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पर्यावरण योद्धा  : 4 करोड़ पेड़ लगा रेतीली जमीन को बनाया जंगल

जादव पायेंग 16 साल की उम्र से माजुली द्वीप पर लगा रहे पेड़

Written byदिब्या कमल बोरदोलोईदिब्या कमल बोरदोलोई
Jun 5, 2022, 12:45 pm IST
in भारत

जादव पायेंग 16 साल की उम्र से माजुली द्वीप पर लगा रहे पेड़। 43 साल में 1,500 एकड़ रेतीली भूमि को जंगल में बदला। उनके बसाए जंगल में पक्षियों की कई प्रजातियों बाघ, हिरण, खरगोश, हाथी सहित कई वन्यजीवों का बसेरा

असम में ब्रह्मपुत्र नदी के बीच स्थित है माजुली द्वीप। यह पहला ऐसा द्वीप है, जिसे भारत का एक जिला बनाया गया है। करीब 40 साल पहले माजुली द्वीप की रेत पर एक युवा जादव पायेंग ने सैकड़ों मरे हुए सांपों को देखा। इस घटना ने पायेंग के दिमाग पर इतना असर डाला कि उसने हालात बदलने की ठान ली। उसने 1979 में 16 साल की उम्र में बंजर मिट्टी में पौधे लगाना शुरू किया। पायेंग ने अपना ध्यान जंगल पर केंद्रित रखने के लिए अपनी पढ़ाई तक छोड़ दी। नतीजा, 43 साल में पायेंग ने लगभग 1500 एकड़ जमीन में जंगल उगा दिया। एक किसान के बेटे जादव पायेंग की पहचान आज ‘भारत के वन पुरुष’ के रूप में होती है। जादव पायेंग, जिन्हें मोलाई पायेंग के नाम से भी जाना जाता है, ने बंजर और रेतीली जमीन में लगभग 4 करोड़ पेड़ लगाए हैं।

असम के जोरहाट जिले में कोकिलामुख के पास स्थित जंगल मोलाई कथोनी या मुलाई रिजर्व कभी लगभग 2,500 एकड़ के क्षेत्र में फैला हुआ था। हर साल मानसून के समय नदी में बाढ़ आ जाती है, जिसमें खेत और घर सहित सब कुछ नष्ट हो जाता है। ऊपर से जमीन का कटाव भी होता रहता है। लगातार कटाव के कारण बीते 70 वर्षों में जंगल क्षेत्र में 50 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है। चिंता की बात यह है कि अगर यही रफ्तार रही तो अगले 20 वर्षों में यह पूरी तरह जलमग्न हो जाएगा। यदि ऐसा हुआ तो माजुली द्वीप पर रहने वाले 1,50,000 लोगों के सामने घर और आजीविका का संकट खड़ा हो जाएगा। उन्हें कहीं और पलायन करना होगा।

जादव पायेंग को पद्मश्री पुरस्कार प्रदान करते तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी

पायेंग कहते हैं, ‘‘आप प्रकृति के विरुद्ध नहीं जा सकते और न ही नदी के कटाव को नियंत्रित कर सकते हैं। आप जितनी बार मजबूत बांध बनाएंगे, नदी और अधिक आक्रामक होती जाएगी। इसका एक ही विकल्प है- वृक्षारोपण। नदी के किनारे बांस और कुछ विशेष प्रकार के पेड़ लगाए जाएं तो मिट्टी का कटाव रुकेगा। मैंने 4 साल पहले ढकुआखाना में इसे आजमाया। इसका परिणाम यह है कि अब वहां मिट्टी का क्षरण नहीं होता।’’

शुरुआत में पायेंग ने बांस के पौधे लगाए। बाद में वे दूसरे पौधे लगाने लगे। बाद में इन्हीं से उन्हें बीज मिलने लगा। हालांकि इस प्रक्रिया में समय अधिक लग जाता था। लेकिन उन्होंने अपना प्रयास जारी रखा। जैसे-जैसे उनका जंगल घना होता गया, वैसे-वैसे इसमें निवासियों की संख्या भी बढ़ती गई। जल्द ही, जंगल पक्षियों की सैकड़ों प्रजातियों से भर गया। यही नहीं, साल के तीन महीने जो हिरण, गैंडे, बाघ और हाथी अपने जंगल में भटकते थे, वे भी आ गए। पायेंग ने आगे कहते हैं, ‘‘पेड़ों को जानना बहुत जरूरी है। जब तक आप व्यक्तिगत रूप से पेड़ को नहीं जानते, आप इसकी उचित देखभाल नहीं कर सकते। इसलिए इसकी रक्षा के लिए पहले पर्यावरण से परिचित होना होगा।’’

‘‘पक्षी, जानवर, हवा, नदियां पेड़ लगाना जानती हैं। लेकिन इनसान ही पेड़ लगाना नहीं जानता। अपने ग्रह को बचाने के लिए हमें इस हुनर को जल्द से जल्द सीखने की जरूरत है। हम अब बूढ़े हो गए हैं, लेकिन अपने बच्चों को एक बेहतर दुनिया बनाने के लिए हमें उन्हें यह हुनर सिखाने की जरूरत है। 

लेख ने बदली जिंदगी
जादव के जीवन में 2007 से बदलाव आया। एक फोटो पत्रकार ने जंगल में पायेंग को बीज बोते हुए देखा और उन पर एक लेख लिखा। जल्द ही उन्होंने अपने काम से पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया और अपनी अविश्वसनीय उपलब्धियों के लिए कई पुरस्कार जीते। पायेंग का कहना है कि अगर माजुली को ब्रह्मपुत्र नदी के कटाव से बचाना है तो किनारों पर अधिक से अधिक संख्या में सीधे उगने वाले नारियल के पेड़ लगाने पर विचार करना होगा। जब नारियल के पेड़ को एक-दूसरे के नजदीक लगाते हैं तो वे मिट्टी को बांध लेते हैं। इससे कटाव नहीं होता। बदले में नारियल के पेड़ न केवल देश की अर्थव्यवस्था को गति देंगे, बल्कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने में भी मदद करेंगे। असम के वन और पर्यावरण मंत्री परिमोल शुक्ल वैद्य कहते हैं, ‘‘हमें उन पर गर्व है। वन विभाग हमारे जंगल की रक्षा और विकास के लिए उनकी मदद ले रहा है। पायेंग काफी अनुभवी हैं। वे और अधिक हरित क्षेत्र तैयार करने में हमारी मदद कर रहे हैं।’’

बच्चों के प्रेरणास्रोत
जादव पायेंग बच्चों को भी प्रेरणा दे रहे हैं। उन पर बच्चों के लिए ‘जादव एंड द ट्री प्लेस’ नाम से एक किताब लिखी गई है। इसमें उनकी कहानी है। इसमें बताया गया है कि कैसे उन्होंने एक जंगल बनाया, जो अब जंगली जानवरों और पक्षियों का घर है। पायेंग पर पुरस्कार विजेता वृत्तचित्र भी बन चुके हैं। यही नहीं, अमेरिका के दो पीएचडी छात्र जादव पायेंग की देखरेख में पर्यावरण संरक्षण पर शोध कर रहे है। आज दुनिया भर के लोग ‘मोलाई जंगल’ देखने के लिए आते हैं। उनकी प्रेरणादायक कहानी को स्कूलों में पारिस्थितिकी कक्षाओं में भी पढ़ाया जा रहा है। पर्यावरण के क्षेत्र में पायेंग की अभूतपूर्व उपलब्धि के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया है। पायेंग कहते हैं, ‘‘पर्यावरण संरक्षण की शिक्षा शुरुआती दौर से ही दी जानी चाहिए। स्कूल जाने वाला हर छात्र अपने स्कूल के दिनों में कम से कम दो पेड़ लगाए तो 10 साल में हमारा देश हरा-भरा हो जाएगा। अगर छात्रों को पेड़ों की पहचान करना और उनका पोषण करना सिखाया जाएगा, तभी वृक्षारोपण सफल होगा।’’

मेक्सिको के जंगल करेंगे आबाद
पायेंग अब मेक्सिको के जंगलों को फिर से हरा-भरा बनाने के लिए तैयार हैं। 62 वर्षीय पायेंग ने दिसंबर 2021 में मेक्सिको में पर्यावरण परियोजनाओं पर सहयोग करने के लिए एक एनजीओ Fundación Azteca के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस एनजीओ का उद्देश्य उत्तरी अमेरिकी देश में 70 लाख पेड़ लगाना है। पायेंग के मुताबिक, यह पहल एक वृहद् वृक्षारोपण परियोजना है, जिसके तहत मेक्सिको में 8 लाख हेक्टेयर जमीन चिह्नित है। इसके लिए मेक्सिको की सरकार ने उन्हें 10 साल के लिए वीजा दिया है। वे साल के तीन माह सितंबर, अक्तूबर और नवंबर मेक्सिको में रहेंगे, क्योंकि ये तीन महीने पेड़ लगाने के लिए उपयुक्त हैं। बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान के लिए उन्हें अपने साथ रोजाना एक लाख छात्रों को अपने साथ जोड़ना होगा।

जादव पायेंग कहते हैं, ‘‘पक्षी, जानवर, हवा, नदियां पेड़ लगाना जानती हैं। लेकिन इनसान ही पेड़ लगाना नहीं जानता। अपने ग्रह को बचाने के लिए हमें इस हुनर को जल्द से जल्द सीखने की जरूरत है। हम अब बूढ़े हो गए हैं, लेकिन अपने बच्चों को एक बेहतर दुनिया बनाने के लिए हमें उन्हें यह हुनर सिखाने की जरूरत है।

Topics: पर्यावरणरेतीली जमीन‘मोलाई जंगल’माजुली द्वीप
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