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कई क्षेत्रों में हिंदू हुए अल्पसंख्यक

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jul 21, 2021, 12:02 pm IST
inभारत, पश्चिम बंगाल

संजीव कुमार सिंह


पश्चिम बंगाल में जनांकिकी तेजी से बदल की ओर। इसके मूल में अवैध घुसपैठिए और राजनीतिक स्वार्थ साधने वाले नेताओं की संकीर्ण नीतियां। राज्य के 8,000 गांव हिंदू विहीन और एक तिहाई से अधिक विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां जीत का निर्णय मुस्लिमों के हाथ में। इससे हिंदूबहुल पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक पहचान खतरे में आ गई है

भारतवर्ष का उदीयमान सितारा जहां के आंगन में सांस्कृतिक पहचान के रंग है… जहां की मिट्टी से त्यागी, बलिदानी और आंदोलनकारियों की खुशबू आती है… जो सद्भाव के गीत से भारत का परिचय कराता है… जहां देश की आजादी के लिए बलिदान के रंग का सुनहरा इतिहास छिपा है… जहां के लोगों के ज्ञान का रंग और जहां के लोगों ने साहित्य, खेल, कला और संस्कृति तथा जंगे-आजादी एवं ज्ञान-विज्ञान की आलोकित आभा से विश्व में अपनी अलग पहचान बनाई… आज मां, माटी और मानुष की पहचान वाला वह बंगाल अपनी बदहाली पर पश्चाताप कर रहा है। यहां के 70 प्रतिशत बहुसंख्यक आत्मचिंतन और संघर्ष के भंवर में समाते चले जा रहे हैं और 30 प्रतिशत अल्पसंख्यक मानवता और नागरिकता की परिभाषा की उलटी गिनती लिख रहे हैं।

मुस्लिम आबादी बढ़ने से बदला सांस्कृतिक परिदृश्य
जनांकिकी इतिहास गवाह है, बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल को मिलाकर पहले बंगाल हिन्दू बहुसंख्यक हुआ करता था। अब भारत में बच रहे हिंदू बहुल पश्चिम बंगाल का एक बहुत बड़ा हिस्सा, पड़ोसी बांग्लादेश के घुसपैठियों से आबाद होकर मिनी बांग्लादेश बन गया है, जहां मुस्लिम बहुसंख्यक हैं और हिन्दू मात्र 6 प्रतिशत बचे हैं। हालात ये हैं कि पश्चिबम बंगाल में मुस्लिम आबादी 2001 में 25 प्रतिशत थी, जो 2011 में बढ़कर 27 प्रतिशत हो गई। वर्तमान में भारत-बांग्लादेश के सीमावर्ती इलाकों से कट्टरपंथियों द्वारा हिन्दुओं को भयभीत कर भगाए जाने की सूचनाएं आ रही हैं। इससे  बांग्लादेश की सीमा से सटे पश्चिम बंगाल, बिहार और असम के अधिकतर क्षेत्रों का राजनीतिक व सांस्कृतिक परिदृश्य बदल गया है।
अविभाजित भारत के समय बंगाल में अल्पसंख्यक आबादी लगभग 30 प्रतिशत थी और विभाजन के बाद भारी संख्या में मुस्लिम बांग्लादेश में जा बसे, तब यहां अल्पसंख्यक आबादी काफी कम हो गई। मगर वर्तमान परिवेश की बात करें तो एक बार फिर से मुस्लिम समुदाय ने अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराते हुए अपनी आबादी को दोबारा 30 प्रतिशत तक पहुंचा दिया है। यदि आंकड़ों की बात की जाए तो जिस तरह से बंगाल में मुस्लिम आबादी का विकास हो रहा है, इसके कई परिणाम निकल सकते हैं जो किसी भयावहता की ओर इशारा कर रहे हैं। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पिछले 10 वर्ष में जहां हिंदू समुदाय की आबादी 7 प्रतिशत तक बढ़ी है, वहीं मुस्लिम आबादी 8 प्रतिशत तक बढ़ी है।

दमन के कारण हिंदुओं का पलायन
प. बंगाल के 38,000 गांवों में 8000 गांव अब इस स्थिति में हैं कि वहां एक भी हिन्दू नहीं रहता, या यूं कहना चाहिए कि उन्हें वहां से भगा दिया गया है। बंगाल के अल्पसंख्यक बहुल मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर आदि जिलों में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत 50 और इससे अधिक है जहां हिंदुओं को मुस्लिम दमनकारी नीतियों का सामना करना पड़ता है। इसमें मुर्शिदाबाद में 47 लाख मुस्लिम और 23 लाख हिन्दू, मालदा में 20 लाख मुस्लिम और 19 लाख हिन्दू, और उत्तरी दिनाजपुर में 15 लाख मुस्लिम और 14 लाख हिन्दू हैं। दमनकारी गतिविधियों से तंग आकर पिछले कई वर्ष से यहां पलायन का दौर जारी है। अपने आप को कमजोर पाकर यहां के हिंदू समुदाय के लोग पलायन को मजबूर हैं। वे अपना घर-बार और संपत्ति  कोसंकट में डाल कर दूसरी जगह को आशियाना बना रहे हैं जिसका लाभ इन पर शासन करने वाले लोग कई मायने में उठा रहे हैं।

घुसपैठियों ने बदले समीकरण
रोहिंग्या के मुद्दे पर भी इन क्षेत्रों में काफी सुर्खियां बनी हुई हैं। पहले पड़ोसी मुल्क के लोगों ने यहां पांव जमाने के लिए भाईचारा और सद्भाव का सहारा लिया मगर अब वह बात नहीं है। कम आबादी वाली हिंदू क्षेत्रों में ये लोग जबरन प्रवेश कर उनकी जमीन और प्रमुख स्थलों को निशाना बनाकर उस पर अपना कब्जा जमा रहे हैं। बंगाल की सांस्कृतिक और भाषायी पहचान की खूबसूरती पर अब किसी और का कब्जा हो रहा है। इसकी सुधि लेने के लिए हिंदुओं को किसी मसीहा का इंतजार है।  यहां बांग्लादेश की सीमा से सटे बंगाल के हिस्सों में आने वाले हिंदुओं को खदेड़ा जा रहा है। उनके घरों और मंदिरों पर कब्जा जमाया जा रहा है। मगर इस दर्द भरी दास्तान पर मरहम लगाने के लिए कोई उचित समाधान किसी के पास नहीं है।

जेनेट लेवी की आशंका
मशहूर अमेरिकी पत्रकार जेनेट लेवी ने अपनी पुस्तक द मुस्लिम टेकओवर आॅफ वेस्ट बंगाल में दावा किया है कि भारत का एक और विभाजन होगा और वह भी तलवार के दम पर। उन्होंने आशंका व्यक्त की है कि कश्मीर के बाद पश्चिम बंगाल में अब गृहयुद्ध होगा और अलग देश की मांग की जाएगी। बड़े पैमाने पर हिंदुओं का कत्लेआम होगा और मुगलिस्तान की मांग की जाएगी। उन्होंने यह भी दावा किया है कि यह सब ममता बनर्जी की सहमति से होगा। जेनेट लेवी ने कहा है कि 2013 में पहली बार बंगाल के कुछ कट्टरपंथी मौलानाओं ने अलग मुगलिस्तान की मांग शुरू की। इसी साल बंगाल में हुए दंगों में सैकड़ों हिंदुओं के घर और दुकानें लूट ली गई और कई मंदिरों को भी तोड़ दिया गया। इन दंगों में सरकार द्वारा पुलिस को आदेश दिए गए कि वह दंगाइयों के खिलाफ कुछ ना करें।

जब हमारे सामने ये आंकड़े आते हैं कि राज्य के 46 विधानसभा क्षेत्रों में मुसलमान, आबादी का 50 प्रतिशत या उससे अधिक हैं, 16 विधानसभा क्षेत्रों में मुसलमान मतदाताओं का प्रतिशत 40 से 50 के बीच है और 33 क्षेत्रों में 30 से 40 के बीच, तो जेनेट लेवी की आशंका सच लगने लगती है। इन आंकड़ों से साफ है कि ठीक एक तिहाई सीटों पर मुसलमानों का समर्थन, किसी भी उम्मीदवार को विजय दिलवा सकता है। इसके अलावा जिन क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी 20 से 30 प्रतिशत है, वहां भी जीत की चाभी उनके पास ही है। वहां वे अपने समर्थक उम्मीदवार के पक्ष में जा कर सरकार बनाने-बिगाड़ने के खेल में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

पश्चिम बंगाल में पहले ईसाई मिशनरियों के चलते हिन्दू आबादी में बड़े पैमाने पर सेंधमारी हुई जिसके बाद मुस्लिम-वामपंथी गठजोड़ ने राज्य में हिन्दुओं के अस्तित्व को संकट में डाल दिया। हिन्दू संगठन और धार्मिक संस्थानों पर लगातर हमलों का इन राज्यों में लंबा इतिहास रहा है। आधुनिक भारत में इस तरह के सामाजिक परिवर्तन और राजनीतिक स्वार्थ के चलते हिन्दुओं में तनाव का बढ़ना चिंता का विषय है।

बंगाल की माटी में जन्मे सन्यासी शासक बल्लभ सेन, प्रोफेसर मेघनाद साहा, स्वामी विवेकानंद, रवींद्र नाथ ठाकुर, चैतन्य महाप्रभु, रामकृष्ण परमहंस, सत्येंद्र नाथ बोस, अवनींद्र नाथ ठाकुर, आचार्य प्रफुल्ल चंद्र रॉय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, श्री अरविंद, बंकिम चंद्र चटर्जी, रमेश चंद्र मजूमदार, आशुतोष मुखर्जी जैसे महापुरुषों ने अपनी विचारधारा और सोच से समस्त संसार को प्रभावित किया। राष्ट्रधर्म और सामाजिक एकता की विचारधारा की जो परिभाषा उन्होंने वैश्विक स्तर पर फैलाई उसे पूरे विश्व ने स्वीकार किया। मगर आज के राजनीतिक ध्रुवीकरण और गैर जिम्मेदाराना विचारधाराओं ने सोनार बांग्ला की परिभाषा को मजबूत करने के बजाय झकझोर कर रख दिया है। इन महापुरुषों ने बंगाल के लिए जो सपने संजोए थे, उन सपनों का जनांकिकी के आधार पर विभाजन हो रहा है । बंगाल की सांस्कृतिक गौरवशाली विरासत की अमृत धारा की नदी सूखने लगी है।

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