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थोथा चना, बाजे घना

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Feb 28, 2022, 05:00 am IST
in भारत, सम्पादकीय, दिल्ली
लोकतांत्रिक देश, तानाशाह देश, संयुक्त राष्ट्र और राणा अय्यूब

लोकतांत्रिक देश, तानाशाह देश, संयुक्त राष्ट्र और राणा अय्यूब

लोकतांत्रिक देश हमेशा तानाशाह देशों से ऊपर हैं। यूएनए को यह समझना पड़ेगा और वे देश कानून से चलेंगे, आपके ट्वीट से नहीं। राणा अय्यूब जैसों को भी सिर्फ शरिया दिखता है। इन्हें जान लेना चाहिए कि यह देश कानून और संविधान से चलता है।

फरवरी के दूसरे सप्ताह में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने राणा अय्यूब के खिलाफ जांच कर मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में उनकी 1.77 करोड़ रुपये की बैंक जमाओं को अटैच कर दिया। इसके बाद यूएन जिनेवा हैंडिल से राणा अय्यूब के समर्थन में ट्वीट आया कि उनका न्यायिक उत्पीड़न किया जा रहा है। इसे तुरंत समाप्त किया जाना चाहिए। इन पर मन में कई सवाल उठे। चाहे राणा अय्यूब हों या यूएनए, कहीं ऐसा तो नहीं है कि सरोकार, प्रगतिशीलता के नाम पर और बाकियों की ठेकेदारी करने के नाम पर कुछ लोग बड़े तो दिखने लगे, परंतु उतने ही अर्थहीन हो गए हैं।

बातें बड़ी, नीयत छोटी 
संयुक्त राष्ट्र और राणा अय्यूब की तुलना कुछ लोगों को खटक सकती है। मगर यह तुलना वास्तव में व्यावहारिक है। यूएन बात भले दुनिया की करे, परंतु शक्ति महज कुछ हाथों में दिखाई देती है। दूसरी ओर राणा अय्यूब जैसे चेहरे भी बात तो प्रगतिशीलता, मानवता की करते हैं परंतु झुकाव सिर्फ मुस्लिमों और राजनीतिक नफरतों की ओर होता है।

दूसरी बात, यूएन क्या वास्तव में उतना प्रभावी है, जितनी ताल ठोकी जाती है। यूएन के होते हुए भी उक्रेन प्रकरण, सीरिया का गृह युद्ध, ईरान-ईराक युद्ध इतना लंबा कैसे चला? जब युद्ध हो रहे हैं तो यूएन कैसे प्रासंगिक है? इसी तरह प्रगतिशील हैं। ये सिर्फ खुद को प्रासंगिक बनाये रखने के तंत्र के तौर पर काम करते हैं। राणा अय्यूब की प्रगतिशीलता और पत्रकारिता के कारण कितनी जिंदगियां बदलीं?


यूएनए को यह समझना पड़ेगा और वे देश कानून से चलेंगे, आपके ट्वीट से नहीं। राणा अय्यूब जैसों को भी सिर्फ शरिया दिखता है। इन्हें जान लेना चाहिए कि यह देश कानून और संविधान से चलता है। ये गलत करते हैं और फंसने पर अपने रसूख का प्रयोग करते हैं। ये थोथे रसूख बदलती हुई दुनिया में चलने वाले नहीं हैं। यह दुनिया पारदर्शी है और उतनी ही तर्कशील भी। तकनीक की कैंची ने इस मनमानी के पैर कतर दिए हैं। अब ये थोथे रसूख, थोथी प्रगतिशीलता चलने वाली नहीं। 


तीसरी बात, जो ये कहते हैं, करते उसके उलट हैं। महज बयान देकर कोरी बुद्धिजीविता निभाते हैं, और इस तरह से एक-दूसरे का इकोसिस्टम बना रहता है जो दुनिया की आंखों में धूल झोंकने का काम करता है। दोनों ही बदलाव कर देने का दावा करते हैं। पर यूएन के हाथ में वास्तविक शक्ति कहां है और दूसरे के पास वास्तविक दृष्टि कहां है?  यूएन के 193 सदस्य देश हैं। वह प्रस्ताव पास कर सकता है, खास कानून बना सकता है, शांति सेना तैनात कर सकता है। इसी तरह, स्वयंभू प्रगतिशील इन चीजों पर धारणा बना सकते हैं, मोर्चे निकाल सकते हैं मगर किसी समस्या के हल के लिए ये कदम उठाते हैं क्या?

अंत में एक बात और, चाहे यूएन हो, चाहे प्रगतिशील, ये हिंसक तत्वों की ओर से आंखें मूंदे हुए दिखते हैं, जहां से वास्तव में मानवता के लिए खतरे हैं। यूएन के 193 सदस्यों में से केवल 26 पूर्ण लोकतंत्र हैं तो विपरीत ध्रुव पर खड़े उत्तर कोरिया, चीन, ईरान, सीरिया भी इसके पूर्ण सदस्य हैं। दूसरी तरफ राणा अय्यूब जैसी बिरादरी है जो वाशिंगटन पोस्ट में बगदादी को एक सीधा सा मजहबी गुरु बताती हैं। जो लोगों का खून बहाए, वह सीधा होता है? ऐसे प्रगतिशीलों और तानाशाह देशों, जहां मानवाधिकार कुचले जा रहे हैं, को यूएन ने पूरी मान्यता दे रखी है। यह एक जुगलबंदी है जो लोकतंत्र-मानवाधिकार के विरुद्ध कई बार मोचार्बंदी करती हुई दिखती है।

स्वहित पोषण का तंत्र  
इन्हें इस कसौटी पर भी जांचा जाना चाहिए कि इनके जो बड़े आभामंडल हैं, ये स्वहित पोषण का तंत्र बनकर तो नहीं रह गए? राणा पर अभी जो जांच हुई, उसमें सीधे-सीधे दो-तीन मामले हैं। उन्होंने तीन बातों झुग्गीवासी व किसानों, तीन राज्यों में राहत कार्यों और कोविड पीड़ितों के नाम पर क्राउड फंडिंग के जरिए पैसा जुटाया। इसमें 2.7 करोड रुपये की राशि मिली थी। उसमें से 1. 25 करोड़ खर्च किए और 90 लाख कर भुगतान की मद में बताए। राणा ने एक और खेल किया। यह चंदा उन्होंने अपने अब्बू और बहन के खातों में मंगाया। इसमें गबन यह किया कि पैसा किसी और के नाम पर मांगे और फिर रमजान के महीने में जकात के नाम पर मुस्लिमों में बांट दिया। आप दीन-दुखियों के लिए पैसा लेकर सिर्फ मुसलमानों को देंगे? यह क्या है? आप हैं क्या, प्रगतिशील हैं या मानवता के नाम पर पलते परजीवी?

ट्वीट से नहीं, कानून से चलेंगे देश
लोकतांत्रिक देश हमेशा तानाशाह देशों से ऊपर हैं। यूएनए को यह समझना पड़ेगा और वे देश कानून से चलेंगे, आपके ट्वीट से नहीं। राणा अय्यूब जैसों को भी सिर्फ शरिया दिखता है। इन्हें जान लेना चाहिए कि यह देश कानून और संविधान से चलता है। ये गलत करते हैं और फंसने पर अपने रसूख का प्रयोग करते हैं। ये थोथे रसूख बदलती हुई दुनिया में चलने वाले नहीं हैं। यह दुनिया पारदर्शी है और उतनी ही तर्कशील भी। तकनीक की कैंची ने इस मनमानी के पैर कतर दिए हैं। अब ये थोथे रसूख, थोथी प्रगतिशीलता चलने वाली नहीं।

पुनश्च : प्रगतिशीलता के परजीवी तंत्र ने एजेंडाधारी पत्रकारिता के लिए खूब पुरस्कार जुटाए होंगे। अब यूएन को अपने उस रिपोर्टियर ट्विटर हैंडल को आंतरिक रूप से पुरस्कृत करना चाहिए क्योंकि दागी चेहरे को बचाने के लिए एक ट्वीट से इस हैंडल ने संयुक्त राष्ट्र की छीछालेदर का अलग ही कीर्तिमान बनाया है।

@hiteshshankar

हितेश शंकर
हितेश शंकर
हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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