राज्य/जम्मू-कश्मीर-अलगाववादियों की अटकी सांस
July 19, 2026
  • Read Ecopy
  • Circulation
  • Advertise
  • Careers
  • About Us
  • Contact Us
Android appiPhone AppArattai
Panchjanya
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
Panchjanya
panchjanya android mobile app
  • होम
  • भारत
  • विश्व
  • संघ @100
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विश्लेषण
  • मत अभिमत
  • रक्षा
  • धर्म-संस्कृति
  • पत्रिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
  • Print Edition
  • Ecopy
होम Archive

राज्य/जम्मू-कश्मीर-अलगाववादियों की अटकी सांस

Written byArchiveArchive
Aug 7, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 07 Aug 2017 10:56:11

एक जमाना था जब नेता और अधिकारी कश्मीर की तथाकथित समस्या को सुलझाने के लिए श्रीनगर में गिलानी के घर हाजिरी देते थे। लेकिन केन्द्र की मौजूदा सरकार ने राष्ट्रहित में कदम उठाते हुए अलगाववादियों को घेरना शुरू किया हैडॉ. कुलदीप चन्द अ
ग्निहोत्री
पिछले दिनों राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने जम्मू-कश्मीर में कई साल से सक्रिय हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के कई नेताओं व उनके रिश्तेदारों को गिरफ्तार किया। कश्मीर घाटी में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के बारे में कहा जाता है कि वह आतंकवादी गिरोहों का राजनैतिक मुखौटा है। आतंकवादी गिरोह जब सरकार से बातचीत करना चाहते हैं तो मोटे तौर पर वे इसी राजनैतिक मुखौटे के माध्यम से बात करते हैं। गिरफ्तार किए गए लोगों में से सैयद अली शाह गिलानी और मीरवाइज उमर फारुक की टोली के लोग ही ज्यादा हैं।
ईरान के गिलान से आए पुरखों की संतान सैयद अली शाह गिलानी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के स्वयंभू नेता हैं। उनके इस कद को बढ़ाने में  पूर्व की भारत सरकार और पाकिस्तान का बराबर का योगदान रहा है। कभी भारत सरकार के प्रतिनिधि कश्मीर के मामलों पर सैयद अली शाह से बात करते थे। शेख अब्दुल्ला के जमाने में इस प्रकार के लोगों को बकरा पार्टी भी कहा जाता था। लेकिन मामला यहीं पर खत्म नहीं होता। विरोधी पक्ष के नेता भी जब श्रीनगर जाते हैं तो कश्मीर की तथाकथित समस्या पर विचार करने के लिए गिलानी के घर हाजिÞरी देते हैं। गिलानी दिल्ली के स्वभाव और दिमाग को अच्छी तरह पढ़ चुके हैं। कश्मीरियों में अपने रुतबे की धाक जमाने के लिए वे कई बार विरोधी पक्ष के नेताओं से मिलने से इनकार कर देते हैं। कश्मीरी इसे गिलानवालों की ताकत के रूप में देखते हैं। जिन गिलानवालों के सामने भारत का विपक्ष पानी भरता है, तो वहां आम कश्मीरी की क्या बिसात। यदि इससे भी गिलानी का राजनैतिक कद एक आध ईंच छोटा रह जाता है, तो उसकी कमी दिल्ली में कार्यरत पाकिस्तान का उच्चायुक्त पूरा करता है। दिल्ली में जब भी पाकिस्तान का कोई हैसियत वाला आदमी आता है तो गिलानी तुरन्त उससे ‘कश्मीर पर बातचीत’ करने के लिए पहुंचते हैं। घाटी का मीडिया बाकायदा इस मुलाकात को सारा दिन ‘ऐतिहासिक’ बताता रहता है। इससे कश्मीर में उलझी समस्याओं पर कितना असर होता है, यह तो पता नहीं लेकिन आम कश्मीरी की नजर में गिलानवालों की हैसियत जरूर बढ़ जाती है। दिल्ली की सरकारें अब तक इन्हीं गिलानवालों की जी हजूरी  करके कश्मीर में शांति स्थापित करना चाहती थीं। दिल्ली की सरकारें यह नहीं सोचती थीं कि गिलानियों का हित कश्मीर की आग को सुलगाए रखने में ज्यादा है, क्योंकि कश्मीर के सुलगते रहने से ही उनकी जरूरत रहेगी। शांति स्थापित हो जाने पर उन्हें कौन पूछेगा?
लेकिन वक्त करवट ले चुका है। गत दिनों गिरफ्तार किए गए हुर्रियत नेताओं में स्वयं गिलानी का दामाद ही है। उसके अलावा जांच एजेंसी ने गिलानी के बड़े बेटे नईम को भी पूछताछ के लिए बुलाया है। नईम पेशे से चिकित्सक है और दस साल पाकिस्तान में रह कर भारत लौटा है। उसके बारे में कहा जा रहा है कि वह बड़े गिलानी के बाद उनका उत्तराधिकारी बनेगा। उत्तराधिकारी बनने के लिए पाकिस्तान में दस साल की ‘ट्रेनिंग’ पर्याप्त मानी जाती होगी। गिलानी के दामाद अल्ताफ अहमद शाह फंटूश को कुछ दिन पहले ही गिरफ़्तार किया जा चुका है। गिलानवालों का नजदीकी सहयोगी एयाज अकबर भी एनआईए के शिकंजे में आ गया है। यह एयाज ही है जो गिलानी के इशारे पर श्रीनगर में दुकानें बन्द करवाता है और न करने पर दुकानदारों को धमकाता है। तहरीक-ए-हुर्रियत का प्रवक्ता महराजुद्दीन कलवाल और पीर सैफुल्लाह को भी श्रीनगर में पकड़ लिया गया है। कलवाल हिजबुल मुजाहिद्दीन का आतंकवादी रहा है और अब अपने आपको सिविल सोसाइटी का रहनुमा बताता है। लेकिन गिलानी ने उसे महत्वपूर्ण जिÞम्मेदारी दे रखी थी- खोज अभियानों के दैरान सुरक्षा बलों पर पत्थर बरसाने वालों की टुकड़ियां भर्ती करना।  मीरवाइज उमर फारुक का सहयोगी शहीद-उल-इस्लाम भी शिकंजे में है। जम्मू-कश्मीर डेमोक्रेटिक फ्रीडम पार्टी के संस्थापक पुराने अलगाववादी शब्बीर शाह भी गिरफ्त में है। जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रÞंट के पुराने आतंकी फारुक अहमद डार, शब्बीर शाह का सहयोगी नईम खान भी पकड़े गए हैं। जांच एजेंसियों ने लंबी जांच के बाद माना है कि हुर्रियत आतंकवादियों को पैसा मुहैया करवाती है। जाहिर है, हुर्रियत के नेता अपनी जेब से तो यह पैसा देते नहीं होंगे। उन्हें कोई और पैसा देता होगा। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस को विदेशों से, खासकर सऊदी अरब और पाकिस्तान से पैसा मिलता है। यह कोई छिपा हुआ रहस्य नहीं है। इसे दिल्ली में बैठी सरकारें भी जानती थीं और आज भी जानती हैं। मध्य एशिया के मामलों के विशेषज्ञ प्रो. काशीनाथ पंडित मानते हैं कि ज्यादातर पैसा तो सऊदी अरब से ही आता है। पाकिस्तान तो मात्र उस पैसे को हुर्रियत कॉन्फ्रेंस और आतंकवादी गिरोहों तक पहुंचाने का माध्यम भर है। पिछले कुछ बरसों से चीन भी इस मैदान में कूद पड़ा है और उसने भी घाटी में परोक्ष रूप से अपनी हाजिÞरी दर्ज करानी शुरू कर दी है। लेकिन पैसा किस तरीके से आता है? जांच एजेंसियां मानती हैं कि पिछले कुछ साल से सीमा के आरपार जो व्यापार की आधिकारिक सुविधा प्रदान की गई है, उस व्यापार को कुछ व्यापारियों के माध्यम से पैसा लाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन यह अनेक तरीकों में से एक है। मामला केवल इतने तक सीमित नहीं है। बाहर से आने वाले पैसे में से कुछ हिस्सा हुर्रियत के ये नेता अपने पास भी रखते हैं। इस प्रकार इन्होंने अकूत संपत्ति एकत्र कर ली है। ये नेता तो परदा डालने के लिए भी कोई काम-धंधा नहीं करते, फिर उनके पास पिछले दो तीन दशकों में इतनी सम्पत्ति कहां से आ गई? हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेताओं ने अपने लिए तो बेहिसाब सम्पत्ति जोड़ ली और उसमें से कुछ पैसा निवेश कर पत्थर फेंक बटालियन तैयार कर ली। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ये लोग  बखूबी जानते हैं कि वे जिन बेरोजगारों को थोड़ा-बहुत पैसा देकर पत्थर फिंकवाते हैं, वे जानते हैं कि उनमें से अधिकांश मारे जाएंगे। लेकिन यह उनकी रणनीति का हिस्सा है। सभी सरकारों को इस बात का पता था लेकिन वे जान-बूझकर इस ओर से आंखें मूंद लेती थीं। दिल्ली की  सरकारें आम कश्मीरियों का अपमान करते हुए इन दलालों के माध्यम से कश्मीर की अंदरूनी समस्या हल करना चाहती थीं। यह नीति उन्होंने जवाहर लाल नेहरू से विरासत में हासिल की थी। किसी ने भी इस बात की ओर ध्यान नहीं दिया कि इस नीति के चलते नेहरू घाटी में शांति स्थापित करने के असफल प्रयास करते-करते वहां दलालों की जमात पैदा कर बैठे। इसी जमात के अलग-अलग घटक घाटी में शांति का ठेका लेने लगे। शेख अब्दुल्ला के कुनबे से बेहतर इस रहस्य को कौन जान सकता है? फारुख अब्दुल्ला जानते ही होंगे कि उनके मरहूम पिता शेख मोहम्मद अब्दुल्ला पर बाकायदा कचहरी में मुकदमा चला था कि उनकी जमात पाकिस्तान से पैसा लेती है। बाद में इस केस को नेहरू के दबाव के चलते वापस ले लिया गया था। कश्मीर में जो अलगाववाद फैला रहे हैं, वे पाकिस्तान से तो पैसा लेते हैं। उनका काम घाटी में अलगाववाद की आग को तेज या कम करना है। परिवर्तन केवल यह हुआ कि पहले घाटी में शांति स्थापित करने के लिए पहले वहां के कट्टरवादी राजनैतिक दल ‘ठेका’ लेते थे। बाद में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेताओं ने भी यह काम शुरू कर दिया। यह अलग बात है कि कालांतर में हुर्रियत के इन नेताओं को विदेशी ताकतों ने ‘ठेका’ देना शुरू कर दिया। अब काम घाटी में शांति स्थापित करना नहीं बल्कि अशांति पैदा करना था। लेकिन जिनको ‘ठेके’ पर काम करने की आदत पड़ जाती है, वे इस बात का ध्यान नहीं रखते कि मालिक ने काम क्या
दिया है।
इतना ही नहीं, धीरे-धीरे इन दलालों को भी कश्मीर मसले में ‘स्टेकहोल्डर’ माना जाने लगा और पूर्व की सेकुलर सरकारों के नेता तक ‘समस्या के समाधान’ के लिए इनसे मिलने लगे। दिल्ली से जो अधिकारी-नेता आते थे, उनका कश्मीर दौरा तब तक सफल नहीं होता था जब तक  वे गिलानवालों के यहां हाजिÞरी न लगा दें। इससे पूरे परिदृश्य में से आम कश्मीरी गायब होने लगा और पूरे मंजर पर दलालों ने कब्जा कर लिया ।
हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेताओं और उनके रिश्तेदारों की गिरफ़्तारी से आतंकवादी गिरोहों का तिलमिलाना स्वाभाविक ही था। लेकिन गुस्से में भी उन्होंने एक सामयिक प्रश्न उठाया है जिसका उत्तर दिया जाना उचित है। उन्होंने कहा कि हुर्रियत कॉन्फ्रेंस को विदेशों से ही पैसा नहीं मिलता बल्कि उनको भारत सरकार भी पैसा देती रही है। फारुख अब्दुल्ला ने अपनी बात को और ज्यादा पुख़्ता बनाने के लिए ए.एस.दुलत की एक किताब का हवाला दिया है, जो कुछ साल पहले लिखी गई थी। रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के मुखिया रह चुके एस ए.एस.दुलत ने इसमें कहा था कि भारत सरकार भी कश्मीर घाटी में कुछ लोगों को खरीदने के लिए पैसे देती रही है। यदि फारुख अब्दुल्ला, अपने आरोप को विश्वसनीय बनाने के लिए दुलत की किताब का सहारा न भी लेते तब भी उनकी बात पर विश्वास किया जा सकता था। वैसे तो उनके पिता पर भी यह आरोप लगता था कि रियासती काल में ब्रिटिश सरकार मुस्लिम कॉन्फ्रेंस/नेशनल कॉन्फ्रेंस को महाराजा हरि सिंह के खिलाफ आंदोलन चलाने के लिए पैसा देती थी। यह अलग बात है कि उसकी कभी जांच नहीं हुई। जब दिल्ली सरकार ने शेख अब्दुल्ला को अमेरिका के साथ साठगांठ करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया तब भी फारुख अब्दुल्ला (जो उन दिनों नेहरू के घर दिल्ली में आकर ठहरते थे) का कुछ नहीं हुआ। दरअसल कश्मीर घाटी के लोगों का गुस्सा ही इस बात को लेकर रहा कि दिल्ली उन पर विश्वास नहीं करती बल्कि  घाटी में से कुछ लोगों को पैसा देकर खरीद लेती है और चाहती है कि ये खरीदे हुए नेता कश्मीर घाटी के लोगों को हांकते रहें। घाटी में नेहरू ने नेताओं को खरीद कर स्थापित करने की जो परंपरा शुरू की थी, वह कालान्तर में भी चलती रही और कश्मीरी अपने आप को ठगा हुआ महसूस करते रहे। कांग्रेस ने कश्मीर में केवल नेता ही नहीं खरीदे बल्कि नौकरशाही में भी चुने हुए लोगों को खरीदा। फारुक अब्दुल्ला जब अपनी बात को पुख़्ता बनाने के लिए ए.एस.दुलत का सहारा लेते हैं तो उन्हें अब्दुल्ला परिवार के शासन के दौरान प्लेग की तरह फैले भ्रष्टाचार के लिए शायद किसी का सहारा न लेना पड़े। उसके लिए तो वे स्वयं ही प्रमाण हैं । यह अलग बात है कि फारुख में सच कहने की हिम्मत नहीं है। कांग्रेस सरकारें पहले तथाकथित राजनैतिक नेताओं को पालती रही लेकिन उनके भ्रष्टाचार से दुखी जनता ने उनका साथ छोड़ दिया। हुर्रियत कांफ्रेंस ने तो विदेशी पैसा हलाल करते हुए हजारों कश्मीरियों को मरवा दिया।
यहां एक और प्रश्न पर विचार करना जरूरी है कि क्या अलगाववादियों के लिए कश्मीर घाटी में किए जा रहे प्रयोग वहां के मुसलमान कश्मीरियों के हितों के लिए हैं? क्या वहां के स्थानीय कश्मीरियों में हिंदू-मुसलमान के प्रश्न को लेकर कोई विवाद है? क्या इस विवाद में हुर्रियत के अलगाववादी मुसलमान कश्मीरियों के हितों की लड़ाई लड़ रहे हैं? घाटी में जो रोज घट रहा है, उसे देख कर कोई भी सहज भाव से कह सकता है कि कश्मीर घाटी में यही मुद्दे हैं। लेकिन वास्तव में ये मुद्दे वहां हैं ही नहीं। कश्मीर को लेकर, भारत विरोधियों द्वारा बनाई गई रणनीति में ये मुद्दे केवल भ्रम पैदा करने के लिए उछाले जाते हैं। असल मसला भारत को सामरिक दृष्टि से कमजोर करने का है। उस रणनीति को पूरा करने के लिए कश्मीर घाटी में एक सुदृढ़ संगठन तैयार कर लिया गया है। यह शेख अब्दुल्ला की मुस्लिम/नेशनल कॉन्फ्रेंस के वक्त से ही तैयार हो गया था। उसमें हिंदू-मुसलमान दोनों ही थे। जैसा भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि देश में जयचन्दों की कमी कभी नहीं रही। जाने माने कश्मीरी पृथ्वी नाथ बजाज मरते समय तक कश्मीर घाटी को पाकिस्तान में मिलाने की वकालत करते रहे। जाने-माने वास्तुकार राम चन्द्र काक, जो कभी जम्मू कश्मीर के प्रधानमंत्री भी रहे थे, कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने के प्रयास करते रहे। मोती लाल मिस्त्री भी इसी जमात के हमसफर थे।
अभी जम्मू में जांच एजेंसियां जिस देविन्द्र सिंह बहल के दस्तावेज खंगाल रही हैं, वह सैयद अली शाह गिलानी का बहुत ही नजदीकी रहा है और अलगाववादियों द्वारा आतंकवादियों तक विदेशी पैसा पहुंंचाने की लम्बी शृंखला की कड़ी में दिखाई दे रहा है। इसलिए मामला केवल हिंदू-मुसलमान का नहीं है बल्कि हिन्दुस्थान को कमजोर करने और तोड़ने की एक लम्बी साजिश का हिस्सा है ।
मोदी सरकार ने दिल्ली की इस सत्तर साल पुरानी नीति को बदल दिया और हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेताओं को कश्मीर में ‘स्टेकहोल्डर’ मानने की बजाए कश्मीर की आम जनता को विश्वास में लेने की नीति अपनाई है। क्योंकि हुर्रियत कश्मीर की जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करती बल्कि वह पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व करती है। यदि मोदी सरकार को पाकिस्तान से कोई बात भी करनी होगी तो वह उससे सीधे केरगी, हुर्रियत के दलालों के माध्यम से बात क्यों करेगी? हुर्रियत के नेताओं की गिरफ़्तारी कश्मीर को लेकर बदली नीति का प्रतीक है। नई नीति में देशी वेश में विदेशी दलालों की समाप्ति का संकेत है। इसे फारुख अब्दुल्ला से अच्छी तरह और कौन समझ सकता है। उनकी छटपटाहट का असल कारण यही है ।    ल्ल

ShareTweetSendShareSend
Subscribe Panchjanya YouTube Channel
Download Panchjanya mobile apps: Google Play Store  / App Store

संबंधित समाचार

vp cp radhakrishnan releases book rss at 100 ek sadi sankalp ki in delhi

“युवाओं के राष्ट्रीय चरित्र को ढालने वाली आत्मा की कार्यशाला है संघ की शाखा” : उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन

Young Thinkers Meet Dehradun RSS Arun Kumar Sangh At 100 Ramesh Pokhriyal Nishank Ram Madhav India Foundation

देहरादून: ‘लेखक गांव’ में राष्ट्रीय युवा विचारक बैठक शुरू, संघ सहसरकार्यवाह अरुण कुमार ने ‘RSS@100’ पर दिया व्याख्यान

Azam Khan

बरकरार रहेगी आजम खान की सजा, अपील खारिज, अफसरों को ‘तनखैया’ बताकर किया था जूते साफ करवाने का ऐलान

RSS Bhayyaji Joshi Udaipur Seva Bharati Natural Health Center Inauguration Website Digital Launch

प्राकृतिक चिकित्सा वैकल्पिक नहीं, बल्कि समानान्तर पद्धति: भय्याजी जोशी

श्री नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री

PM मोदी का AI वीडियो वायरल! 22,000 रुपये लगाकर 25 लाख कमाने का झांसा, PIB Fact Check ने बताया फर्जी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

पंजाब में आप सरकार के मर्म पर प्रहार कर चुनावी एजेंडा सेट कर गए PM मोदी

Load More

ताज़ा समाचार

vp cp radhakrishnan releases book rss at 100 ek sadi sankalp ki in delhi

“युवाओं के राष्ट्रीय चरित्र को ढालने वाली आत्मा की कार्यशाला है संघ की शाखा” : उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन

Young Thinkers Meet Dehradun RSS Arun Kumar Sangh At 100 Ramesh Pokhriyal Nishank Ram Madhav India Foundation

देहरादून: ‘लेखक गांव’ में राष्ट्रीय युवा विचारक बैठक शुरू, संघ सहसरकार्यवाह अरुण कुमार ने ‘RSS@100’ पर दिया व्याख्यान

Azam Khan

बरकरार रहेगी आजम खान की सजा, अपील खारिज, अफसरों को ‘तनखैया’ बताकर किया था जूते साफ करवाने का ऐलान

RSS Bhayyaji Joshi Udaipur Seva Bharati Natural Health Center Inauguration Website Digital Launch

प्राकृतिक चिकित्सा वैकल्पिक नहीं, बल्कि समानान्तर पद्धति: भय्याजी जोशी

श्री नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री

PM मोदी का AI वीडियो वायरल! 22,000 रुपये लगाकर 25 लाख कमाने का झांसा, PIB Fact Check ने बताया फर्जी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

पंजाब में आप सरकार के मर्म पर प्रहार कर चुनावी एजेंडा सेट कर गए PM मोदी

India UK trade deal

Explainer: UK के साथ व्यापार समझौते से भारत को क्या फ़ायदा होगा?

Journalist Alok Goswami passes away

वरिष्ठ पत्रकार आलोक गोस्वामी का निधन, पाञ्चजन्य के अतुलनीय सहयोगी अब हमारे बीच नहीं रहे

खटीमा: ईसाई बने थारू जनजाति के 36 लोगों ने सनातन धर्म में की घर वापसी, जनेऊ और कलेवा धारण किया

अमेजन से मंगवाई हिंदी की पुस्तक, मिली अंग्रेजी की; शिकायत के बाद भी नहीं हुई कोई कार्रवाई

Load More
  • Privacy
  • Terms
  • Cookie Policy
  • Refund and Cancellation
  • Delivery and Shipping

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies

  • Search Panchjanya
  • होम
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • सामाजिक समरसता
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • पर्यावरण
      • नागरिक कर्तव्य
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विभाजन-विभीषिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
    • सुशासन संवाद
    • सागर मंथन
    • मुंबई संकल्प
    • अष्टायाम
    • गुरुकुलम
    • साबरमती संवाद
    • आधार इन्फ्रा
  • वेब स्टोरी
  • ऑपरेशन सिंदूर
  • विश्लेषण
  • लव जिहाद
  • खेल
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म-संस्कृति
  • पर्यावरण
  • बिजनेस
  • साक्षात्कार
  • शिक्षा
  • रक्षा
  • कला-साहित्य
    • पुस्तकें
    • पुस्तक समीक्षा
  • सोशल मीडिया
  • विज्ञान और तकनीक
  • मत अभिमत
  • श्रद्धांजलि
  • संविधान
  • आजादी का अमृत महोत्सव
  • पॉडकास्ट
  • पत्रिका
  • हमारे लेखक
  • Read Ecopy
  • प्रसार विभाग – Circulation
  • About Us
  • Contact Us
  • Careers @ BPDL
  • Advertise
  • Privacy Policy

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies