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… जब सोनिया गांधी ने निकाली नेपाल से ‘खुन्‍नस’

हिन्‍दू धर्म-कर्म में न तो नेहरू की आस्‍था रही और न ही उनके नाती राजीव गांधी की।

Written byपंकज दासपंकज दास
May 30, 2022, 12:45 pm IST
inविश्व
लुम्बिनी दौरे पर भगवान बुद्ध को पुष्‍प अर्पित करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

लुम्बिनी दौरे पर भगवान बुद्ध को पुष्‍प अर्पित करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

हिन्‍दू धर्म-कर्म में न तो नेहरू की आस्‍था रही और न ही उनके नाती राजीव गांधी की। नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर में इंदिरा गांधी को इसलिए नहीं जाने दिया गया, क्‍योंकि उन्‍होंने एक पारसी से विवाह किया था, पर उन्‍होंने बुरा नहीं माना। लेकिन सोनिया गांधी को रोका गया तो न केवल राजीव भड़क गए थे, बल्कि सोनिया ने तो नेपाल से अपने इस ‘अपमान का बदला’ तक लिया।

आजादी के 74 साल के दौरान भारत में 14 प्रधानमंत्री बने, जिनमें से 11 ने नेपाल का दौरा किया। लेकिन प्रधानमंत्री के तौर पर और इस पद से हटने के बाद गिने-चुने राजनेता ही नेपाल के पशुपति नाथ सहित दूसरे हिंदू मंदिरों में गए और वहां पूजा-अर्चना की। अपने आठ साल के कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 5 बार नेपाल जा चुके हैं। हर बार उन्‍होंने भगवान पशुपतिनाथ का दर्शन कर पूजा-अर्चना की। पहली बार 2014 में वे प्रधानमंत्री का पद संभालने के कुछ ही महीने बाद पशुपतिनाथ का दर्शन करने गए थे। 16 मई को नेपाल का उनका दौरा 17 साल में किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला द्विपक्षीय दौरा था।

नरेंद्र मोदी के पहले के सभी प्रधानमंत्री जिनको इश्वर में आस्था थी, उन्‍होंने नेपाल दौरे के दौरान पशुपतिनाथ का दर्शन किया। हालांकि कुछ राजनीतिक मजबूरी और कुछ ‘हिंदू विरोधी’ होने के कारण नेपाल के किसी भी मंदिर में नहीं गए।

 

मोदी की श्रद्धा और भक्तिभाव से अभिभूत

प्रधानमंत्री मोदी की हर यात्रा राजनीति और कूटनीति से ऊपर उठकर धार्मिक ही रही है। नेपाल दौरे के दौरान कभी वे भगवान पशुपतिनाथ, कभी भगवान मुक्तिनाथ, कभी माता माता जानकी और कभी भगवान बुद्ध की जन्मस्थली गए। उनकी इस अगाध श्रद्धा और भक्तिभाव के कारण नेपाली जनता अभिभूत रहती है।

 

दूसरी बार जब सार्क शिखर सम्मलेन में भाग लेने गए, तब उन्होंने पशुपतिनाथ मंदिर में विशेष पूजा की थी। इसी तरह, तीसरी बार बिम्सटेक सम्मलेन के दौरान जनकपुरधाम और चौथी बार भगवान मुक्तिनाथ और इस बार भगवान बुद्ध की जयंती पर उनकी जन्मस्थली लुम्बिनी में जाकर नेपाल-भारत के बीच धार्मिक संबंधों को और अधिक मजबूत किया है। वे केवल इसी बार पशुपतिनाथ मंदिर नहीं गए।

 

नेहरू ने पूजा से किया इनकार

जवाहरलाल नेहरू दो बार नेपाल गए। पहली बार जून 1951 में दो दिन पर वे किसी भी मंदिर में नहीं गए। दूसरी बार जून 1959 में तीन दिवसीय यात्रा पर जब वे नेपाल गए, तो नेपाली जनता की धार्मिक भावनाओं और भगवान पशुपतिनाथ में उनकी अगाध श्रद्धा के कारण अपने सलाहकारों के मशिवरे पर पशुपतिनाथ मंदिर गए। इस दौरान वे मंदिर के प्रांगण में एक घंटे तक रहे, लेकिन पूजा-पाठ करने से इनकार कर दिया था। नेपाल के पूर्व विदेश मंत्री रमेशनाथ पाण्डेय उस क्षण को आज भी याद करते हुए कहते हैं, ‘‘भारतीय राजदूत के बार-बार आग्रह करने के बावजूद नेहरू ने पूजा करने या दूतावास द्वारा लाए गए चढ़ावा को वहां देने से इनकार कर दिया था। उस दिन समझ में आया कि धर्म-कर्म और पूजा-पाठ में उनकी दिलचस्पी नहीं के बराबर है और वे नास्तिक हैं।’’

नेहरू कैबिनेट में मंत्री रहे लालबहादुर शास्त्री 23 अप्रैल, 1965 को प्रधानमंत्री के विशेष दूत के तौर पर सिर्फ एक रात के लिए नेपाल गए। इस कारण किसी मंदिर में उनका जाना नहीं हो सका। प्रधानमंत्री पद छोड़ने के बाद चंद्रशेखर भी नेपाल गए, लेकिन राजनीतिक व्यस्तता के कारण मंदिर जाने के लिए समय नहीं निकाल पाए। प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद एचडी देवगौड़ा नेपाल गए और पशुपतिनाथ के दर्शन किए। इसी तरह, इंद्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री बनने से पहले और बाद में भी नेपाल गए और पशुपतिनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना की।

पशुपतिनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी, जो कि कर्नाटक के मूल निवासी होते हैं और जिनको मूल भट्ट कहा जाता है, उन्होंने नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री बनने का आशीर्वाद दिया। इस बात का पता चलते ही काठमांडू से दिल्ली तक राजनीतिक गलियारे में सनसनी मच गई थी। बदले राजनीतिक हालात में राव ने भारत के प्रधानमंत्री का पद संभाला और दो बार काठमांडू गए और पशुपतिनाथ के दर्शन किए।

इंदिरा गांधी को प्रवेश से रोका

इंदिरा गांधी को पशुपतिनाथ मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई, क्‍योंकि उन्‍होंने पारसी से विवाह किया था। इस मंदिर में सिर्फ हिन्दू धर्म मानने वालों को ही प्रवेश दिया जाता है। हालांकि पशुपतिनाथ और दक्षिणकाली के प्रति उनकी आस्‍था जीवन भर बनी रही। वे जब भी किसी राजनीतिक मुसीबत में फंसती थीं, अपने भरोसेमंद कैबिनेट सहयोगी ललित नारायण मिश्रा को विशेष विमान से दक्षिणकाली में पूजा करने के लिए भेजा करती थीं। इसके विपरीत राजीव गांधी की अपने नाना नेहरू की तरह धार्मिक अनुष्ठानों में रुचि नहीं थी। प्रधानमंत्री रहते सार्क सम्‍मेलन के दौरान वे काठमांडू गए तो राजनीतिक मजबूरी और नेपाल की जनभावनाओं के सम्‍मान के लिए पशुपतिनाथ मंदिर गए

 

… और सोनिया गांधी ने ‘बदला’ लिया

उस समय राजीव गांधी के साथ सोनिया गांधी भी थीं। परंपराओं और नियमों के कारण सोनिया को द्वार पर ही रोक दिया गया। इस पर राजीव गांधी नाराज भी हुए थे। कहा जाता है कि उस घटना से सोनिया गांधी इतनी आहत हुईं कि नेपाल जब में रातोंरात पंथनिरपेक्षता थोपी गई, उसमें दस जनपथ और खासकर सोनिया गांधी की भूमिका थी। नेपाल के सशस्त्र द्वंद्व में रहे माओवादी को भारत में प्रश्रय देना, उनके लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था करना और उनके जरिये ही विश्व के एकमात्र हिन्दू राष्ट्र को ध्वस्त कर वहां पंथनिरपेक्षता की घोषणा करवाने के पीछे पश्चिमी देशों के एजेंडे को सोनिया गांधी और उनके सिपहसालारों का पूरा समर्थन था। नेपाल की जनता आज भी मानती है कि सोनिया गांधी कभी भी हिंदू भावनाओं के प्रति संवेदनशील नहीं रहीं।

 

राव को प्रधानमंत्री बनने का आशीर्वाद

राजीव गांधी के पशुपतिनाथ मंदिर से जुड़ी एक और रोचक घटना है। पहली बार जब वे शिवरात्रि पर पशुपतिनाथ गए, तब पीवी नरसिम्हा राव उनकी सरकार में विदेश मंत्री थे। पशुपतिनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी, जो कि कर्नाटक के मूल निवासी होते हैं और जिनको मूल भट्ट कहा जाता है, उन्होंने नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री बनने का आशीर्वाद दिया। इस बात का पता चलते ही काठमांडू से दिल्ली तक राजनीतिक गलियारे में सनसनी मच गई थी। बदले राजनीतिक हालात में राव ने भारत के प्रधानमंत्री का पद संभाला और दो बार काठमांडू गए और पशुपतिनाथ के दर्शन किए।

2002 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सार्क शिखर सम्मेलन में सहभागी होने काठमांडू गए। अपने व्यस्त कार्यक्रम के बावजूद उन्होंने पशुपतिनाथ का दर्शन किया था।

Topics: सोनिया गांधीसार्क शिखरराजीव गांधीपशुपतिनाथ मंदिरनेहरू की आस्‍था
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