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करगिल के महान योद्धा मेजर राजेश अधिकारी, जिन्होंने गोली लगने के बाद भी जारी रखी जंग, तोलोलिंग जीतने के बाद हुए बलिदान

राजेश अधिकारी कारगिल युद्ध में मातृभूमि की रक्षार्थ बलिदान होने वाले भारतीय सेना के दूसरे सैन्य अधिकारी थे। बलिदान के 13 दिन बाद युद्धक्षेत्र से उनका पार्थिव शरीर बरामद हुआ था

Written byउत्तराखंड ब्यूरोउत्तराखंड ब्यूरो
Dec 26, 2022, 12:27 pm IST
in उत्तराखंड
राजेश अधिकारी (फाइल फोटो)

राजेश अधिकारी (फाइल फोटो)

उत्तराखण्ड की पवित्र, पावन भूमि एक ओर धार्मिक, आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक अनुष्ठान स्थली रही है। वहीं, यह देवभूमि अनेक वीर एवं वीरांगनाओं की जन्म स्थली भी रही है। देवभूमि उत्तराखण्ड के लाट सुबेदार बलभद्र सिंह नेगी, विक्टोरिया क्रास विजेता सुबेदार दरबान सिंह, विक्टोरिया क्रास विजेता रायफलमैन गब्बर सिंह रावत, कर्नल बुद्धीसिंह रावत, मेजर हर्षवर्धन बहुगुणा आदि जैसे नाम सदा अमर रहेंगे। ऐसे बहादुरों की वीरता से परिपूर्ण इतिहास हमारे लिए बेहद गर्व का विषय है। इनके अदम्य साहस, शौर्य एवं वीरता ने उत्तराखण्ड का नाम ऊंचा किया है। इस ऐतिहासिक कड़ी में एक अमूल्य हीरा मेजर राजेश अधिकारी हैं, जिनकी नेतृत्व क्षमता पर भारतीय सेना भी गौरवान्वित महसूस करती है। मेजर राजेश अधिकारी को भारत-पाकिस्तान युद्ध में असाधारण वीरता व उत्कृष्ट नेतृत्व का प्रदर्शन करने पर भारतीय सेना में वीरता का सर्वोच्च सैनिक सम्मान महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था।

राजेश सिंह अधिकारी का जन्म 25 दिसंबर सन 1970 को उत्तराखण्ड के नैनीताल में हुआ था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा सेंट जोसेफ़ कॉलेज, माध्यमिक शिक्षा गवर्मेंट इंटर कॉलेज नैनीताल से हुई थी। बीएससी की शिक्षा उन्होंने कुमाऊं यूनिवर्सिटी नैनीताल से प्राप्त की थी। बाल्यकाल से ही सेना के प्रति राजेश का जो जब्जा था वो उन्हें प्रतिष्ठित भारतीय सैन्य अकादमी में ले आया था। 11 दिसंबर सन 1993 को मेजर राजेश सिंह अधिकारी भारतीय सैन्य अकादमी से ग्रेनेडियर में कमिशन हुए थे। सन 1999 में भारत–पाकिस्तान के मध्य कारगिल में युद्ध का दौर शुरू हो गया था। कारगिल युद्ध में मेजर राजेश अधिकारी को कारगिल ऑपरेशन के लिए भेजा गया था। कारगिल आपरेशन के लिए 18 ग्रिनेडियर से मेजर राजेश अधिकारी अपनी कंपनी की अगुआई कर रहे थे। 30 मई सन 1999 को टोलोलिंग क्षेत्र पर कब्जा करने के लिए बटालियन ऑपरेशन के एक हिस्से के रूप में मेजर राजेश सिंह अधिकारी को इसके आगे की ओर जहां दुश्मन एक मजबूत स्थिति में था, वहां पर कब्जा करके प्रारंभिक पैर जमाने को सुरक्षित करने का काम सौंपा गया था।

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दुश्मन की स्थिति लगभग 15,000 फीट की ऊंचाई पर बर्फ से ढके दुर्गम पहाड़ी इलाके में स्थित थी। जब मेजर अधिकारी अपनी कंपनी को उद्देश्य की ओर ले जा रहे थे, तो उन्हें यूनिवर्सल मशीनगनों के साथ दुश्मन के दो परस्पर सहायक ठिकानों से दागा गया। अधिकारी ने तुरंत रॉकेट लांचर टुकड़ी को दुश्मन की स्थिति को घेरने का निर्देश दिया और करीब क्वॉर्टर मुकाबले में दुश्मन के दो सैनिकों को मार गिराया। इसके बाद अधिकारी ने भारी गोलाबारी के बीच सूझबूझ का परिचय देते हुए अपनी मध्यम मशीनगन टुकड़ी को एक चट्टानी हिस्से के पीछे स्थिति लेने और दुश्मन को घेरने का आदेश दिया। हमला करने वाली पार्टी ने अपना रास्ता बढ़ाना जारी रखा। इस तरह आगे बढ़ते हुए मेजर अधिकारी को गोली लगने से गंभीर चोटें आईं, फिर भी उन्होंने अपनी सब-यूनिट को निर्देशित करना जारी रखा। खाली होने से इनकार करते हुए, उन्होंने दूसरी दुश्मन स्थिति पर हमला किया और एक और कब्जेदार को मार डाला। इस प्रकार तोलोलिंग में दूसरी स्थिति पर कब्जा कर लिया, जिसने बाद में प्वाइंट 4590 पर कब्जा कर लिया। अंतत: उन्होंने देश की आन, बान, शान के लिए मातृभूमि की रक्षार्थ अपना सर्वोच्च बलिदान किया था।

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कारगिल युद्ध में मातृभूमि की रक्षार्थ बलिदान होने वाले भारतीय सेना के वह दूसरे सैन्य अधिकारी थे। सर्वोच्च बलिदान से उनका पार्थिव शरीर 13 दिनों के बाद युद्धक्षेत्र से बरामद हुआ था। उनकी सैन्य वर्दी की जेब में पत्नी के तरफ से लिखी गई एक चिट्ठी मिली थी, जिसे उन्होंने पढ़ी भी नहीं थी। मेजर राजेश सिंह अधिकारी ने भारतीय सेना की सर्वोच्च परंपराओं को कायम रखते हुए दुश्मन की भयंकर उपस्थिति में असाधारण वीरता व उत्कृष्ट नेतृत्व का प्रदर्शन किया था, जिसके लिए उन्हें मरणोपरांत भारतीय सेना का द्वितीय सर्वोच्च सम्मान महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था।

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