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यह जंगल राज है

ममता बनर्जी लगातार जिस राजनीतिक ढीठता का प्रदर्शन करती आ रही हैं, उसका खामियाजा प्रदेश की जनता को क्यों भुगतना चाहिए?

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
May 2, 2023, 11:42 am IST
inसम्पादकीय, पश्चिम बंगाल

ममता बनर्जी की सरकार के गठन के बाद से ही पश्चिम बंगाल में हिंसा की, व्यापक और सामूहिक हिंसा की असंख्य घटनाएं घट चुकी हैं। यह मात्र एक उदाहरण है कि हावड़ा और दलखोला जिलों और पश्चिम बंगाल के अन्य हिस्सों में रामनवमी के दौरान की गई जिस हिंसा को ममता बनर्जी ने बाहरी लोगों द्वारा की गई हिंसा करार देकर उसका राजनीतिक औचित्य जताने की कोशिश की थी

पश्चिम बंगाल में कानून और व्यवस्था अब बहस-परिहास का विषय नहीं, बल्कि विद्रूपता का आख्यान है। वहां हिंसा को रोजमर्रा की सामान्य बात बना दिया गया है। ममता बनर्जी की सरकार के गठन के बाद से ही पश्चिम बंगाल में हिंसा की, व्यापक और सामूहिक हिंसा की असंख्य घटनाएं घट चुकी हैं। यह मात्र एक उदाहरण है कि हावड़ा और दलखोला जिलों और पश्चिम बंगाल के अन्य हिस्सों में रामनवमी के दौरान की गई जिस हिंसा को ममता बनर्जी ने बाहरी लोगों द्वारा की गई हिंसा करार देकर उसका राजनीतिक औचित्य जताने की कोशिश की थी, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने उस हिंसा की जांच राज्य पुलिस से छीन कर एनआईए को स्थानांतरित कर दी है। माने जो ममता बनर्जी के लिए कोई विषय नहीं था, वह अदालत की दृष्टि में कहीं न कहीं आतंकवाद से जुड़ा विषय हो सकता है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि राज्य सरकार की गंभीरता और हिंसा के प्रति उसका दृष्टिकोण क्या है।

एक अवयस्क बालिका अचानक गायब हो जाती है, कुछ दिनों बाद उसका शव मिलता है। पुलिस उस शव को घसीट कर ले जाती हुई वीडियो में नजर आती है। स्थानीय लोगों में रोष फैलता है। उसके कारण फिर नए सिरे से हिंसा होती है और फिर एक वीडियो स्वयं सत्तारूढ़ पार्टी के प्रवक्ता द्वारा ट्विटर पर जारी किया जाता है, जिसमें दर्शाया जाता है कि स्थानीय लोगों ने पुलिसकर्मियों को बंधक बना रखा है और उनके साथ मारपीट की जा रही है। प्रश्न उठता है कि सत्तारूढ़ दल के प्रवक्ता यह शिकायत किससे कर रहे थे? अगर वह यह शिकायत मीडिया से कर रहे थे, तो जाहिर तौर पर सत्तारूढ़ पार्टी को भी राज्य की सरकार पर या उसकी पुलिस पर या कानून-व्यवस्था पर विश्वास नहीं रह गया है।

कोरोना काल में ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में रात को कर्फ्यू लागू करने के केंद्र के आदेश को लागू करने से इनकार कर दिया था। जब प्रधान मंत्री ने कोरोना महामारी के समय देश के नागरिकों से रविवार को कर्फ्यू लगाने की अपील की, तो ममता बनर्जी ने उसी रविवार को स्कूलों में चावल और आलू बांटने का निर्देश जारी कर दिया। राज्यपाल का, केंद्र का, संविधान का, संघीय ढांचे का अपमान करने का प्रयास, एक भ्रष्ट अधिकारी के पक्ष में धरने पर बैठने का मामला – ममता बनर्जी ने अराजकता को ही अपनी राजनीतिक शैली बना रखा है।

यह विडंबना नहीं विद्रूपता है, और यह वही फसल है, जो बोई गई थी। राजनीतिक तौर पर खुद ममता बनर्जी नंदीग्राम की हिंसा की रक्तसिंचित राजनीति की उपज हैं, जिसके बाद उन्हें कम्युनिस्टों की हिंसा मशीनरी, कम्युनिस्ट पार्टियों का वोट बैंक और कम्युनिस्ट पार्टियों के तौर-तरीके सहज हस्तांतरित हो गए थे। ममता बनर्जी ने इसी अराजकता को अपनी राजनीति का तरीका बना रखा है। दो वर्ष पहले, चक्रवात यास के तुरंत बाद कलाईकुंडा में चक्रवात से पश्चिम बंगाल को हुए नुकसान का जायजा लेने के लिए पहुंचे प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान राज्य के मुख्य सचिव मुख्यमंत्री के साथ उपस्थित हुए और मुख्यमंत्री के साथ ही बैठक से उठकर चले गए। राज्य की नौकरशाही के प्रमुख ने देश के प्रधानमंत्री को चक्रवात के बाद की स्थिति का आधिकारिक विवरण देना आवश्यक नहीं समझा।

ममता बनर्जी सरकार ने उन्हें कार्यमुक्त नहीं किया। उसके एक वर्ष पहले टीएमसी सरकार के आदेश पर तीन आईपीएस अधिकारियों सहित पांच अधिकारियों ने गृह मंत्रालय के समन की अवहेलना की। ममता बनर्जी ने अनेक बार केंद्र सरकार के कई आदेशों-नियमों को मानने से इनकार किया है। कोरोना काल में ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में रात को कर्फ्यू लागू करने के केंद्र के आदेश को लागू करने से इनकार कर दिया था। जब प्रधान मंत्री ने कोरोना महामारी के समय देश के नागरिकों से रविवार को कर्फ्यू लगाने की अपील की, तो ममता बनर्जी ने उसी रविवार को स्कूलों में चावल और आलू बांटने का निर्देश जारी कर दिया। राज्यपाल का, केंद्र का, संविधान का, संघीय ढांचे का अपमान करने का प्रयास, एक भ्रष्ट अधिकारी के पक्ष में धरने पर बैठने का मामला – ममता बनर्जी ने अराजकता को ही अपनी राजनीतिक शैली बना रखा है।

प्रश्न यह है कि ममता बनर्जी लगातार जिस राजनीतिक ढीठता का प्रदर्शन करती आ रही हैं, उसका खामियाजा प्रदेश की जनता को क्यों भुगतना चाहिए? ममता सरकार की कारगुजारियां ऐसी हैं कि गत वर्ष बीरभूम जिले में हिंसा को लेकर ही राज्य में अनु. 355 के प्रयोग की आवश्यकता पर बहस चल गई थी। अगर कानून व्यवस्था की स्थिति सुधारातीत है, और राज्य सरकार उसके प्रति अनिच्छुक है, तो वह नागरिकों के लिए आंतरिक सुरक्षा का प्रश्न है। जब राज्य सरकार अपने नागरिकों को सुरक्षा नहीं दे सकती, जब राज्य सरकार खुद दंगाइयों की तरह व्यवहार करती हो, जब राज्य में प्रशासन और पुलिस अपनी मौलिक जिम्मेदारी भूल चुके हों, उस राज्य की जनता को भाग्य के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। भले ही राजनीतिक और संवैधानिक तौर पर केंद्र सरकार की हस्तक्षेप करने की मर्यादा हो, लेकिन इसका कोई ना कोई समाधान तो निकालना होगा।

@hiteshshankar

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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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