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पहली से अंतिम सांस की यात्रा ही पर्यावरण- गोपाल आर्य

पंचतत्व को पारिभाषित करते हुए गोपाल आर्य ने कहा कि देश में प्रति व्यक्ति 422 की तुलना में मात्र 28 पेड़ उपलब्ध हैं जो हवा को स्वच्छ करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं

Written byPanchjanyaPanchjanya — edited by Rajpal Singh Rawat
Jun 25, 2022, 12:45 pm IST
in भारत, विश्लेषण, पाञ्चजन्य इवेंट

पंचतत्व को पारिभाषित करते हुए गोपाल आर्य ने कहा कि देश में प्रति व्यक्ति 422 की तुलना में मात्र 28 पेड़ उपलब्ध हैं जो हवा को स्वच्छ करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। पर्यावरण के प्रति दृष्टिकोण बदलने पर जोर देते हुए उन्होंने चॉकलेट, टॉफी और छोटे प्लास्टिक के पैकेट को बड़ी समस्या बताया, जिनका पुनर्चक्रण नहीं होता। उन्होंने परंपरागत र्इंधन, रसायन का कम से कम प्रयोग करने तथा पानी बचाने का आह्वान किया

यदि पर्यावरण को संतुलित रखना है तो पेड़ लगाने होंगे। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रति व्यक्ति 422 पेड़ चाहिए, पर हिन्दुस्थान में 28 पेड़ ही हैं। सोचिए, क्या हमें जरूरत भर आक्सीजन मिलेगी? जिस देश में सर्वे भवन्तु सुखिन:, सुजलाम्, सुफलाम्, शस्य श्यामला की बात होती है, उस देश की संस्कृति और पञ्चमहाभूत या पञ्चतत्व कहां पहुंच गया है? इसलिए पहले यह समझना होगा कि पंचमहाभूत होता क्या है? क्या पर्यावरण का मतलब केवल पेड़ और पानी होता है?

वेदों में कहा गया है- प्रकृति पंचमहाभूतानि। गंध, रस, रूप, शब्द और स्पर्श पंचमहाभूतों के गुण हैं, जिसे पञ्चतन्मात्रा भी कहते हैं। जहां पंचमहाभूत हैं, वहीं पर जीवन है। पृथ्वी पर जीव इसलिए हैं, क्योंकि यहां पर्यावरण है। जीवन की पहली सांस से अंतिम सांस तक की यात्रा ही पर्यावरण है। लाखों साल से चली आ रही जीवनशैली पर्यावरणयुक्त थी। दिल्ली की वायु गुणवत्ता भी अच्छी थी। लेकिन बीते 300 साल में औद्योगिक क्रांति के बाद हवा की गुणवत्ता चिंताजनक हो गई। पहले 16 संस्कारों में पर्यावरण झलकता था। जन्म से लेकर मृत्यु तक ऐसा कोई संस्कार नहीं, जिसमें पर्यावरण की पूजा नहीं होती थी। पूजा चाहे किसी भी रूप में हो। अभी पूरे विश्व में चार प्रकार की समस्याएं हैं- उद्देश्य का संकट, प्रामाणिकता का संकट, स्वामित्व का संकट और संबंध का संकट। यदि हमें इन संकटों से निकलना है तो पर्यावरण के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलना होगा। पर्यावरण में पांच चीजें आती हैं- जल, जमीन, जंगल, जानवर और जन। पूरी सृष्टि में इनसान की आबादी मात्र .01 प्रतिशत है। कोरोना महामारी ने बता दिया कि यदि .01 प्रतिशत आबादी घरों के अंदर बंद हो जाती है तो दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक 60 हो जाता है, जो अभी 500-600 के स्तर पर है। भारत में प्रति मिनट 10 लाख प्लास्टिक की बोतल कचरे में फेंकी जाती हैं। इसमें से आधे का ही पुनर्चक्रण होता है। इसलिए पर्यावरण को यदि दुरुस्त करना है तो इनसान को जीवनशैली बदलनी होगी।

दूसरा बिंदु है- विरोध की बजाय विकल्प की बात करनी होगी। समस्या के समाधान की बात करनी होगी। तीसरा, हमारी संस्कृति में वायु को प्राण और जल को जीवन कहा गया है। इस पर विचार करना होगा कि सनातन संस्कृति को जीवनचर्या में कैसे शामिल किया जाए? चॉकलेट, टॉफी, दूध और दूसरे तरह के प्लास्टिक के छोटे-छोटे टुकड़ों को मिलाकर प्रतिदिन एक लाख मीट्रिक टन प्लास्टिक कचरा जमीन पर गिरता है। दूध का पैकेट काटने के बाद जो छोटा टुकड़ा हम कूड़े में फेंक देते हैं, उनका पुनर्चक्रण नहीं होता। इसे रोक कर हम धरती को जहरीला होने से बचा सकते हैं। दूध का पैकेट ऐसे फाड़ें कि इसका हिस्सा अलग नहीं हो।

सुबह से शाम तक प्रतिदिन हम न जाने कितने प्रकार के रसायनों का प्रयोग करते हैं। साबुन, शैम्पू, क्लीनर, क्रीम आदि सभी में रसायन हैं। कल्पना कीजिए, प्रतिदिन एक व्यक्ति यदि एक ग्राम भी रसायन प्रयोग करता है तो 100 करोड़ ग्राम यानी 10,000 मीट्रिक टन रसायन कहां जाता है? जिस धरती को हम भारत माता कहते हैं, उसे प्रतिदिन जहर कौन देता है? क्या हमने इस पर कभी विचार किया? क्या हमने यह सोचा कि जीवनचर्या में एक ग्राम रसायन कैसे कम किया जा सकता है? क्या मेरे घर के अंदर और बाहर का पर्यावरण स्वच्छ है? हम या हमारे कार्यक्रम पर्यावरण अनुकूल हैं? क्या हम छोटे स्तर पर बदलाव नहीं ला सकते?

इसी तरह, एक यूनिट बिजली बनाने पर 875 ग्राम कोयला जलता है। कोयला बनने में एक लाख वर्ष लगते हैं। यदि हम एक यूनिट बिजली बचाते हैं तो यह बड़ी बचत साबित हो सकती है। इसी तरह, छोटे-छोटे प्रयासों से पानी की बचत भी की जा सकती है। बेंगलुरु की एक कॉलोनी में लोगों ने घरों में एरेटर (जलवातक) लगाए, जिससे प्रति माह डेढ़ लाख लीटर पानी की बचत हुई। पर्यावरण प्रदूषण वैश्विक समस्या है। इसका समाधान व्यक्ति है। इसका समाधान उसका घर है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण के प्रयास अपने घर से प्रारंभ करने होंगे।


भारत में सालाना 35 लाख टन प्लास्टिक कचरा

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के अनुसार, भारत में सालाना करीब 35 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है। प्रति व्यक्ति प्लास्टिक अपशिष्ट उत्पादन बीते पांच साल में लगभग दोगुना हो गया है। केंद्र सरकार ने एकल उपयोग प्लास्टिक और प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन के उन्मूलन पर सभी हितधारकों को एक मंच पर लाने और प्रभावी प्रबंधन निगरानी के लिए राष्ट्रीय डैशबोर्ड शुरू किया है। प्लास्टिक पैकेजिंग के लिए विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व (ईपीआर) पोर्टल भी शुरू किया गया है ताकि ईपीआर दायित्वों के अनुपालन को लेकर उत्पादकों, आयातकों और ब्रांड मालिकों की जवाबदेही और पारदर्शिता में सुधार किया जा सके। एकल उपयोग प्लास्टिक शिकायत निवारण के लिए मोबाइल एप का भी लोकार्पण किया गया।

Topics: पर्यावरणपर्यावरण कुम्भ
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