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आपातकाल 1975: तानाशाह इंदिरा

भारत में आपातकाल: 1946 में नेहरू द्वारा संविधान सभा में पेश संवैधानिक आदर्शवाद को अगले दो दशक में उनकी पुत्री इंदिरा गांधी ने ही तहस-नहस कर दिया। संविधान सभा नहीं चाहती थी कि संविधान को किसी वाद, सिद्धांत या विचारधारा से संबद्ध किया जाए। पर इंदिरा राज में यह सब हुआ

Written byशिवेन्द्र राणाशिवेन्द्र राणा
Jun 25, 2023, 10:00 am IST
in भारत, विश्लेषण, आजादी का अमृत महोत्सव

संविधान सभा में 13 दिसंबर, 1946 को जवाहर लाल नेहरू द्वारा उद्देश्य-संकल्प प्रस्ताव पेश किया गया था, जिसका समर्थन राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन ने किया था। इसे संविधान सभा ने 22 जनवरी, 1947 को अंगीकार किया था। नेहरू के शब्दों में यह ‘संकल्प से कुछ अधिक एक दृढ़ निश्चय, एक प्रतिज्ञा, एक वचन और सभी के लिए समर्पण’ था।

 

शिवेंद्र राणा

आजादी के अमृतकाल में देश में संविधान की उपलब्धियों पर ही नहीं, उन त्रासदियों पर भी विमर्श होना चाहिए, जिनसे होकर संविधान और लोकतंत्र गुजरा है। ऐसी ही त्रासदी आपातकाल के दौर की रही है, जब संवैधानिक मूल्यों को अपमानित किया गया।

संविधान सभा में 13 दिसंबर, 1946 को जवाहर लाल नेहरू द्वारा उद्देश्य-संकल्प प्रस्ताव पेश किया गया था, जिसका समर्थन राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन ने किया था। इसे संविधान सभा ने 22 जनवरी, 1947 को अंगीकार किया था। नेहरू के शब्दों में यह ‘संकल्प से कुछ अधिक एक दृढ़ निश्चय, एक प्रतिज्ञा, एक वचन और सभी के लिए समर्पण’ था। इस प्रस्ताव द्वारा संपूर्ण प्रभुता संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में भावी भारत की रूपरेखा प्रस्तुत की गई थी। लेकिन यह संवैधानिक आदर्शवाद दो दशकों बाद ही खंडित हो गया, जब लालबहादुर शास्त्री की आकस्मिक मृत्यु के पश्चात नेहरू की पुत्री इंदिरा गांधी को बिना निर्वाचन, जनसहमति के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठाकर संवैधानिक मर्यादाओं का अतिक्रमण किया गया।

संविधान के प्रारूप की आलोचनाओं के जवाब में डॉ. आंबेडकर ने कहा था, ‘‘यदि नए संविधान के अंतर्गत कोई गड़बड़ी होती है, तो इसका कारण यह नहीं होगा कि संविधान खराब था, बल्कि यह कहना चाहिए कि सत्तारूढ़ व्यक्ति ही अधम था, नीच था।’’

लोकनायक जयप्रकाश नारायण लिखते हैं, ‘‘लोकतंत्र की समस्या मूलत: नैतिक समस्या है। संविधान, शासन-प्रणाली, दल, निर्वाचन-ये सब लोकतंत्र के अनिवार्य अंग हैं। किंतु जब तक लोगों में नैतिकता की भावना न रहेगी, लोगों का आचार-विचार ठीक न रहेगा, तब तक अच्छे-से-अच्छे संविधान और राजनीतिक प्रणाली के बावजूद लोकतंत्र ठीक से काम नहीं कर सकता। लोकतंत्र के लिए ये नैतिक गुण और मानसिक प्रवृत्तियां आवश्यक हैं।’’ लेकिन वंशवाद की विष-बेल से उपजी सत्ता के पास ऐसी नैतिकता के होने का प्रश्न ही कहां पैदा होता है। इंदिरा गांधी को संविधान के तिरस्कार की शिक्षा अपने पिता जवाहर लाल नेहरू से मिली थी, जिनका कहना था, ‘‘यदि संविधान कांग्रेस की नीतियों के विपरीत जाता है तो उसे बदलकर अनुकूल बनाया जाना चाहिए।’’

संविधान सभा में बहस के दौरान संविधान के प्रारूप की आलोचनाओं पर जवाब देते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा था, ‘‘मैं यह कहूंगा कि यदि नवीन संविधान के अंतर्गत कोई गड़बड़ी पैदा होती है, तो इसका कारण यह नहीं होगा कि हमारा संविधान खराब था, बल्कि यह कहना चाहिए कि सत्तारूढ़ व्यक्ति ही अधम था, नीच था।’’ 1975 में डॉ. आंबेडकर की आशंका सच साबित हुई। आपातकाल दौर में दुष्टतापूर्ण शक्तियां सक्रिय हो गईं, जिसकी पुष्टि उस समय हुई, जब गांधी जी की समाधि राजघाट पर आचार्य कृपलानी द्वारा आयोजित प्रार्थना के दौरान गांधी जी के पौत्र राजमोहन गांधी एवं समाजवादी नेता एच.वी. कामत गिरफ्तार हुए।

इस बंदी प्रत्यक्षीकरण मामले में सर्वोच्च न्यायालय में तत्कालीन महाधिवक्ता ‘नीरेन डे’ ने अनुच्छेद-21 के अंतर्गत प्रदत्त जीवन एवं स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के प्रवर्तन के निलंबन का समर्थन एवं किसी नागरिक के अपनी गिरफ्तारी को न्यायालय के समक्ष चुनौती देने के अधिकार का विरोध किया। सरकार का पक्ष रखते हुए उन्होंने कहा था, ‘‘गिरफ्तारी का आदेश यदि कानून के अनिवार्य प्रावधानों के प्रतिकूल है और यह ‘दुष्ट विचार’ से प्रेरित है, तब भी न्यायालय को बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को सिरे से खारिज कर देना चाहिए।’’ इसी प्रकार, अपनी दुष्टतापूर्ण योजना के अंतर्गत आपातकाल के समय लोकतंत्र हंता तत्कालीन सरकार ने संविधान के एक बड़े भाग के साथ ही प्रस्तावना को भी संशोधित (42वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1976) किया और उसमें ‘समाजवादी’ एवं ‘धर्मनिरपेक्ष’ जैसे दो शब्द जोड़ दिए। जबकि मूल प्रस्ताव में ये दो शब्द ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र का भी उल्लेख नहीं था। ‘मैनेक’ लिखते हैं, ‘‘इतिहास में कार्य-कारण-संबंधों की गवेषणा मूल्यों के संदर्भ के बिना असम्भव है। कारणों की गवेषणा के पीछे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में मूल्यों की गवेषणा आवश्यक होती है।’’

उद्देशिका के दो प्रयोजन होते हैं। पहला, उद्देशिका ही संविधान के प्राधिकार का स्रोत स्पष्ट करती है। दूसरा, संविधान किन उद्देश्यों को संवर्धित या प्राप्त करने का आकांक्षी है। उद्देशिका पर संविधान का स्वर्णिम भवन खड़ा था, जिसे कांग्रेस विकृत करना चाहती थी।

आखिर नेहरू ने ऐसा क्यों किया होगा? इसके दो जवाब हैं। पहला, नेहरू विवाद से बचना चाहते थे। दूसरा, जैसा कि उनके जीवनीकार माइकल ब्रेशर ने कहा, ‘संभवत: सरदार पटेल ने ऐसा होने नहीं दिया।’ वजह जो भी हो, किंतु यह भी सत्य है कि संविधान सभा नहीं चाहती थी कि संविधान को किसी वाद, सिद्धांत या विचारधारा से संबद्ध कर दिया जाए। किंतु लोकतंत्र हंता कांग्रेस सरकार द्वारा आपातकाल में स्वतंत्रता सेनानियों की आस्था को न सिर्फ रौंदा गया, अपितु बारम्बार अपमानित भी किया गया।

हालांकि यह संपूर्ण सरकार से अधिक व्यक्ति विशेष यानी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के अंतर्मन में व्याप्त अधिनायकवाद का परिणाम था। आवाड़ी अधिवेशन (1955) में उनके सर्वाधिकारवादी पिता जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने ‘समाज की समाजवादी संरचना’ के उद्देश्य का संकल्प लिया था। दूसरे छद्म पंथनिरपेक्षता के नाम पर सनातन समाज को कट्टरपंथी इस्लामिक भेड़ियों के आगे निराश्रित छोड़ देने (1948 का भारत-पाकिस्तान समझौता एवं 1950 के नेहरू-लियाकत समझौता) वाले ‘शांतिदूत चाचा’ की ‘गूंगी गुड़िया’ ने अपनी लोकतांत्रिक शक्ति को महत्वाकांक्षा पूर्ति का मार्ग बनाया। पूर्व गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, इंदिरा गांधी का मूल्यांकन करते हुए लिखते हैं, ‘‘उनके निरंकुश व्यक्तित्व के दो पहलू हैं- असुरक्षा और घमंड। वह सत्ता-लोलुप थीं, जो स्वयं को जवाबदेह तथा विवेक के सामान्य मानदंडों से भी ऊपर मानती थीं। इतिहास में सभी निरंकुश शासकों में ऐसे लक्षण दिखे हैं।’’

इसी की पुष्टि करते हुए आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी की करतूतों के मुरीद रहे प्रसिद्ध लेखक-पत्रकार खुशवंत सिंह ने भी बाद में कहा था, ‘‘अपनी असुरक्षा की भावना के वशीभूत होकर उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं को नष्ट किया। यह असुरक्षा सत्ता गंवाने की आशंका से उत्पन्न हुई थी। रहा उनका अहंकार, तो वह स्वयं के भारत के अघोषित राजपरिवार, नेहरू खानदान की उत्तराधिकारी होने की उनकी स्वयंभू धारणा की उपज था।’’ आडवाणी के अनुसार, ‘शासन करने के लिए जन्म लेने की आत्मछवि’ राजतंत्र में एक गुण हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र में नहीं। कांग्रेस के विभाजन से पूर्व और बाद के सभी कृत्यों में इंदिरा गांधी का यही आकर्षण था।
18वीं सदी साम्राज्यवाद की थी, लेकिन 19वीं सदी में विचारधाराओं का जोर था। 20वीं सदी में इन्हीं विचारधाराओं के आधार पर विश्वभर में आधिपत्य के लिए संघर्ष हुए। इसमें सबसे प्रभावशाली सर्वाधिकारवादी विचारधारा समाजवाद की रही, जिसने नारा तो समता लाने का दिया, पर सबसे ज्यादा जनसंहार, अत्याचार और शोषण समाजवादियों ने ही किया।

हिटलर, मुसोलिनी, स्टालिन, पोल पॉट से लेकर इंदिरा तक, सभी समाजवादी थे। हिटलर एवं इंदिरा गांधी की कार्यशैली में गजब की समानता है। हिटलर के शासनकाल की विवेचना पर आधारित विलियम शिरर की पुस्तक ‘द राइज एंड फॉल आफ थर्ड राइक’ देखिए। हालांकि कुछ भिन्नता के बिंदु भी मौजूद रहे हैं। जैसे- उपरोक्त सभी तानाशाह अपने विकट संघर्षों से उभरकर सत्ता के शीर्ष तक पहुंचे थे, जबकि इंदिरा गांधी को भारत की सत्ता उनके सर्वाधिकारवाद रोग से पीड़ित पिता से विरासत में मिली थी, इसलिए उनका अहंकार भी अधिक बड़ा था। हालांकि इसका दूसरा पहलू जनपक्ष भी है।

व्यक्ति या परिवार विशेष की अपरिहार्यता एवं लोकतंत्र की अवधारणा परस्पर सहगामी नहीं हो सकते। किंतु भारतीय लोकतंत्र ने यह भावुकतापूर्ण आत्मघात किया, जिसका प्रतिफल यह हुआ कि नेहरू की बेटी को सत्ता मिली और उनके द्वारा लागू आपातकाल के दौरान जनभावनाएं एवं जनमर्यादाओं को क्रूरता से रौंदा गया। इंदिरा गांधी को इस बात का भान था कि जिस प्रकार मोतीलाल नेहरू एवं गांधीजी के सहयोग से जवाहर लाल नेहरू कांग्रेस एवं भारतीय जनता पर थोप दिए गए थे, उसी तरह नेहरू के एकाधिकार और उनके प्रति चाटुकारिता की परंपरा की वजह से इंदिरा गांधी स्वयं सरकार पर थोप दी गई थीं। इस अनैतिक परंपरा के बूते इंदिरा गांधी संविधान पर अपनी मनमर्जी थोप सकती थीं और उन्होंने थोपी भी।

संविधान जीवंत दस्तावेज है। उसमें कालक्रम एवं भविष्य के दृष्टिकोण से परिवर्तन होना चाहिए। परिवर्तन से और देश हितानुकूल परिवर्तन से किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। किंतु परिवर्तन संविधान के उन मूलभूत सिद्धांतों को रौंद कर नहीं किया जाना चाहिए था। वे सिद्धांत जो भारत की अंत:चेतना से उपजे थे और संविधान सभा उसका प्रतिनिधित्व कर रही थी। प्रस्तावना संविधान का दर्शन होती है। यह राष्ट्रीय संस्कारों, जीवन मूल्यों, राष्ट्र के संघर्ष से उपजी प्रेरणाओं और उसके भविष्य की मार्गदर्शक है। किंतु आपातकाल का कृत्य संवैधानिक दर्शन का तिरस्कार था। असल में आपातकाल में संविधान संशोधन संविधानवाद की अवधारणा के विरुद्ध था। यह राजनीतिक सत्ता का दुरुपयोग था, जिससे संविधान की मूल भावना को आहत किया गया।

उद्देशिका के विशेषत: दो प्रयोजन होते हैं। पहला, उद्देशिका ही संविधान के प्राधिकार का स्रोत स्पष्ट करती है। दूसरा, संविधान किन उद्देश्यों को संवर्धित या प्राप्त करने का आकांक्षी है। उद्देशिका ही वह आधार था, जिस पर संविधान का स्वर्णिम भवन खड़ा था और कांग्रेस इसे विकृत करना चाहती थी। इसलिए सबसे पहले उसके आधार पर चोट करना था। अत: इंदिरा गांधी ने इसके आधार यानी उद्देशिका पर चोट की। उद्देशिका पर अपने कुत्सित राजनीति से प्रेरित हमले के द्वारा वह संविधान की मूल धारा परिवर्तित करना चाहती थीं, जो उन्होंने की भी। क्योंकि उद्देशिका ही वह गर्भनाल थी, जिसने संविधान का आकार तैयार किया था।

‘समाजवाद’ एवं ‘धर्मनिपेक्षता’ के कोई सुनिश्चित अर्थ नहीं हैं। अत: इसका लाभ हितबद्ध राजनीतिक समूहों द्वारा उठाया जाता रहा। जैसा कि इंदिरा गांधी ने स्वयं कहा था, ‘‘समाजवाद का हमारा अपना ब्रांड है।’’ इसी प्रकार, पंथनिरपेक्षता का प्रयोग अनिर्बंधित सांप्रदायिकता के हथियार के रूप में भी हो सकता है, मतांतरण के रूप में भी हो सकता है और धर्म विरोध के रूप में भी। जनता पार्टी ने जब 45वें संविधान संशोधन विधेयक, 1976 के माध्यम से अनुच्छेद 366 का संशोधन करके एक स्पष्टीकरण जोड़कर इसकी व्याख्या का प्रयास किया, तब राज्यसभा में बहुमत वाली कांग्रेस ने ऐसा होने नहीं दिया। आज जो कांग्रेस ‘देश किसी सरकार या संगठन की मर्जी से नहीं, बल्कि संविधान से चलेगा’, तथा ‘संविधान खतरे में है’, की तकरीरें करती दिखती है, दरअसल यह वही है, जिसे संविधान अपने अनुकूल चाहिए था।

किसी परिवारवाद के विरुद्ध अंध सम्मान रखकर वंशवाद को मुस्सलत कर लेना, अधम सत्ता को स्वीकार करना, संविधान के अपमान को चुपचाप सह लेना और अगली सरकारों पर ऐसी गलतियों को सुधारने का दबाव नहीं बनाना इत्यादि। ये प्रामाणिक भूलें थीं, किंतु इन्हें ढोते रहना तो राष्ट्र की नियति नहीं हो सकती। इसी प्रकार, मूल प्रस्तावना में परिवर्तन के चिह्न आज तक संविधान को बदरंग किए हुए हैं।  इन्हें बदलना ही चाहिए और इसके लिए स्पष्टीकरण, समरसता और वैश्विक दृष्टि जैसे अनर्गल तर्कस्वीकार नहीं किए जाने चाहिए।

आश्चर्य है कि जनता सरकार ने जब पूर्व में संवैधानिक संशोधनों द्वारा की गई विकृतियों को 43वें एवं 44वें संशोधन अधिनियम (1977, 1978) द्वारा ठीक किया, तब प्रस्तावना का पक्ष यथावत् क्यों छोड़ दिया? क्योंकि तब तक इस छद्म पंथनिरपेक्षता एवं अवसरवादी समाजवाद का जहर देश की राजनीति के डीएनए में पैठ चुका था। या कह सकते हैं कि आपदा में अवसर ढूंढ रहे इस भानुमति के कुनबे के पास इतना नैतिक बल ही नहीं बचा था। देश में वोट बैंक की राजनीति उस निम्नतम स्तर की ओर अग्रसर थी, जिसमें राष्ट्रवाद की जिजीविषा को तिलांजलि दी जा चुकी थी। संविधान के इन उपबंधों का इस्तेमाल राजनीतिक तुष्टीकरण एवं बहुसंख्यक समाज की प्रताड़ना हेतु किया जाने लगा।

रा.स्व.संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी लिखते हैं, ‘‘भूल करना मानवीयता है, किंतु प्रमाणित और निर्णित भूल को हठपूर्वक पकड़े रहना अमानवीयता है।’’ इस देश ने कई भूलें की हैं, यथा-किसी परिवारवाद के विरुद्ध अंध सम्मान रखकर वंशवाद को मुस्सलत कर लेना, अधम सत्ता को स्वीकार करना, संविधान के अपमान को चुपचाप सह लेना और अगली सरकारों पर ऐसी गलतियों को सुधारने का दबाव नहीं बनाना इत्यादि। ये प्रामाणिक भूलें थीं, किंतु इन्हें ढोते रहना तो राष्ट्र की नियति नहीं हो सकती। इसी प्रकार, मूल प्रस्तावना में परिवर्तन के चिह्न आज तक संविधान को बदरंग किए हुए हैं।  इन्हें बदलना ही चाहिए और इसके लिए स्पष्टीकरण, समरसता और वैश्विक दृष्टि जैसे अनर्गल तर्कस्वीकार नहीं किए जाने चाहिए।

राजनीतिक वर्ग को यह समझना होगा कि सांस्कृतिक-राष्ट्रीय अपमान के घाव व्यर्थ प्रपंचों के स्नेह लेप से नहीं भरे जाते। इच्छाशक्ति के साथ इस प्रामाणिक भूल का शमन कर संविधान की पवित्रता को लौटाना होगा।

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