सफूरा जरगर को दिल्ली दंगों में आरोपी पाया जाना और सुविधाजनक फेमिनिस्ट मौन
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सफूरा जरगर को दिल्ली दंगों में आरोपी पाया जाना और सुविधाजनक फेमिनिस्ट मौन

सफूरा जरगर का अपराध उनकी गर्भावस्था के चलते दब गया था और उनकी गर्भावस्था के आधार पर उन्हें निर्दोष ठहराने का एक अभियान ही जैसे चला दिया गया था

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Mar 29, 2023, 07:56 pm IST
in भारत, दिल्ली
हाई कोर्ट ने सफूरा जरगर पर आरोप तय करने के दिए निर्देश

हाई कोर्ट ने सफूरा जरगर पर आरोप तय करने के दिए निर्देश

सफूरा जरगर और शरजील इमाम को जामिया में हुई हिंसा के मामले में आरोपी पाया गया है। हाई कोर्ट ने आरोप तय करने के निर्देश दिए हैं। इनमें सफूरा जरगर का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह इसलिए क्योंकि सफूरा जरगर का अपराध उनकी गर्भावस्था के चलते दब गया था और उनकी गर्भावस्था के आधार पर उन्हें निर्दोष ठहराने का एक अभियान ही जैसे चला दिया गया था।

यह भी हैरान करने वाली बात है कि कैसे बहुत ही सुविधाजनक तरीके से सफूरा जरगर द्वारा बोले गए जहरीले बोल दबा दिए गए थे और जो लोग सफूरा की गर्भावस्था पर प्रश्न उठा रहे थे, उन्हें ही ऐसा दोषी ठहराया जा रहा था, जैसे उन्होंने अपराध किया है और सफूरा जरगर निर्दोष हैं।

प्रश्न यह उठता है कि क्या अपराध करते समय की स्थिति को देखा जाएगा या फिर बाद की स्थिति को? दिल्ली पुलिस ने जब उन्हें वर्ष 2020 में गिरफ्तार किया था, उस समय कहा गया था कि वह चार महीने की गर्भवती हैं। और शोर यही मचाया गया था कि एक गर्भवती छात्रा को हिरासत में लिया गया है। एक व्यक्तिगत शारीरिक स्थिति को उस अपराध पर हावी कर दिया था, जिसके चलते कई लोग हिंसा का शिकार हो गए थे। दिल्ली में जामिया में हिंसा भड़क उठी थी। सफूरा जरगर को फरवरी 2020 में दिल्ली में नागरिकता अधिनियम के विरोध में भड़की हिंसा के मामले में हिरासत में लिया गया था।

पुलिस के अनुसार सफूरा जरगर ने जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के पास हुए विरोध प्रदर्शन में भाग लिया था और उन्होंने लोगों को भड़काया था। उन पर दंगा भड़काने का आरोप लगाया गया था। जब उन्हें हिरासत में लिया गया था तो एक बहुत बड़ा वर्ग जिसमें सायमा, सबा नकवी और आरफा खानम शेरवानी तक सम्मिलित थीं, ने ऐसा प्रचार करना आरम्भ किया था जैसे एक उभरती हुई प्रतिभा को हिरासत में ले लिया गया है। सोशल मीडिया पर लोगों ने उनके पोस्ट्स के स्क्रीन शॉट्स साझा किए हैं, जिनमें ऐसा कहा जा रहा है जैसे कि किसी क्रांतिकारी को जबरन हिरासत में लिया गया है।

परन्तु क्या यही कारण था? एक प्रश्न यह भी उठता है कि क्या मात्र महिला होने के नाते सारे अपराध क्षमा हो जाने चाहिए? क्या उस हिंसा में फंसने वाले लोगों में कोई महिला नहीं थी, जो सफूरा जरगर के भड़काने के चलते फैली थी।

Liberals tried hard to show that Safoora is innocent, she's symbol of resistance.

Now Delhi High Court has framed charges against Safoora Zargar in Jamia Riots.

Why so much love for a Rioteer? pic.twitter.com/sTSouzI17J

— Ankur Singh (@AnkurSingh) March 28, 2023

 

कथित लिबरल मीडिया का सारा जोर इसी बात पर हो गया था कि एक गर्भवती लड़की को सरकार परेशान कर रही है एवं उनका जोर इस पर भी था कि एक हिंदूवादी सरकार एक गर्भवती मुस्लिम लड़की को परेशान कर रही है। एक पूरा का पूरा विमर्श ही बदलकर रख दिया था। सोशल मीडिया पर लेख लिखे जा रहे थे।

सरकार से यदि समस्या है तो शांतिपूर्वक प्रदर्शन जनता का अधिकार होता ही है, परन्तु लोगों को भड़काकर हिंसा करवाना? एवं जब क़ानून अपना कदम उठाए तो गर्भवती होने के विमर्श में फंसकर ही विमर्श की दिशा परिवर्तित कर देना? यह लिबरल मीडिया का भारत विरोधी बहुत ही घृणित कदम था, और भारत ही नहीं बल्कि मानवता विरोधी भी क्योंकि हिंसा मानवों के ही विरुद्ध थी।

सफूरा एमफिल कर रही थीं। परन्तु अब प्रश्न उठने ही चाहिए कि एमफिल या पीएचडी करने वाले विद्यार्थी जिनका उद्देश्य अपने चुने हुए विषय में और कुछ खोजना होता है, वह इस सीमा तक सरकार के विरोध में कैसे चले जाते हैं कि उन्हें उनके शैक्षणिक संस्थानों से ही निष्कासित कर दिया जाए और वह क़ानून के दोषी हो जाएं।

अभी तो सफूरा पर हाई कोर्ट ने आरोप तय करने के निर्देश दिए हैं। परन्तु वह शैक्षणिक संस्थान, जहां से वह अपनी पढ़ाई कर रही थीं अर्थात जामिया मिलिया इस्लामिया ने उनका प्रवेश तक अपने यहां प्रतिबंधित कर दिया है। सफूरा वहीं से एमफिल कर रही थीं, परन्तु समय से अपना शोधपत्र सम्मिलित न करने के कारण उनका एमफिल का प्रवेश अगस्त 2022 में रद्द कर दिया गया था। विश्वविद्यालय ने यह कहा था कि सफूरा अप्रासंगिक मामलों को भड़काकर वहां के माहौल को खराब करती हैं और इससे विश्वविद्यालय का माहौल बिगड़ता है। इसकारण उनका प्रवेश वहां नहीं हो सकता।

क्या इस मामले से यह भी समझा जा सकता है कि ऐसे युवा विद्यार्थियों का प्रयोग वह मीडिया अपने लाभ और एजेंडे के लिए प्रयोग करता है, जो वर्ष 2014 से ही मोदी सरकार को अस्थिर करने में लगा हुआ है। क्योंकि हाल ही में बीबीसी ने जो डॉक्यूमेंट्री बनाई थी, और जिसका उद्देश्य भारत सरकार को बदनाम करने के साथ ही भारत में अस्थिरता उत्पन्न करना था, उसमें भी सफूरा जरगर को दिखाया गया था और वह भी पीड़ित के रूप में!

https://twitter.com/vijaygajera/status/1640633636021239808

सफूरा जरगर पर आरोप तय होना, दरअसल उस विमर्श को उत्तर है जो बार-बार भारत जैसे देश को, जहां पर स्त्रियों को देवी मानकर पूजा जाता है, उसे “अल्पसंख्यक औरत” का दुश्मन घोषित कर रहा था। जहाँ पर गर्भावस्था के लिए संस्कार हैं, नए आने वाले जीवन का स्वागत करने के लिए तमाम अनुष्ठान किए जाते हैं, उस देश को अपने एजेंडे के लिए बदनाम किया जा रहा था।

प्रश्न यही है कि जो फेमिनिस्ट या लिबरल वर्ग सफूरा की गर्भावस्था को अपने घृणित एजेंडे के लिए आड़ बनाकर प्रयोग कर रहा था, वह हिंसा के पीड़ितों के लिए आवाज क्यों नहीं उठा सका? क्या उसमें महिलाएं नहीं रही होंगी? और अंत में यही प्रश्न कि भारत विरोधी एजेंडे को साबित करने के लिए यह वर्ग किस सीमा तक नीचे जा सकता है? कथित फेमिनिस्ट वर्ग द्वारा कितना मौन धरा जा सकता है?

Topics: सफूरा जरगर पर आरोप तयSafoora Zargar and Sharjeel ImamSafoora ZargarJamia violence and Safoora ZargarSafoora Zargar chargedसफूरा जरगरसफूरा जरगर और शरजील इमामजामिया हिंसा और सफूरा जरगर
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