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आसान नहीं होगी खड़गे की राह

कांग्रेस शासित दोनों प्रदेशों के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और भूपेश बघेल भी कार्यक्रम में मौजूद थे। प्रियंका गांधी भी। पार्टी के रणनीतिकार इसे पुनरोदय की घड़ी मानते हैं।

Written byप्रमोद जोशीप्रमोद जोशी
Oct 31, 2022, 03:53 pm IST
in भारत, विश्लेषण, मत अभिमत
मल्लिकार्जुन खड़गे

मल्लिकार्जुन खड़गे

पर्यवेक्षकों का कहना है कि खड़गे के सिर पर अब काँटों का ताज है। जिम्मेदारियों का टोकरा उनके सिर पर होगा। विफलताएं उनकी और श्रेय लेने के अवसर किसी और के। हार मिली, तो उनकी और सफलता मिली, तो श्रेय ‘भारत जोड़ो यात्रा’ का। कांग्रेस में गैर-गांधी अध्यक्ष खुद कब तक चलेगा?

अंततः कांग्रेस को करीब 24 साल बाद गैर-गांधी पार्टी अध्यक्ष मिल गया। 26 अक्तूबर को मल्लिकार्जुन खड़गे ने कार्यभार संभाल लिया। सोनिया गांधी के लावा इस मौके पर राहुल गांधी भी उपस्थित थे, जो अपनी ‘भारत जोड़ो यात्रा’ को कुछ समय के लिए छोड़कर इस कार्यक्रम में हिस्सा लेने दिल्ली आए। 7 सितंबर से ‘भारत जोड़ो यात्रा’ में शामिल होने के बाद राहुल गांधी पहली बार दिल्ली में कांग्रेस के किसी कार्यक्रम में शामिल हुए थे। 27 अक्तूबर से वे फिर से यात्रा में शामिल हो गए। यात्रा इन दिनों तेलंगाना में है।

कांग्रेस शासित दोनों प्रदेशों के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और भूपेश बघेल भी कार्यक्रम में मौजूद थे। प्रियंका गांधी भी। पार्टी के रणनीतिकार इसे पुनरोदय की घड़ी मानते हैं। कुछ पर्यवेक्षक मानते हैं कि अध्यक्ष के चुनाव के बहाने पार्टी के भीतर ही नहीं, दूसरे दलों पर भी आंतरिक-लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का प्रवेश होगा।

जिम्मेदारियों का टोकरा

दूसरी तरफ कुछ पर्यवेक्षकों का कहना है कि खड़गे के सिर पर अब काँटों का ताज है। जिम्मेदारियों का टोकरा उनके सिर पर होगा। विफलताएं उनकी और श्रेय लेने के अवसर किसी और के। हार मिली, तो उनकी और सफलता मिली, तो श्रेय ‘भारत जोड़ो यात्रा’ का। कांग्रेस में गैर-गांधी अध्यक्ष खुद कब तक चलेगा?  पीवी नरसिंहराव और सीताराम केसरी को कितनों ने स्वीकार किया? नरसिंहराव ने परिवार को हाशिए पर रखा था, पर उनके हटने के बाद जो हुआ, उससे भी हम परिचित हैं।

बात केवल अध्यक्ष के पदस्थापित होने तक की नहीं है। सवाल है कि पार्टी के भीतर वैचारिक और संगठनात्मक सुधारों की क्या कोई योजना है? इस बात से किसी ने कभी इनकार नहीं किया कि गांधी परिवार की केंद्रीय-भूमिका पार्टी में फिर भी रहेगी। पर कितनी और किस रूप में, यह अब स्पष्ट होगा। जिस मशीनरी की परिकल्पना की जा रही है, उसकी कोई नज़ीर अतीत में नहीं है। उसे नया गढ़ना होगा।

राजस्थान में अशोक गहलोत प्रकरण अभी अनसुलझा है। भले ही खड़गे पार्टी अध्यक्ष हैं, पर कम से कम इस मामले में परिवार की सलाह काम करेगी। ऐसा ही छत्तीसगढ़ में नेतृत्व के सवाल पर होगा। काफी दिक्कतें आंतरिक राजनीति को लेकर ही है। पंजाब में जो कुछ भी हुआ, वह किसकी देन था?  बहरहाल जिन समस्याओं का समाधान गांधी परिवार नहीं कर पाया, तो क्या खड़गे उन्हें निपटा देंगे?

कितनी छूट मिलेगी?

इसमें दो राय नहीं कि वे सौम्य और अनुभवी नेता हैं। सबको साथ रखने का कौशल भी उनके पास है, पर क्या इतने अधिकार उनके पास होंगे कि वे कड़े फैसले कर सकें? आम कार्यकर्ता को सोनिया या राहुल गांधी की तुलना में उनके दरवाजे आसानी से खुले मिलेंगे। पर क्या वे इतने समर्थ होंगे कि पार्टी की इमेज को पूरी तरह बदल दें?

इस बात का इंतजार करना होगा कि पार्टी में सत्ता के दो केंद्र बनेंगे या नहीं। गांधी परिवार ‘बैक सीट ड्राइविंग’ करेगा या नहीं। राहुल गांधी ने हाल में कहा है कि पार्टी अध्यक्ष ही सुप्रीम होगा। यह कहना आसान है, पर इसे सुनिश्चित भी करना होगा। इसकी जिम्मेदारी परिवार पर ही है।

शरद ऋतु की हवाओं के साथ कार्यकर्ताओं में जोश है। यह जोश कितना स्थायी है, यह भी प्रकट होने की घड़ी है। बाहर वालों को कुछ संशय हैं। एक यह कि वास्तविक शक्ति केंद्र कहाँ है? कौन हाईकमान है और कौन उसका द्वारपाल? खासतौर से व्यक्तिगत-विवादों को सुलझाने की प्रक्रिया क्या होगी? चुनावों में टिकट-वितरण की मशीनरी क्या होगी वगैरह? बहरहाल काफी बातें खड़गे साहब के व्यक्तिगत कौशल पर निर्भर करेंगी। संगठनात्मक-सुधार उनकी जिम्मेदारी है। यह आसान काम नहीं है।

घटता जनाधार

उन्हें कांग्रेस की बागडोर ऐसे मौके पर मिली है, जब पार्टी अपने जीवन के सबसे कमज़ोर स्तर पर है। 1998 में जब सोनिया गांधी ने कमान संभाली थी, तब पार्टी की तीन राज्यों में सरकार थी और उसके 141 सदस्य लोकसभा में थे। आज उससे कहीं ज्यादा खराब स्थिति है। उनकी प्रतिस्पर्धा जिस पार्टी से है, उसकी ताकत कहीं ज्यादा है। केवल भारतीय जनता पार्टी ही नहीं उसके जनाधार पर आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियाँ कब्जा करती जा रही हैं।

आंतरिक राजनीति के दृष्टिकोण से पहली चुनौती राजस्थान की है, जहाँ सत्ता-परिवर्तन होने या नहीं होने के अलग-अलग अर्थ हैं। पर ज्यादा बड़ी परीक्षा कांग्रेस कार्यसमिति के गठन को लेकर है। कार्यसमिति के 25 में से 12 सदस्य चुनाव के रास्ते से आने चाहिए। आंतरिक-लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का तकाज़ा है कि चुनाव हों, पर व्यावहारिक राजनीति कहती है कि यह तलवार की धार पर चलने जैसा काम है।

यूपीए को क्या वे मुख्य विरोधी गठबंधन बनाने में कामयाब होंगे? ज्यादा बड़ा सवाल है कि कांग्रेस इस एकता की धुरी में होगी या परिधि में? विफलताओं के बावजूद कांग्रेस के पास राष्ट्रीय स्तर पर संगठन है, जो उसकी ताकत है। पर क्या विरोधी-नेता कांग्रेस के वर्चस्व को स्वीकार करेंगे? या फिर ममता बनर्जी, एमके स्टालिन, नीतीश कुमार, शरद पवार, उद्धव ठाकरे और अखिलेश यादव में से किसी एक को क्या यूपीए का नेता बनाया जा सकता है?  खड़गे को इन नेताओं के साथ पटरी बैठानी होगी।

संगठनात्मक सुधार

खड़गे ने यह भी कहा है कि उदयपुर घोषणा का पालन करते हुए पार्टी के 50 फीसदी पद 50 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों को दिए जाएंगे। अगले डेढ़-दो महीनों में गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव-परिणाम भी आ जाएंगे। खड़गे ने कार्यभार संभालते हुए पहली बात इन चुनावों को लेकर ही कही है।

खड़गे को बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में संगठन को खड़ा करना होगा, जहाँ पार्टी का तकरीबन सफाया हो चुका है। इस समय उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी प्रियंका गांधी के पास है। क्या यह व्यवस्था जारी रहेगी, या बदलेगी? राज्यों पर निगरानी रखने के लिए खड़गे या तो कुछ उपाध्यक्षों की नियुक्ति करेंगे, या कोई मशीनरी बनाएंगे।

चुनाव-चुनौती

खड़गे के पास समय भी कम है। 2024 के लोकसभा चुनाव को अब सिर पर ही मानिए। लोकसभा चुनाव के पहले 11 राज्यों के और उसके फौरन बाद के चुनावों को भी जोड़ लें, तो कुल 18 विधानसभाओं के चुनाव होने हैं। इनमें हिमाचल प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, झारखंड, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे महत्वपूर्ण राज्य शामिल हैं। हिमाचल और गुजरात के चुनाव तो सामने खड़े हैं और फिर 2023 में उनके गृह राज्य कर्नाटक के चुनाव हैं। अगले साल फरवरी-मार्च में त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड के चुनाव हैं, मई में कर्नाटक के और नवंबर-दिसंबर में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मिजोरम और तेलंगाना के।

उत्तर में कांग्रेस की दशा खराब है। वहाँ के लिए सफल रणनीति तैयार करने की चुनौती सबसे बड़ी है। उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में उन्हें किसी न किसी पार्टी के साथ गठबंधन करना होगा। राष्ट्रीय स्तर पर भी विरोधी दलों के गठबंधन की बात चल रही है। इससे जुड़ी रणनीति भी एक बड़ी चुनौती होगी।

यूपीए को क्या वे मुख्य विरोधी गठबंधन बनाने में कामयाब होंगे? ज्यादा बड़ा सवाल है कि कांग्रेस इस एकता की धुरी में होगी या परिधि में? विफलताओं के बावजूद कांग्रेस के पास राष्ट्रीय स्तर पर संगठन है, जो उसकी ताकत है। पर क्या विरोधी-नेता कांग्रेस के वर्चस्व को स्वीकार करेंगे? या फिर ममता बनर्जी, एमके स्टालिन, नीतीश कुमार, शरद पवार, उद्धव ठाकरे और अखिलेश यादव में से किसी एक को क्या यूपीए का नेता बनाया जा सकता है?  खड़गे को इन नेताओं के साथ पटरी बैठानी होगी।

Topics: कांग्रेस की बागडोरएमके स्टालिनउद्धव ठाकरे और अखिलेशगैर-गांधी पार्टी अध्यक्षशरद पवारमल्लिकार्जुन खड़गेममता बनर्जीसोनिया गांधीनीतीश कुमार
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