पेटा-अमूल विवाद : गाय बहाना, देश निशाना
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पेटा-अमूल विवाद : गाय बहाना, देश निशाना

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jun 7, 2021, 12:06 pm IST
inदिल्ली

पेटा इंडिया ने भारत की सहकारी दूध कंपनी अमूल को एक पत्र लिखकर उसे पशु दूध छोड़कर वीगन दूध उत्पादित करने की सलाह दी। इस पत्र पर दोनों संस्थाओं के बीच जमकर रार मची है। यहां सवाल यह है कि पेटा इंडिया ने यह सलाह क्यों दी? क्या पेटा का यह पत्र विदेशी कंपनियों के इशारे पर है? यह पत्र क्या भारतीय संस्कृति और व्यापारिक ताने-बाने पर सीधा आघात करने के इरादे से है?

गायों को इस पृथ्वी की अधिष्ठात्री माना जाता है। भारत का वाङ्मय गाय के दूध को अमृत और मां के दूध के गुणों से परिपूर्ण बताता है। हिंदू ही नहीं, भारत में विकसित अन्य मतों और विदेशी मजहबों में भी गाय और गाय के दूध का गुणगान है। लेकिन एक विघ्नसंतोषी और खललप्रिय अंतरराष्ट्रीय एनजीओ पीपल फॉर एथिकल ट्रीटमेंट आॅफ एनीमल (पेटा) को यह स्वीकार्य नहीं है। हिंदू परंपराओं को निशाना बनाने के लिए कुख्यात पेटा ने अब भारतीय उद्यम और कारोबार जगत को सीधा निशाना बनाने का षड्यंत्र किया है। गौर करें, पहले हिंदू त्योहार और परंपराएं, अब हिंदुस्थानी कारोबार।

देश की दुग्ध आवश्यकताओं को पूर्ण करने में अग्रणी अमूल कंपनी को पेटा ने सवा दो पेज का एक पत्र लिखा है। अमूल के प्रबंध निदेशक आर.एस. सोढ़ी को संबोधित यह पत्र पेटा इंडिया की वीगन आउटरीच कोआॅर्डिनेटर डॉ. किरण आहूजा ने 27 मई, 2021 को लिखा है। इसमें अमूल को गाय के दूध का उत्पादन करने में अपने संसाधन व्यर्थ करने के बजाय निरंतर विकसित हो रहे वीगन खाद्य एवं दुग्ध बाजार का लाभ उठाने की सलाह दी गई है। अमूल को पेटा की ओर से यह पत्र पहला है, ऐसा नहीं है। पेटा ने इससे पहले 17 फरवरी, 2020 को भी अमूल को इस बाबत पत्र लिखा था। यह पत्र पेटा के सीईओ ने लिखा था। किरण आहूजा ने उसी पत्र के अनुसरण में ताजा पत्र लिखा है जिस पर विवाद हो रहा है। अमूल भारतीय डेयरी सहकारी सोसाइटी है जिसका प्रबंधन गुजरात को-आॅपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन करता है।

पेटा इंडिया का पत्र
पेटा इंडिया ने अपने पत्र में लिखा है कि हम वनस्पति आधारित उत्पादों की मांग पूरी करने का प्रयास करते हुए अमूल को उसके संसाधन व्यर्थ करने के बजाय बढ़ते वीगन खाद्य एवं दुग्ध बाजार से लाभान्वित होने के लिए प्रोत्साहित करना पसंद करेंगे। अन्य कंपनियां बाजार में आ रहे बदलावों पर भली-भांति प्रत्युत्तर दे रही हैं और अमूल भी यह कर सकती है। पत्र में आगे लिखा गया है कि एक पुरानी कहावत है कि ‘यदि आप उन्हें हरा नहीं सकते तो उनके साथ हो जाइए’-और अमूल को निश्चित रूप से वीगन उत्पादों की बढ़ती मांग का लाभ होगा। वस्तुत:, वीगन खाद्य एवं पेय के लिए मांग इतनी बढ़ रही है कि ग्रांड व्यू रिसर्च की रिपोर्ट यह तक खुलासा करती है कि वैश्विक डेयरी वैकल्पिक बाजार के 2028 तक बढ़ कर 52.58 बिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। रिपोर्ट में लिखा है कि पर्यावरणीय एवं नैतिक चिंताओं के कारण उपभोक्ताओं की बदलती प्राथमिकता के परिणामस्वरूप वीगन और इस तरह के भोजन को व्यापक स्तर पर अपनाया जा रहा है जिससे आगामी समय में बाजार वृद्धि पर सकारात्मक असर पड़ने का अनुमान है। इसके अलावा विश्व की 75 प्रतिशत जनसंख्या लैक्टोज से पीड़ित है। इसलिए हैरानी नहीं होनी चाहिए कि वीगन दूध की बिक्री इतनी बढ़िया है कि यूके का गार्जियन अखबार उसे ‘श्वेत स्वर्ण’ कहता है।
पत्र में आगे लिखा गया है कि वीगन उत्पादों से मिलने वाला व्यावसायिक अवसर आपकी सफलता में निश्चित रूप से मदद करेगा। वैश्विक खाद्य निगम कारगिल की 2018 की रिपोर्ट बताती है कि पूरी दुनिया में डेयरी उत्पादों के संदर्भ में उपभोक्ताओं का नजरिया बदल रहा है। कई संस्कृतियों में कभी संतुलित आहार के आवश्यक अंग रहे डेयरी उत्पादों का उपयोग पिछले दो दशकों में काफी घटा है। दरअसल उपभोक्ता डेयरी उत्पादों में एलर्जी पैदा करने वाले तत्वों, हार्मोन के उपयोग और कुछ उत्पादों के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत नुकसानदायक होने से पैदा होने वाली चिंताओं के कारण अपना व्यवहार बदल रहे हैं। अमेरिका के प्रमुख डेयरी उत्पादक डीन फऊड्स ने जब 2019 में स्वयं को दिवालिया घोषित किया तो इससे पशु दूध की खपत में गिरावट और वीगन दूध की लोकप्रियता बढ़ने का संकेत मिला।

पेटा इंडिया ने अपने पत्र में आगे नेस्ले, डेनमार्क की आरला फूड्स, अमेरिका स्थित चोबानी, अमेरिका की ही जनरल मिल्स, कनाडा की सापुतो आदि उन डेयरी कंपनियों का उल्लेख किया है जिन्होंने बीते सालों में वीगन उत्पाद पेश किए। इसी संदर्भ में यूनीलीवर के सीईओ एलन जोप का हालिया बयान भी उद्धृत किया गया है जिसमें उन्होंने दुनिया के वीगन उत्पादों की ओर बढ़ने की बात कही है। पेटा के पत्र के मुताबिक ब्रिटिश वित्तीय सेवा कंपनी बार्कले के विश्लेषकों का अनुमान है किदशक के अंत तक वीगन खाद्य एवं दुग्ध बाजार 1000 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ सकता है। पेटा इंडिया ने आगे लिखा है कि ये कंपनियां जानती हैं कि स्वास्थ्यवर्धक खाद्य के तौर पर पशु दूध की साख घट रही है और उपभोक्ता आज जलवायु परिवर्तन से इसके जुड़ाव, इसमें एंटीबायोटिक एवं हार्मोन के उपयोग और पशुओं के प्रति क्रूरता से चिंतित हैं। यूके के किशोर अब गाय के दूध को वनस्पति आधारित दूध से कम स्वास्थ्यप्रद मानते हंष और सोशल मीडिया को धन्यवाद कि भारत के किशोर भी पीछे नहीं हैं।

अमूल के लाभ के लिए पेटा बेचैन क्यों
इस पूरे पत्र को गौर से पढ़ें तो कुछ बातें समझ में आएंगी। पहला सवाल तो यही उठता है कि पेटा इंडिया अमूल के व्यावसायिक लाभ के लिए इतनी बेचैन क्यों है। इस पत्र में अमूल के लिए लोभ (व्यावसायित वृद्धि का अनुमान) है, चेतावनी (अमेरिकी डेयरी कंपनी के दिवालिया होने का उल्लेख) है, लांछन (डेयरी उत्पादों में मिलावट का उल्लेख) है, अनभिज्ञ होने का उपहास (बाकी कंपनियां जानती हैं, इसलिए कर रही हैं) है। विभिन्न विदेशी रिर्पोेटों, अनुमानों और बयानों से आतंकित करने की चेष्टा है। पेटा कोई व्यावसायिक संस्था तो है नहीं कि वह अमूल के व्यावसायिक हित की चिंता करे? ऐसा भी नहीं है कि पेटा इंडिया ने अमूल को महज कोई सामयिक सलाह दी है। पेटा ने सवा साल पहले भी इस बाबत पत्र लिखा था, ताजा पत्र उस पहले पत्र के फॉलोअप में लिखा गया है। यानी यह पेटा का सुविचारित अभियान है। क्यों?
इसका जवाब मिल जाता है स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सह-समन्वयक अश्विनी महाजन के ट्वीट से। इस ट्वीट में लिखा है, ‘क्या आप नहीं जानते कि ज्यादातर डेयरी किसान भूमिहीन हैं। इस विचार को लागू करने से कईयों की आजीविका का स्रोत खत्म हो जाएगा। ध्यान रहे दूध हमारे विश्वास में है, हमारी परंपराओं में, हमारे स्वाद में, हमारे खाने की आदतों में पोषण का एक आसान और हमेशा उपलब्ध स्रोत है।’ महाजन का यह ट्वीट अमूल के प्रबंधन निदेशक आर.एस. सोढ़ी ने रीट्वीट किया है।

पेटा इंडिया पर प्रतिबंध की अमूल की मांग
पेटा इंडिया के पत्र पर अमूल की ओर से जोरदार जवाबी हमला बोला गया है। अमूल के प्रबंध निदेशक आरएस सोढ़ी ने कहा, ‘देश के सहकारी डेयरी सेक्टर में 10 करोड़ से अधिक किसान कामकाज कर रहे हैं। अगर कंपनी दूध का उपयोग करना बंद कर देगी तो इन 10 करोड़ लोगों को रोजगार कैसे उपलब्ध कराया जाएगा?’ सोढ़ी ने कहा कि वनस्पति आधारित खाद्य कंपनियां दूध के नाम पर ही मलाई काट रही हैं।
इसके बाद अमूल के उपाध्यक्ष वलमजी हंबल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मामले में हस्तक्षेप का आग्रह किया। हंबल ने आरोप लगाया कि पेटा इंडिया भारतीय डेयरी उद्योग की छवि खराब कर 10 करोड़ लोगों की आजीविका बर्बाद करने की कोशिश कर रही है। इस एनजीओ की मंशा कई विदेशी कंपनियों से प्रेरित लगती है। उन्होंने आगे कहा, ‘भारत में इस तरह के संगठनों की गतिविधियों को रोकने के लिए, गुजरात के दुग्ध उत्पादक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह करते हैं कि पेटा को बैन करने के लिए जरूरी कार्यवाही करें ताकि गलत सूचना अभियान से देश के डेयरी उद्योग की छवि कोई धूमिल न कर सके।’ उन्होंने आरोप लगाया कि पेटा का असली उद्देश्य सिंथेटिक दूध पैदा करनेवाली मल्टीनेशनल कंपनियों की मदद करना है।
हंबल के मुताबिक ‘डेयरी सेक्टर भारत के सकल घरेलू उत्पाद में महत्वपूर्ण योगदानकर्ता है लेकिन इस संगठन जैसे अवसरवादी तत्वों की फैलाई झूठी खबर से जीडीपी बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। ऐसे संगठन भारत के दुग्ध उत्पादकों को बेरोजगार करने की साजिश का हिस्सा हैं।’ उन्होंने जोर दिया कि डेयरी उद्योग से जुड़े 10 करोड़ भारतीय दूध दूहते वक्त किसी तरह की पशु क्रूरता में शामिल नहीं होते। हंबल ने कहा, ‘ये पूरा प्रकरण एक गलत सूचना अभियान और भारतीय डेयरी उद्योग को तोड़ने का प्रयास है, जो आत्मनिर्भर है, और दूध एवं दूध उत्पादों के आयात की परेशानी से देश को बचाता है।’ उन्होंने कहा, ‘हम अमूल से जुड़े लगभग 40 लाख डेयरी किसानों और लगभग पंद्रह लाख अन्य से प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर पेटा पर प्रतिबंध लगाने का आग्रह करते हैं।’ हंबल गुजरात कोआॅपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (जीसीएमएमएफ) की सदस्य यूनियन सरहद डेयरी के अध्यक्ष भी हैं।

पेटा इंडिया का अमूल पर सीधा हमला
अमूल के उपाध्यक्ष वलमजी हंबल के बयान पर पेटा इंडिया के सीईओ डॉ. मणिलाल वलियाते ने एक बयान में कहा, ‘अमूल ने खुद को धौंस जमाने वाली संस्था के तौर पर पेश किया है, जो जानवरों को लेकर जनता की चिंता को सराहने में असमर्थ हैं। अमूल की धौंस के बावजूद यह तथ्य बदलने नहीं जा रहा कि अब दुनियाभर में वीगन आहार की लोकप्रिय हो रहा है।’ उन्होंने कहा, ‘उपभोक्ता पौधों से मिले दूध और शाकाहारी भोजन का चुनाव कर रहे हैं, क्योंकि वे जानवरों पर क्रूरता का समर्थन नहीं करते। मसलन जैसे गाय के बछड़ों को सिर्फ इसलिए छोड़ दिया जाता है या मार दिया जाता है, क्योंकि वे दूध नहीं दे सकते। लोग अपने बेहतर स्वास्थ्य को तरजीह दे रहे हैं और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए डेयरी की भूमिका, पानी की बबार्दी और अन्य पर्यावरणीय दिक्कतों को लेकर भी चिंतित हैं।’ बयान में कहा गया, ‘भारत पशु प्रेमियों का देश है और हम वीगन आहार में भी विश्व में अग्रणी हो सकते हैं।

भारतीय संस्कृति और कारोबार पर सुनियोजित हमला
इस पूरे पत्र का बार-बार गौर से पढ़ें। यह भारतीय संस्कृति और कारोबार पर सुनियोजित हमला है। भारतीय बाङ्मय में वर्णित और दुनिया भर की प्रयोगशालाओं में सिद्ध गाय के दूध की स्वास्थ्यवर्धकता के बारे में पेटा किसके हवाले से टिप्पणी कर रही है-ब्रिटिश किशोरों के माध्यम से। पेटा क्यों चाहती है कि अमूल वीगन दूध की ओर उन्मुख हो? दरअसल भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है। दुनिया भर में उत्पादित होने वाले दूध का 22 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारत में उत्पादित होता है। इसके बाद अमेरिका, चीन, पाकिस्तान और ब्राजील का स्थान है। विश्व दुग्ध बाजार के उत्पादन में 22 प्रतिशत की हिस्सेदारी अकेले भारत की, यह तो कई देशों को खटकने वाली बात है ही। यहां याद कीजिए कि नब्बे के दशक में कैसे इसी तरह के एनजीओ को आगे करके भारतीय कालीन को बाल श्रम के नाम पर लांछित किया गया था और उस अभियान के परिणामस्वरूप भारतीय कालीन की साख और मांग वैश्विक बाजार में गिर गई। भारत का कालीन उद्योग, जो उस वक्त अव्वल देशों से होड़ करता था, आज चौपट हो चुका है। यहां यह भी सोचना होगा कि वनस्पतियों से दूध बनाने का पेटेंट किसके पास है? दुनिया की कौन सी कंपनियां पशु दुग्ध आहार के मोर्चे पर पिछड़ गर्इं और वीगन उत्पादों में बढ़त ले चुकी हैं? पेटा के इस पत्र में किसका हित है? पेटा के इस पत्र को इस नजरिये से भी देखें कि भारत सरकार देश के किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए उन्हें पशुपालन के लिए प्रेरित कर रही है, दुग्ध उत्पादन और बढ़ाने के लिए रणनीतियों और महत्वाकांक्षी योजनाओं पर काम चल रहा है और पेटा देश के सबसे बड़े दूध उत्पादक को हतोत्साहित करने के अभियान में जुटा है। क्या यह सहज और संयोग मात्र लग रहा है? क्या इस पत्र की षड्यंत्रकारी दृष्टि से हम इनकार कर सकते हैं? यह अनुमान लगाना कोई रॉकेट साइंस नहीं है कि पेटा के इसी पत्र की कड़ी में आगामी वर्षों में वीगन उत्पाद को बढ़ावा देने वाले कुछ एनजीओ जन्मेंगे, उन्हें वित्तीय सहायता दी जाएगी और फिर उन्हें कुछ खास अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा जाएगा। ल्ल

83 प्रतिशत पशुओं की हत्या कर देता है पेटा
पेटा क्या है? अपने विज्ञापनों, ब्रांड एंबेसडर और विवादों के जरिए खासी सुर्खियां पा चुके पेटा यानी पीपल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट आॅफ एनिमल्स यानी-पशुओं से नैतिक बर्ताव के लिए लोग- को आज अधिकांश लोग जानते हैं। धारणा यह है कि यह लोगों को पशुओं के साथ क्रूरता करने से रोकने वाली संस्था है। लेकिन क्या यही सच है?
हिंदू परंपराओं को निशाने पर रखते हुए पशुओं के प्रति प्रेम का प्रदर्शन करने वाली इस संस्था की असलियत कुछ और है। खुद को पशुओं के अधिकार का संरक्षक कहने वाली इस संस्था का भेद वर्जीनिया डिपार्टमेंट आॅफ एग्रीकल्चर एंड कंज्यूमर सर्विसेज (वीडैक्स) की रिपोर्ट से मिलता है। वीडैक्स हर वर्ष पशु आश्रयगृहों से इस बात का लेखा-जोखा मांगता है कि उनके यहां कितने पशु आए, कितने पशु किसी को सौंपे गए, कितने अपनाए गए और कितने मार दिए गए।
पेटा के पशु आश्रय गृह के बारे में वीडैक्स की रिपोर्ट बताती है कि पेटा अपने यहां आए अधिसंख्य पशुओं को बड़ी निर्ममता से मार डालती है। वर्ष 2020 में पेटा ने अपने यहां आए 66.2 प्रतिशत पशुओं की हत्या कर दी। हालांकि यह प्रतिशत इस बार कम है। वर्ष 2006 में पेटा ने अपने यहां के 97.4 प्रतिशत पशुओं की हत्या की थी जबकि 2009 में 97.3 प्रतिशत पशुओं को मारा था। पेटा ने 2019 में 1,593 कुत्तों, बिल्लियों और अन्य पालतू पशुओं को मार दिया था। वहीं 2018 में 1771 पशुओं की हत्या कर दी गई। इसी तरह 2017 में 1809, 2016 में 1411 और 2015 में 1456 पशुओं को मार दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार 1998 से लेकर 2020 तक पेटा ने 41,539 पशुओं की हत्या की। यानी पेटा ने 1998 से 2020 तक अपने यहां आए 49,737 पशुओं में से 83.5 प्रतिशत को मौत के घाट उतार दिया।
24 घंटे में हो जाती है अधिकांश की हत्या
प्रतिवर्ष पेटा द्वारा मौत के घाट उतारे गए पशुओं की इतनी बड़ी संख्या को देखकर वर्जीनिया के अधिकारी हतप्रभ रह गए। यहां तक पशु आश्रय गृह खोलने के पेटा के लाइसेंस को रद करने पर भी विचार होने लगा। दरअसल 2010 में वर्जीनिया के एक नागरिक ने पेटा की शिकायत की थी। इस शिकायत पर कार्रवाई करते हुए वीडैक्स के जांचकर्ता डॉ. डेनियल कोविच ने जुलाई 2010 में वर्जीनिया स्थित पेटा के पशु आश्रयगृह की निरीक्षण किया।
उन्होंने पाया कि वर्ष भर में जितने पशुओं को आश्रयगृह में आया दिखाया जाता है, उतने पशुओं के रहने की जगह पेटा के आश्रयगृह में नहीं है। ऐसा संभवत: इसलिए है क्योंकि पेटा प्राप्त पशुओं को बहुत समय पर अपने पास नहीं रखता। दो माह के रिकॉर्ड की समीक्षा करने के बाद कोविच ने पाया कि 290 पशुओं में से 245 यानी 84 प्रतिशत पशुओं को पेटा ने 24 घंटे के भीतर मार डाला।
कोविच ने पाया कि पेटा के आश्रयगृह स्वयं पेटा के प्रकाशित मानदंडों के अनुरूप नहीं हैं। पेटा के प्रतिनिधि ने डॉ. कोविच को इंगित किया कि आश्रयगृह आम लोगों के लिए खुला नहीं है। पेटा को इन पशुओं की हत्या करने पर कोई ग्लानि भी नहीं है। उनका कहना है कि वे पशुओं को एक सौम्य और दर्दरहित मौत देते हैं।

पेटा ने 1998 से 2020 तक अपने यहां आए 49,737 पशुओं में से 83.5% को मौत के घाट उतार दिया

वेद-पुराणों में गाय के दूध की महिमा

ऋग्वेद (2/35/7) में कहा गया है कि
स्व आ दमे सुदुधा पस्य धेनु:
अर्थात अपने घर में ही उत्तम दूध देने वाली गौ हो।
अथर्ववेद (4-21-11 और 6) में कहा गया है कि
आ गावो अग्मन्नुत भद्र्रकम्रन सीदंतु गोष्मेरणयंत्वस्मे।
प्रजावती: पुरुरूपा इहस्स्युरिंद्राय पूवीर्रुष्सोदुहाना:॥
यूयं गावो मे दयथा कृशं चिदश्रीरं चित्कृणुथा सुप्रतीकम्।
भद्र्र गृहं कृणुथ भद्र्रवाचो बृहद्वो वय उच्यते सभासु॥
अर्थात गो माताओं! तुम अपने दूध और घी से दुर्बलों को बलिष्ठ बनाती हो और रोगियों को स्वस्थ। अपनी पवित्र वाणी से तुम हमारे घरों को शुद्ध करती हो। सभाओं में तुम्हारा गुणगान होता है ।
अथर्ववेद (10-10-34) में कहा गया है कि
वशां देवा उपजीवंति वशां मनुष्या उप।
वशेदं सर्वं भवतु यावतु सूर्यो विपश्यति॥
अर्थात देवता और मानव गो पदार्थों पर जीते हैं। जब तक सूर्य चमकेगा, विश्व में गायें रहेंगी। सारा ब्रह्मांड गाय के संबल पर निर्भर है।

क्या है वीगन मिल्क
वनस्पति आधारित दूध या वीगन मिल्के पौधों या उसके भिन्न उत्पादों से निकाला जाने वाले दूध है। सोया दूध, राइस दूध, कोकोनट दूध, काजू दूध, बादाम दूध, ओट दूध आदि वीगन दूध श्रेणी में आते हैं।
पशु दूध बनाम वीगन दूध
ग्रामीण भारत में पशुपालन आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। भारत जैसी कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था में, दूध 10 करोड़ भूमिहीन और सीमांत किसानों की आजीविका का आधार है और सकल घरेलू उत्पाद में 4 लाख करोड़ रुपये का योगदान देता है।
दूसरी ओर, सोयाबीन, वनस्पति आधारित वीगन पेय पदार्थ बनाने में इस्तेमाल होने वाले नट्स जैसी सामग्री दूसरे देशों से आयात किए जाते हैं और लाभ ज्यादातर विदेशी कंपनियों को वापस भेज दिया जाता है। यह भारत के सकल घरेलू उत्पाद या किसानों की आजीविका या कृषि क्षेत्र के उत्थान में योगदान नहीं देता है।
अमूल के विज्ञापनों पर पेटा खा चुका है मात
पेटा इंडिया ने अमूल को वीगन दूध के व्यवसाय में उतरने की सलाह सहजता से दी हो, यह नहीं कहा जा सकता। इससे पहले पेटा इंडिया ने बीडब्ल्यूसी (ब्यूटी विदाउट क्रुएलिटी) और शरण इंडिया के साथ मिलकर अमूल के एक विज्ञापन के खिलाफ एएससीआई (भारतीय विज्ञापन मानक परिषद) से शिकायत की थी। मई माह के आखिर में ही एएससीआई ने आरोपों को निराधार बताते हुए उन्हें खारिज कर दिया और साथ ही अमूल को क्लीन चिट दे दी।
इन शिकायतों के संबंध में अमूल ने अपने जवाब में विज्ञापन में वर्णित तथ्यों के वैज्ञानिक निष्कर्षों, प्रकाशित रिपोर्टों और खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम 2006 और संबंधित नियमों में निहित स्पष्ट वैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि शिकायतकतार्ओं द्वारा किए गए दावे झूठे और निराधार थे। एएससीआई ने अमूल के सभी बिंदुओं को मान्य किया और पाया कि दूध एक पौष्टिक भोजन है और यह कैल्शियम, विटामिन, काबोर्हाइड्रेट, वसा, खनिज और प्रोटीन से भरपूर होता है। साथ ही एएससीआई ने यह भी देखा कि भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम में वनस्पति आधारित दूध ‘दूध’ की परिभाषा में शामिल नहीं हैं।
अमूल वीगन पेय के खिलाफ अदालत में
अमूल ने वीगन पेय उत्पाद को दूध के रूप में प्रचारित करने के आलेखों और वीडियो के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। न्यायालय ने ऐसे मामलों में ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ निरोधक आदेश जारी किया है और उन्हें अमूल के सभी संदर्भों को हटाने का आदेश दिया है। यह पता लगाने के लिए कि क्या इस तरह के अपमानजनक लेख/वीडियो प्लांट बेस्ड फूड एंड बेवरेज कंपनियों द्वारा प्रायोजित किए गए हैं, न्यायालय ने ऐसे व्यक्तियों को अपने बैंक विवरण प्रस्तुत करने के लिए भी कहा है।
अमूल का कहना है कि खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम ‘दूध’ को वनस्पति आधारित पेय कंपनियों के उत्पादों के रूप परिभाषित नहीं करता है। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि कंपनियां दूध के रूप में अपने उत्पादों का प्रचार या बिक्री नहीं कर सकती हैं। इस मामले पर न्यायालय ने 24 मई को एक नोटिस जारी कर केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार, भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण और वनस्पति आधारित खाद्य उत्पाद बनाने वाली कंपनियों के विचार मांगे हैं।
गाय के दूध के स्वास्थ्यकारी गुण
गाय का दूध स्वादिष्ट, स्निग्ध, सुपाच्य, मधुर, शीतल, रुचिकर, बल, बुद्धि व स्मृति तथा रक्तवर्धक, आयुष्यकारक एवं जीवनीय गुणदायक माना जाता है। गाय का दूध वात, पित्त, कफ तीनों दोंषों का शमन करने वाला है। दूध शरीर की जलन को मिटाता है। अन्न पाचन में सहायता करता है। शिशु से वृद्ध तक, सभी उम्र के लोगों के लिए गाय के दूध का सेवन हितकर है।
आचार्य वाग्भट्ट के ‘अष्टांगहृदय’ ग्रंथ में उल्लेख है कि सब पशुओं के दुग्धों में गाय का दुग्ध अत्यंत बलवर्धक और रसायन है। गव्यं तु जीवनीयं रसायनम्।
आचार्य सुश्रुत ने गौदुग्ध को जीवनोपयोगी तथा आचार्य चरक ने इसे जीवनशक्ति प्रदान करने वाला द्रव्यों में सर्वश्रेष्ठ और रसायन कहा है : प्रवरं जीवनीयानां क्षीरमुकत रसायनम्।
इसमें प्रोटीन, काबोर्हाइड्रेटस, उच्च श्रेणी की लैक्टोज शर्करा, खनिज पदार्थ, वसा आदि शरीर के सभी पोषकतत्त्व भरपूर मात्रा में पाये जाते हैं। इसमें आवश्यक सभी एमिनो एसिड प्रचुर मात्रा में होते हैं, जो अनाज, सब्जी, अण्डा व मांस की तुलना में उच्च गुणवत्ता वाले होते हैं।
दुग्ध-वसा अन्य वसाओं की तुलना में सुपाच्य होती है। रोज एक गिलास (250 ग्राम) दूध पीने से शरीर की प्रतिदिन के कैल्शियम की 75 प्रतिशत आवश्यकता, बच्चों की विटामिन बी-12 की 40-60 प्रतिशत आवश्यकता, वयस्कों की वसा की 25-30 प्रतिशत आवश्यकता पूरी हो जाती है। स्ट्रांशियम केवल गौदुग्ध में ही पाया जाता है, जो एटम बम के अणु-विकिरणों (एटॉमिक रेडियेशन्स) के विषकारक प्रभाव का दमन करता है। दूध में विद्यमान ‘सेरीब्रोसाइडस’ तत्त्व मस्तिष्क व बुद्धि में सहायक होते हैं। एमडीजीआई प्रोटीन शरीर की कोशिकाओं की कैंसर से रक्षा करता है।

पेटा का हिंदूफोबिया
पेटा की भारतीय शाखा पेटा इंडिया का एकमात्र लक्ष्य पशुओं पर क्रूरता की आड़ में हिंदू संस्कृति और त्योहारों पर हमले करना रह गया है। हिंदी में एक कहावत है झ्र कहीं की र्इंट, कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा। यही हाल हिंदू त्योहारों के बारे में पेटा इंडिया का हो गया है। आइये देखते हैं पेटा ने कैसे हिंदू त्योहारों पर हमले किए।
1. मार्च, 2017 में पेटा इंडिया ने होली को निशाने पर लिया और लिखा कि इस होली पर जानवरों को सुरक्षित रखें। उन पर रंगीन पावडर या पानी न डालें।
2. सितंबर, 2018 में पेटा इंडिया ने जन्माष्टमी को निशाना बनाया। उसने ट्वीट किया कि गायों को भी खुश रखते हुए वीगन घी और गैर-डेयरी उत्पादों का उपयोग करके जन्माष्टमी के उल्लासपूर्ण पर्व का आनंद लें। अब कोई पेटा इंडिया को बताए कि जन्माष्टमी श्रीकृष्ण भगवान के जन्म का त्योहार है। वह श्रीकृष्ण भगवान, जो गौपालक होने के नाते, गोपाल भी कहे गए और जिनका पसंदीदा आहार दूध, दही, माखन जैसे उत्पाद ही था।
3. अक्टूबर 2019 में पेटा इंडिया ने दीपावली को निशाने पर रखा और अभियान चलाया कि-पटाखे जानवरों को आतंकित कर सकते हैं। इस बार शोर-रहित दीपावली मनाएं और जानवरों को सुरक्षित रखने में मदद करें।
4. जुलाई 2020 में पेटा इंडिया ने लेदर फ्री अभियान चलाया। इसके लिए पेटा ने हिंदुओं के पवित्र त्योहार रक्षाबंधन को चुना और कहा कि इस रक्षाबंधन, गायों की भी हिफाजत करें। यह समझ में न आने वाला कथन है। रक्षाबंधन और गाय का क्या जुड़ाव है? दरअसल पेटा इंडिया यह कह रही थी कि राखी में चमड़े का उपयोग न करें। अब कौन हिंदू लेदर वाली राखी बंधवाता है? इसी अभियान पर लोकगीत गायिका मालिनी अवस्थी भड़क गर्इं और उन्होंने पेटा को फटकार लगाई कि रक्षाबंधन हिंदुओं का त्योहार है जहां पेटा का लेदर फ्री कैंपेन कोई मतलब नहीं रखता। उन्होंने पेटा को सलाह दी कि वे उन त्योहारों के खिलाफ कैंपेन चलाएं जो जानवरों की मौत का जश्न मनाते हैं। उन्होंने लिखा ह्यये बेतुका है! कभी लेदर से बनी राखी के बारे में नहीं सुना। पेटा इंडिया आपका दुर्भावनापूर्ण कैंपेन अजीब है।’
-संदीप त्रिपाठी

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