छद्म बौद्धवाद की आड़ में राजनीतिक लाभ का खेल
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छद्म बौद्धवाद की आड़ में राजनीतिक लाभ का खेल

भगवान बुद्ध एक सनातनी परिवार में जन्मे हिन्दू थे, एक पक्षी का शिकार उनके भाई के द्वारा करने से उनका ह्रदय द्रवित हो गया एवं वैराग्य उत्पन्न हुआ

Written byगोपाल गोस्वामीगोपाल गोस्वामी
Oct 15, 2022, 04:19 pm IST
inभारत
शपथ लेते राजेंद्र पाल गौतम (फाइल फोटो)

शपथ लेते राजेंद्र पाल गौतम (फाइल फोटो)

आम आदमी पार्टी के विधायक राजेंद्र पाल गौतम  द्वारा दिल्ली के एक कार्यक्रम में हजारों सनातनियों का बौद्ध पंथ में परिवर्तन कराने का एक वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में रहा, जिसमें वह हिन्दू धर्म की आस्थाओं का अपमान करते व उन्हें त्याग देने की प्रतिज्ञा दिलवा रहे हैंकम्युनिस्टों द्वारा छद्म रूप से एक नई कौम का निर्माण करने के प्रयत्न एक सदी से चलता आ रहा है। उनके इन कुप्रयासों से एक नई जाति का निर्माण हो रहा है, जो न तो हिन्दू हैं न ही बौद्ध। गौतम द्वारा जो प्रतिज्ञाएं दिलवाई जा रही थीं, उनका बुद्ध के संदेशों से कहीं का लेना-देना नहीं है। उनका आशय इस्लामी व ईसाई ताकतों से धन प्राप्त कर उनके लिए संरक्षण देने वाली कुछ राजनीतिक पार्टियों का जनाधार तैयार करना मात्र ही है।

भगवान बुद्ध एक सनातनी परिवार में जन्मे हिन्दू थे, एक पक्षी का शिकार उनके भाई के द्वारा करने से उनका ह्रदय द्रवित हो गया एवं वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने विलासिता छोड़ सादगी पूर्ण जीवन बिताने का निश्चय किया व सन्यासी हो गए। उनके द्वारा प्रतिपादित सबसे महत्वपूर्ण सन्देश था अहिंसा। बुद्ध ने किसी भी प्रकार की हिंसा को वर्जित किया, परन्तु आज कथित बौद्ध मांस भक्षण करते हैं। यहीं से यह ध्यान में आता है कि वे लोग बुद्ध की शिक्षाओं के कितने समीप हैं।

इन तथाकथित बौद्धों ने एक सूची बनाई है, जिसकी प्रतिज्ञा वे कन्वर्ज से पहले दिलवाते हैं, जैसा गौतम कर रहे थे। आइये इन प्रतिज्ञाओं की पड़ताल करते हैं कि वे स्वयं इसका कितना पालन करते हैं तथा वे जिनको कोसते हैं उनके द्वारा इनका कितना पालन होता है। उन्होंने इन 22 प्रतिज्ञाओं को निर्धारित किया है और ये प्रतिज्ञाएं हिंदू मान्यताओं और पद्धतियों की जड़ों पर गहरा आघात करती हैं।

1. मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई विश्वास नहीं करूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा.

सनातन हिन्दू धर्म में किसी भी भगवान को पूजने या किसी को भी नहीं पूजने की स्वतंत्रता है अतः इस प्रतिज्ञा का कोई औचित्य नहीं रह जाता, न ही बुद्ध ने ऐसा करने की किसी शिक्षा का कोई उल्लेख मिलता है।

2. मैं राम और कृष्ण, जो भगवान के अवतार माने जाते हैं, में कोई आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा.

उपरोक्त की भांति मानना या न मानने की कोई बाध्यता नहीं है आप नास्तिक होकर भी हिन्दू रह सकते हैं.

3. मैं गौरी, गणपति और हिन्दुओं के अन्य देवी-देवताओं में आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा.

आस्था यह नितांत व्यक्तिगत विषय है, पूजा करना या नहीं करना भी व्यक्तिगत विषय है, ऐसे असंख्य हिन्दू हैं जो किसी भी देवता की पूजा नहीं करते परन्तु हिन्दू हैं, अतः यह प्रतिज्ञा क्या सिद्ध करती है यह समझ के बाहर है.

4. मैं भगवान के अवतार में विश्वास नहीं करता हूँ.

यदि आपकी भगवान में आस्था ही नहीं है तो अवतार में विश्वास हो या नहीं उससे क्या अंतर पड़ता है अतः यह प्रतिज्ञा भी औचित्यहीन है.

5. मैं यह नहीं मानता और न कभी मानूंगा कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे. मैं इसे पागलपन और झूठा प्रचार-प्रसार मानता हूँ.

भगवन बुद्ध, भगवान् विष्णु के अवतार थे यह हिन्दुओं की मान्यता है, आप इसे नहीं मानते तो हिन्दुओं ने तो कभी इसको आपका पागलपन नहीं कहा तो आप क्यों कहते हैं यह समझ के परे है.

6. मैं श्रद्धा (श्राद्ध) में भाग नहीं लूँगा और न ही पिंड-दान दूंगा.

श्राद्ध व पिंडदान आप अपने पितरों के सम्मान में करते हैं, इसे किसी ब्राह्मण के द्वारा कर्मकांड कर ही संपन्न किया जा सकता है ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है, करना या नहीं करना यह नितांत व्यक्तिगत है.

7. मैं बुद्ध के सिद्धांतों और उपदेशों का उल्लंघन करने वाले तरीके से कार्य नहीं करूँगा.

यह अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतिज्ञा है जो क्रम 9 व 10 का स्वतः उल्लंघन है

8. मैं ब्राह्मणों द्वारा निष्पादित होने वाले किसी भी समारोह को स्वीकार नहीं करूँगा.

समारोह में जाना या नहीं जाना व्यक्तिगत निर्णय है.

9. मैं मनुष्य की समानता में विश्वास करता हूँ.

यह इसी सूची में ऊपर आये क्रमों के एकदम उलट है.

10. मैं समानता स्थापित करने का प्रयास करूँगा.

एक बड़े वर्ग के विरोध में प्रतिज्ञा दिलवा कर कहां की समानता आएगी?

11. मैं बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग का अनुसरण करूँगा.

यह मैं आप सभी पाठकों पर छोड़ता हूँ कि इसका अवलोकन आप स्वयं करें .

12. मैं बुद्ध द्वारा निर्धारित परमितों का पालन करूँगा.

इसको भी मैं पाठकों के विवेक पर छोड़ता हूँ.

13. मैं सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया और प्यार भरी दयालु रहूंगा तथा उनकी रक्षा करूँगा.

सारे दलित एक्टिविस्ट गौमांस भक्षण के पक्ष में खड़े रहते हैं अन्य जीवों की तो बात ही क्या करें, अतः इसका भी विवेक पाठकों पर.

14. मैं चोरी नहीं करूँगा.

चोरी नहीं करना सनातन हिन्दू धर्म के मूल उपदेश ही है.

15. मैं झूठ नहीं बोलूँगा.

यह सनातन हिन्दू धर्म का मूल मंत्र है

16. मैं कामुक पापों को नहीं करूँगा.

प्रत्येक ब्राह्मण यह उपदेश करता है व इसका स्वयं पालन करता है.

17. मैं शराब, ड्रग्स जैसे मादक पदार्थों का सेवन नहीं करूँगा.

यह प्रतिज्ञा सभी को लेने के लिए कही जाती है, चाहे किसी भी जाति-धर्म का हो व कर्मकांडी इसका स्वयं पालन भी करते हैं.

18. मैं महान आष्टांगिक मार्ग के पालन का प्रयास करूँगा एवं सहानुभूति और अपने दैनिक जीवन में दयालु रहने का अभ्यास करूँगा.

अष्टांग मार्ग का पालन प्रत्येक हिन्दू करने का प्रयत्न तो करता है परन्तु कितना कर पाता है वो अलग विषय है, कितने बौद्ध इसका पालन करते हैं यह चर्चा का विषय हो सकता है.

19. मैं हिंदू धर्म का त्याग करता हूँ जो मानवता के लिए हानिकारक है और उन्नति और मानवता के विकास में बाधक है क्योंकि यह असमानता पर आधारित है, और स्व-धर्मं के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाता हूँ.

धर्म का त्याग करना या पालन करना यदि किसी लोभ लालच, छल या प्रपंच के बिना हो तो ठीक है, परन्तु पूरा संसार आज इस बात को मानता है कि यदि संसार में शांति स्थापित करनी है तो सनातन शिक्षाएं एकमात्र उपाय हैं, यूरोप के कई देश हिन्दू हो रहे है, अतः इन प्रपंच में आ रहे हिन्दुओं को इस पर विचार कर ही कदम उठाना चाहिए। स्वतंत्रता के बाद से अब तक हजारों लोगों ने बौद्ध पंथ अपनाया है उनकी कितनी उन्नति हुई इसका आंकलन हो तो अच्छा है.

20. मैं दृढ़ता के साथ यह विश्वास करता हूँ की बुद्ध का धम्म ही सच्चा धर्म है.

हिन्दुओं में असंख्य लोग बुद्ध धर्म की शिक्षाओं को मानते है व बुद्ध को भगवान् विष्णु का अवतार मानते हैं अतः उनका बताया धर्म भी सनातन का अविभाज्य अंग है.

21. मुझे विश्वास है कि मैं (इस धर्म परिवर्तन के द्वारा) फिर से जन्म ले रहा हूँ.

एक ओर आप अवतार में विश्वास नहीं होने की प्रतिज्ञा दिलवा रहे हैं व यहीं पर पुनर्जन्म जो सनातन हिन्दू धर्म की प्रधान मान्यता है उसी की शपथ दिलवा रहे हैं.

22. मैं गंभीरता एवं दृढ़ता के साथ घोषित करता हूँ कि मैं इसके (धर्म परिवर्तन के) बाद अपने जीवन का बुद्ध के सिद्धांतों व शिक्षाओं एवं उनके धम्म के अनुसार मार्गदर्शन करूँगा .

यदि गौर करेंगे तो पाएंगे कि बुद्ध, महावीर, नानक की शिक्षाएं देश काल व स्थिति के अनुरूप सनातन वेदों व अन्य हिन्दू ग्रंथों व मान्यताओं की ही बढ़ोतरी है. उपरोक्त प्रतिज्ञाएं शत-प्रतिशत हमारी मान्यताओं का ही प्रतिरूप हैं, आठ सौ वर्षों की विधर्मियों की गुलामी ने उसमे कुरीतियों को आश्रय दिया, अन्यथा हम विश्व की सबसे उत्कृष्ट समाज व्यवस्था थे। जन्म से जाति नहीं कुल होता है, वर्ण या लक्षण आपके व्यक्तित्व के लक्षणों पर आधारित होता है। कर्ण भी अंगराज हुआ, मछुवारन के पेट से जन्मे वेदव्यास ब्राह्मण हुए, क्षत्रिय कुल में जन्मे विश्वामित्र ब्राह्मण हुए। जंगल में पैदा हुए हनुमान सेनापति हुए, शबरी संत हुईं, ऐसे असंख्य उदाहरण हैं जो यह सिद्ध करने के लिए उपयुक्त हैं कि जाति जन्म नहीं, कर्म आधारित थी.

आज असंख्य लोग इस छुआ-छूत, जात-पात के भेद को मिटाने के लिए कार्य कर रहे हैं। आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कुछ दिन पूर्व ही जात-पात समाप्त कर सभी हिन्दुओं को समरस होने का आग्रह किया था, संघ के सभी स्वयंसेवक समरसता के मूर्त उदाहरण हैं। समाज को ऐसे लोगों का साथ देकर उनको अधिक शक्ति प्रदान करनी चाहिए, न कि वामन मेश्राम व गौतम जैसे लोगों का जो विदेशी चंदे के लालच में देश का नुकसान व समाज के अंदर खायी को और बढ़ाने के कार्य में लगे हैं.

(लेखक सामाजिक चिंतक और शोधार्थी हैं)

Topics: pseudo Buddhismछद्म बुद्धिज़्मराजनीतिक लाभ का खेलआम आदमी पार्टी के विधायकराजेंद्र पाल गौतमpolitical gain
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