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खास इतिहासकारों को क्यों है इतिहास से दिक्कत

इरफान हबीब का मामला तो और भी दिलचस्प है। वे स्वयं को मार्क्सवादी इतिहासकार बताते हैं। जिस व्यक्ति का वाद पहले से निर्धारित है, वह इतिहास के साथ निष्पक्ष या तटस्थ कैसे हो सकता है?

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Jan 24, 2023, 04:00 pm IST
in सम्पादकीय

पाञ्चजन्य के हीरक जयंती कार्यक्रम में, इतिहासकारों को आरिफ मोहम्मद खान पर गुस्सा क्यों आता है, इस प्रश्न पर केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि कुछ विचारधाराएं ऐसी हैं जहां बगैर दुश्मन पैदा किए वे जीवित नहीं रह सकते। इतिहास ऐसी चीज है जिसे कोई मिटा नहीं सकता। वह हो चुका है। आप उसे बदल नहीं सकते। उससे सीख सकते हैं। यहां स्मरणीय है कि तीन वर्ष पूर्व भारतीय इतिहास कांग्रेस के सम्मेलन में केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान के संबोधन के दौरान मार्क्सवादी इतिहासकार इरफान हबीब ने मंच पर चढ़ कर उन्हें बोलने से रोकने की कोशिश की थी।

इतिहासकारों का यह खेमा इतिहास को अपनी विचारधारा के अनुसार परिभाषित करना और इसके लिए इतिहास को तोड़ना- मरोड़ना चाहता है। पाञ्चजन्य स्थापना दिवस कार्यक्रम से ठीक एक दिन पहले इन कथित इतिहासकारों का दिल्ली में जमावड़ा हुआ। इसमें उन्होंने हमारा इतिहास, उनका इतिहास, किसका इतिहास यह मंच सजाया था।

दरअसल ये ऐसे इतिहासकार हैं जिन्हें उस इतिहास से दिक्कत है जो इनकी विचारधारा के खांचे में फिट नहीं बैठता। राष्ट्रप्रेम इस देश के इतिहास का अभिन्न भाग है। बलिदानों की अनूठी गाथाएं हैं, किंतु चूंकि राष्ट्र का विचार इनकी आयातित विचारधारा के निशाने पर है इसलिए इतिहास में राष्ट्रभाव से भी भारी दिक्कत है।

यह जानना दिलचस्प है कि खुद इन इतिहासकारों का इतिहास क्या है!
इनमें दो कथित इतिहासकार-रोमिला थापर और इरफान हबीब आमतौर पर ज्यादा चर्चा में रहते हैं। रोमिला थापर का नेहरू परिवार से भी रिश्ता है। इतिहासकार के तौर पर उनकी प्रामाणिकता आप इस बात से समझ सकते हैं कि हाल में उन्होंने युधिष्ठिर और अशोक को जैसे समकालीन या कहिये, उलटे क्रम में उल्लिखित किया था।

इन्हें युधिष्ठिर के कामों पर बौद्ध धर्म की छाप दिखाई देती है। रोमिला थापर ने यह बात 2010 में इंटरनेशनल डेवलपमेंट रिसर्च सेंटर (आईडीआरसी) के अध्यक्ष डेविड एम. मैलोन से बातचीत के दौरान कही थी। यह ऐसी मूर्खतापूर्ण बात थी मानो कोई कहे कि पूर्वजों ने वंशजों से प्रेरणा ली। समय-समय पर अपने अज्ञान का भोंडा प्रदर्शन करने वाले ये इतिहासकार यह तथ्य मांगने पर बगलें झांकने लगते हैं, यही नहीं अपनी सही पहचान भी छुपाते हैं। एक राजनीतिक दल के परिवार के व्यक्तियों से जुड़ाव, जानकारी का अभाव यह सब बारीकी से रचे गए महिमामंडन के खेल में उजागर नहीं किया जाता।

कुछ वर्ष पूर्व जब थापर जेएनयू की एमेरिटस प्रोफेसर बनी थीं तो जब उनसे जीवन वृत्त मांगा गया तो उन्होंने नहीं दिया। विडंबना यह कि विचारधारा के आधार पर इतिहासकार बने ये लोग बाकी इतिहासकारों को कथित इतिहासकार ठहराते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि ये एक नेटवर्क के जरिए थोपे हुए इतिहासकार हैं। इन थोपे हुए इतिहासकारों के सच की बानगी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आम्बेकर का साक्षात्कार लेते समय न्यूज लॉन्ड्री की प्रधान संपादक मधु त्रेहान के वक्तव्य से भी मिलती है। मधु त्रेहान ने इस साक्षात्कार में साफ-साफ कहा-‘इंदिरा गांधी ने जेएनयू शुरू क्यों किया था? क्योंकि कम्युनिस्ट उनका सिर खा रहे थे, उनके पीछे पड़े हुए थे। उन्होंने सोचा कि इनको व्यस्त रखो और जेएनयू शुरू किया। सारे कम्युनिस्टों को वहां नौकरी दे दी। कम्युनिस्ट वहां काम करने लगे, व्यस्त हो गए, बढ़िया वेतन ले रहे थे। आपने उन्हें डिस्टर्ब क्यों कर दिया?’

रोमिला के भाई रोमेश थापर भारतीय पत्रकार थे, राजनीतिक टिप्पणीकार थे। और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से संबद्ध थे। कम्युनिस्ट पत्रिका सेमिनार के संस्थापक संपादक थे। दोनों भाई-बहन की जड़ें मार्क्सवाद में थीं। दिल्ली में हुए ताजा जमावड़े में भी सीताराम येचुरी की उपस्थिति बता रही थी कि इन सबको पीछे से कौन चला रहा है। इरफान हबीब का मामला तो और भी दिलचस्प है। वे स्वयं को मार्क्सवादी इतिहासकार बताते हैं। जिस व्यक्ति का वाद पहले से निर्धारित है, वह इतिहास के साथ निष्पक्ष या तटस्थ कैसे हो सकता है?

प्रश्न है कि क्या इतिहास को पढ़ाने के बजाय क्रूर विचारधारा की कठपुतलियों के आगे कत्ल होने के लिए छोड़ देना चाहिए?
तो क्या सनकी, क्रूर, अय्याश तानाशाहों का इतिहास भारतीय जनता के सामने कभी आना ही नहीं चाहिए? क्या अप्रिय तथ्य इतिहास से इसलिए बाहर कर दिए जाएंगे कि इससे आक्रोश पैदा होगा?

तो क्या पढ़ाने से पहले ही यह धारणा बनाकर कि इससे लोग भड़केंगे, इतिहास की कब्र खोद दी जाए? वास्तव में ये इतिहासकार नहीं, कब्र खोदने वाले हैं। ये ऐतिहासिक तथ्यों को दफनाने का काम करते हैं।

इतिहास घटित होता है, घटनाओं से सबक सीखे जाते हैं। मगर कुछ लोग राजनीतिक तौर पर, भारत की आयातित विचारधारा के तौर पर, इतिहास को निर्देशित करने की कोशिश कर रहे हैं। ये इतिहासकार के तौर पर भारत के साथ षड्यंत्र के औजार हैं। ये इतिहासकार नहीं हैं, भारतीय जनमानस पर एक खास विचारधारा थोपने की मशीनें हैं, इन्हें इसी नजर से देखा जाना चाहिए।

@hiteshshankar

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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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