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नए और बेदाग चेहरों का मिलेगा लाभ

Written byराकेश सैनराकेश सैन
Jan 28, 2022, 09:00 pm IST
in भारत, पंजाब
जोश से भरे पंजाब भाजपा के कार्यकर्ता

जोश से भरे पंजाब भाजपा के कार्यकर्ता

पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा ने नए और बेदाग छवि वाले प्रत्याशियों को उतारा है। पार्टी का यह सूत्र काम करता भी दिख रहा है। कुछ समय पहले तक पंजाब में भाजपा का जबर्दस्त विरोध हो रहा था। अब वैसी बात नही है

अभी अधिक दिन नहीं हुए हैं जब पंजाब के कुछ गांवों में इस तरह के पोस्टर लगाए जाते थे—'इस गांव में भाजपाइयों का आना सख्त मना है।' लेकिन अब कहीं भी ऐसी बात नहीं है।  इसमें सबसे बड़ा कारण है नवम्बर,2021 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा तीन कृषि सुधार कानून को वापस लेना। लोग यह कहने लगे हैं कि अब भाजपा पंजाब की चुनावी दौड़ में एक मजबूत खिलाड़ी बन चुकी है। पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह की पंजाब लोक कांग्रेस और पूर्व केंद्रीय मंत्री सरदार सुखदेव सिंह ढींढसा के अकाली दल संयुक्त का साथ मिलने से भाजपा और सशक्त हुई है। इसके साथ ही भाजपा अपने प्रत्याशियों के चयन में अलग—अलग समीकरणों को ध्यान में रख रही है। भाजपा ने अपने कोटे की 65 में से 63 सीटों के लिए  प्रत्याशियों की घोषणा भी कर दी है। इनमें किसान, पंथक नेता, डॉक्टर, वकील और समाज के अन्य वर्ग के बड़े चेहरे शामिल हैं। बटाला से कांग्रेस के मौजूदा विधायक फतेहजंग बाजवा, फगवाड़ा से पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री विजय सांपला, मोगा से हरजोत कमल, रोपड़ से इकबाल सिंह लालपुरा को टिकट दिया गया है। मजीठा में बिक्रम मजीठिया के खिलाफ प्रदीप सिंह भुल्लर उतारे गए हैं, वहीं चमकौर साहिब से मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के खिलाफ दर्शन सिंह शिवजोत को टिकट दिया गया है। भाजपा ने लंबी से चुनाव लड़ रहे प्रकाश सिंह बादल के विरुद्ध राकेश ढींगरा को उतारा है। भाजपा ने अपने पुराने दिग्गजों मनोरंजन कालिया को जालंधर, तीक्ष्ण सूद को होशियारपुर, दिनेश सिंह बब्बू को सुजानपुर, सुरजीत कुमार ज्याणी को फाजिल्का और अरुण नारंग को अबोहर से टिकट दिया है।

ऐसा पहली बार हो रहा है, जब भाजपा पंजाब में 65 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। अकाली दल से गठबंधन के कारण अब तक भाजपा राज्य में लोकसभा की 13 में से 3 और विधानसभा की 117 में से 23 सीटों पर ही चुनाव लड़ती आ रही थी। कहने को तो आम आदमी पार्टी भी दूसरी बार चुनाव लड़ने जा रही है और यह भी लगभग नई पार्टी है, परन्तु गत विधानसभा चुनाव में 117 सीटों पर लड़ने के बावजूद उसके केवल 20 विधायक ही चुने गए थे। इस बार पार्टी ने अधिकतर सीटों पर उन्हीं पुराने चेहरों पर विश्वास जताया है। इन पुराने चेहरों की निष्क्रियता से उनके खिलाफ लोगों में कुछ न कुछ असंतोष का भाव है। इसी असंतोष के चलते आम आदमी पार्टी के छह विधायक और कुछ बड़े नेता पार्टी छोड़ भी चुके हैं।  

2017 में अकाली-भाजपा गठजोड़ की सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर चरम पर थी। अकाली दल के कई नेता भ्रष्टाचार व नशा तस्करी जैसे गंभीर आरोपों का सामना कर रहे थे, लेकिन भाजपा के किसी नेता पर ऐसा कोई आरोप नहीं था। इसलिए विधानसभा चुनाव हारने के बाद भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष विजय सांपला ने स्पष्ट कहा था कि जनता का यह आक्रोश अकाली दल के खिलाफ था, भाजपा के नहीं। इस बात को लोग भी मान रहे हैं। इन सबका लाभ भाजपा को मिलता दिख रहा है।  

 

मजीठिया ने बढ़ाई मुश्किल

इन दिनों पूर्व मंत्री और अकाली नेता बिक्रम सिंह मजीठिया नशा तस्करी के एक मामले में गिरफ्तारी से बचने के लिए अदालतों के चक्कर काट रहे हैं। पंजाब में नशा एक बड़ी समस्या और चुनावी मुद्दा है। पिछले विधानसभा चुनाव के समय आई 'उड़ता पंजाब' फिल्म ने राजनीतिक वातावरण पर बहुत अधिक प्रभाव डाला था और अकाली दल को सत्ता से वंचित होना पड़ा। इस बार मजीठिया के कारण अकाली दल बादल बचाव की मुद्रा में आ गया है।

भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी कांग्रेस

गत दिनों मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के रिश्तेदार हनी के साथ ही कुछ अन्य लोगों के ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय ने छापा मारा। ईडी ने हनी के मोहाली, लुधियाना और फतेहगढ़ साहिब स्थित ठिकानों की तलाशी ली। मोहाली स्थित आवास से 7.9 करोड़ रु. जब्त किए गए। इस मामले में चन्नी का बयान ही उनके प्रति शक को और मजबूत कर रहा है। चन्नी कभी कहते हैं कि उनके रिश्तेदारों के कार्यों से उन्हें कैसे जोड़ा जा सकता है, वहीं कभी वे कहते हैं कि यह कार्रवाई बदले की भावना से केंद्र सरकार कर रही है। अब चन्नी चाहे कुछ भी कहें, यह मुद्दा जोर पकड़ चुका है।

मैं कौमी फौजी : मुस्तफा

नवजोत सिंह सिद्धू के प्रधान रणनीतिक सलाहकार मोहम्मद मुस्तफा 20 जनवरी को मालेरकोटला में एक जनसभा में यह कहते हुए सुने जा सकते हैं कि, 'मैं… का जलसा नहीं होने दूंगा। मैं कौमी फौजी हूं, कौम का सिपाही हूं… घर में घुस कर मारूंगा।'  मुस्तफा मुस्लिम आबादी के बीच खुलेआम अपने को  कौमी फौजी यानी जिहादी बता रहे हैं और हिंदुओं के खिलाफ जिहादियों की ही भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। और इसकी पत्नी रजिया सुल्ताना मालेरकोटला से कांग्रेस की प्रत्याशी हैं। कांग्रेस मुस्तफा के इस बयान पर खामोश है। 

विवादों में भगवंत मान

आम आदमी पार्टी ने अपने एकमात्र सांसद भगवंत मान को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाया है। ये वही मान हैं, जिन पर कथित तौर पर संसद में भी शराब पीकर जाने के आरोप लगते रहे हैं। इस मामले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी अप्रत्यक्ष तौर पर टिप्पणी कर चुके हैं। एक तरफ आम आदमी पार्टी नशे को खत्म करने का वायदा कर रही है, तो दूसरी ओर उसने भगवंत मान को अपना चेहरा घोषित किया है। यह बात लोगों को हजम नहीं हो रही है।

पंजाब की राजनीति में अभी तक भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सिख व पंथ विरोधी शक्तियों के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। राजनेताओं के साथ-साथ यहां के मीडिया विशेषकर पंजाबी मीडिया में बैठे वामपंथियों ने सिख समाज को सदैव संघ व भाजपा के साथ भिड़ाने, भडकाने और बेवकूफ बनाने का ही काम किया है और वे अपने प्रयास में काफी सीमा तक सफल भी रहे हैं। लेकिन अब पुरानी भ्रान्तियां टूटती दिख रही हैं। सिख समाज को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का काम पसंद आ रहा है। भले ही कथित किसान आंदोलन के नाम पर कुछ तत्वों ने पंजाब के लोगों को भाजपा और प्रधानमंत्री के विरुद्ध भड़काने का काम किया। इसके बावजूद पंजाब के अनेक किसान यह स्वीकार करते हैं कि किसी सरकार ने तो उनकी सुध ली। उल्लेखनीय है कि पंजाब में ऐसे किसानों की कोई कमी नहीं है, जो नए कृषि कानूनों को सही मानते हैं,लेकिन राजनीति प्रेरित किसान संगठनों के विरुद्ध वे कुछ नहीं बोल पाते हैं। यही कारण है कि ऐसे लोग न चाहते हुए भी आंदोलन में उतरे। कृषि कानूनों के वापस होने के बाद ये लोग प्रधानमंत्री से बहुत ही खुश हैं।

जहां तक बात करें पंथक नेताओं की तो शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक समिति के लगातार पांच बार अध्यक्ष रहे पंथरत्न जत्थेदार गुरचरण सिंह टोहरा के दोहते कंवरवीर सिंह टोहरा भाजपा में शामिल हो चुके हैं और पार्टी ने उन्हें अमलोह विधानसभा क्षेत्र से मैदान में उतारा है। इतना ही नहीं, दिल्ली गुरुद्वारा प्रबन्धक समिति के सरदार मनजिन्दर सिंह सिरसा भी भाजपा में आ चुके हैं। ऐसे बहुत सारे पंथक नेता हैं, जो भाजपा में आए हैं।

यानी अकाली दल से जुड़े बहुत सारे लोग भी भाजपा के साथ हैं और कांग्रेस के अनेक विधायक तो भाजपा में शामिल हो चुके हैं। वहीं दूसरी ओर भगवंत मान को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाने से आम आदमी पार्टी के प्रति लोगों की भावना बदलती दिख रही है। लोग कहते हैं कि एक ओर तो केजरीवाल राज्य को नशामुक्त बनाने की बात करते हैं, दूसरी ओर ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाते हैं, जिन पर शराब पीकर संसद में भी जाने की बातें कई लोग करते हैं। यदि भाजपा इसे ठीक से मुद्दा बना ले तो उसे ऐतिहासिक सफलता मिल सकती है।      

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