इंदिरा की बहू किसी से नहीं डरतीं, क्या कानून से भी नहीं ? एक परिवार का विशिष्टता बोध झेलने को तैयार नहीं नया भारत
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इंदिरा की बहू किसी से नहीं डरतीं, क्या कानून से भी नहीं ? एक परिवार का विशिष्टता बोध झेलने को तैयार नहीं नया भारत

आपातकाल के दौरान 1975 में कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने कहा था- इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा

Written byमृदुल त्यागीमृदुल त्यागी
Jul 22, 2022, 07:46 pm IST
in भारत
प्रवर्तन निदेशाल कार्यालय में पूछताछ के लिए जातीं सोनिया गांधी (फाइल फोटो)

प्रवर्तन निदेशाल कार्यालय में पूछताछ के लिए जातीं सोनिया गांधी (फाइल फोटो)

नेशनल हेराल्ड घोटाले में जमानत प्राप्त कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने गुरुवार को प्रवर्तन निदेशालय की पूछताछ का सामना करने से पहले कहा- मैं इंदिरा गांधी की बहू हूं. मैं किसी से नहीं डरती। क्या यह एक तरह की धमकी नहीं है और साथ ही इस बयान में “किसी से” कौन है ? क्या ये किसी प्रवर्तन निदेशालय है ? यह घोटाले की जांच का काम करने वाली एजेंसियां हैं। क्या ये कानून है, जिससे वह नहीं डरतीं या फिर अदालतें हैं, जिससे न डरने की बात हो रही है या फिर यह वही सोच है, जब आपातकाल के दौरान 1975 में कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने कहा था- इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा।

नेशनल हेराल्ड घोटाला क्या है, अब इस देश के अधिकतर नागरिक जानते हैं। इस मामले की शुरुआत 2014 में नरेंद्र मोदी के आने के बाद से नहीं हुई। 2012 में सुब्रमण्यम स्वामी के एक कंप्लेंट केस के तौर पर यह मामला कानूनी कार्रवाई के दायरे में आया। इस मामले को रद्द कराने के लिए कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट तक गई। मामले में दम है, कुछ तो दाल में काला है, तभी सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद्द करने से इंकार कर दिया। सोनिया गांधी और उनके बेटे राहुल गांधी इस मामले में जमानत पर हैं। आपराधिक भ्रष्टाचार के साथ मनी लांड्रिंग का मामला भी नेशनल हेराल्ड घोटाले में सामने आया है। अब मनी लांड्रिंग विजय माल्या करें या फिर सोनिया गांधी, कानून तो अपना काम करेगा। उसी कानूनी दायरे में ईडी अपना काम कर रही है।

न डरने की चुनौती किसे ?

अब सवाल ये है कि जांच एजेंसियां किसी को पूछताछ के लिए बुलाती हैं, तो डराती हैं क्या ? यह कानूनी प्रक्रिया है। नरेंद्र मोदी ने भी पूछताछ का सामना किया। फिर न डरने की चुनौती किसे ? क्यों इंदिरा गांधी की बहू होने का हवाला ? क्या यह वही सोच है, जिसने बेखौफ होकर देश के संविधान, लोकतंत्र, लोकतांत्रिक संस्थाओं की हत्या की। आपातकाल लगाने में इंदिरा गांधी को भी किसी से डर नहीं लगा था। इमरजेंसी की 43वीं बरसी पर भाजपा के दिवंगत नेता अरुण जेटली ने एक ब्लॉग लिखा था। उन्होंने लिखा- जर्मन तानाशाह हिटलर की तरह इंदिरा गांधी भी भारत को एक वंशवादी लोकतंत्र में बदलने के लिए आगे बढ़ी थीं। हिटलर और इंदिरा दोनों ने कभी भी संविधान को रद्द नहीं किया। उन्होंने लोकतंत्र को तानाशाही में बदलने के लिए एक गणतंत्र के संविधान का उपयोग किया। जेटली ने लिखा था- हिटलर ने अधिकांश सांसदों को गिरफ्तार करा लिया था। इंदिरा ने भी ज्यादातर विपक्षी सांसदों को गिरफ्तार करवा लिया था और उनकी अनुपस्थिति में दो-तिहाई बहुमत साबित कर संविधान में कई सारे संशोधन करवा लिए।

इस बयान ने बहुत कुछ याद दिला दिया

इंदिरा की बहू ने जिस तरह से किसी से न डरने की बात की, उसने मारुति घोटाले से लेकर अवैध रूप से राज्य सरकारों की बर्खास्तगी तक बहुत कुछ याद दिला दिया है। बहुत और बहुत ज्यादा निर्मम तरीके से इस देश की संवैधानिक व्यवस्था की हत्या इसी विशिष्टताबोध से लैस परिवारवादी दंभ में की गई थी। इंदिरा के किसी से न डरने की बहुत बड़ी कीमत इस देश का लोकतंत्र अदा कर चुका है। इसी प्रकार 2004 से 2014 राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के जरिये सोनिया गांधी इस देश की सत्ता चला चुकी हैं। पूरी तरह स्वछंद, बिना किसी जवाबदेही, संवैधानिक दायरे से बाहर। यह दुस्साहस यदि हुआ, तो उसी पारिवारिक दंभ वाली सोच के कारण, जिसमें बिना कानूनी, संवैधानिक जवाबदेही के सत्ता के आनंद की प्रवृत्ति पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। सोनिया गांधी किसी से नहीं डरतीं, तभी तो आयल फॉर फूड (नटवर सिंह), सत्यम, 2जी स्पैक्ट्रम, राष्ट्रमंडल खेल, नरेगा, मधु कोड़ा मनीलांड्रिंग, आदर्श सोसाइटी और कोल ब्लॉक जैसे हजारों करोड़ रुपये के घोटाले बेखौफ होकर होते रहे।

ये 1975 नहीं, आज का भारत है

कुछ मीडिया हाउस सोनिया गांधी के बयान पर मुग्ध हैं। ये भी पीढ़ी दर पीढ़ी बिल्कुल मुग्ध भाव से इस परिवार पर बलिहारी जाते रहे हैं, लेकिन ये 1975 नहीं, 2022 का भारत है। नए भारत ने अंगड़ाई ली तो कांग्रेस सिमटती चली गई। बृहस्पतिवार को दिल्ली की सड़कों पर उत्पात मचाते कांग्रेसी इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं हैं कि वे परिवारवाद के सम्मोहन में देश से कट चुके हैं। प्रतिदिन सिकुड़ती कांग्रेस और शेष भारत अब अलग हैं।

कांग्रेसियों की एक मूल दिक्कत है। वह चाहते हैं कि उनकी पार्टी की आलाकमान (गांधी-नेहरू-वढेरा परिवार) को पूरा देश, कानून, सरकारी जांच एजेंसियां उसी नजर से देखें, जिस नजर से वे देखते हैं। जैसे हर कांग्रेसी उन्हें अवतरित, कानून-संविधान के दायरे से ऊपर, देव-तुल्य, निष्पाप, निष्कलंक मानता है, वैसे ही हर देशवासी को मानना चाहिए। कानून का काम सिर्फ उन्हें सलाम करना है। संविधान असल में उनकी इच्छा है। सरकारी एजेंसियां ताबेदार हैं। कुल मिलाकर वे भारत पर एक उपकार हैं।

अब आप इस वहम में नहीं रह सकते कि…

कांग्रेसी ऐसा मानते हैं, मान सकते हैं। एक परिवार की चरण वंदना ही कांग्रेस का मूल तत्व है। उन्हें यह मानना चाहिए। रोक भी नहीं सकते, लेकिन यह परिवार भी खुद को यही मानता है। बृहस्पतिवार को जब प्रवर्तन निदेशालय ने सोनिया गांधी को पूछताछ के लिए बुलाया, तो कांग्रेसी नेताओं का कहना था- सोनिया गांधी त्याग की मूर्ति हैं। उन्हें कैसे बुलाया जा सकता है फिर एक नेता ने कहा- अगर प्रवर्तन निदेशालय को कुछ पूछना था, तो 75 साल की महिला को बुलाने के बजाय उनके घर जाकर पूछ सकते थे (शुक्र है, ये नहीं कहा कि प्रणाम और चरणवंदना करते हुए घर जाकर हाल-चाल पूछना चाहिए था)। एक और नेता ने कहा- 54 साल राज किया है। क्या वह 90 करोड़ जैसी छोटी रकम का घोटाला करेंगी। कांग्रेसियों की नजर में मसला नेशनल हेराल्ड घोटाला नहीं है। उनकी नजर में इस परिवार का कोई घोटाला मसला नहीं है। उनका मानना है कि इस देश के तमाम संसाधनों पर पहला हक इस परिवार का है, जो उन्होंने ले लिया है, वह उनका एहसान है और जो नहीं ले पाए, वह राष्ट्र के प्रति उनका समर्पण, बलिदान और त्याग है। लेकिन नए भारत में कानून अपना काम कर रहा है। बड़े-बड़े दरख्त गिर रहे हैं। परिवारवादी ताकतें चाहे वह उत्तर प्रदेश हो, बिहार हो या फिर महाराष्ट्र, किनारे लगती जा रही हैं। अब आप इस वहम में नहीं रह सकते कि मैं फलां का बेटा हूं या फलां की बहू।

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