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संकट हरने वाली संकष्टी चतुर्थी

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jan 20, 2022, 11:37 pm IST
inभारत, धर्म-संस्कृति, दिल्ली
गणेशजी

गणेशजी

शास्त्रीय मान्यता है कि इस निर्जला व्रत का अनुष्ठान सर्वप्रथम माँ पार्वती ने अपने पुत्र गणेश की मंगलकामना के लिए किया था। तभी से हिंदू धर्म की महिलाएं अपनी संतान की दीर्घायु और खुशहाल जीवन की कामना के साथ इस निर्जला व्रत का अनुष्ठान करती आ रही हैं।

 

पूनम नेगी

सनातन धर्म में विघ्नहर्ता गणेश के अर्चन-वंदन के विविध व्रत-पर्वों में संकष्टी चतुर्थी प्रमुख पर्व है। 'संकष्टी' शब्द मूलतः संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है कष्टों से मुक्ति दिलाने वाली तिथि। माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि संकष्टी चतुर्थी के नाम से जानी जाती है। शास्त्रीय मान्यता है कि इस निर्जला व्रत का अनुष्ठान सर्वप्रथम माँ पार्वती ने अपने पुत्र गणेश की मंगलकामना के लिए किया था। तभी से हिंदू धर्म की महिलाएं अपनी संतान की दीर्घायु और खुशहाल जीवन की कामना के साथ इस निर्जला व्रत का अनुष्ठान करती आ रही हैं। इस दिन व्रती माताओं द्वारा सूर्यास्त के उपरांत चंद्रमा को अर्घ्य देकर जल, अक्षत-पुष्प, दीप-धूप, दूर्वा, रोली, मौली तथा पान-सुपारी आदि पूजन सामग्री से विघ्नहर्ता गणेश और चौथ माता (पार्वती) की विधि विधान से आराधना कर तिल के लड्डू का प्रसाद चढ़ाने की लोक परंपरा है। चूंकि यह समय शीत ऋतु का होता है, इसलिए इस पर्व पर गणेश जी को मोतीचूर व बेसन के स्थान पर तिल के लड्डू का प्रसाद चढ़ाया जाता है। कारण की तिल ऊष्ण प्रवृति का आहार तो होता ही है; धर्मशास्त्रों में इसे देवान्न की संज्ञा भी दी गयी है। इस चतुर्थी पर्व को ‘सकट चौथ, 'माघी चतुर्थी' और ‘तिलचौथ’ आदि नामों से श्रद्धाभाव से मनाया जाता है।

इस पर्व के शुभारम्भ से जुड़े कुछ अन्य रोचक पौराणिक कथानक व लोककथाएं चर्चित हैं। शिव पुराण में वर्णित कथा प्रसंग के अनुसार एक बार कैलाश पर महादेव शिव माता पार्वती और अपने दोनों पुत्रों कार्तिकेय और गणेश के साथ बातचीत कर रहे थे; तभी विपदाओं में घिरे देवगण मदद मांगने भगवान शिव के पास पहुंचे। देवताओं की विनती सुन शिवजी ने कार्तिकेय व गणेश दोनों से पूछा कि तुम में से कौन देवताओं के कष्टों के दूर करने में समर्थ है? जब दोनों ही पुत्रों ने स्वयं को इस दायित्व को निभाने में सक्षम बताया तो भगवान भोलेनाथ ने जिम्मेदारी देने से पूर्व दोनों की एक परीक्षा ली। वे बोले दोनों में से जो भी पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके लौट आएगा, उसी को यह जिम्मेदारी मिलेगी। यह सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर तत्काल पृथ्वी की परिक्रमा को निकल गये। पर गणेशजी पशोपेश में फंस गये कि वे अपने वाहन मूषकराज पर सवार होकर पृथ्वी की परिक्रमा कैसे कर सकेंगे! तभी उन्हें एक युक्ति सूझी और वे अपने स्थान से उठकर अपने माता-पिता की सात परिक्रमा करके वापस अपने स्थान पर बैठ गये। कुछ समय बाद कार्तिकेय भी परिक्रमा करके लौट आये और स्वयं को विजेता बताने लगे। पर भगवान शिव ने निर्णय देने से पूर्व गणेश से पृथ्वी के बजाय की उनकी परिक्रमा करने का कारण पूछा तो गणेश जी बोले- शास्त्र कहते हैं कि व्यक्ति की सारी दुनिया उसके माता-पिता के चरणों में ही होती है। इसलिए आप दोनों की प्रदक्षिणा से मेरी धरती की परिक्रमा पूरी हुई। गणेश जी का यह उत्तर सुनकर भगवान शिव और माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें ‘प्रथम पूज्य’ होने का आशीष देकर देवताओं के संकट दूर करने का दायित्व सौंपा दिया। 

आगे की कथा कहती है कि जिस दिन पार्वती नंदन गणेश ने दिन देवताओं की मदद कर उनके संकट दूर किये थे, वह पावन तिथि माघ माह के कृष्ण पक्ष की संकष्टी चतुर्थी थी। तभी से महादेव के आशीर्वाद से इस दिन गणपति के पूजन की परम्परा शुरू हो गयी। महाभारत में उल्लेख है कि श्रीकृष्ण की सलाह पर धर्मराज युधिष्ठिर ने भी अपने जीवन के संकटों को दूर करने के लिए इस व्रत को किया था।

सकट चौथ से जुड़ी एक और लोककथा लोकप्रिय है। पुराने समय में एक गाँव में एक बहुत ही गरीब और दृष्टिहीन बुढ़िया अपने बेटा- बहू के साथ रहती थी। वह गणेश जी की परम भक्त थी और बेटा- बहू के मिलकर श्रद्धा-भक्ति से नियमित उनका पूजन किया करती थी। एक बार माघ की संकष्टी चतुर्थी के दिन सभी गणेश जी की पूजा कर रहे थे; उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर गणेश जी प्रकट होकर उस बुढ़िया से बोले- 'बुढ़िया मां! तू जो चाहे सो मांग ले।' बुढ़िया बोली- मुझसे तो मांगना ही नहीं आता। कैसे और क्या मांगू? तब गणेशजी बोले- अपने बहू-बेटे से पूछकर मांग ले। पुत्र ने कहा- 'मां! तू धन मांग ले। बहू ने कहा- 'पोता मांग ले। बुढ़िया को लगा कि ये तो अपने-अपने मतलब की बात कह रहे हैं। अत: उसने पड़ोसिनों से पूछा। पड़ोसिनों ने कहा- तू आंखों की रोशनी मांग ले। फिर तीनों पक्षों पर विचार कर बुढ़िया बोली- 'यदि आप प्रसन्न हैं, तो मुझे नौ करोड़ की माया दें, निरोगी काया दें, आंखों की रोशनी दें, नाती-पोता दें और अंत में मोक्ष दें।' यह सुनकर तब गणेशजी बोले- 'बुढ़िया मां! तुमने तो हमें ठग लिया। फिर भी जो तूने मांगा है, वचन के अनुसार सब तुझे मिलेगा। तथास्तु कहकर गणेशजी अंतर्धान हो गये। तभी से उस बुढ़िया माई के जीवन से प्रेरणा लेकर महिलाएं अपने बच्चों की सलामती के लिए माघ की संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने लगीं।

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