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‘उल्टी मूर्तियों को ठीक करे एएसआई’

दिल्ली के साकेत न्यायालय में कुतुब मीनार से जुड़े एक मामले की सुनवाई हुई। इसमें अदालत ने एक ऐसी टिप्पणी कर दी, जिससे जिहादियों के चेहरे लटक गए

Written byPanchjanyaPanchjanya
Apr 3, 2023, 05:51 pm IST
in दिल्ली

गत दिनों मार्च में दिल्ली के साकेत न्यायालय में कुतुब मीनार से जुड़े एक मामले की सुनवाई हुई। इसमें अदालत ने एक ऐसी टिप्पणी कर दी, जिससे जिहादियों के चेहरे लटक गए हैं। सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता हरिशंकर जैन ने कहा कि चूंकि कुतुब मीनार और कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद को 27 जैन मंदिरों को तोड़कर बनाया गया है इसलिए वहां हिंदुओं को पूजा का अधिकार मिलना चाहिए।

इस पर न्यायालय ने कहा कि, चलो मान लिया कि कुतुब मीनार परिसर में पहले मंदिर थे और उनको तोड़कर ही कुतुब मीनार बनाया गया है, लेकिन अब आप किस आधार पर याचिका दायर कर रहे हैं कि वहां हिंदुओं को पूजा का अधिकार मिले? न्यायाधीश महोदय ने यह भी पूछा कि क्या आप वर्तमान ढांचे को नष्ट करना चाहते हैं?

इस पर हरिशंकर जैन ने जवाब दिया कि हिंदू धर्म के अनुसार अगर एक बार किसी मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा कर दी जाती है तो वह सदैव मंदिर ही रहता है। भले ही मंदिर के ढांचे को ध्वस्त ही क्यों न कर दिया जाए? उन्होंने यह भी कहा कि वे यह बिल्कुल भी नहीं चाहते कि जो वर्तमान ढांचा है, उसे नष्ट कर दिया जाए, लेकिन परिसर के अंदर हिंदुओं को पूजा- पाठ का अधिकार दिया जाना चाहिए।

मूर्तियों की अपमानजनक स्थिति में होने पर न्यायाधीश द्वारा चिंता जताना भी हिंदुओं की एक बड़ी सफलता है। कुतुब मीनार जैसे मामलों में अधिकांश हिंदुओं को कोई रुचि नहीं है। इसके बाद भी हरिशंकर जैन जिस जबरदस्त तरीके से इस मामले को उठा रहे हैं, उसी का परिणाम है कि साकेत न्यायालय के न्यायाधीश को उपरोक्त टिप्पणी करनी पड़ी है।

विष्णु ध्वज ही आज की कुतुब मीनार

अनेक प्रमाण मिलते हैं कि आज जहां कुतुब मीनार है, वहां गणित और ज्योतिषीय ज्ञान व गणना के लिए नक्षत्रशाला का निर्माण किया गया था, जिसे ‘मेरु स्तंभ’ या ‘ध्रुव स्तंभ’ या ‘विष्णु स्तंभ’ कहा जाता है। इसी स्थान के साथ में 27 हिंदू और जैन मंदिरों तथा भगवान विष्णु के मंदिर का निर्माण नक्षत्रों के अध्ययन के लिए नक्षत्र देवताओं के साथ हुआ था। यह ‘मेरु स्तंभ’ देवताओं को समर्पित था। ‘मेरु स्तंभ’ पर 12वीं शताब्दी में कुतुबुद्दीन ऐबक ने कुरान की आयतें उत्कीर्ण करवा दीं। उसके बाद से इसे कुतुब मीनार कहा जाने लगा। बिहार विश्वविद्यालय के प्रो. डी. त्रिवेदी का दावा है कि विष्णु ध्वज ही आज की कुतुब मीनार है। इसका निर्माण सम्राट समुद्र गुप्त ने कराया था।

इस पर न्यायालय ने पूछा कि आखिर आपके पास इसका क्या आधार है कि मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा हुई थी? इसके उत्तर में हरिशंकर जैन ने कहा कि आज भी परिसर में लौह स्तंभ मौजूद है और इस पर श्लोक लिखे हुए हैं, जिनमें यह बताया गया है कि लौह स्तंभ विष्णु स्तंभ की पताका है। उन्होंने यह भी कहा कि यह काफी दुखद है कि परिसर में भगवान की मूर्तियां अपमानजनक स्थिति में लगी हुई हैं। इस पर अदालत ने कहा कि कम से कम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को मूर्तियों को ऐसी स्थिति में लाना चाहिए जिससे कि किसी की आस्था को ठेस न पहुंचे।

मूर्तियों की अपमानजनक स्थिति में होने पर न्यायाधीश द्वारा चिंता जताना भी हिंदुओं की एक बड़ी सफलता है। कुतुब मीनार जैसे मामलों में अधिकांश हिंदुओं को कोई रुचि नहीं है। इसके बाद भी हरिशंकर जैन जिस जबरदस्त तरीके से इस मामले को उठा रहे हैं, उसी का परिणाम है कि साकेत न्यायालय के न्यायाधीश को उपरोक्त टिप्पणी करनी पड़ी है। अब यह देखना होगा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण कब और कैसे मूर्तियों को ठीक स्थिति में लाता है।

Topics: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभागकुतुब मीनार परिसरकुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिदहिंदू धर्मHinduismQutub Minar ComplexArchaeological Survey of Indiaहिंदुओं को पूजा का अधिकारQuwwat-ul-Islam MosqueRight of Hindus to worship
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