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सरना के नाम पर षड्यंत्र!

ऐसा माना जा रहा है कि झारखंड में वनवासियों के लिए ‘सरना धर्म कोड’ की मांग चर्च के इशारे पर हो रही है। वनवासी समाज के ज्यादातर लोग इस मांग का विरोध कर रहे हैं। इसके बावजूद कुछ लोग वनवासी समाज के युवाओं को आंदोलन के लिए उकसा कर राज्य में माहौल बिगाड़ रहे हैं

Written byअरुण कुमार सिंहअरुण कुमार सिंह
Nov 8, 2020, 01:18 pm IST
in झारखण्‍ड
‘सरना धर्म कोड’ के लिए प्रदर्शन करते वनवासी समाज के लोग (फाइल चित्र)

‘सरना धर्म कोड’ के लिए प्रदर्शन करते वनवासी समाज के लोग (फाइल चित्र)

दुनिया में पहली बार ऐसा हो रहा है कि किसी पूजा-स्थल के नाम पर ‘धर्म कोड’ की मांग की जा रही है। इसलिए इस पर लोकसभा के पूर्व उपाध्यक्ष और खूंटी से आठ बार सांसद रहे करिया मुंडा सहित अनेक लोग सवाल उठा रहे हैं।

इ­न दिनों झारखंड में ‘सरना धर्म कोड’ के नाम पर धरना, प्रदर्शन हो रहे हैं। इनके विरोध में आवाज उठ रही है। सरना कोई पंथ या मत नहीं है, बल्कि वनवासियों के पूजा-स्थल को ‘सरना’ कहा जाता है। इसके बावजूद इस नाम पर ‘धर्म कोड’ की मांग हो रही है, जो चकित कर देने वाली है। शायद दुनिया में पहली बार ऐसा हो रहा है कि किसी पूजा-स्थल के नाम पर ‘धर्म कोड’ की मांग की जा रही है। इसलिए इस पर लोकसभा के पूर्व उपाध्यक्ष और खूंटी से आठ बार सांसद रहे करिया मुंडा सहित अनेक लोग सवाल उठा रहे हैं।

झारखंड के बहुत सारे लोगों ने यह भी बताया कि इसकी मांग करने वालों में ज्यादातर वे वनवासी हैं, जो ईसाई बन गए हैं। इसलिए इस मांग को लेकर झारखंड में एक नई बहस छिड़ गई है। वनवासियों का ही एक वर्ग कह रहा है कि इस मांग के पीछे असली उद्देश्य है वनवासियों को सामाजिक रूप से तोड़ना और उन्हें कमजोर करना। वहीं इस मांग के लिए आंदोलन करने वालों का तर्क है कि वनवासियों की पहचान को बचाए रखने के लिए ‘सरना धर्म कोड’ जरूरी है।

सरना की बात निकली है, तो सरना झंडा के बारे में भी जानना जरूरी है। वनवासी सफेद और लाल रंग का झंडा अपने घरों और पूजा स्थलों पर लगाते हैं। इसे ‘सरना झंडा’ कहा जाता है। वनवासी इस झंडे को बहुत ही पवित्र मानते हैं। किसी वनवासी के घर इस झंडे का लगा दिखना आम बात है।

उल्लेखनीय है कि झारखंड में वनवासियों की जनसंख्या एक करोड़ से अधिक है। वोट के लिहाज से यह एक बड़ी संख्या है। इसलिए प्राय: सभी सेकुलर राजनीतिक दल ‘सरना धर्म कोड’ की वकालत कर रहे हैं। राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी कहा है कि जल्दी ही इस संबंध में एक प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास भेजा जाएगा। प्रस्ताव में यह आग्रह किया जाएगा कि 2021 में होने वाली जनगणना मेंजनजाति समाज के लिए अलग से ‘धर्म कोड’ का खंड जोड़ा जाए।

‘सरना धर्म कोड’ की मांग करने वालों में एक प्रमुख व्यक्ति हैं ‘राजी परहा सरना प्रार्थना सभा भारत’ के अध्यक्ष बंधन तिग्गा। तिग्गा वनवासियों के लिए ‘सरना धर्म कोड’ की मांग कई साल से कर रहे हैं। वे कहते हैं, ‘‘वनवासी हिंदू नहीं हैं। हिंदू मूर्ति पूजा करते हैं और वनवासी समाज प्रकृति पूजक है। नदी, पहाड़, जंगल आदि की पूजा करने वाले वनवासी समाज को जनगणना में हिंदू समाज के साथ न जोड़ कर उसके लिए एक अलग खंड बनाया जाए। यह वनवासियों की पहचान को बनाए रखने के लिए जरूरी है।’’ झारखंड के प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. राजकिशोर हांसदा ने उनके इस तर्क और मांग का विरोध किया है। वे कहते हैं, ‘‘जनजातीय समाज को भ्रमित करने के लिए ‘सरना धर्म कोड’ की मांग की जा रही है। इस मांग का कोई तार्किक आधार नहीं है।

जिन लोगों ने श्रेष्ठ सनातन संस्कृति को संजोकर रखा है, उन्हीं को उससे अलग करने का प्रयास चल रहा है। यह कहना पाप है कि ‘जनजाति समाज प्रकृति को मानता एवं पूजता है और बाकी हिंदू समाज मूर्ति पूजा करता है।’ यह सरासर गलत बात है, क्योंकि सनातन हिंदू धर्म का आधार ही प्रकृति है। ’’ डॉ. हांसदा कहते हैं, ‘‘सनातन संस्कृति में लोग सदियों से देवी-देवताओं के साथ धरती, पेड़, नदी, जल, वन-पहाड़, पत्थर, सूर्य-चंद्र की पूजा करते आ रहे हैं। यही तो प्रकृति पूजा है। यह पूजा सुदूर क्षेत्रों में रहने वालों से लेकर नगरवासी तक करते हैं। जो बातें सनातन हिंदू धर्म ग्रंथों में लिखी गई हैं, वे तो जनजाति समाज के आचार-व्यवहार के अंदर मौजूद हैं।

जैसे ऋग्वेद में लिखा है, ‘‘अतिथि देवो भव:, वसुधैव कुटुम्बकम् आदि।’’ इसका व्यावहारिक रूप संताल जनजाति में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। किसी संताल परिवार में कोई अतिथि आता है तो सबसे पहले उसको बैठने के लिए आसन दिया जाता है। उसके बाद उस परिवार की कोई एक महिला एक लोटा जल अतिथि के सामने रखती है, उसके बाद उसे प्रणाम करती है। फिर उस परिवार के जितने भी सदस्य हैं, बारी-बारी से अतिथि के सामने आकर उसे प्रणाम करते हैं। यही तो सनातन परिवारों में भी होता है, हां, स्थिति और परिस्थिति के अनुसार तौर-तरीके में कुछ बदलाव अवश्य हो जाता है।’’

12 करोड़ वनवासी

एक अनुमान है कि देश में लगभग 12 करोड़ वनवासी हैं। 2011 की जनगणना में पूरे देश में 40,75,246 वनवासियों ने अपना पंथ सरना लिखवाया था। इसमें सर्वाधिक झारखंड में 34,50,523, ओडिशा में 3,53,520, पश्चिम बंगाल में 2,24,704, बिहार में 43,342, छत्तीसगढ़ में 2,450 और मध्य प्रदेश में 50 लोग हैं।

झारखंड में हैं 32 वनवासी समुदाय

झारखंड में वनवासियों के 32 समुदाय हैं। जैसे- उरांव, खड़िया, कोल, सावर, असुर, बैगा, बंजारा, चिक बड़ाईक, गोराइत, हो, करमाली, खरवार, खोंड, किसान, कोरा, कोरबा, लोहरा, संताल, मुंडा, खड़िया, गोंड, कनबार, महली, बथूड़ी, बेदिया, बिंझिया, बिरहोर, बिरजिया, चेरो, माल पहाड़िया, पहाड़िया, सौरिया पहाड़िया और भूमिज।

पूर्व सांसद करिया मुंडा तो ‘सरना धर्म कोड’ की मांग करने वालों से यह जानना चाहते हैं कि क्या किसी पूजा-स्थल के नाम पर कोई ‘धर्म कोड’ बन सकता है? उन्होंने कहा, ‘‘क्या ‘मंदिर धर्म कोड’, ‘मस्जिद धर्म कोड’, ‘गुरुद्वारा धर्म कोड’, ‘चर्च धर्म कोड’ बन सकता है? यदि नहीं तो फिर पूजा स्थल के नाम पर ‘सरना धर्म कोड’ कैसे बन सकता है?’’ श्री मुंडा का यह भी कहना है कि इस मांग के पीछे असली मंशा है भोले-भाले वनवासियों को बरगलाना। कुछ नेता वनवासियों को भ्रमित कर अपना राजनीतिक स्वार्थ साधना चाहते हैं। कुछ लोग तो यह भी कह रहे हैं कि ‘सरना धर्म कोड’ की मांग के पीछे कुछ अंतरराष्ट्रीय ताकतें हैं।

राज्यसभा सांसद समीर उरांव कहते हैं, ‘‘ईसाई संस्थाओं से जुड़े कुछ षड्यंत्रकारियों के बहकावे पर जनजाति समाज के कुछ लोग ‘सरना धर्म कोड’ की मांग कर रहे हैं।’’ वे यह भी कहते हैं, ‘‘ईसाई संगठन मूल जनजातियों को अपने साथ जोड़ने के लिए इस मांग को हवा दे रहे हैं। जनजाति समाज उनकी असली चाल को समझने का प्रयास करे।’’ श्री उरांव की बात का समर्थन करते हुए ‘राष्ट्रीय आदिवासी मंच झारखंड’ की कार्यकारिणी के सदस्य सन्नी टोप्पो कहते हैं, ‘‘आज वनवासी समाज को सबसे अधिक खतरा ईसाइयों से है। ये लोग हमें हिंदू समाज से काटकर अल्पसंख्यक बनाना चाहते हैं। इसलिए ये ‘सरना धर्म कोड’ की मांग कर रहे हैं।’’ वे कहते हैं, ‘‘वनवासी समाज सदियों से इस देश के बहुसंख्यक समाज का हिस्सा रहा है। हमें अल्पसंख्यक बनना स्वीकार नहीं। इसलिए हम लोग ‘सरना धर्म कोड’ का विरोध कर रहे हैं।’’

छात्र नेता सहदेव महतो तो यहां तक कहते हैं, ‘‘सरना धर्म कोड के नाम पर चर्च वनवासियों को आपस में ही लड़ाना चाहता है। इसलिए वनवासियों के विरोध के बावजूद कुछ लोग इस ‘कोड’ के नाम पर वनवासी युवाओं को भड़का रहे हैं, उन्हें आंदोलन के लिए उकसा रहे हैं।’’ वे यह भी कहते हैं कि इस तरह की मांग को केंद्र सरकार एक बार ठुकरा चुकी है। केंद्र सरकार ने स्पष्ट कहा था कि यह संभव नहीं है। सरकार ने कहा था कि इस तरह की मांग मानने से बड़ी संख्या में पूरे देश में ऐसी और मांगें उठेंगी। यानी भारत सरकार ने पहले ही ‘सरना धर्म कोड’ की मांग को ठुकरा दिया है। इसके बावजूद आए दिन झारखंड के विभिन्न हिस्सों, खासकर रांची के आसपास ‘सरना धर्म कोड’ के लिए आंदोलन और प्रदर्शन हो रहे हैं। इनसे ही इनकी मंशा उजागर हो रही है। यह अच्छी बात है कि वनवासी समाज के ज्यादातर लोग इस मांग का विरोध कर रहे हैं। आने वाले दिनों में यह विरोध और तेज होने वाला है।

इसलिए लोग मांग कर रहे हैं कि राज्य सरकार इस मांग के प्रस्ताव को केंद्र सरकार के पास भेजने से पहले झारखंड के वनवासी समाज के प्रमुख लोगों से बात करे। इसके साथ ही लोग यह भी कह रहे हैं कि वर्तमान राज्य सरकार पूरी तरह चर्च के प्रभाव में है। इसलिए लोगों को सरकार से कोई उम्मीद नहीं दिख रही है।

यही कारण है कि वनवासी कई संगठन बनाकर ‘सरना धर्म कोड’ के विरुद्ध आवाज उठा रहे हैं। अब समय ही बताएगा कि ‘सरना धर्म कोड’ विरोधी जीतेंगे या उसके पक्षधर।

Topics: क्या ‘मंदिर धर्म कोड’Sarna!‘मस्जिद धर्म कोड’‘गुरुद्वारा धर्म कोड’‘चर्च धर्म कोड’जनजाति समाज प्रकृति‘Forest resident societyis it a conspiracy in the name of ‘Temple Religion Code’‘Mosque Religion Code’‘Gurudwara Religion Code’वनवासी समाज‘Church Religion Code’tribal societynature
अरुण कुमार सिंह
अरुण कुमार सिंह
समाचार संपादक, पाञ्चजन्य | अरुण कुमार सिंह लगभग 25 वर्ष से पत्रकारिता में हैं। वर्तमान में साप्ताहिक पाञ्चजन्य के समाचार संपादक हैं। [Read more]
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