मैरिटल रेप : दिल्ली उच्च न्यायालय का विभाजित निर्णय, आगे की राह क्या?
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मैरिटल रेप : दिल्ली उच्च न्यायालय का विभाजित निर्णय, आगे की राह क्या?

दिल्ली उच्च न्यायालय में अंतत: मैरिटल रेप अर्थात वैवाहिक बलात्कार को लेकर जो बहस चल रही थी, वह बिना किसी निर्णय के समाप्त हुई जब दो जजों ने विभाजित निर्णय दिया। यह मामला पूरे देश में चर्चा का विषय इसलिए भी है क्योंकि यह आशंका व्यक्त की जारी है कि दहेज विरोधी अधिनियम की तरह इसका भी दुरूपयोग होगा।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
May 14, 2022, 03:15 pm IST
in भारत, विश्लेषण
प्रतीकात्मक चित्र

प्रतीकात्मक चित्र

दिल्ली उच्च न्यायालय में अंतत: मैरिटल रेप अर्थात वैवाहिक बलात्कार को लेकर जो बहस चल रही थी, वह बिना किसी निर्णय के समाप्त हुई जब दो जजों ने विभाजित निर्णय दिया। यह मामला पूरे देश में चर्चा का विषय इसलिए भी है क्योंकि यह आशंका व्यक्त की जारी है कि दहेज विरोधी अधिनियम की तरह इसका भी दुरूपयोग होगा। पिछले कई वर्षो से दहेज और बलात्कार की झूठे मामलों के चलते न्यायालय भी कठोर टिप्पणी कर चुके हैं। परन्तु फिर भी इनकी संख्या में कमी नहीं आ रही है।

वैवाहिक बलात्कार का अर्थ है, पत्नी द्वारा पति भी यह आरोप लगा दिया जाना कि पति ने बलात्कार किया है। जबकि अभी आईपीसी की धारा 375 में इसे अपवाद माना गया है। करुणा नंदी सहित अन्य याचिकाकर्ताओं ने इसी अपवाद को ही चुनौती दी है। आईपीसी की धारा 375 बलात्कार को परिभाषित करती है और इसके अनुसार निम्नलिखित परिस्थितियों में यौनकार्य को बलात्कार माना जाता है,

• उस स्त्री की इच्छा के विरुद्ध।
• उस स्त्री की सहमति के बिना।
• उस स्त्री की सहमति से जबकि उसकी सहमति, उसे या ऐसे किसी व्यक्ति, जिससे वह हितबद्ध है, को मृत्यु या चोट के भय में डालकर प्राप्त की गई है।
• उस स्त्री की सहमति से, जबकि वह पुरुष यह जानता है कि वह उस स्त्री का पति नहीं है और उस स्त्री ने सहमति इसलिए दी है कि वह विश्वास करती है कि वह ऐसा पुरुष है। जिससे वह विधिपूर्वक विवाहित है या विवाहित होने का विश्वास करती है।
• उस स्त्री की सहमति के साथ, जब वह ऐसी सहमति देने के समय, किसी कारणवश मन से अस्वस्थ या नशे में हो या उस व्यक्ति द्वारा व्यक्तिगत रूप से प्रबन्धित या किसी और के माध्यम से या किसी भी बदतर या हानिकारक पदार्थ के माध्यम से, जिसकी प्रकृति और परिणामों को समझने में वह स्त्री असमर्थ है।
• उस स्त्री की सहमति या बिना सहमति के जबकि वह 18 वर्ष से कम आयु की है।
• उस स्त्री की सहमति जब वह सहमति व्यक्त करने में असमर्थ है।

इसमें अपवाद के रूप में पुरुष का अपनी पत्नी के साथ मैथुन बलात्संग नहीं है जबकि पत्नी पन्द्रह वर्ष से कम आयु की नहीं है। करुणा नंदी ने इसी अपवाद को चुनौती दी थी। इस विषय में पुरुषों के लिए कार्य करने वाली संस्थाओं ने इस अपवाद को हटाने का विरोध किया था और इसी विषय में एक बार न्यायालय ने यह तक कह दिया था कि यदि सेक्स वर्कर को न कहने का अधिकार है तो पत्नी को क्यों नहीं? यहां पर कई प्रश्न उठते हैं। सबसे पहला तो यह जो सोशल मीडिया पर यूजर्स भी पूछ रहे हैं कि आखिर यह कैसे पता चलेगा कि पत्नी ने रात में हां कहा था या न? और क्या अब बेडरूम में भी सीसीटीवी लगवाया जाएगा, जिससे यह पता चलता रहे कि पत्नी ने कब सहमति दी और कब नहीं?

पुरुष आयोग की मांग लगातार उठाने वाली एवं पुरुषों के लिए लड़ने वाले एक्टिविस्ट बरखा त्रिहान से हमने इस निर्णय के विषय में बात की तो उनका कहना था कि वैवाहिक बलात्कार का अर्थ है हिन्दू परिवारों का पूरी तरह से टूट जाना। उन्होंने कहा कि यह बहुत बड़ी वामपंथी साजिश है, जिसके तले हिन्दू परिवारों को चरणबद्ध तरीके से तोड़ा जा रहा है। अभी तक तो हम केवल 498 ए के ही दुरूपयोग की बात कर रहे हैं, परन्तु इस कदम के बाद तो क्या होगा, हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।

क्या कहा जस्टिस सी हरिशंकर ने?
धारा 375 में पति और पत्नी के अपवाद को बनाए रखते हुए जस्टिस सी हरिशंकर ने कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। उन्होंने कहा कि “एक पति और पत्नी के बीच सेक्स पवित होता है। एक स्वस्थ विवाह में कभी भी सेक्स केवल एक शारीरिक गतिविधि नहीं हो सकती है, जिसका लक्ष्य केवल ऊपरी चरमता पाना हो। पति और पत्नी के बीच सेक्स के बीच जो भावनात्मक सम्बन्ध स्थापित होते हैं, उनसे इंकार नहीं किया जा सकता है।” उन्होंने यह भी कहा कि “यदि पति और पत्नी के बीच कभी-कभी पत्नी की सहमति के बिना भी सेक्स होता है, तो भी इसे बलात्कार की संज्ञा नहीं दी जा सकती है क्योंकि फिर इन संबंधों से उत्पन्न हुई बच्ची को क्या बलात्कार का परिणाम कहेंगे? हालांकि वह बच्चा एक वैध विवाह के परिणामस्वरुप पैदा हुआ है, फिर भी उसे बलात्कार की पैदाइश माना जाएगा, जो बहुत गलत है!”

वहीं जस्टिस शकधर ने कहा कि इस अपवाद को हटाना चाहिए क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 14, 19 (1) (ए) और 21 के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन करता है। सोशल मीडिया से लेकर हर मंच पर इस विषय में बातें हो रही हैं और लोग अब इसे लेकर प्रश्न कर रहे हैं कि जब बलात सम्बन्धों के लिए घरेलू हिंसा में पति के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज कराई जा सकती है तो फिर ऐसी क्या विवशता या दबाव है कि एक पति को ही बलात्कारी सिद्ध करने की जल्दी मचाई जा रही है?

क्या भारत का सांस्कृतिक इतिहास जो मात्र परिवार के कारण ही जीवित है, उसे अब और टुकड़े टुकड़े करने की यह कवायद है? क्या जैसा लोग कहते हैं कि इसमें जिहादी और वामपंथी तत्व सबसे अधिक सक्रिय हैं, सही बात है क्योंकि याचिकाकर्ताओं में मुस्लिम याचिकाकर्ता एवं वामपंथी विचारों वाली ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वीमेन एसोसिएशन भी सम्मिलित है? ऐसे तमाम प्रश्न आम लोगों के मस्तिष्क में हैं, जो यह जान रहे हैं कि इस कानून के आने से परिवार की शेष परम्परा भी टूट जाएगी और साथ ही वाम फेमिनिज्म वाली फेमिनिस्ट कहीं न कहीं भारत को बलात्कार का देश साबित करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा देंगी।

Topics: वैवाहिक बलात्कार पर कोर्ट का निर्णयmarital rapeMarital rape in courtCourt decision on Marital Rapeवैवाहिक बलात्कारकोर्ट में वैवाहिक बलात्कार
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