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दामन पर दाग

यह पहला अवसर नहीं है, जब किसी घोटाले में कांग्रेस या नेहरू-गांधी परिवार का नाम आया हो।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jun 11, 2022, 12:45 pm IST
in भारत, विश्लेषण

यह पहला अवसर नहीं है, जब किसी घोटाले में कांग्रेस या नेहरू-गांधी परिवार का नाम आया हो। बोफोर्स घोटाला, आदर्श घोटाला, टाट्रा ट्रक घोटाला, अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर घोटाला, कॉमनवेल्थ घोटाला, कोयला घोटाला, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, सत्यम घोटाला, मारुति घोटाला, वाड्रा-डीएलएफ घोटाला और ऐसे कई घोटालों के छींटें कांग्रेस और इसके अगुआ परिवार के दामन पर हैं

जीप खरीद घोटाला

आजादी के बाद यह पहला घोटाला था, जो 1948 में सामने आया था। दरअसल, पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया था, सेना के पास जीपें नहीं थीं। तुरंत किसी भी कीमत पर जीपें खरीदने का आदेश दिया गया। तब लंदन में भारतीय उच्चायुक्त टी.टी. कृष्णामाचारी थे। ब्रिटिश कंपनी से 2000 विली मार्का जीप खरीदने के आदेश दिए गए थे, लेकिन युद्ध समाप्त होने के 18 माह बाद 1949 में जीपें आर्इं वह भी केवल 155। अधिकांश जीपें मानक पर खरी नहीं उतरीं। उस समय एक जीप की कीमत 300 पाउंड थी। जांच हुई तो कृष्णामाचारी जीप खरीद घोटाले में दोषी पाए गए, लेकिन उनका कुछ नहीं बिगड़ा। 1955 में मामले को रफा-दफा कर दिया गया और कुछ समय बाद ही उन्हें नेहरू कैबिनेट में उन्हें जगह मिल गई।

मूंदड़ा घोटाला

यह घोटाला 1957 में हुआ, जिसकी आंच तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और वित्त मंत्री टी.टी. कृष्णामाचारी तक पहुंची थी। दरअसल, कलकत्ता (अब कोलकाता) के उद्योगपति हरिदास मूंदड़ा ने 1957 में भारतीय जीवन बीमा (एलआईसी) के जरिये अपनी छह कंपनियों में 12.40 करोड़ का निवेश कराया। यह निवेश सरकारी दबाव में किया गया था। इसमें एलआईसी की निवेश समिति की अनदेखी की गई थी। तब तक एलआईसी को पता चला, तब तक उसे करोड़ों रुपये का नुकसान हो चुका था। नेहरू इस मामले को दबाना चाहते थे, लेकिन उनके दामाद और इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी ने इसका खुलासा कर दिया। नेहरू ने कृष्णामाचारी को बचाने की पुरजोर कोशिश की, लेकिन उन्हें मंत्रीपद छोड़ना पड़ा।

मारुति घोटाला

मारुति कंपनी बनने से पहले 1974 में एक घोटाला हुआ, जिसमें प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का नाम आया। इंदिरा गांधी ने अपने बेटे संजय गांधी को यात्री कार बनाने का लाइसेंस दिलाने में मदद की थी। इसके लिए 1973 में मारुति टेक्निकल सर्विसेज प्राइवेट लि. नाम से कंपनी बनाई गई। सोनिया गांधी को इसका प्रबंध निदेशक बनाया गया, जबकि उनके पास इसके लिए जरूरी तकनीकी योग्यता नहीं थी। यही नहीं, कंपनी को इंदिरा सरकार ने कर, निधि और जमीन खरीद में भी रियायतें दीं। लेकिन कंपनी ऐसी एक भी कार नहीं बना सकी, जिसे बाजार में उतारा जा सके। लिहाजा, 1977 में कंपनी को बंद करना पड़ा।

बोफोर्स घोटाला

24 मार्च, 1986 को भारत सरकार और स्वीडन की हथियार निर्माता कंपनी एबी बोफोर्स के बीच 1,437 करोड़ रुपये का सौदा हुआ। यह सौदा भारतीय थल सेना को 155 एमएम की 400 होवित्जर तोपों की आपूर्ति के लिए हआ था। कंपनी ने सौदा हासिल करने के लिए भारत के बड़े नेताओं और सैन्य अधिकारियों को 1.42 करोड़ डॉलर (64 करोड़ रुपये) की रिश्वत दी थी। इसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी, सोनिया गांधी और कांग्रेस के कई नेताओं का नाम आया। इस सौदे में इतालवी कारोबारी ओत्तावियो क्वात्रोकि की भूमिका रही, जो गांधी परिवार का करीबी था, जबकि 20 अप्रैल, 1987 को लोकसभा में राजीव गांधी ने कहा था कि सौदे के लिए न तो घूस दी गई और न ही इसमें किसी बिचौलिये की भूमिका थी। जुलाई 1993 में क्वात्रोकि भारत छोड़कर भाग गया और फिर कभी नहीं आया। बाद में सीबीआई ने उसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस वापस ले लिया और सर्वोच्च न्यायालय से मामले को बंद करने की अनुमति मांगी। बाद में अजय अग्रवाल ने लंदन में क्वात्रोकि के खाते से संबंधित दस्तावेज मांगे, लेकिन सीबीआई ने याचिका का जवाब नहीं दिया।

अगस्ता वेस्टलैंड घोटाला

भारत सरकार वीवीआईपी लोगों के प्रयोग के लिए इटली की कंपनी अगस्ता वेस्टलैंड से हेलिकॉप्टर खरीदना चाहती थी। संप्रग सरकार ने मार्च 2012 में 12 अगस्ता वेस्टलैंड को हेलिकॉप्टर का आर्डर दिया। उस समय तर्क दिया गया कि यह बेहतरीन हेलिकॉप्टर है, जिसमें दो की बजाय तीन इंजन होते हैं। 36 अरब रुपये का यह सौदा एडब्ल्यू 101 मॉडल के लिए किया गया। 12 में से 8 हेलिकॉप्टर का प्रयोग वीवीआईपी लोगों के लिए किया जाना था। कहा गया कि इनमें एक साथ 10 यात्री जा सकते हैं। शेष 4 हेलिकॉप्टर 30 एसपीजी कमांडो के लिए थे। 2013 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके राजनीतिक सचिव अहमद पटेल पर कंपनी से 360 करोड़ रुपये का दलाली लेने के आरोप लगे। इटली की अदालत ने भी माना कि इस सौदे में भारतीय अधिकारियों और राजनेताओं को 15 मिलियन डॉलर रिश्वत दी गई। हालांकि बाद में अदालत ने यह संकेत भी दिया कि सौदे में परदे के पीछे सोनिया गांधी ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अदालत के 225 पन्नों के फैसले में चार बार ‘सिग्नोरा गांधी’, दो बार पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व आस्कर फर्नांडीस का नाम भी है।

वाड्रा-डीएलएफ घोटाला

सोनिया गांधी के दामाद और प्रियंका गांधी वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा ने कम दाम में जमीन खरीदी और उसे रियल एस्टेट कंपनी डीएलएफ को महंगे दाम पर बेचकर मोटा मुनाफा कमाया। यह घपला 2012 में सामने आय। वाड्रा ने डीएलएफ से 65 करोड़ का ब्याज-मुक्त कर्ज लिया और इसकी एवज में कंपनी को राजनीतिक लाभ पहुंचाया। केंद्र में संप्रग सरकार के रहते वाड्रा ने हरियाणा, राजस्थान सहित देश के कई हिस्सों में कौड़ियों के भाव जमीन खरीदी। इसे लेकर उनके खिलाफ कई मामले दर्ज हैं।

आदर्श घोटाला

मुंबई में कोलाबा के आवासीय इलाके नेवी नगर और रक्षा प्रतिष्ठान के आसपास आदर्श कोआपरेटिव सोसाइटी (लि.) ने अवैध तरीके से इमारत खड़ी की। यह योजना कारगिल युद्ध में बलिदान होने वाले सैनिकों के परिजनों के लिए बनाई गई थी, लेकिन 80 प्रतिशत फ्लैट उन लोगों को आवंटित किए गए, जिनका सेना से कोई वास्ता नहीं था। इस मामले में महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को इस्तीफा देना पड़ा था।

इस खबर को भी पढ़ें-

Topics: आजादी के बाद पहला घोटालाआदर्श घोटालावाड्रा-डीएलएफ घोटालाअगस्ता वेस्टलैंड घोटालाबोफोर्स घोटालामारुति घोटालामूंदड़ा  or जीप खरीद घोटाला
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