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कांग्रेस का राहु (ल) काल

Written byPanchjanyaPanchjanya
Oct 3, 2021, 06:13 pm IST
in भारत, सम्पादकीय, दिल्ली

देश की सबसे बुजुर्ग पार्टी को बचाने के लिए अब कांग्रेसियों को आगे आना होगा


हितेश शंकर

देश  की सबसे बुजुर्ग पार्टी, कांग्रेस की वर्तमान दशा-दिशा पटरी पर नहीं दिख रही। यह देखते हुए कुछ लोग चिंतित हैं, हतप्रभ हैं, आश्चर्यचकित हैं तो कुछ लोग प्रसन्न हैं। प्रश्न यह है कि इस स्थिति तक कांग्रेस पहुंची कैसे? उसके सितारे क्यों गड़बड़ाये? क्या सितारे में ही कुछ गड़बड़ थी? क्या कांग्रेस के सितारे ने ही उसे ग्रहण लगा दिया? सोशल मीडिया के मंचों पर जनमानस में यह सवाल उठ रहे हैं। लोग मान रहे हैं कि कांग्रेस का बुरा समय, या कहिए राहु काल राहुल से शुरू होता है। जब लोग यह कहते हैं तो इसे सिर्फ व्यंग्यात्मक टिप्पणी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि यह कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए। जो लोग इस धारणा को खरिज करना चाहते हैं उन्हें इससे जुड़े तथ्य देखने चाहिए। तथ्य यह है कि कांग्रेस को झकझोरने वाला हाल-फिलहाल का सबसे बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम पंजाब में एक कद्दावर नेता को हटाकर एक प्यादे को आगे बढ़ाने का खेल था। कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटा कर चरणजीत सिंह चन्नी के चयन को जो लोग उस समय मास्टर स्ट्रोक बता रहे थे, उनकी अब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर नवजोत सिंह सिद्धू के इस्तीफे से मुंह छुपाने की स्थिति आ गई है। जाहिर है, इस ‘हिट विकेट’ के लिए भी उसी व्यक्ति विशेष को जिम्मेदार मानना चाहिए जिसे मास्टर स्ट्रोक का श्रेय दिया जा रहा था।

कांग्रेस के दिग्गज नेता कपिल सिब्बल कह रहे हैं कि फैसले कोई तो करता है, कौन करता है? वास्तव में उनका इशारा था कि- फैसले आकाश से नहीं हो रहे हैं, दिल्ली से हो रहे हैं, गांधी परिवार से हो रहे हैं और गांधी परिवार में भी राहुल गांधी ये सब 'खेल' कर रहे हैं। किन्तु यह खेल खेलते-खेलते उन्होंने पार्टी के साथ क्या खिलवाड़ कर डाला है, शायद इसका उन्हें अंदाजा भी नहीं है।

ब्रिटिश लीक पर कांग्रेस!
अंग्रेजों ने 'बांटो और राज करो' के सिद्धांत पर देश पर एक लंबे समय तक राज किया, विभाजक रेखाओं को बढ़ाया, क्षत्रपों को लड़ाया। इसी आधार पर वे अपना शासन स्थायी रखते थे। इतिहासकार इस बात पर एकमत हैं कि कांग्रेस ने भी पूर्ण स्वराज्य के लिए अड़ने के बजाय  ‘ट्रांसफर आॅफ पावर’ किया था, परिणामस्वरूप राजपाट जरूर बदला किन्तु रीति-नीति अंग्रेजों वाली ही थी। चाहे जवाहरलाल नेहरू, या फिर उनसे आगे भी  विशेषकर गांधी परिवार का शासनकाल देखें तो शासन की दृष्टि, चाल-ढाल ब्रिटिश ढर्रे वाली ही थी। समाज में वैमनस्य और गरीबी हटाने के लिए काम करने के बजाय इसे गहराना राजनीति की परिपाटी बन गई। राज्य सरकारों को धमकाना, लोगों को बांटने का खेल करना और फिर पंच परमेश्वर बन जाना.. अब इसका नया अध्याय यह है कि समाज को बांटने की 'नीतिगत' योजनाओं पर काम करने की ताकत उनके 'हाथ' से चली गई क्योंकि लोगों ने उन्हें लोकतंत्र के मंदिर से बुहार कर हाशिए पर डाल दिया है।
लेकिन आदत इतनी जल्दी जाती कहां है?
सो, जो बांटने की आदत है, वह पार्टी के भीतर शुरू हो गई। जिस काम में 'हाथ' सधा हुआ है, लोगों को लड़ाने का वह काम अब  घर के भीतर चल रहा है।  छत्तीसगढ़ में टीएस सिंहदेव और भूपेश बघेल की लड़ाई देखें, चाहे राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट की रार देखें, चाहे पंजाब में अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू  के बीच बजे खांडे… सब जगह पार्टी के आंगन में फैली नफरत के बीज खुद घर के मालिकों ने बोए हैं। ध्यान दीजिए, क्षत्रप सही हैं या गलत, कांग्रेस यह फैसला नहीं कर रही, बल्कि गलत को भी शह देने की जो आदत है, वह आदत कांग्रेस को डुबो रही है। इस पर तुर्रा यह कि गांधी परिवार इस पर मंथन करने, चिंतन करने के बजाय अपनी ही हनक में है। शीर्ष परिवार के अनुभवहीन अधेड़ पार्टी को अपनी बपौती मानते हैं। दरअसल कांग्रेस में परिवार के खूंटे के अलावा सबकुछ दिखावा है। कार्यसमिति जैसी कोई चीज होती है, किसी की राय का महत्व होता है, अन्य नेताओं का कुछ अनुभव हैं, इन सब बातों से बेपरवाह कांग्रेस का आत्ममुग्ध नियंता मिल-बैठकर निर्णय करने के बजाय अपनी मनमर्जी की मुहर लगाता है।
कुछ लोग एक पाले को पोसते हैं, कुछ दूसरे को कोसते हैं।

गैरों पे करम, अपनों पर सितम
बाहर से देखने पर लगता है कि कांग्रेस इस समय भारी ऊहापोह से गुजर रही है, किंतु पार्टी कार्यकर्ताओं का दर्द यह है  कि इतना सब होने पर भी घर के भीतर कांग्रेस के कर्णधार निश्चिंत हैं। गलत को ही सही माने बैठे हैं।
यही कारण है कि कार्यकर्ताओं ने ही नहीं, बल्कि दिग्गजों ने भी अपने आकाओं पर भरोसा छोड़ दिया है। जितिन प्रसाद का प्रकरण लें, ज्योतिरादित्य सिंधिया का मामला लें या कपिल सिब्बल और 22 अन्य वरिष्ठ नेताओं के समूह की चिट्ठियों को देखें। यह व्यथा बार-बार उफन कर बाहर आ रही है कि कांग्रेस के लिए अपने नेताओं की राय का कोई मतलब नहीं रह गया है।

जो पार्टी लाइन से भले मेल नहीं खाते मगर चाटुकारिता में, संपर्क में या वैमनस्य की राजनीति में बहुत सिद्धहस्त हैं, ऐसे 'सयाने' लोगों पर भरोसा करना… युवराज को अरसे से ऐसे ही लोग रास आ रहे हैं। कामरेड कन्हैया, जो कल तक कांग्रेस को पानी पी पीकर कोसते थे, पूंजीवाद को कोसते थे, परिवारवाद को कोसते थे, उन्हें कांग्रेस ने राजनीति में अपने स्थान से नीचे झुककर कंधे पर बैठा लिया है। राहुल गांधी सोच रहे हैं कि उन्होंने कन्हैया को अपने मंच पर चढ़ाया है पर वास्तविकता यह है कि कल वह उनके कंधे पर चढ़कर राहुल गांधी से ऊपर अपना कद बताएंगे। दुग्गी भर की हैसियत को हुक्म का इक्का बताना, इस खेल में कन्हैया को कमाल हासिल है। चाहे उनके गांव के बूथ पर उनको वोट न मिलते हों मगर खुद को राष्ट्रीय नेता की तरह प्रस्तुत करना …और अब तो वे राहुल गांधी के कंधे पर चढ़ गए हैं!

अपने पिता (राजीव गांधी) के दोस्त (कैप्टन अमरिंदर सिंह) के साथ तमीज से पेश आने की नसीहत का मामला हो या असम के हेमंत बिस्वसरमा द्वारा उजागर किया गया प्रकरण… पार्टी के दिग्गजों की बजाए अपने कुत्ते को तरजीह देने वाले युवराज जाने क्यों यह जताते रहते हैं कि कांग्रेस का भरोसा अब अपने पुराने लोगों पर नहीं हैं। ध्यान दीजिए, कभी भारतीय राजनीति का एकमात्र ध्रुव कही जाने वाली  पार्टी की स्थिति यह है कि प्रियंका गांधी का कार्यालय, राहुल गांधी का कार्यालय वामपंथी छात्र संगठन आइसा के पूर्व कार्यकर्ता और छात्रनेता चला रहे हैं।

चीन के चेयरमैन को अपना चेयरमैन बताते, नेताजी सुभाष चंद्र बोस को 'तोजो का कुत्ता' कहने वाले वामपंथियों का देशघाती इतिहास है, किन्तु देश के साथ घात की इस डगर पर बढ़ते-बढ़ते कांग्रेस 'आत्मघाती' स्थिति में आ गई है इसका जरा भी ध्यान पार्टी के नीति-निर्धारकों को नहीं है।
कभी  राष्ट्रीय विचारों का सम्मानित मंच रही पार्टी आज बीफ पार्टी करते घृणित गिरोहों के साथ, कभी आतंकवाद को पोसने की आरोपी पीएफआई के साथ, नरसंहार करने वाले नक्सलियों के हिमायतियों के साथ, खालिस्तानी नारे उछालने वाले उपद्रवियों के साथ उनके पीछे खड़ी नजर आती है तो इसे घटनाओं में अपवाद के बजाय चयन का स्थायी दोष कहना चाहिए।

प्रश्न है – क्या कांग्रेस की अपनी कोई विचारधारा बची है? आज पार्टी अपनी लीक के बजाय एक आयातित विचारधारा, जो खूनी क्रांति में भरोसा करती है, उसी राह पर बढ़ती नजर आती है। याद कीजिए, जेएनयू के  विवादित प्रकरण के बाद भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे नारे और कन्हैया कुमार एक दूसरे के पर्याय जैसे हैं।
 क्या अब यही कांग्रेस का भी घोष वाक्य नहीं हो गया?

आत्ममंथन की आवश्यकता
यह दोषारोपण की बात नहीं है, यह कभी अति प्रतिष्ठित और मजबूत रही अनुभवी पार्टी के लिए आत्ममंथन की बात है। किन्तु इस आत्ममंथन को सिर्फ गांधी परिवार के भरोसे छोड़ना गड़बड़ होगा। याद कीजिए, इस देश में कोई ऐसा परिवार नहीं जिसमें पहले के समय कम से कम एक सदस्य या फिर पूरा परिवार ही पक्का कांग्रेसी न रहा हो। आज स्थिति क्यों बदली है? यह लोगों का जो पालाबदल है, मनबदल है, वह क्यों हुआ है? वह कांग्रेस के अन्य नेताओं के कारण पैदा नहीं हुआ बल्कि गांधी परिवार की जो बेरुखी और अपने तरीके से फैसले लेने का जमीन से कटा हुआ अहंकारी अनमनापन है, उससे लोगों ने धीरे-धीरे कांग्रेस को मन से उतार दिया है। अब इस चिंतन की जिम्मेदारी कांग्रेस के लिए वास्तव में फिक्रमंद नेताओं पर है। दूसरा कारण यह है कि कांग्रेस के शीर्ष परिवार में खुद मतभेद और अंतर्विरोध बहुत गहरे हैं। अहमद पटेल जब तक थे, तब तक सोनिया गांधी के मन की रणनीतियां बनाते और अमल करते थे और राहुल को संतुलित भी करते थे। राहुल की स्थिति यह है कि उन्हें अपने तुक्के ही तीर लगते हैं। जबकि असली तीरंदाजों को वह गिनते ही नहीं।

और तो और, रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका फिरोज वाड्रा की भी आकांक्षाएं कम नहीं हैं। रॉबर्ट वाड्रा राहुल गांधी से ज्यादा संभावनाएं प्रियंका में देखते हैं। वे तो मानते हैं कि वे या उनकी पत्नी देश की किसी भी सीट से चुनाव लड़ और जीत सकते हैं।

बहरहाल, अंतर्विरोधों से घिरा कुनबा, जिसकी राजनीतिक परिपक्वता पर उसका दंभ भारी है, संकटकाल में कांग्रेस की स्टेयरिंग थामे है। ऐसे में कांग्रेस को अगर देश में अपनी भूमिका बनाए रखनी है, इस पुरानी पार्टी को और परिपाटी को जिंदा रखना है तो पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को इस परिवार को एक ओर रख भविष्य के बारे में सोचना पड़ेगा। कांग्रेस की सेहत के लिए यही जरूरी है। कहा जाता है कि लोकतंत्र में विपक्ष मजबूत हो, यह आवश्यक है। मगर कांग्रेस को समझना पड़ेगा कि विपक्ष मजबूत हो, इसकी जिम्मेदारी सत्तापक्ष पर नहीं है। इसकी जिम्मेदारी खुद विपक्ष, यानी कांग्रेस पर ही है।

@hiteshshanker

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