अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटने को तैयार इमरान सरकार
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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटने को तैयार इमरान सरकार

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jun 18, 2021, 11:53 am IST
inविश्व, जम्‍मू एवं कश्‍मीर

संतोष कुमार वर्मा                                                                                   

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पाकिस्तान में सदैव से बाधित रही है| यहां न केवल सैन्य शासन लोगों और प्रेस की आजादी को दबाता रहा है,बल्कि कथित लोकतांत्रिक सरकारें भी इस दमन में किसी भी तरह से पीछे नहीं रही हैं। इमरान खान की सरकार इन सबको पीछे छोड़कर एक नया कीर्तिमान स्थापित करने की राह पर अग्रसर है।

    अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पाकिस्तान में सदैव से बाधित रही है| यहां न केवल सैन्य शासन लोगों और प्रेस की आजादी को दबाता रहा है,बल्कि कथित लोकतांत्रिक सरकारें भी इस दमन में किसी भी तरह से पीछे नहीं रही हैं। इमरान खान की सरकार इन सबको पीछे छोड़कर एक नया कीर्तिमान स्थापित करने की राह पर अग्रसर है। इस  सरकार ने पाकिस्तान मीडिया डेवलपमेंट अथॉरिटी आर्डिनेंस, 2021 का मसौदा तैयार किया है। सरकार के अनुसार जिसका उद्देश्य मीडिया कानूनों में एकरूपता लाना है। इसके द्वारा कई मौजूदा कानूनों जैसे प्रेस काउंसिल आर्डिनेंस 2002, प्रेस, न्यूज़ पेपर्स, न्यूज़ एजेंसीज एंड बुक्स रजिस्ट्रेशन आर्डिनेंस—2002, न्यूज़ पेपर्स एम्पलोयीज (कंडीशन्स ऑफ़ सर्विस) एक्ट 1973, पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आर्डिनेंस—2002 जिसे PEMRA अमेंडमेंट एक्ट 2007 द्वारा संशोधित किया गया था और मोशन पिक्चर्स आर्डिनेंस  1979 इत्यादि को समाप्त कर एक कानून बनाना है।

    एक ओर जहां सरकार इसे प्रशासनिक कार्यकुशलता और वर्तमान समय की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त विधान बता रही है, वहीं दूसरी ओर इस मीडिया नियामक प्राधिकरण स्थापित करने के प्रस्ताव की पाकिस्तान के पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और विपक्ष ने भी कड़ी आलोचना की है। पाकिस्तान ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (पीबीए), ऑल पाकिस्तान न्यूजपेपर्स सोसाइटी, काउंसिल ऑफ पाकिस्तान न्यूजपेपर्स एडिटर्स और पाकिस्तान फेडरल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स सहित सभी मीडिया संगठनों ने प्रस्तावित अध्यादेश को " असंवैधानिक और कठोर कानून" करार दिया है।

    क्या है इस अध्यादेश में ?

    इस अध्यादेश का मसौदा यह बताता है कि प्रस्तावित अध्यादेश में सरकार की इच्छा सर्वोपरि हो जाएगी। इस मसौदे के अनुसार, सरकार नीति संबंधी मामलों पर प्राधिकरण को निर्देश जारी कर सकती है और ऐसे निर्देश प्राधिकरण के लिए बाध्यकारी होंगे। देश में संचालित होने वाले मीडिया संगठन, हिंसा या घृणा को उकसाने वाले किसी भी कार्यक्रम को प्रसारित, वितरित या ऑनलाइन उपलब्ध नहीं करा सकेंगे, जो कानून और व्यवस्था के रखरखाव, राज्य के प्रमुख, सशस्त्र बलों के सदस्यों या राज्य के विधायी या न्यायिक अंग के विरुद्ध पूर्वाग्रह से ग्रस्त हों अथवा उनकी छवि को हानि पहुंचाने वाले हों। इस मसौदे में इस प्राधिकरण को इतना शक्तिशाली बनाया गया है कि इसके पास किसी भी व्यक्ति, प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक अथवा डिजिटल मीडिया या ऑनलाइन कार्यक्रम के किसी भी प्लेटफॉर्म से मुद्रण या प्रसारण को बिना किसी कारण बताओ नोटिस जारी कर रोकने की शक्ति होगी। इसमें मीडिया संगठनों को ऐसा कुछ भी प्रसारित या वितरित करने से प्रतिबंधित किया गया है, जो "झूठा या आधारहीन या दुर्भावनापूर्ण हो अथवा जिसे मानने के लिए पर्याप्त कारण मौजूद हों, कि वह झूठा, आधारहीन या दुर्भावनापूर्ण हो सकता है।" अपने संदेह की प्रति पुष्टि हेतु प्राधिकरण किसी भी जानकारी, लेखा परीक्षित वित्तीय विवरण या कोई अन्य प्रासंगिक दस्तावेज भी मांग सकता है। प्राधिकरण बिना किसी सूचना के "जनहित की आवश्यकता के कारण" किसी मीडिया स्टेशन के उपकरणों को जब्त कर सकता है या उसके परिसर को सील कर सकता है।

    पीएमडीए में नया क्या है ?

    इस अध्यादेश में पीएमडीए को "एक स्वतंत्र, कुशल, प्रभावी और पारदर्शी" प्राधिकरण के रूप में वर्णित किया गया है जो डिजिटल मीडिया सहित सभी प्रकार के मीडिया को विनियमित करेगा। परन्तु वास्तव में यह सर्वसत्ताधिकार प्राप्त ऐसा संगठन होगा जिसे कई मायनों में गैर कानूनी अधिकार प्राप्त होंगे। इस अध्यादेश में यह कहा गया है कि अब प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ—साथ डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की स्थापना और संचालन के लिए भी लाइसेंस की आवश्यकता होगी और इस डिजिटल मीडिया को ऑनलाइन समाचार पत्र, वेब टीवी चैनल, ओटीटी प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन समाचार चैनल, वीडियो लॉग और यूट्यूब चैनल, नेटफ्लिक्स, अमेज़ॅन प्राइम आदि के रूप में वर्णित किया गया है।

    इस मसौदे में बताया गया है कि जो प्राधिकरण बनाया जाएगा, स्थापना के बाद इस प्राधिकरण में एक अध्यक्ष और 11 सदस्य शामिल होंगे, जिन्हें पाकिस्तान के राष्ट्रपति द्वारा संघीय सरकार की सलाह पर नियुक्त किया जाएगा। प्राधिकरण के अध्यक्ष की नियुक्ति सूचना सेवा समूह के अधिकारियों के ग्रेड 21-22 के पैनल से की जाएगी। प्रस्तावित कानून के तहत सरकार एक मीडिया कंप्लेंट काउंसिल की स्थापना भी करेगी, जिसका कार्य "किसी व्यक्ति या संगठनों द्वारा समाचार, विश्लेषण, प्रिंट, प्रसारण, फिल्मों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर कार्यक्रमों के किसी भी पहलू के खिलाफ या किसी भी मीडिया सेवा प्रदाता के विरुद्ध की गई शिकायतों को प्राप्त कर उसे जांचना और उसकी समीक्षा करना होगा।

    इसके साथ ही मसौदे में यह भी कहा गया है कि इस आर्डिनेंस के अनुरूप लाइसेंसधारी व्यक्ति और पंजीकृत संस्था, इस अध्यादेश के किसी भी प्रावधान का उल्लंघन करता है, तो वह अपराध का दोषी होगा, जिसके लिए तीन साल का कारावास या ढाई करोड़ रुपये तक का जुर्माना अथवा दोनों हो सकते हैं। और साथ ही इसके लिए अपील के प्रावधानों को बहुत ही कठिन बना दिया गया है। इस अध्यादेश के मसौदे के अनुसार इस प्राधिकरण द्वारा सुनाये गए निर्णयों की अपील के लिए मीडिया ट्रिब्यूनल का गठन किया जाएगा और पीड़ित व्यक्ति अथवा संस्था 30 दिनों के भीतर मीडिया ट्रिब्यूनल में अपील दायर कर सकता है। और मीडिया ट्रिब्यूनल द्वारा लिए गए निर्णय की वैधता पर सवाल उठाने का अधिकार केवल सर्वोच्च न्यायालय के पास होगा!

    यह प्रस्तावित कानून इमरान खान की पूर्णसत्तावादी मानसिकता का नवीनतम उदाहरण है, जहाँ सत्ता लोकतांत्रिक मुखौटे के पीछे सैन्य संस्थान द्वारा अपने हाथों में सकेंद्रित की जा रही है।  सरकार जो वर्तमान कानूनों को निरस्त कर प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया पर नियंत्रण रखने के लिए एक सर्व-शक्तिशाली नियामक निकाय की स्थापना करना चाहती है, जो किसी भी तरह से सरकार और सबसे महत्वपूर्ण सेना के खिलाफ उठने वाली आवाज को, एक तरह से कानूनी रूप देकर दबाया जा सके। दूसरी ओर सरकार द्वारा किये जाने वाले अन्याय से निपटने के लिए न्यायालय की शरण में जाने की व्यवस्था को भी अवरुद्ध कर दिया गया है। इस प्राधिकरण के मनमाने निर्वाचन के विरुद्ध अपील का अधिकार भी सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किये गए मीडिया ट्रिब्यूनल के पास होगा। और न्यायपालिका की इस पूरी प्रक्रिया में उपस्थिति केवल सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर होगी। इन स्तरों पर एक साधनहीन डिजिटल पोर्टल संचालक किस तरह अपने न्याय की लड़ाई लड़ पायेगा यह स्पष्ट ही है।

    यह एक प्रकार से जनरल अयूब खान के युग की गहन सेंसरशिप की पुनरावृत्ति की तरह है, जब जनता में फातिमा जिन्ना की देशव्यापी लोकप्रियता और सेना के विरोध के चलते प्रेस एंड पब्लिकेशन आर्डिनेंस (पीपीओ)  1963 लाया गया था, जिसमें प्रेस की स्वतंत्रता को रेजिमेंटल प्रावधानों के द्वारा मिलिट्री बूटों के तले कुचल दिया गया। मीडिया के प्रति यह व्यवहार केवल अयूब खान का ही नहीं था, बल्कि यह कमोबेश हर पाकिस्तानी शासक का होता है। इमरान खान इसमें आगे की और कहीं अधिक दुर्दांत कड़ी हैं। ईयू क्रॉनिकल ने अक्टूबर 2020 में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया था कि पाकिस्तान में स्वतंत्र पत्रकारिता के प्रति असहिष्णुता की कार्रवाइयां जुलाई, 2018 में इमरान खान के प्रधानमंत्री बनने के बाद से नाटकीय रूप से बढ़ी हैं। अभी हाल ही में असद तूर और हामिद मीर के प्रकरण का पटाक्षेप भी नहीं हो पाया है। इस समय पाकिस्तान का मीडिया भयंकर वित्तीय दबावों का सामना कर रहा है। वहीं सरकार द्वारा उसके कामों की आलोचनात्मक रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को सेंसर किया जा रहा है, उन पर झूठे मुकदमे लादे जा रहे हैं। यहां तक कि अपहरण, मारपीट और हत्या भी की जा रही है।  इमरान खान की सरकार अब मीडिया के इस उत्पीड़न को इस अध्यादेश द्वारा कानूनी रूप देने का विचार रखती है!

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