकता के नाम पर पहली बैठक 23 जून को पटना में हुई। भारतीय जनता पार्टी के विरुद्ध एकजुटता दिखाने का पहला मौका था। इसके लिए पिछले 6 माह से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एड़ी चोटी एक किए हुए थे। लेकिन इसका कोई फलाफल नहीं निकला। सिर्फ एक बात पर कुछ लोगों की राय बनी कि अगली बैठक 12 जुलाई को शिमला में होगी। बैठक में कोई अपने अहम के घेरे से बाहर निकलने को तैयार नहीं दिख रहा था।

ममता बनर्जी की शर्त पर पटना में बैठक हो तो गई लेकिन सभी अपनी अपनी शर्तों को लेकर ज्यादा सजग थे। अरविंद केजरीवाल ने तो एक प्रकार से कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा ही खोल दिया था। उनका मानना था कि केंद्र सरकार के अध्यादेश के विरुद्ध कांग्रेस उनका खुलकर साथ दे। वहीं महबूबा मुफ्ती अरविंद केजरीवाल से धारा 370 पर उनका रवैया जानना चाहती थी। बैठक के बाद इस बैठक की सचाई सामने आई। बैठक के बाद विपक्षी एकजुटता दिखाने के लिए पत्रकार वार्ता का आयोजन किया गया था। यह वार्ता भी नाम मात्र की ही थी।पत्रकारों को सवाल नहीं पूछना था। नेता आते थे और अपनी बात कहकर शांत हो जाते थे। इस पत्रकार वार्ता से ममता बनर्जी कुछ देर में ही चली गईं। दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने तो बैठक का एक प्रकार से वहिष्कार ही कर दिया। ये दोनों पत्रकार वार्ता में नहीं गए। विपक्षी पार्टियों के कई प्रमुख नेता विशेषकर विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री चार्टर्ड प्लेन से आए थे। केजरीवाल और स्टालिन को फ्लाइट पकड़ने की कोई जल्दबाजी नहीं थी। ऐसे में इनका पत्रकार वार्ता से गायब होना, कई संकेत देता है।

विपक्षी एकता की मुहिम चलानेवाले नीतीश के राज्य में ही संप्रग का परिवार सिमट रहा है

पटना की बैठक में नेताओं के हाव भाव से लग रहा था कि मजबूरी में साथ आए हैं। सिर्फ मोदी विरोध के नाम पर राजनैतिक पार्टियां अपनी दुकान लंबे समय तक नहीं चला सकतीं।  ये बात सभी दल समझ रहे हैं। नीतीश कुमार के अंदर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने की इच्छा कुलांचे मार रहा है। इस बैठक से उन्हें बड़ी उम्मीद थी कि सभी पार्टियां एकमत से उन्हें विपक्षी एकता की मुहिम के संयोजक बना देंगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नीतीश कुमार भले ही भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता के अभियान में लगे हों लेकिन सचाई यह है कि यहां बिहार में ही संप्रग का कुनबा बिखर रहा है। संप्रग के 3 महत्वपूर्ण दल इस गठबंधन से अलग हो चुके हैं। सबसे पहले रालोसपा के उपेंद्र कुशवाहा ने नीतीश कुमार से दूरी बनाई। उपेंद्र कुशवाहा भले ही जद यू में शामिल हुए थे लेकिन उन्होंने अपनी पार्टी का विलय जद यू में नहीं किया था। कुशवाहा के बाद विकासशील इंसाफ पार्टी के सहनी उनसे अलग हुए। और अभी हाल में हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्युलर) के जीतनराम मांझी ने संप्रग से किनारा कर लिया। यह निर्णय इन दलों ने अपनी इच्छा से नहीं लिया है बल्कि अपने कार्यकर्ताओं के दबाव में लिया है।

23 जून को विपक्ष द्वारा अपना अपना स्वार्थ छोड़कर साथ आने की बात कही गई। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नीतीश कुमार स्वयं अपना स्वार्थ छोड़ने को तैयार हैं। वे कब मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर इस मुहिम में लगेंगे।

पटना में लगे पोस्टर बहुत कुछ संकेत देते हैं

विपक्षी एकता को लेकर पटना में पोस्टरबाजी जारी है। आम आदमी पार्टी ने 21 जून को ही विपक्षी एकता का माखौल उड़ाते हुए पोस्टर लगा दिया था। पोस्टर में नीतीश कुमार को कुर्सी प्रेमी बताया गया था। केजरीवाल को ही देश का एकमात्र विकल्प बताया गया था। “2024 का संकल्प, केजरीवाल ही विकल्प”, जैसे पोस्टर भी लगे थे। 25 जून को आम आदमी पार्टी ने पुनः पोस्टर लगाए।सड़क किनारे चाय की दुकान लगानेवाले डब्लू ने ठीक ही कहा कि विपक्षी दलों में अभी से ही घमासान है। आगे आगे देखिए क्या होता है?

Topics: बिहारआपातकाल
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