हिंदी दिवस (14 सितंबर) पर विशेष - बाधाओं को दूर करने की कोशिश
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हिंदी दिवस (14 सितंबर) पर विशेष – बाधाओं को दूर करने की कोशिश

Written byArchiveArchive
Sep 11, 2017, 12:00 am IST
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दिंनाक: 11 Sep 2017 10:11:56

कुछ दिन पहले हिंदी के प्रयोग से संबंधित एक संसदीय समिति की रपट आई है। इसकी सिफारिशों के अनुसार राष्ट्रपति और सरकार के मंत्रियों समेत सभी प्रतिष्ठित पदों पर आसीन व्यक्तियों, जिन्हें हिंदी आती हो, के लिए अपने वक्तव्य हिंदी में देना जरूरी हो जाएगा। साथ ही समिति द्वारा केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) तथा अन्य केन्द्रीय विद्यालयों में दसवीं तक की शिक्षा में हिंदी को अनिवार्य कर देने की सिफारिश भी की गई है। इसी प्रकार की और भी कई सिफारिशें इस समिति द्वारा की गई हैं, जिन्हें राष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी है। हालांकि अभी इन सिफारिशों को सिर्फ राष्ट्रपति की तरफ से मंजूरी मिली है, अभी ये लागू नहीं हुई हैं, मगर अभी से ही इन पर देश के गैर-हिंदी भाषी राज्यों के दलों की भृकुटियां तन गई हैं। इस रपट के स्वीकृत होने के बाद द्रमुक नेता एम. के. स्टालिन ने झटपट केंद्र सरकार पर यह आरोप लगा दिया कि वह गैर-हिंदीभाषी राज्यों पर हिंदी को थोप रही है।
बहरहाल, यह लड़ाई बेहद पुरानी है। जब भी देश में हिंदी के हित में कोई राष्ट्रव्यापी पहल की बात आती है, उस पर तमिलनाडु आदि राज्यों के राजनेताओं का रुख बिना सोचे-विचारे तल्ख हो जाता है। गैर-हिंदीभाषी राज्यों का हिंदी के प्रति यह विद्वेष समझ से परे है कि  एक तरफ तो वे अपने यहां एक विदेशी भाषा अंग्रेजी को अपनाए बैठे हैं,  दूसरी तरफ हिंदी के नाम ही भी उन्हें चिढ़ मच जाती है। यदि उन्हें सिर्फ अपनी क्षेत्रीय भाषाओं से ही लगाव होता और वे इसी कारण हिंदी का विरोध कर रहे होते तो उन्हें विदेशी भाषा अंग्रेजी को भी नहीं अपनाना चाहिए था। लेकिन, ऐसा नहीं है। देखा जा सकता है कि उन्हें अंग्रेजी से कोई दिक्कत नहीं है, मगर इस देश, जिसके वे अंग हैं, की संविधान स्वीकृत राजभाषा हिंदी से उन्हें समस्या हो जाती है। प्रश्न यह है कि यदि इन गैर-हिंदीभाषी क्षेत्रों के लोग अपनी क्षेत्रीय भाषाओं के साथ अंग्रेजी को अपना सकते हैं, तो हिंदी को अपनाने में उन्हें दिक्कत क्या है? कहना न होगा कि हिंदी को लेकर देश के इन प्रदेशों का विरोध तार्किक कम, पूर्वाग्रह प्रेरित अधिक है। सीधे शब्दों में कहें तो ये अनुचित हठधर्मिता है, जिसने आज से पांच दशक पहले हिंसक आंदोलन का रूप ले लिया था। दरअसल, तत्कालीन सरकार ने तब उस हिंदी विरोधी आंदोलन के आगे झुक कर बड़ी भूल की थी, जिसके फलस्वरूप आज दक्षिण का हिंदी विरोध इतना बढ़ गया है कि इस भाषा को लेकर एक छोटी-सी राष्ट्रव्यापी पहल भी उसे स्वीकार नहीं होती।
यहां यह कहना उल्लेखनीय होगा कि हिंदी की महत्ता की बात करने का कतई यह अर्थ नहीं है कि अन्य भारतीय भाषाओं को कमतर समझा जा रहा है। निस्संदेह कोई भी भारतीय भाषा हिंदी से कम नहीं है। सबका बराबर स्थान है। लेकिन, राष्ट्र को एकसूत्र में पिरोए रखने और संस्कृतियों का संवहन करने की सामर्थ्य यदि किसी भाषा में है, तो वह हिंदी में ही है। हिंदी ही ऐसी भाषा है, जो अंग्रेजी का मुकाबला कर देश के अंग्रेजीकरण को रोक सकती है। कोई अन्य भारतीय भाषा फिलहाल अंग्रेजी का मुकाबला कर पाने की स्थिति में नजर नहीं आती। उदाहरणस्वरूप हिंदी का विरोध करने वाले तमिलनाडु का उल्लेख करें तो उसने हिंदी को स्वीकार नहीं किया, फलस्वरूप आज उसकी अपनी क्षेत्रीय भाषा के साथ अंग्रेजी का पूर्ण वर्चस्व है, बल्कि अंग्रेजी अधिक ही है।
इसी क्रम में विचार करें तो आज हिंदी के लिए जितनी भी चुनौतियां आ रही हैं, इनके लिए कहीं न कहीं स्वतंत्रता के पश्चात् के हमारे नीति-नियंताओं की ऐतिहासिक भूलें जिम्मेदार हैं। अंग्रेजी आज हिंदी के लिए सबसे बड़ा संकट बन चुकी है। हर मोर्चे पर हिंदी को अपने अस्तित्व के लिए अंग्रेजी से संघर्ष और समझौता करना पड़ रहा है। रोजगार के क्षेत्र में तो अंग्रेजी का लगभग एकछत्र राज कायम हो ही चुका है, अब धीरे-धीरे वह आम बोलचाल में हिंदी का जो संप्रभु अस्तित्व था, उसे भी चुनौती देने लगी है। इसी का परिणाम है कि आज हिंग्लिश के रूप में एक कथित भाषा चलन में आ गई है। इस स्थिति के लिए सबसे ज्यादा दोषी आजादी के बाद अंग्रेजी को हिंदी के बराबर रूप में स्वीकारते जाने की हमारी अनावश्यक उदारता है। तब हमने अंग्रेजी को राजकाज की भाषा के रूप में सिर्फ दशक भर के लिए रखा था कि धीरे-धीरे हिंदी के चलन में आ जाने के बाद इसे हटा दिया जाएगा, लेकिन ऐसा आज तक नहीं हो सका। इस तरह मैकाले ने अंग्रेजी के जरिए भारतीयता को मिटाने का जो तरीका रखा था, उसका अनुसरण आजाद भारत की सरकारें भी करने लगीं।
आज इस देश में अंग्रेजी सिर्फ एक भाषाभर नहीं रह गई है, बल्कि उच्चता- बोध का साधन और प्रतीक बन गई है। लोगों में अंग्रेजी को लेकर यह अवधारणा गहराई तक पैठ चुकी है कि अंग्रेजी जानना विशिष्टता का चिह्न है। यहां तक कि किसी व्यक्ति के विविध विषयों के ज्ञान से अधिक महत्व उसके अंग्रेजी ज्ञान का है। ज्यादातर लोग इस मानसिकता से ग्रस्त हैं कि अंग्रेजी का ज्ञान विद्वान होने का लक्षण है। ऐसे में, उन्हें यह बात समझाना मुश्किल है कि ब्रिटेन का एक अनपढ़ व्यक्ति भी अंग्रेजी में ही बात करता है। यानी कि अंग्रेजी सिर्फ एक भाषा है, ज्ञान का आधार नहीं।
इस स्थिति के मद्देनजर आज हिंदी को बढ़ावा देने की जरूरत तो है ही, साथ ही इस अंग्रेजीदां मानसिकता को समाप्त करने की भी है। इसके लिए सबसे बेहतर रास्ता यही है कि देश में अंग्रेजी माध्यम शिक्षा को पूर्णत: समाप्त कर दिया जाए। और शिक्षा का माध्यम हिंदी समेत भारतीय भाषाएं हों। अंग्रेजी सिर्फ एक भाषा के रूप में पढ़ाए जाने तक सीमित रहे, इससे अधिक कुछ नहीं। वास्तव में तो यह कार्य आजादी के तुरंत बाद ही कर लेना चाहिए था। गांधीजी भी यही चाहते थे। उनका कथन था,''राष्ट्र के बालक अपनी मातृभाषा में नहीं, अन्य भाषा में शिक्षा पाते हैं, तो वे आत्महत्या करते हैं। इससे उनका जन्मसिद्ध अधिकार छिन जाता है। विदेशी भाषा से बच्चों पर बेजा जोर पड़ता है और उनकी सारी मौलिकता नष्ट हो जाती है। इसलिए किसी विदेशी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाना मैं राष्ट्र का बड़ा दुर्भाग्य मानता हूं।'' यह इस देश का बहुत बड़ा दुर्भाग्य रहा कि आजादी के छह महीने बाद ही गांधी की हत्या हो गई। यदि वे कुछ वर्ष भी जीवित रहते तो संभवत: आज हिंदी की यह दशा
न होती।
मगर, तब नहीं हुआ तो न सही, अब इस तरह का कदम उठाने में सरकार को पीछे नहीं हटना चाहिए। इतना अवश्य है कि इससे अस्थायी तौर पर थोड़ी असुविधा हो सकती है। उच्च शिक्षा में विज्ञान आदि विषयों की अध्ययन सामग्री का हिंदी में अधिक न होना समस्या उत्पन्न करेगा, मगर अपने देश की भाषा के उत्थान और औपनिवेशिक भाषा के चंगुल से छूटने के लिए हमें इन समस्याओं से लड़ना ही होगा। हम थोड़ी-सी असुविधा के भय से हिंदी को इस तरह अंग्रेजी के समक्ष हाशिए पर जाते हुए नहीं छोड़ सकते। वैसे भी ये समस्याएं कोई बहुत बड़ी नहीं हैं। हिंदी में अनुपलब्ध पठन सामग्री का अनुवाद कराकर धीरे-धीरे इस प्रकार की समस्याओं को समाप्त किया जा सकता है।
हिंदी के उत्थान और अंग्रेजीदां मानसिकता के उन्मूलन के लिए सरकार को इस तरह के कदम उठाने की इच्छाशक्ति दिखानी होगी, अन्यथा देश में व्याप रही अंग्रेजीदां मानसिकता हिंदी को धीरे-धीरे निगल जाएगी। स्मरण रहे, अगर ऐसा होता है तो यह सिर्फ एक भाषा पर संकट नहीं होगा, बल्कि इस देश की सांस्कृतिक विरासत पर भी कुठाराघात होगा।     -पीयूष द्विवेदी

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