आवरण कथा:कोई नहीं ‘शरीफ’
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आवरण कथा:कोई नहीं ‘शरीफ’

Written byArchiveArchive
Aug 7, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 07 Aug 2017 10:56:11

 

 

भ्रष्टाचार के आरोप में नवाज को सत्ता से बेदखल कर देने के पीछे और कोई नहीं, सिर्फ पाकिस्तान की फौज है। सर्वोच्च अदालत के पीछे पाकिस्तानी फौजी अधिकारी ही हैं जो खुद बड़े से बडेÞ हेरफेर में लिप्त रहे हैं। लेकिन उन पर कोई उंगली नहीं उठाई जाती। यही है वह चीज जो पाकिस्तान को गर्त में धकेल रही है

प्रशांत बाजपेई

भ्रष्टाचार के आरोप में पाकिस्तान में नवाज  शरीफ को प्रधानमंत्री की कुर्सी से बेदखल कर देने वाले खुद कितने शरीफ हैं, यह सवाल (नवाज को छोड़कर) किसी और ने नहीं उठाया है। यह सवाल महत्वपूर्ण हो सकता था यदि पाक फौज को अपना मसीहा समझने वाली भ्रमित पाकिस्तानी अवाम यह सवाल पूछती। यदि इस सवाल के पूछे जाने का अंदेशा भी होता तो रावलपिंडी के दिमाग में पकने वाली नित नयी खुराफातों की रोकथाम हो सकती थी। यह पाकिस्तान की अपनी दिशा और दशा को बदलने वाला मोड़ भी साबित हो सकता था। लेकिन ऐसा हो नहीं सका, क्योंकि ‘काफिर’ भारत के विरुद्ध नफरत की घुट्टी पीकर पली-बढ़ी इस्लामिक ‘रिपब्लिक’ आॅफ पाकिस्तान की पीढ़ियां, पाक फौज को उस मुजाहिदीन लश्कर के रूप में देखती हैं जो ‘किसी दिन गाजी बनकर हिन्दुस्थान पर फतह’ हासिल करेगी। इस पागलपन के दुष्परिणामों को समझने वाले लोग यहां मुंह पर ताला लगा तमाशा देखने को मजबूर हैं, उधर दुनिया सांसत में है कि पाक फौज की लश्कर-ए-तय्यबा, तालिबान, हक्कानी, जैशे मुहम्मद या सिपह-ए-साहबा जैसी औलादों के हाथ यदि पाकिस्तानी परमाणु बम लग गए तो क्या होगा। गौर करने वाली बात यह है कि जिस लट्ठ से नवाज शरीफ को मारा गया है, उसे सालों से तेल पिलाया जा रहा था।
फैसला सुनाते हुए वहां की सबसे बड़ी अदालत ने दार्शनिक कवि खलील जिब्रान की कविता ‘पिटी द नेशन’ का पाकिस्तानी अनुवाद ‘काबिल-ए-रहम है वो कौम’ को उसमें जोड़ा (जिसमें नेशन का अनुवाद ‘कौम’ किया गया है)। मजे की बात यह है कि नवाज को निशाने पर लेकर कही गईं ये पंक्तियां भयभीत और भ्रष्ट न्यायतंत्र, सर्वशक्तिमान पंजाबी फौजी इस्टेब्लिशमेंट और पाकिस्तान के गाफिल समाज पर ज्यादा सटीक बैठती हैं, जैसे ‘काबिल-ए-रहम है वो कौम, जिसके पास अकीदा तो बहुत है मगर दिल दीन से खाली है।
‘काबिल-ए-रहम है वो कौम, जो अपने कपड़े खुद नहीं बुनती’,
‘काबिल-ए-रहम है वो कौम, जो अपनी रोटी खुद नहीं पैदा करती’,
‘काबिल-ए-रहम है वो कौम, जो जनाजों के जुलूसों के सिवा कहीं और अपनी आवाज बुलंद नहीं करती’,
‘काबिल-ए-रहम है वो कौम, जो टुकड़ों में बंटी है और हर टुकड़ा एक कौम होने का दावा करता है’।
फिलहाल भारत के बढ़ते वैश्विक कद और ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के बाद से तिलमिलाई बैठी पाक फौज ने पाकिस्तान के लोकतंत्र पर एक मर्मान्तक चोट कर दी है।
एक प्रहसन
नवाज के साथ जो हुआ है, उससे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की हैसियत और नेशनल असेम्बली की अहमियत पर सवाल खड़ा हो गया है। ताजा घटनाक्रम के पीछे थोड़ा-सा इतिहास है। ‘तानाशाह’ मुशर्रफ से जान बचाकर भागे पाकिस्तान के तत्कालीन निष्कासित प्रधानमंत्री सउदी अरब में शरण लिए हुए थे। अक्तूबर 1999 में उनका तख्तापलट करने के बाद फौजी तंत्र ने उन पर अपहरण, हत्या के प्रयास, आतंकवाद, भ्रष्टाचार और कर चोरी के आरोप लगाए थे। खबरें आ रही थीं कि मुशर्रफ नवाज शरीफ को फांसी दिलवाना चाहते थे और क्लिंटन प्रशासन की सख्ती के बाद पाकिस्तान से निर्वासित होने की शर्त पर उनकी जान बख्शने को तैयार हुए थे। बाद में क्लिंटन ने भी इस आशय की हामी भरी थी।
सऊदी अरब में रहते हुए शरीफ को उनके बेटे की कंपनी में चेयरमैन बनाया गया था और उनका वेतन  10,000 दिरहम तय किया गया था, जिसे उन्होंने कभी लिया नहीं और इसलिए उसका अपने चुनाव संबंधी दस्तावेज में जिक्र नहीं किया। बाद में यह मामला अदालत में लाया गया और उसने फैसला सुनाया कि भले ही नवाज ने वह 10,000 दिरहम का वेतन लिया नहीं, लेकिन उसे उनकी संपत्ति में ही गिना जाएगा। इसके साथ ही अदालत ने उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। मामले को चटपटा बनाने के लिए इसमें पनामागेट की ‘खबरों’ को जोड़ा गया। पनामागेट में दुनियाभर के नामचीन लोगों के विदेशी खातों के विवरण में नवाज के कुछ रिश्तेदारों का भी नाम आया था। नवाज का नाम नहीं था, लेकिन विदेश में उठे मामले पनामागेट के दुष्प्रचार को आधार बनाकर माहौल बनाया गया और फिर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को तकनीकी खामी के आधार पर दोषी करार दे दिया गया।
दुनिया में कोई देश ऐसा नहीं कर सकता सिवाय पाकिस्तान के, क्योंकि इस तरह से आप अपने राष्ट्राध्यक्ष को दुनिया के सामने निरीह बनाकर खड़ा कर देते हैं। अपनी संप्रभुता की कद्र करने वाला कोई भी देश ऐसा कभी नहीं होने देगा। इसीलिए सारी दुनिया में कूटनीतिक ढाल (इम्युनिटी) का प्रावधान है। फैसला सुनाते हुए अदालत ने यह भी नहीं कहा कि प्रधानमंत्री होने के नाते नवाज शरीफ के पास कूटनीतिक ढाल नहीं है, क्योंकि तब भविष्य के लिए एक नया संकट खड़ा हो जाता और बहस भी उस दिशा में मुड़ जाती जहां अदालत के इस फैसले पर तीखे सवाल उठने लगते।
पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय के इतिहास में आज तक किसी को भी सिर्फ जांच के आधार पर, ऊपर अपील करने का मौका दिए बिना इस तरह बाहर का रास्ता नहीं दिखाया गया। सेना के मुखौटों द्वारा तर्क दिया जा रहा है   कि न्यायाधिकरण के पांचों सदस्यों ने एकमत से फैसला दिया है। सचाई यह है कि फौज जब जज की कुर्सी के पीछे खड़े होकर फैसले करवाती है तो वे एकमत से ही दिए गए फैसले होते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण पाकिस्तान के आज तक के सबसे लोकप्रिय और ताकतवर प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को दी गई फांसी है, जब उनकी पत्नी नुसरत भुट्टो अदालत की देहरी पर सिर पटकती रह गयी और सारी दुनिया से हो रहे विरोध और दबाव के बावजूद फौजी तानाशाह जनरल जिया उल हक के इशारे पर न्याय सिर के बल खड़ा हो गया था।
नवाज शरीफ पर यह मुकदमा क्यों चलवाया गया, इसकी एक पृष्ठभूमि है। नवाज लगातार रावलपिंडी के एकछत्र साम्राज्य को चुनौती दे रहे थे। उन्होंने फौज के हाथ में रहते आए रक्षा और विदेश विभाग में प्रधानमंत्री के रूप में मजबूत पकड़ बनाई और फौज को नाराज करते हुए भारत की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाने की जुर्रत की थी। पहले वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में पहुंचे। फिर मोदी की इच्छा को ध्यान में रखते हुए कश्मीरी अलगाववादियों को भाव देना बंद किया। इससे फौज की भौंहे तन गर्इं, उसने अपने पिट्ठू इमरान खान और मौलाना ताहिर उल कादरी को मैदान में उतारा और शरीफ बंधुओं की नाक के नीचे अपने संरक्षण में उत्पात करवाया। मौके की नजाकत को समझते हुए नवाज थोड़ा पीछे हट गए। फौज के साज पर कश्मीर और बुरहान वानी का राग भी छेड़ा, लेकिन पूरी तरह हथियार डालने की तैयारी नहीं दिखाई। अंतत: फौज ने उन्हें सबक सिखाने का निश्चय किया और पर्दे के पीछे से पूरी पटकथा लिखी। इस प्रहसन का निर्देशन एवं  मीडिया में उसका मंचन करवाया। इस तरह फौज ने अपना खौफ और दबदबा फिर कायम कर लिया।
न्यायपालिका पर प्रश्नचिन्ह
इस नाजुक मोड़ पर अदालत ने ‘काबिल-ए-रहम है वो कौम’ का जो बेमेल उपयोग किया है, वह कोई नयी बात नहीं है। पाक न्यायालय न्याय के मजाक और अपने फैसलों में ऊटपटांग बातों को जोड़ने के लिए जाने जाते हैं। जैसे कि पाकिस्तानी समाज में इस्लामी मान्यताओं की दुहाई देकर अपनी मर्जी से शादी करना बड़ा गुनाह माना जाता है। इसलिए एक लड़की की  अपनी पसंद की शादी के खिलाफ टिप्पणी करते हुए अदालत ने लिखा कि ‘‘हिलेरी क्लिंटन, जो कि एक इतनी शैतानी जगह (अमेरिका) से आती हैं, उनका भी कहना है कि पारिवारिक मूल्यों का ध्यान रखना चाहिए, और औरत तो मल्लिका होती जो अपनी ‘जूती’ खरीदने खुद नहीं जाती, उसके मां-बाप उसके लिए बाजार से लाते हैं। पैर में सही बैठ गई तो उसे वह जूती दे दी जाती है’’।
     दुनिया कुछ भी कहे, इस्लाम के इस किले में कानून ऐसे ही चलता है। न्यायपालिका पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप तो हैं ही, अदालत का चाबुक खाकी वर्दी वालों पर कभी नहीं चलाया जाता। हां, फौज के जनरल ही किसी ब्रिगेडियर या कर्नल को निपटाने के लिये हरी झंडी दिखा दें तो बात अलग है। पाकिस्तान के इतिहास में फौज ने जब-जब तख्तापलट किया है, पाकिस्तान की सर्वोच्च अदालत ने चुपचाप रावलपिंडी को मनमानी करने के कानूनी औजार उपलब्ध करवाए हैं। आखिरकार मार्शल लॉ भी संविधान के अंतर्गत ही लगाया जाता है और उसे लागू करने के लिए संवैधानिक उपायों की ही आड़ ली जाती है। इसीलिए पाक फौज अदालतों में अपने लोगों को शामिल करवाती है और उन्हें ऊपर बढ़ाती जाती है। इसलिए अदालतें राजनीतिकों पर वजह-बेवजह सख्ती कर लेती हैं। इसके उलट, फौज और आईएसआई द्वारा अगवा कर प्रताड़ित किये गए, अथवा अपने सम्बन्धियों को खो देने वाले लोग जब-जब अदालतों में पहुंचे तब-तब अदालतों ने उन्हें कभी न्याय नहीं दिया। अन्यथा बलूचिस्तान, गिलगित-बाल्टिस्तान और जिए सिंध आंदोलन की हालत आज कुछ और होती। मानवाधिकार आयोग और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने कहा है कि मानवाधिकार हनन के इन संगीन मामलों में पाकिस्तान की अदालत अपनी सुरक्षा एजेंसियों के प्रमुखों को बुलाये और सवाल करे कि जवाबदेही किसकी है। अदालत हिम्मत नहीं कर पाई। शायद इरादा भी नहीं था, और बदनाम पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों ने अदालत में आकर कह दिया कि वे रक्षा मंत्रालय के प्रति जवाबदेह नहीं हैं। वास्तव में यह तय ही नहीं हो सका कि ये लोग किसके प्रति जवाबदेह हंै, और इस पर किसी को आश्चर्य भी नहीं हुआ। इसके पहले की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सरकार, जो गत 7 दशकों में अपना कार्यकाल पूरा करने वाली पहली सरकार थी, के राष्ट्रपति जरदारी और दूसरे लोगों पर यही अदालत तब से आज तक कुछ नहीं कर पाई, जबकि जरदारी 30 साल से पाकिस्तान में ‘मिस्टर टेन परसेंट’ के नाम से मशहूर रहे हैं। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी अब बेशर्मी से इस फैसले पर सीटी और तालियां बजा रही है। यह पाकिस्तान का दुर्भाग्य है कि एक बकरा दूसरे के हलाल होने पर जश्न मना रहा है।
शरीफ के दुश्मन की शराफत
पाक फौज मुल्क की रहनुमा और भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाके की अपनी छवि पेश करती आई है। सत्य यह है कि पाकिस्तान में फौज से ज्यादा भ्रष्ट कोई नहीं है। नैतिक, चारित्रिक या आर्थिक, हर पैमाने पर यहां भ्रष्टाचार सड़ांध मार रहा है। अपने अस्तित्व में आने के बाद इस फौज ने हर लड़ाई हारी है, लेकिन पाकिस्तान को फतह कर लिया है। पाक सेना पाकिस्तान की असली आका है। पाकिस्तान में इसे दबी आवाज में ‘इस्टेब्लिशमेंट’ कहा जाता है। पाकिस्तानी सेना के अधिकारी मीडिया में कहते दिखते हैं कि, फौज मुल्क की खिदमत के लिए है। पर सच एकदम उलट है। वास्तव में पूरा मुल्क पाकिस्तानी फौज की खिदमत कर रहा है। ब्रिगेडियरों और जनरलों के बच्चे अमेरिका और यूरोप के विश्वविद्यालयों में लाखों डॉलर सालाना फीस देकर पढ़ रहे हैं। बड़े अफसर सेवानिवृत्त होने के बाद करोड़ों के फार्म हाउस में ऐश के साथ रहते हैं, बड़े धंधे चलाते हंै। कभी नहीं पूछा जाता कि यह धन कहां से आता है। दुनिया में व्यापार करने वाली दो ही फौजे हैं, मिस्र और पाकिस्तान की। उसमें भी पाकिस्तानियों का कोई जवाब नहीं है। पाकिस्तान के स्टॉक एक्सचेंज से लेकर हर मोटे मुनाफे वाले कारोबार में फौज का हिस्सा है। फौज यहां बैंक, एयरलाइन्स, स्टील, सीमेंट, टेलीकॉम, पेट्रोलियम, ऊर्जा, शक्कर, टेक्सटाइल्स, सड़क परिवहन, जमीनी सौदे, शिक्षा, खेल, स्वास्थ्य, सेवा, किराना, बेकरी  हर क्षेत्र में व्यापार कर रही है। सारे बड़े सरकारी ठेके इन्हें ही मिलते हैं। फौजियों के रिश्तेदारों, सगे-सम्बन्धियों को भी वरीयता दी जाती है। गौरतलब है कि पाकिस्तान फौज में 90 प्रतिशत भर्तियां पंजाब से की जाती हैं, इसलिए यह आर्थिक लाभ भी फौज के माध्यम से पंजाब की जेब में ही जाते हैं। बलूचों और सिंधियों की नाराजगी के पीछे एक बड़ी वजह यह भी है। रक्षा मंत्रालय के उपक्रम-फौजी फाउंडेशन, आर्मी वेलफेयर ट्रस्ट, शाहीन फाउंडेशन और बहरिया फाउंडेशन कई स्तरों पर धनोपार्जन कर रहे हैं। लाभ जाता है, सेना के अधिकारियों की जेब में। एक खास बात यह है कि इन संस्थानों से फौजी तो कमा रहे हैं, पर ये संस्थान सदैव घाटे में रहते हैं। समय-समय पर सरकार इनको आर्थिक सहायता देती है, और इनको बैंकों से कर्ज दिलाने के लिए बैंक गारंटी लेती है। सैन्य अधिकारी मनचाहे आॅडिट करवाते हैं, सरकार भरपाई करती रहती है।
पाकिस्तान में सेना सबसे बड़ी जमींदार है। लाखों एकड़ जमीन पर उसका कब्जा है, जिसे बेचकर या  लीज पर देकर मोटा मुनाफा कमाया जाता है। सेना के अधिकारियों को भूमि देने के लिए 1912 का लैंण्ड एक्ट अब तक चल रहा है। इसके अंतर्गत फौजी अधिकारियों को 20 रुपये से 60 रुपये एकड़ भाव से जमीन दी जाती है। मेजर जनरल या उसके ऊपर के अधिकारी 240 एकड़, ब्रिगेडियर कर्नल 150 एकड़, लेफ्टिनेंट कर्नल 124 एकड़ और जे.सी.ओ. तथा एन.सी.ओ. 64-32 एकड़ जमीन खरीद सकते हैं। यही फौज तकनीकी खामी के आधार पर नवाज शरीफ को कुर्सी से उतरवा देती है और दुष्प्रचार किया जाता है पनामागेट के नाम पर। तमाशे के चरम बिंदु पर न्याय के मसीहा बने न्यायाधीश शेरो-शायरी करते हुए दार्शनिक अंदाज में फैसले सुनाते हैं।
आगे फिर वही इतिहास है
दुष्यंत कुमार का शेर है-‘मौलवी से डांट खाकर अहले मकतब, फिर उसी आयत को दोहराने लगे हैं’। तो पिंडी में बैठे आकाओं ने सबको नसीहत कर दी है। पुरानी लकीरों को अच्छी तरह रंग कर सबको हदें समझा दी गई हैं। जो आज हैं उनको भी, और जो आने वाले हैं उनको भी। फौज ने समझा दिया है कि उसके पास हमेशा तुरुप का इक्का होता है। पाकिस्तान का भविष्य अधर में लटका हुआ है और अधर में लटकी हुई है दुनिया की सुरक्षा, क्योंकि जिहादी आतंक के कारखाने पर दुनिया की सबसे बड़ी जिहादी संस्था का दबदबा बरकरार है। यह वही फौज है जिसके इशारे पर उसके परमाणु वैज्ञानिक एम.क्यू. खान ने चुराई हुई (और कुछ भीख में मिली) परमाणु तकनीक ईरान और उत्तर कोरिया को बेच दी थी। किसी अदालत से उसे कोई सजा नहीं हुई।
पाकिस्तान की यह वही अदालत है जो आतंक के विरुद्ध लड़ाई में पाकिस्तान के ‘साथी’ रहे अमेरिका को ओसामा बिन लादेन का पता बताने के आरोप में एक चिकित्सक को गद्दार ठहराकर जेल में ठूंस देती है। यह पाकिस्तान का वही समाज है जो ‘काफिरों’ के खिलाफ नफरत से उबलता रहता है और उसका खून चूस रही फौज को सिर आंखों  पर बिठाता है।
खलील जिब्रान ने आगे लिखा है-
‘काबिल-ए-रहम है वो कौम, जो अपने नेताओं का स्वागत तो ढोल-नगाड़े के साथ करती है,
   लेकिन उन्हें विदा करती है अपमानित करके’। इसके गहरे निहितार्थ हैं।    

सिंधु जल समझौते पर विश्व बैंक से पाकिस्तान को झटका
अपने बिगड़ते अंदरूनी हालात और बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसते पाकिस्तान को अब सिंधु जल समझौते के तहत भी बड़ा झटका लगा है। विश्व बैंक ने पाकिस्तान की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए भारत को झेलम और चिनाब नदी पर पनबिजली संयंत्रों के निर्माण की इजाजत दे दी है। इससे जम्मू-कश्मीर में किशनगंगा और रतले पनबिजली संयंत्रों के निर्माण के रास्ते में बाधा खड़ी करने की कोशिशों में जुटे पाकिस्तान को एक बार फिर मुंह की खानी पड़ी है।
विश्व बैंक ने कहा कि सिंधु जल संधि के तहत भारत को झेलम और चिनाब की सहायक नदियों पर कुछ शर्तों के साथ पनबिजली संयंत्रों के निर्माण की इजाजत है। भारत इस समझौते को तोड़े बिना अपनी परियोजनाएं पूरी कर सकता है। समझौते के तहत दोनों नदियों के साथ सिंधु को भी पश्चिमी नदियों के तौर पर घोषित किया गया है। साथ ही, उसने कहा कि भारत और पाकिस्तान 1960 की सिंधु जल संधि के क्रियान्वयन में मतभेदों को लेकर वाशिंगटन में अगले दौर पर चर्चा के लिए तैयार हो गए हैं। दोनों देशों के बीच यह बैठक सितंबर में होनी है। विश्व बैंक ने मामले पर सुनवाई के लिए दोनों देशों के सचिवों की बैठक बुलाई थी। सचिव स्तर की बातचीत खत्म होने के बाद वैश्विक संस्था ने 2 अगस्त को यह जानकारी दी।
दरअसल, पाकिस्तान चाहता था कि भारत द्वारा बनाए जा रहे दोनों संयंत्रों के डिजाइन को लेकर उसकी जो चिंता है, उसके समाधान के लिए एक पंचाट का गठन किया जाए। वहीं, भारत एक तटस्थ विशेषज्ञ नियुक्त करने की मांग कर रहा है जो इस मामले की पड़ताल कर सके।
भारत ने 2007 में 330 मेगावाट की किशनगंगा पनबिजली परियोजना पर काम शुरू किया था, जिसे 2016 में ही पूरा किया जाना था। लेकिन इस पर आपत्ति जताते हुए पाकिस्तान मामले को विश्व बैंक के स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (सीओए) में ले गया। इसके बाद सीओए ने 2011 में परियोजना पर अस्थायी रोक लगा दी। बाद में सीओए ने 2013 में भारत को किशनगंगा नदी के बहाव को मोड़ने की इजाजत दे दी। वहीं, चिनाब नदी पर 850 मेगावाट वाली रतले पनबिजली परियोजना की आधारशिला 25 जून, 2013 को रखी गई थी और 2018 तक इसका निर्माण पूरा किया जाना था। उधर, पाकिस्तान भी किशनगंगा नदी (पाकिस्तान में नीलम नदी) पर एक पनबिजली संयंत्र का निर्माण कर रहा है। उसका कहना था कि भारत द्वारा किशनगंगा संयंत्र के निर्माण के कारण उसके यहां पानी कम पहुंचेगा और उसके संयंत्र को बिजली उत्पादन के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल सकेगा।
गौरतलब है कि पाकिस्तान ने दोनों ही पनबिजली परियोजनाओं पर आपत्ति जताते हुए इसे सिंधु जल समझौते का उल्लंघन करार दिया था। भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में सिंधु जल समझौता हुआ था।

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