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पड़ोस/ पाकिस्तान : कर्जे का जाल महंगाई का जंजाल

Written byPanchjanyaPanchjanya
Apr 23, 2021, 10:56 am IST
inविश्व, दिल्ली

आम चुनावों (2018) के बाद इमरान खान के नेतृत्व में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी जिस तरह से सत्ता में आई, वह पाकिस्तान के अन्दर व बाहर सभी जगह विदित ही है। इसके सत्ता में आने के तरीके को शायद भुला भी दिया जाता परन्तु यह सरकार जिस तरह से शासन संचालन कर रही है, उससे यही लगता है कि यह पाकिस्तान को दिवालियापन के गर्त में ले जाने को दृढ़प्रतिज्ञ है। आज इस सरकार को सत्ता में आये लगभग 32 माह पूरे हो चुके हैं और इस अवधि में सरकार ने अपनी आय से लगभग 10 खरब रुपये अधिक खर्च कर दिए हैं। यह मुख्य रूप से बजटीय घाटा है जिसकी प्रतिपूर्ति के लिए अंधाधुंध तरीके से ऋण लिये गए जिनकी ब्याज दरें उच्च स्तर पर थीं। यह ऋणों का एक गहन दुष्चक्र है जिसमें इमरान सरकार बुरी तरह से फंस चुकी है। और, इस वित्तीय कुप्रबंधन का सबसे बड़ा शिकार पाकिस्तान की जनता बन रही है जो इस महामारी के दौर में अपने जीवन पर मंडराते संकटों को अपने सम्मुख देख रही है।

वर्तमान समय में जब औसत पाकिस्तानी के सामने रोजगार की उपलब्धता कम हो रही है, ठीक उसी समय बाजारों में आवश्यक वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की मुद्रा का अवमूल्यन होता जा रहा है और रुपये के कमजोर पड़ने के साथ ही मुद्रास्फीति लगातार प्रबल होती जा रही हैं। आज पाकिस्तानियों के लिए अनियंत्रित कोविड-19 की तुलना में अनियंत्रित मुद्रास्फीति सबसे चिंताजनक मुद्दा बन चुकी है। हाल ही में ‘इप्सोस’ द्वारा कराये गए एक नवीन सर्वेक्षण में दो-तिहाई उत्तरदाताओं ने मौजूदा आर्थिक स्थिति को अत्यंत बुरा तथा इसमें सुधार की कोशिशों को अत्यंत संदेहास्पद बताया है।

उल्लेखनीय है कि ‘इप्सोस’, जो एक वैश्विक बाजार अनुसंधान और परामर्श फर्म है, ने प्रधानमंत्री इमरान खान के मुद्रास्फीति को नियंत्रित कर पाने में असमर्थता के चलते अपने 32 माह के कार्यकाल के दूसरे वित्त मंत्री हफीज शेख को बर्खास्त किये जाने के एक सप्ताह पूर्व ही यह सर्वेक्षण किया था।

इस सर्वेक्षण के निष्कर्ष यह बताते हैं कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की दृढ़ता पर पाकिस्तान की जनता का विश्वास बुरी तरह चरमरा गया है। यहां तक कि लोग सरकारी वित्तीय तंत्र में निवेश करने में भी भयभीत हैं। युवाओं ने अर्थव्यवस्था की दुर्दशा को स्थायी मानकर रोजगार, नौकरियों और कुल मिलाकर भविष्य के प्रति आशावादी दृष्टिकोण का लगभग परित्याग कर दिया है। 18 से 24 मार्च के बीच किए गए इस सर्वेक्षण में लोगों से अर्थव्यवस्था में उनके विश्वास, एक साल पहले की तुलना में मौजूदा स्थिति के बारे में उनकी राय, निवेश के फैसले, नौकरी की संभावनाएं और उनके लिए सबसे अधिक चिंताजनक मुद्दों पर सवाल किया गया था।

यह सर्वेक्षण आम जनता में पाकिस्तान सरकार और अर्थव्यवस्था के प्रति चिंता को प्रतिबिंबित करता है जो बहुत भयावह है। रिपोर्ट के अनुसार एक आम पाकिस्तानी के अन्दर अब रोजगार खोने का डर बहुत पीछे रह गया है, क्योंकि बढ़ती मुद्रास्फीति अर्थव्यवस्था से संबंधित समस्याओं की सूची में सबसे ऊपर है। इस सर्वेक्षण में भाग लेने वालों में से 32 प्रतिशत के लिए बढ़ती मुद्रास्फीति से जनित महंगाई सबसे चिंताजनक मुद्दा थी। इसके बाद बेरोजगारी (20 प्रतिशत) और कोविड-19 (16 प्रतिशत) दूसरे सबसे बड़े चिंताजनक मुद्दे रहे। इप्सोस के इस सर्वेक्षण में लगभग 10 प्रतिशत लोगों ने बढ़ती हुई गरीबी को सबसे चिंताजनक मुद्दा बताया। इस सर्वेक्षण की सबसे हास्यास्पद बात यह थी कि प्रधानमंत्री इमरान खान ने लोगों के आर्थिक संकट को कम करने की तुलना में भ्रष्टाचार को खत्म करने को अपनी प्राथमिकता बताया था, इस सर्वेक्षण ने उनकी प्राथमिकताओं पर भी सवालिया निशान लगा दिया। इस सर्वे के निष्कर्षों के अनुसार केवल 3 प्रतिशत लोगों ने भ्रष्टाचार, रिश्वत, मिलावट और भाई-भतीजावाद को एक मुद्दा माना। पाकिस्तान में आम जनता शायद भ्रष्टाचार की इतनी आदी हो चुकी है कि उसने इसे जीवन का आवश्यक अंग ही मान लिया है। कम से कम इप्सोस के सर्वेक्षण से तो यही दिखाई देता है। इसके अनुसार सिंध, बलूचिस्तान और खैबर-पख्तूनख्वा में भ्रष्टाचार का मुद्दा शीर्ष पांच चिंताओं में सबसे निचले पायदान पर था, जबकि पाकिस्तान में सेना और राजनीति में वर्चस्व रखने वाले पंजाब प्रान्त में रहने वाले लोगों के लिए भ्रष्टाचार कोई मुद्दा ही नहीं है।

इस सर्वेक्षण में लोगों की राय में क्षेत्रीय भेद भी देखे गए। उत्तर-पश्चिमी जनजाति बहुल प्रांत खैबर-पख्तूनख्वा के लगभग 38 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने जहाँ महंगाई में लगातार हो रही बढ़ोतरी को चिंता का कारण बताया, वहीं तुलनात्मक रूप से अधिक शहरी और सम्पन्न प्रांत सिंध और पंजाब में 31 प्रतिशत लोगों के लिए ही महंगाई और मुद्रास्फीति वृद्धि सबसे बड़ा मुद्दा रही। सीमान्त बलूचिस्तान में 30 प्रतिशत लोगों के लिए महंगाई सबसे बड़ा मुद्दा बनी हुई है। पाकिस्तान के चारों प्रांतों में लगातार बढ़ती बेरोजगारी दूसरा सबसे बड़ा चिंताजनक मुद्दा थी। उल्लेखनीय है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने इस वित्तीय वर्ष में पाकिस्तान में बेरोजगारी की दर में 1.5 प्रतिशत की वृद्धि की आशंका व्यक्त की है।
पाकिस्तान की वर्तमान आर्थिक स्थिति के बारे में भी इस सर्वेक्षण में निराशाजनक स्थिति ही सामने निकल कर आई। इस सर्वेक्षण में शामिल 64 प्रतिशत लोगों का मानना है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था अत्यंत खराब स्थिति में है। इससे भी बढ़कर यह कि लोगों का पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के भविष्य के प्रति संदेह लगातार बढ़ा है। सर्वे में सम्मिलित 41 प्रतिशत लोगों का मानना है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में सुधार के कोई संकेत नहीं हैं, और यह आगे भी कमजोर होती जाएगी।

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में एक लम्बे समय से गिरावट देखी जा रही है और 2014 के बाद से, जब पाकिस्तान ने चीनी ऋण के आधार पर बनने वाली सीपीईसी परियोजना का आरम्भ किया, पाकिस्तान के आर्थिक शोषण का एक नया दौर प्रारंभ हो गया। इस समय पाकिस्तान ऋण के गहरे दुष्चक्र में फंसा हुआ है। एक ओर वह अंतरराष्ट्रीय देनदारियों को चुकाने में असमर्थ होता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 6 अरब डॉलर के वित्तीय पैकेज को लेने की अनिवार्य पूर्व शर्त के रूप में वह अपने यहां वित्तीय मितव्ययिता के नियमों को लागू करने और कर राजस्व में वृद्धि करने के लिए प्रतिबद्ध है। परन्तु इस विपरीत आर्थिक परिस्थिति में जनता को दी जाने वाली आर्थिक सहायता को रोके जाने, जो बढ़ते राजस्व व्यय की कटौती के नाम पर रोकी जा रही है, से पाकिस्तान की बदहाल आम जनता की पीड़ाओं में वृद्धि ही हो रही है।

पाकिस्तान की सरकार इस बीच चालू खाते के घाटे में सुधार के नाम पर अपनी पीठ ठोक रही है, वह भी उसके लिए नुकसान का कारण बन सकता है। चालू खाते के घाटे में यह सुधार आर्थिक वृद्धि की दर को धीमा करके हासिल किया गया था। परन्तु इस समय पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के निर्यात से लेकर विदेशी प्रत्यक्ष निवेश, राजस्व संग्रह, राजकोषीय घाटा और सार्वजनिक ऋण जैसे संकेतक वहां के आर्थिक हालात की बदहाली को ही दर्शाते हैं। अब इमरान खान ने वित्त मंत्रालय का जिम्मा हम्मद अजहर को दिया है, परन्तु समस्या की जड़ें कहीं अधिक गहरी हैं और केवल प्रशासनिक पुनर्गठन इसका समाधान नहीं हो सकता।

एस. वर्मा

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